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घर में सब-कुछ होते हुए भी चारा काटने पर मजबूर क्यों हैं ये बूढ़ी नानी?

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श्रेया पांडेय

श्रेया पांडेय महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी में गायन संगीत की परास्नातक (फाइनल सेमेस्टर) छात्रा हैं. पेंटिंग और हाथ से बनी चीज़ों में बहुत रुचि है. घरवाले प्रेम से ‘वर्षा’ बुलाते हैं. सोशल मीडिया पर भी लिखती रहती हैं. उनका लिखा हुआ पोस्ट हम आपको यहां पढ़वा रहे हैं.


कुछ दिनों से ननिहाल में हूं. यहां मूंग और उड़द की फसल तैयार हो गयी है, जो रोज़ घर पर आती है. नाना-नानी दोपहर के खाने के बाद सारा दिन बातें करने और मूंग तोड़ने में बिताते हैं. उनके साथ एक कोई अनजानी (मेरे लिए) बूढ़ी नानी भी रहती हैं, जो उम्र में नाना और नानी से काफी बुजुर्ग लगती हैं. इनको गांव में सबलोग ‘झखड़ी बो’ के नाम से जानते हैं. एक दिन मैंने उनके पास जाकर उनका नाम पूछ लिया.

“नानी तोहार नाम का ह?”

80 साल के उनके जीवन में शायद उनसे ये सवाल उनकी शादी के बाद पहली बार किया गया था, इसलिए वो कुछ देर तक सोचती रहीं. फिर बोलीं,

“बहिनी का करबू हमार नाम जान के. केहू ना जानेला. हमहूं भुला गइनी. का जाने बियाह के पहिले लोग का कहें हमके.”

अभी मैं कुछ बोलती, इससे पहले ही नानी बोलीं,

“नाही हमार नाम ताजिया ह बचवा. याद आ गइल”.

बगल में बैठी मेरी मां ने कहा- तीजिया होगा, ताजिया तो कोई नाम नहीं होता.

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श्रेया और तीजिया नानी. (तस्वीर: श्रेया पांडेय)

मैंने उनसे पूछा कि आप इस उम्र में काम क्यों कर रही हैं नानी? तो वो चुप हो गईं. मैं समझ नहीं पाई कि वो चुप क्यों हैं. ये समझ पाना भी हमारे और आपके लिए बहुत मुश्किल है, या शायद तब तक के लिए अंदाज़ा लगाना नामुमकिन ही है, जब तक हम खुद उस उम्र में न चले जाएं. मैंने नासमझी में दोबारा वही सवाल पूछ लिया. तब उन्होंने कहा,

“बचवा हमके बइठल अच्छा ना लागेला..हमरी घरे कौनो चीज के कमी ना ह..कुल ठीक ह.”

ये कहते हुए वो कुछ सहमी-सी थीं. कुछ देर बाद जब मेरे नाना-नानी वहां से चले गए, तब तीजिया नानी ने अपने बच्चों का उनके साथ बर्ताव बताया.

“घरे खाना ना देन लोग बचवा. केहू से कहिहा जिन..पतोह कहेली कि ढेर खाइला.. एहीसे हम काम करीला..त तोहार नाना-नानी कुछ खाये के दे देन.”

कहते हुए वो फफक पड़ीं. तब मुझे समझ आया कि वो चुप क्यों थीं. किसी गांव वाले के सामने वो अपना दुख ज़ाहिर नहीं करना चाहती थीं. समाज में बच्चों की इज़्ज़त की परवाह थी उन्हें. बहू-बेटे और घर के बच्चों के इतने बुरे बर्ताव के बाद भी वो समाज में उनके इज़्ज़त, सम्मान और छवि की परवाह थी. ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि मेरी उनसे बातचीत के दौरान उन्होंने लगभग पांच-छह बार केवल यही कहा,

“केहू के बतइहा जिन रनिया..”

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खेत में काम करतीं तीजिया नानी. (तस्वीर: श्रेया पांडेय)

तीजिया नानी की पूरी कहानी सुनने के बाद मेरे मन में एक बात आई. अगर हमारे रहते ऐसे 80 साल की किसी बेजान-सी नानी को दूसरों के घर जाकर चारा केवल इसलिए काटना पड़े, ताकि वो अपना पेट भर सकें, तो लानत है हमारे होने पर. और ऐसा भी नहीं है कि तीजिया नानी के घर में आर्थिक परेशानी है या उनके घर में खाने की कमी है. उनके बारे में गांव वालों से पूछने पर पता चला कि उनका बड़ा-सा घर है. खेती भी होती है. बच्चे हैं. घर पर गाय-बैल और भी बहुत कुछ. इससे पता चलता है कि गांव में रहने के नज़रिए से उनका एक सम्पन्न परिवार है. तो फिर कमी किस बात की है?

इन सब के बीच मैं उनके लिए क्या कर सकती हूं, ये सोचकर मेरे पास जो कुछ थोड़े-बहुत पैसे थे, मैं लेकर उनके पीछे भागी. रास्ते में उन्हें रोक के पैसे देने चाहे, तो वो जैसे घबरा गयीं.

“अरे बचवा ई का करत हउ.? हमके पाप लगी..तू इहवां नानी के घरे न आयल हउ..इहवा के बाभन हउ.. हम तोहसे ना ले सकीला..बिना कुछ कइले तू हेतना देत हउ..हम ना लेब बहिनी.”

तब मुझे ये भी समझ आया कि ये बुज़ुर्ग स्वाभिमानी भी कितने होते हैं. केवल इनकी असमर्थता और मजबूरी इनके स्वाभिमान का दम तोड़ देती है. बस इस देश की सारी तीजिया नानियां मेरी तीजिया नानी की तरह अपना पेट भरने के साथ साथ अपने स्वाभिमान को सुरक्षित रखने में समर्थ नहीं होतीं. न शारीरिक तौर पर, न ही मानसिक. गांव के कुछ लोग और रिश्तेदारों ने मुझसे कहा,

“अरे ये तुम्हारे नाना के घर मजदूरी करने वाली औरत है, इससे इतना क्या सम्बन्ध रखना? ये सब ऐसे ही कहानियां गढ़ने वाली होती हैं”.

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तीजिया नानी से कभी किसी ने उनका अपना नाम नहीं पूछा था. (तस्वीर: श्रेया पांडेय)

मुझे ये समझ नहीं आता कि लोग इतने निष्ठुर, असंवेदनशील और गैर-ज़िम्मेदार कैसे हो सकते हैं?? इनसे और इन जैसे सभी लोगों से केवल इतना ही कहना है कि ये बूढ़े लोग हमसे हीरे-जवाहरात नहीं चाहते. ये बस चाहते हैं हमसे हमारा थोड़ा सा वक्त, हमारा दुलार-प्यार और दो वक्त का खाना. जहां हमें उन्हें पूरी सेवा और सम्मान देना चाहिए, वहां हम उनकी बेसिक ज़रूरतें भी पूरी नहीं करते. तिस पर खुद के संस्कारी, शिक्षित और परंपरावादी होने का दावा करते हैं.

अगर आपको ऐसा कोई अकेला पुरनियां कहीं दिखे, तो भले आप उनके लिए कुछ कर पाएं या न कर सकें, पर बैठकर पांच मिनट उनसे बात जरूर करें. उनका हाल पूछें. उनका दर्द केवल सुन लेना भी मरहम लगाने से कहीं ज़्यादा कारगर है. और अगर आप उनकी कुछ मदद करने में समर्थ रहे, तो कई पीढ़ियों के लिए झोलीभर के आशीर्वाद जुटा लेंगे.


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