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निर्भया की वकील सीमा कुशवाहा की कहानी जिन्हें बोला गया, 'निर्भया से भी बुरे तरीके से रेप करेंगे तुम्हारा'

फेसबुक पर एक पेज है, ह्यूमंस ऑफ बॉम्बे. ये हम और आप जैसे लोगों की कहानियां शेयर करता है. साथ-साथ कुछ ऐसे लोगों की भी, जो अपने काम की वजह से लोगों की नज़रों में आए. इस बार उन्होंने शेयर की एक बेहद खास प्रोफाइल. सीमा कुशवाहा की. ये निर्भया मामले में उसकी मां आशा देवी की वकील थीं. 20 मार्च को सुबह साढ़े पांच बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में निर्भया के रेपिस्ट्स को फांसी दे दी गई. 2012 से लेकर 2020 तक के इस सफ़र में निर्भया की मां आशा देवी ने लगातार लड़ाई जारी रखी. और इसमें उन के साथ खड़ी रहीं, सीमा कुशवाहा.  कैसे पहुंची वो यहां तक, और क्या-क्या झेला उन्होंने इस ट्रायल के दौरान, उन्होंने साझा किया. पढ़िए.

मैं उत्तर प्रदेश के उग्गरपुर से हूं. हाल तक अगर आप इसे गूगल करते, तो वहां भी नहीं मिलता. ऐसी छोटी जगह है ये. जब मेरी मां को पता चला कि वो प्रेगनेंट हैं, तो वो एबॉर्शन कराना चाहती थीं. क्योंकि पहले से ही उनकी तीन बेटियां और तीन बेटे थे. लेकिन उन्होंने नहीं कराया. जब मेरा जन्म हुआ, तो मेरे पापा और बुआ के अलावा सब लोग नाखुश थे. घर के बड़ों ने ये भी सोचा कि मुझे मार डालें. लेकिन मेरी बुआ और पापा ने मुझे बचा लिया. मेरे भाइयों ने मुझे अनचाहे बच्चे की तरह ट्रीट किया. लेकिन पिता हमेशा साथ खड़े रहे.

सीमा की सहेली रिंकी ने LLB के फॉर्म्स दिलाने में उनकी मदद की. घर छोड़कर वो पढ़ने गईं. किसी तरह नौकरियां करके खुद को सपोर्ट किया. ताकि अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी कर सकें. सीमा ने बताया कि कानपुर के कोर्ट्स में महिला वकीलों को डेट्स नहीं मिलती थीं. सिर्फ इसलिए कि वो महिला थीं. वहां से वकालत छोड़कर सीमा दिल्ली आ गईं, UPSC की तैयारी करने. जब निर्भया गैंगरेप हुआ, तब वो दिल्ली के एक पीजी में रह रही थीं. जब प्रोटेस्ट हुए, तब उन्होंने भी उसमें हिस्सा लिया. साकेत कोर्ट में चार्जशीट दाखिल होते समय भी वो वहां मौजूद थीं. वकीलों से विनती करते हुए कि आरोपियों का केस न लें. तब से ही वो लगातार आशा देवी के सम्पर्क में रहीं, सभी सुनवाइयों में जाती रहीं.

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सीमा आगे पढ़ना चाहती थीं. लेकिन रिश्तेदार तैयार नहीं थे. उनकी बुआ ने उन्हें जो सोने के गहने दिए थे, उन्हें बेचकर उन्होंने पढ़ाई जारी रखी. उसके बाद छोटी-मोटी नौकरियां कीं. (तस्वीर: सीमा कुशवाहा फेसबुक)

2014 में उन्होंने आशा देवी से कहा,

‘मैं लडूंगी ज्योति का केस. हम छोड़ेंगे नहीं उन्हें’.

‘मुझे अभी भी याद है कि मैंने किस तरह सभी आरोपियों को झूठ बोलते देखा. एक औरत होने के नाते मैं उन्हें पीट-पीट कर अपने हाथों से सज़ा देना चाहती थी. लेकिन एक वकील होने के नाते मैंने अपने दिल पर पत्थर रख लिया. मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती, मुझे कैसा महसूस हुआ जब वो रॉड अदालत में पेश की गई. मुझे लगा मैं बेहोश हो जाऊंगी. उन्होंने फिर भी झूठ बोला और कहा कि उन्होंने ये रॉड नहीं देखी थी. जबकि उनकी उंगलियों के निशान उस रॉड पर हर जगह मौजूद थे.’

सीमा ने बताया कि किस तरह दोषियों के वकील AP सिंह ने अपीलों को रोकने की कोशिश की. जजों पर मौखिक हमले किए. हाई कोर्ट ने मौत की सज़ा सुनाई, उसके बाद भी मामला आगे नहीं बढ़ रहा था. निर्भया के माता-पिता उम्मीद हार रहे थे.

‘मेरे लिए सुप्रीम कोर्ट में तारीख पाना भी मुश्किल था. मुझे बताया गया था कि 2021 के पहले सुनवाई नहीं होगी. लेकिन मैंने वकीलों को कॉल किया, रजिस्ट्रार के ऑफिस के पास दरख्वास्त लगाई, और एक साल बाद मुझे सुनवाई की तारीख मिली. दो साल और 11 महीनों बाद सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा सुनाई. लेकिन AP सिंह ने दोषियों को बचाने की कोशिश जारी रखी. हर बार जब मैं निर्भया के कमरे में जाती थी, उसकी मुस्कुराती हुई फोटो देखती थी, तो मुझे और मेहनत से कोशिश करने की ताकत मिलती थी. मैं उसकी तस्वीर को देखती रहती थी. मैंने उससे वादा किया कि उसके दोषियों को फांसी होगी. ये साबित करने के लिए कि उसने उस रात कुछ गलत नहीं किया था. कि रात को आठ बजे अपने पुरुष मित्र के साथ बाहर होना, उन आदमियों को ये हक़ नहीं देता कि वो उसका रेप करें, उसकी जान लें.’

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ये सीमा के करियर का पहला केस था जो सुप्रीम कोर्ट गया. वहां पहुंच कर उन्होंने लड़ाई जारी रखी. (तस्वीर: सीमा कुशवाहा फेसबुक)

सीमा ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को चिट्ठियां लिखीं. मीडिया में हो रही देरी पर सवाल उठाए. कोर्ट में जिरहें कीं. सीमा वकालत में नई थीं, और AP सिंह के पास काफी अनुभव था, लेकिन सीमा ने हार नहीं मानी.

‘फांसी वाले दिन सुबह साढ़े पांच बजे, जब आंटी,अंकल और मैंने उनकी फांसी की ख़बर देखी, हम एक दूसरे के गले लगकर रोए. हम आखिरकार जीत गए थे- ज्योति की आत्मा को शांति मिल गई थी.

हम सात साल से भी ज़्यादा समय तक लड़े, लेकिन अभी हमें बहुत दूर जाना है. क्योंकि मानसिकता अभी भी वही है. जब उनको फांसी हो गई, मेरे सोशल मीडिया हैंडल्स पर मुझे गालियां पड़ने लगीं. उन्होंने मुझसे कहा, ‘हम निर्भया से भी बुरे तरीके से बलात्कार करेंगे तुम्हारा’. मुझे उन कमेंट्स की कोई परवाह नहीं. लेकिन जो चीज मुझे दुःख देती है वो ये है कि तब से लेकर अब तक मेरे पास 500 से भी ज्यादा मैसेज आ चुके हैं महिलाओं के. कुछ ने मुझे FIR की कॉपियां भेजी हैं, जो उन्होंने दर्ज कराईं, पर कुछ नहीं हुआ. औरों ने मुझे बताया कि किस तरह उनका रेप किया गया, शोषण किया गया और न्याय नहीं मिला उन्हें. मैं उन सब तक मैसेज पहुंचाना चाहती हूं- हम छोड़ेंगे नहीं उन्हें. लड़ाई अभी शुरू हुई है’.

सीमा की तरह ही दीपिका सिंह राजावत ने भी इस तरह के थ्रेट्स का सामना किया था. दीपिका कठुआ गैंगरेप और हत्या मामले में मारी गई बच्ची के परिवार की वकील थीं. उन्होंने लॉजिकल इंडियन को दिए एक इंटरव्यू में बताया,

‘मैंने हर तरह के हैरेसमेंट का सामना किया. जब मैंने केस उठाया, तब आरोपियों के सपोर्ट में खड़े लोगों ने मुझे बर्बाद कर देने की धमकी दी. जब मुझे परिवार के वकील की जिम्मेदारी से हटाया गया, तब मुझ पर स्वार्थी होने के आरोप लगे. कहा गया कि मैंने लड़की के परिवार को छोड़ दिया. सिर्फ पब्लिसिटी पाने के लिए ये सब किया. मुझे एंटी-हिन्दू और एंटी नेशनल कहा गया. किराए पर घर देने को लोग अब तैयार नहीं मुझे.’

दीपिका को लगातार एक साल तक जान से मारने की धमकियां मिलती रहीं. उन्होंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी.

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दीपिका सिंह राजावत पर आरोप लगाए गए कि उन्होंने कठुआ केस सिर्फ अपनी पब्लिसिटी के लिए लिया, और परिवार को अकेला छोड़ दिया. (तस्वीर: PTI)

हमारे सोशल मीडिया पर कोई हमें एक गाली दे देता है, तो चार दिन मन खराब रहता है. उसके बीच इन महिलाओं ने जान की धमकियां झेलते हुए, गालियां खाते हुए अपना काम जारी रखा. निर्णयों से ज़्यादा महत्वपूर्ण उनके पीछे की ये कहानियां हैं, जिनको जानना ज़रूरी है. ताकि कल किसी छोटे से गांव की किसी छोटी सी लड़की के मन में इच्छा जगे, कि वो भी कुछ करना चाहती है, तो उसके सामने ये कहानियां मौजूद हों. हिम्मत की. ताकत की. जिनके अंत में राजकुमारी को बचाने राजकुमार नहीं आता. वो अपनी लड़ाई खुद लड़ती है. जीतती है. और दूसरों के लिए हाथ बढ़ाती है.


वीडियो: निर्भया के दोषियों की फांसी के लिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई करने वाली जज कौन हैं? 

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