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पन्नी में बंधी लाशों को जलाने वाली औरतों की कहानी, जो लोगों के घटिया तानों से ऊपर उठ चुकी हैं

सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है. उसमें कुछ ऐसा दिख रहा है, जिसे हम आपको स्क्रीन पर दिखा नहीं सकते. लेकिन बता ज़रूर सकते हैं. एक लड़की तीन-चार लड़कों के साथ मिलकर एक गाड़ी से एक-एक करके डेड बॉडीज़ निकाल रही है. और उसे लकड़ की चिता पर रख रही है. सारे शव पॉलिथीन से लिपटे हुए हैं. शवों को चिताओं पर रखने के बाद उन्हें जलाया जा रहा है. मतलब अंतिम संस्कार किया जा रहा है. इस वीडियो को 8 मिलियन माने 80 लाख से भी ज्यादा बार देखा जा चुका है. कौन है ये लड़की? और क्यों वो इन शवों का अंतिम संस्कार कर रही है? सब बताएंगे आज की बड़ी खबर में. साथ ही उन बाकी महिलाओं के बारे में भी बताएंगे जो कोरोना के दौरान लावारिस शवों को उठाने से लेकर उनका अंतिम संस्कार कर रही हैं.

जिस वायरल वीडियो का हमने ज़िक्र किया, वो भारत का नहीं नेपाल का है. वीडियो में दिखने वाली लड़की का नाम है सपना रोका मागर. पिछले करीब डेढ़-दो साल से वो लावारिस शवों को आखिरी विदाई देने का काम कर रही हैं. 2020 में BBC की ‘दुनिया की 100 प्रभावशाली महिलाओं’ की लिस्ट में भी सपना का नाम आ चुका है. ‘ग्लोबल वॉइस’ नाम की एक वेबसाइट के मुताबिक, सपना अभी 19 साल की हैं. नेपाल के एक छोटे से गांव में जन्म हुआ था. पढ़ाई के सिलसिले में शहर गई थीं, वहां एक टीनेज लड़के से प्यार हुआ, दोनों ने परिवार के खिलाफ जाकर शादी कर ली, जो ज्यादा दिन तक चल नहीं सकी. परिवार वालों ने पहले ही सपना को अपनाने से मना कर दिया था, करीब तीन महीने तक उनके पास रहने की जगह नहीं थी, सड़क पर रहना पड़ा. फिर होमलेस मैनेजमेंट एंड रिहेबिलिटेशन सेंटर नाम की एक संस्था से वो जुड़ीं और उसके बाद से ही वो लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने का काम कर रही हैं. हिंदू रीति से वो अंतिम विदाई दे रही हैं.

Sapana Roka Magar
लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करतीं सपना. (फोटो- फेसबुक)

BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, जब सपना और उनकी संस्था को कोई लावारिस शव मिलता है, तो वो पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल ले जाते हैं. 35 दिन तक इंतज़ार करते हैं, अगर तब तक शव की पहचान करने वाला कोई नहीं मिलता, तो फिर यही संस्था अंतिम संस्कार करती है. सपना कहती हैं कि हर किसी को सही तरीके से आखिरी विदाई पाने का अधिकार है. ये भी कहती हैं कि वो ये काम सोशल वर्क के तौर पर नहीं करतीं, बल्कि खुद के मन की शांति के लिए करती हैं.

भारत की औरतों की कहानियां भी सुनिए

सपना की तरह भारत में भी बहुत सी औरतें इस वक्त लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर रही हैं. ओडिशा के भुवनेश्वर में एक शादीशुदा कपल साथ मिलकर ये नेक काम कर रहा है. ‘आज तक’ के मोहम्मद सुफियान की रिपोर्ट के मुताबिक, पति का नाम प्रदीप है और महिला का नाम मधुस्मिता है. मधुस्मिता कोलकाता के एक बडे़ अस्पताल में नर्स थीं. और उनके पति भुवनेश्वर में रहकर शवों का अंतिम संस्कार करते थे. इसी काम के दौरान एक बार वो खुद हादसे का शिकार हो गए और उनके पैर में चोट आ गई. ऐसे में मधुस्मिता ने अपनी नौकरी छोड़ी और पति की मदद करने का फैसला किया. वो ट्रेन की पटरी से लावारिस शवों को उठाती हैं और उन्हें आखिरी विदाई देती हैं. अब ऐसा नहीं है कि ये काम बड़ी आसानी से वो कर लेती हैं. कई तरह की दिक्कतें भी आती हैं, जैसे महिला होने के चलते उन्हें ताने सुनने पड़ते हैं, रेलवे ट्रेक पर अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है. इन सबसे पार पाकर भी मधुस्मिता लगातार अपना काम कर रही हैं. अपने इस काम के सिलसिले में उन्होंने हमसे फोन पर बात की. उन्होंने कहा-

“लोग तो बहुत कुछ बोलते हैं. कभी बोलते हैं कि हमारे घर के सदस्य का शव है, तुम लड़की हो, तुम मत करो कुछ. ठीक है मैं अगर नहीं जाऊंगी उस शव के लिए तो आप जाइए, तो वो कहते हैं कि नहीं हमें डर लगता है. बहुत प्रॉब्लम होती है. लोगों का ताना सुनना पड़ता है. मेरे मायके वाले भी मुझसे बहुत नाराज़ हैं. क्योंकि मैं राजवंशी परिवार से आती हूं, तो उन्हें अच्छा नहीं लगता कि मैं ऐसे शव उठाऊं. वो मुझसे अच्छे से बात नहीं करते हैं. और किसी की बात मैं क्या ही बताऊं. दूसरी ये दिक्कत होती है कि जब हम ट्रेन के ट्रैक से शव उठा रहे होते हैं, तब ट्रेन कहां से आ जाती है कुछ पता नहीं चलता. जो रेलवे ट्रैक होता है वहां खतरा ज्यादा होता है. अलग-बगल रोड तो होती नहीं, या तो नदी होती है या जंगल होता है. हम पानी में तैरकर शव लाते हैं, पहाड़ पर चढ़ना होता है. बहुत रिस्क होता है.”

Last Rites
भुवनेश्वर की मधुस्मिता.

अब चलते हैं तेलंगाना की तरफ. यहां तो 16 साल की एक लड़की ये काम कर रही है. नाम है देवीश्री. डॉ अन्नन सेवा फाउंडेशन नाम के NGO से जुड़ी हैं. देवीश्री के साथ बाकी औरतें भी हैं. जो NGO की तरफ से लावारिस शवों को आखिरी विदाई देने का काम कर रही हैं. ‘इंडिया टुडे’ से जुड़े आशीष पांडे की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले ये NGO ऐसी लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार में मदद करता था, जो रेलवे ट्रैक पर बेहद बुरी हालत में मिलती थीं, लेकिन कोरोना के मामले बढ़ने के बाद इस NGO ने कोविड से जान गंवाने वाले लोगों का अंतिम संस्कार करना भी शुरू कर दिया. देवीश्री बताती हैं कि जब उन्हें कोई लावारिस शव मिलता है, तो उनका NGO शव के परिवार वालों का पता लगाने की कोशिश करता है, जब इसमें कामयाबी नहीं मिलती, तब अंतिम संस्कार कर दिया जाता है.

अब आइए यूपी के लखनऊ में. यहां वर्षा वर्मा नाम की एक महिला रहती हैं. इनकी एक संस्था है ‘एक कोशिश ऐसी भी’. ये संस्था कोविड की वजह से जान गंवाने वाले लोगों के लिए शव वाहन मुहैया कराती है. वो भी निशुल्क. और जिन मरीज़ों का अंतिम संस्कार करने के लिए उनके परिवार वाले आगे नहीं आते हैं, उनका अंतिम संस्कार भी करती है. पूजा बताती हैं कि उनकी संस्था तो कई साल पुरानी है, लेकिन कोरोना के मामले बढ़ने के बाद उन्होंने शव वाहन की शुरुआत की. उन्होंने ‘द लल्लनटॉप’ को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी दोस्त ने कोविड के चलते दम तोड़ दिया था, श्मशान घाट तक ले जाने के लिए शव वाहन या एंबुलेंस नहीं मिल रहा था, जो भी मिल रहे थे वो 10 से 12 हज़ार रुपए मांग रहे थे. इसी के बाद वर्षा ने फैसला किया वो वो शव वाहन की भी शुरुआत करेंगी.

Devishree
तेलंगाना की देवीश्री.

महाराष्ट्र के पुणे में भी 25 महिलाओं का एक ग्रुप क्रिमेशन का काम कर रहा है. यहां के वैकुंठ क्रिमेटोरियम यानी श्मशान में, ये औरतें काम कर रही हैं. सभी अलग-अलग जगहों पर नौकरी भी करती हैं, ऐसे में अपनी जॉब के बाद पांच-पांच घंटे का वक्त वो क्रिमेटोरियम के लिए निकालती हैं और शिफ्ट के बेसिस पर काम करती हैं. श्मशान में किसी शव के आने के पहले ये औरतें लकड़ियां इकट्ठा करती हैं, शव के लिए चिता तैयार करती हैं. शव का अंतिम संस्कार होने के बाद, अगले दिन ये जली हुई चिता में से अस्थियां इकट्ठा करती हैं, जब शव के परिवार वाले आते हैं, तो ये औरतें इन अस्थियों को उन्हें सौंपती हैं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इन 25 में से एक महिला बताती हैं कि मिड अप्रैल से कोविड की वजह से जान गंवाने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई थी. ऐसे में श्मशान में बहुत लोड बढ़ गया था. पहले अकेले पुरुष ही ये काम कर रहे थे, लेकिन लोड बढ़ने के बाद महिलाओं ने भी ये ज़िम्मेदारी उठाई.

धर्म क्या कहता है?

कोरोना के टाइम पर शवों का अंतिम संस्कार करने वाली औरतों की लिस्ट लंबी है. हमने तो कुछ ही की जानकारी आपको दी है. जिन भी औरतों से हमने बात की, उनमें से ज्यादातर ने हमें ये बताया कि शुरुआत में सोसायटी के लोगों ने ये सवाल खड़ा किया था कि वो औरत हैं, ऐसे में अंतिम संस्कार या अंतिम यात्रा से जुड़ा काम वो कैसे कर सकती हैं. ऐसा इसिलए, क्योंकि हमारे देश का एक बड़ा हिस्सा ये मानता है कि अंतिम यात्रा में औरतें नहीं जा सकतीं, ये काम केवल पुरुषों का है. धर्म का हवाला देकर लोग ये नियम बताते हैं. तो हमने सोचा कि क्यों न धर्म की थोड़ी जानकारी रखने वाले लोगों से ही इस मुद्दे पर बात कर ली जाए. सबसे पहले हमने बात की प्रोफेसर आर्कनाथ चौधरी से. ये श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय गुजरात में वाइस चांसलर हैं. हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार में औरतों की भूमिका पर वो कहते हैं-

“किसी लड़की द्वारा अंतिम संस्कार करना मना नहीं है. मनु ने भी मना नहीं किया था. उन्होंने एक परंपरा दिखाई थी. कहा था कि यदि पुत्र है तो बड़े बेटे को अंतिम संस्कार का अधिकार सबसे पहले मिलेगा. अगर बड़ा बेटा जीवित नहीं है, या फिर कहीं बाहर है, तो मंझले बेटे को बड़ा मानकर अधिकार दिया जाएगा. मंझला भी अगर मौजूद नहीं है तो छोटे बेटे को ये अधिकार चला जाता है. फिर उन्होंने कहा कि जिनके पुत्र नहीं हैं, केवल पुत्री हैं तो अंतिम संस्कार का पहला अधिकार पुत्री के बेटे यानी नाती को मिलेगा. अगर पुत्री का बेटा भी नहीं है, कोई और सगा संबंधी नहीं है, तो पुत्री भी अंतिम संस्कार कर सकती है. लोगों ने इस नियम को गलत समझ लिया. और फिर समय के साथ इस नियम में बदलाव होते गए और लोग ये मानने लगे कि औरतें अंतिम संस्कार नहीं कर सकतीं. लोगों की व्यक्तिगत इच्छा ही नियम बनते चली गई. दूसरा अंतिम यात्रा की अगर बात करें, तो हमारे यहां कहीं ये विचार नहीं किया गया है कि महिला जाए या नहीं जाए. पहले लोग महिलाओं को इसलिए श्मशान ज्यादा नहीं जाने देते थे, क्योंकि घर में बच्चे भी होते हैं, महिलाओं का सीधा असर बच्चों पर पड़ता है, तो उनकी सुरक्षा के लिए रोकते थे. लेकिन समय के साथ ये लोक व्यवहार बन गया. सामाजिक विकृतियां पैदा होते गईं. धर्मशास्त्र ने कहीं कोई निर्देश नहीं दिया है. कोई बंधन नहीं है.”

इस्लाम धर्म में अंतिम संस्कार में महिलाओं को लेकर क्या नियम हैं, ये जानने के लिए हमने बात की शीबा फहमी से. ये सीनियर जर्नलिस्ट हैं और मुस्लिम धर्म विशेषज्ञ हैं. उन्होंने कहा-

“इस्लामी शरिया में अंतिम संस्कार को तद्फीन कहते हैं. इसके प्रोसेस में केवल दो बातों का ख्याल रखना होता है. पहला ये कि जल्द से जल्द हो. दूसरा सादगी से हो. किसी भी तरह का दिखावा नहीं होना चाहिए. केवल कफ़न का खर्च आता है. ये कहा गया है कि अगर मर्द का शव है तो भाई-बेटा जैसे उसके घरवाले ही उसे नहलाएं, और खातून हैं तो बहन-बेटी जैसे घरवाले नहलाएं. इस तद्फीन की प्रक्रिया में महिलाओं को किसी खास तरह का रोल न तो दिया गया है और न ही मना किया गया है. सिर्फ इतना लिहाज़ रखने को कहा गया है कि वो महिलाएं जो अपने गम पर काबू नहीं पा सकतीं, या जो भी लोग अपने गम पर काबू नहीं पा सकते, जो ज़ोर-ज़ोर से रोते हैं, चीखते हैं, खुद को नुकसान पहुंचाते हैं गम की हालत में, सिर पीट रहे हैं, सीना पीट रहे हैं, या अपना सिर ज़मीन पर मार रहे हैं, इस तरह जो गमज़दा लोग हैं उनके लिए ये इजाज़त नहीं है कि वो वहां जाएं और कब्रिस्तान की शांति भंग करें.”

Sheeba

सिख धर्म के नियमों की जानकारी हमें SGPC के सदस्य गुरचरण सिंह ग्रेवाल ने दी. उन्होंने कहा-

“सिखों में ये कॉन्सेप्ट है कि जो आपने कर्म किए हैं, उनका हिसाब होगा, न कि आपका लड़का आपको मोक्ष दिलवा सकता है. हमारी हिस्टोरिकल बात ये है कि जब चमकौर की जंग हुई थी, तब गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के साथी शहीद हुए थे, तब उनका अंतिम संस्कार एक महिला ने किया था. तो हमारे धर्म में ऐसी कोई बात नहीं है. चाहे लड़की हो या लड़का हो, सब बराबर हैं.”

Gurcharan Singh

इसाई धर्म के नियम जानने के लिए हमने बात की पादरी आशीष जॉन आर्चर से. उन्होंने बताया-

“आधुनिक समाज में महिलाएं भी पुरोहित बन रही हैं. रिफॉर्म्ड चर्च ट्रेडिशन में ऐसा हो रहा है. जिस चर्च में महिलाएं पुरोहित हैं, वहां महिलाएं भी अंतिम संस्कार करती हैं. किसी तरह की कोई रोक नहीं है. जो अधिकार पुरुष पुरोहित के हैं, वही महिला पुरोहित के भी हैं. अगर कहीं पर किसी वजह से कोई पुरोहित मौजूद नहीं है, तो जो भी सीनियर व्यक्ति वहां उपलब्ध होगा, चाहे वो पुरुष हो या महिला, वो अपने धर्माध्यक्ष से परमिशन लेकर अंतिम संस्कार की विधी को पूरा कर सकता है.”

Ashish John

इस उम्मीद के साथ कि औरतों के साथ होने वाले भेदभाव को हर स्तर पर समय रहते खत्म किया जाएगा, या फिर कम से कम कम किया जाएगा.


वीडियो देखें: डेढ़-दो साल से वो लावारिस शवों को आखिरी विदाई देने का काम करने वाली सपना की कहानी क्या है?

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