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कपड़ों और खिलौनों के नाम पर बड़ी आसानी से भरा जा रहा बच्चों के दिमाग में ज़हर

भारत से करीब आठ हज़ार किलोमीटर दूर एक देश है. स्पेन. यहां इस वक्त बहुत सारे स्कूलों में मेल टीचर्स स्कर्ट्स पहनकर बच्चों को पढ़ाने जा रहे हैं. हैरान हुए? थोड़ी हैरानी हमें भी हुई थी. इसलिए क्योंकि हमारी परवरिश ही इसी तरह से हुई है कि हम किसी लड़के को लड़कियों के कपड़ों में नहीं देख सकते या अगर देखते भी हैं तो उसे हजम नहीं कर पाते. खैर, स्पेन में जो हो रहा है, उसकी अपनी एक वजह है. क्या है वो वजह? डिटेल में बताते हैं.

‘द न्यू यॉर्क पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अक्टूबर-नवंबर की बात है. स्पेन के एक स्कूल में पढ़ने वाले 15 साल के माइकल गोमेज़ स्कर्ट पहनकर पहुंचे. ये स्कूल स्पेन के बिलबाओ सिटी में था. माइकल को ऐसा करते देख उसे निष्कासित कर दिया गया और एक सायकोलॉजिस्ट के पास भेज दिया गया. माइकल ने इसके बाद एक टिकटॉक वीडियो भी डाला था, जिसमें बताया था कि फेमिनिज़्म और डाइवर्सिटी को सपोर्ट करने के लिए उसने स्कर्ट पहना था.

माइकल के निष्कासन के बाद स्कूल के कई सारे टीचर्स और स्टूडेंट्स उनके सपोर्ट में आए. 4 नवंबर को स्कूल के गणित के टीचर जॉस पिनास सबसे पहले स्कर्ट पहनकर बच्चों को पढ़ाने पहुंचे. अपनी एक तस्वीर भी उन्होंने ट्विटर पर डाली थी. लिखा था-

“20 साल पहले अपने सेक्शुअल ओरिएंटेशन की वजह से मैंने उत्पीड़न और अपमान का सामना किया था. उसी हाई स्कूल में, जहां इस वक्त मैं टीचर हूं. मैं स्टूडेंट माइकल को सपोर्ट करता हूं, जिसे स्कूल से निष्कासित कर दिया गया और सायकोलॉजिस्ट के पास भेज दिया गया, वो भी इसलिए क्योंकि वो स्कर्ट पहनकर क्लास में गया था.”

इसी ट्वीट के साथ टीचर पिनास ने #ClothesHaveNoGender मूवमेंट की शुरुआत की. कई सारे स्टूडेंट्स और टीचर ने इस मूवमेंट को सपोर्ट किया. अब टीचर पिनास के अलावा स्पेन के एक और स्कूल के दो अन्य टीचर्स की तस्वीरें भी सामने आई हैं, जिनमें वो स्कर्ट पहनकर बच्चों को पढ़ाते नज़र आ रहे हैं. ये स्कूल स्पेन के वलाडोलिड नाम की सिटी में है. टीचर्स का नाम है- मैनुएल ऑर्टेगा और बोर्जा वेलुके. दोनों टीचर्स ने डिसाइड किया था कि मई के महीने में हर दिन वो स्कूल में स्कर्ट पहनकर ही जाएंगे. उनके इस फैसले के पीछे भी एक कारण था. ये कि कुछ दिन पहले उनके स्कूल के एक स्टूडेंट को होमोफोबिक गालियों का सामना करना पड़ा था. 29 अप्रैल 2021 के दिन बोर्जा वेलुके ने ट्विटर पर अपनी और साथी टीचर की तस्वीर डालते हुए लिखा था-

“स्कूल वो है जो सम्मान, विविधता, को-एजुकेशन और सहिष्णुता के साथ शिक्षा देता है. आप जैसा चाहते हो वैसे कपड़े पहनो. हम #ClothesHaveNoGender मूवमेंट में शामिल होते हैं.”

‘न्यू यॉर्क पोस्ट’ की रिपोर्ट की मानें, तो सोशल मीडिया पर अब कई सारे लोग #ClothesHaveNoGender मूवमेंट को सपोर्ट कर रहे हैं. स्पेन के एक टाउन में एक स्कूल के कुछ पुराने स्टूडेंट्स महीने की हर चार तारीख को स्कर्ट पहनकर इकट्ठा हो रहे हैं. कई सारे स्टूडेंट्स के पैरेंट्स भी इस मुहीम को सपोर्ट कर रहे हैं.

हमारे देश में क्या हाल है?

ये तो हो गई स्पेन की बात. अब ऐसा तो है नहीं कि दुनिया के बाकी देशों में लड़के आराम से स्कर्ट पहनकर स्कूल जा सकते हैं. बिल्कुल भी नहीं है. लड़का और लड़की के पहनावे को लेकर एक अनकहा सा नियम बना दिया गया है. जो लगभग हर देश में लागू है. भारत की बात करें, तो जेंडर डिविज़न यानी लिंग के आधार पर अंतर स्थापित करने का काम बचपन से ही शुरू हो जाता है. ज्यादा दूर नहीं जाएंगे. आप स्कूलों में देखिए, नर्सरी, KG1, KG2, पहली, दूसरी कक्षा के बाद लड़का और लड़की के यूनिफॉर्म अलग-अलग हो जाते हैं. हमने अधिकतर स्कूलों में देखा है कि लड़कियां आठवीं तक स्कर्ट्स पहनती हैं. और उसके बाद नौवीं से बारहवीं तक सलवार सूट. लड़के स्कर्ट या सलवार सूट नहीं पहनते, वो पैंट-शर्ट पहनते हैं. हां क्लास बढ़ने के साथ ही उनके यूनिफॉर्म के पैंट जो हाफ होते थे, वो फुल हो जाते हैं. लड़कों और लड़कियों को साथ में भी कम ही स्कूलों में बैठने दिया जाता है. ज्यादातर स्कूलों में अलग-अलग कतार बना दी जाती हैं. माने स्कूल के लेवल से ही जेंडर डिविज़न क्रिएट होने लगता है, जो आगे तक बना रहता है.

कैसे मार्केट क्रिएट कर रहे हैं जेंडर डिविज़न?

अब आते हैं सबसे बड़े डिविज़न क्रिएटर पर. जो है मार्केट. कैसे? इसे एक उदाहरण से समझते हैं. मेरी एक दोस्त को अपने भतीजे के बर्थडे के लिए एक गिफ्ट लेना था. लॉकडाउन था, वो बाहर जा नहीं सकती थी, इसलिए बच्चों के कपड़ों और गिफ्ट्स के लिए बनी एक वेबसाइट को ओपन किया. बच्चे की उम्र पूछने के पहले ही ऑप्शन था जेंडर सेलेक्ट करने का. मतलब आपको क्या गिफ्ट करना चाहिए, ये फैसला बच्चे की उम्र पर नहीं, बल्कि उसके जेंडर पर निर्भर करता है.

चलिए अब एक छोटा सा प्रैक्टिकल करते हैं. आपमें से ज्यादातर लोगों के पास इंटरनेट तो होगा ही. गूगल खोलिए और सर्च बॉक्स में लिखिए गर्ल्स टॉयज़. तस्वीरों वाले ऑप्शन पर जाइए. क्या दिख रहा है? आपका स्क्रीन पिंक कलर से भर गया होगा. आपको बार्बी सेट, डॉल हाउस, किचन सेट, डॉक्टर सेट, यही सब दिख रहा होगा. अब इसे हटाइए, सर्च बॉक्स पर लिखिए- टॉयज़ फॉर बॉयज़. क्या दिखा? कार वाले खिलौने, हवाइ जहाज, बाइक, रोबोट्स, ट्रक ये सब दिख रहा होगा. इनमें बहुत कम टॉयज़ का रंग पिंक होगा. क्यों? क्योंकि वो तो लड़कियों का रंग  मान लिया गया है. इसे पता नहीं क्यों कब कैसे असाइन कर दिया गया है. अब अगर लड़कों के तथाकथित रंग की बात करें, तो वो ब्लू मान लिया गया है.

Toys And Gifts (1)
गूगल सर्च में लड़कियों के गिफ्ट और लड़कों के गिफ्ट में अंतर देखिए.

हमने कुछ नामी ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स भी खंगाली. एक साइट पर हम गए. वहां खिलौनों का सेक्शन खोला- प्रिटेंडेड प्ले टॉयज़ पर गए. कुछ किचन सेट्स दिखे. सब पिंक रंग के. और सबमें छोटी बच्ची की तस्वीर लगी थी. छोटे लड़के की नहीं. घरेलू काम में इस्तेमाल होने वाले सामानों का भी खिलौने वाला संस्करण दिखा, वो भी पिंक रंग में था. फिर हमने वेहिकल टॉय वाला सेक्शन खंगाला. उसमें गाड़ियों वाले खिलौने थे, अधिकतर में लड़कों की ही तस्वीर बनी हुई थी. मानो बच्चों को ये बताने की कोशिश की गई हो कि गाड़ियों पर पहला अधिकार लड़कों का है.

फिर हमने एक और काफी फेमस वेबसाइट ओपन की. यहां टॉयज़ सेक्शन के किचन सेट वाली कैटेगिरी में हम गए. देखा कि 70 फीसद किचन सेट्स पिंक रंग में थे और उनमें बच्चियों की तस्वीर थी. फिर इसी वेबसाइट की गाड़ी वाली कैटेगिरी में गए, तो वहां पिंक रंग की गाड़ियां बहुत ही कम थीं. और ज्यादातर में लड़कों की तस्वीर बनी हुई थी.

Toys And Gifts (2)
वेबसाइट में किचन किट वाले ऑप्शन में लड़की की तस्वीर किचन किट के साथ. कार के साथ लड़के की तस्वीर.

ये सीन केवल भारत में ही नहीं है. दूसरे देशों में भी है. यूएस की बात करें, तो वहां भी इसी तरह से खिलौनों की मार्केटिंग की जाती है. ‘द गार्जियन’ वेबसाइट में मई 2016 में एक आर्टिकल छपा था. जिसके मुताबिक US में साल 1970 के पहले तक खिलौनों को जेंडर डिविज़न के आधार पर नहीं बांटा गया था. 1970 के कई सारे विज्ञापन ये दिखाते हैं कि लड़का और लड़की सभी रंगों के खिलौनों के साथ एकसाथ मिलकर खेल रहे हैं. लेकिन 1980 और 90 आते तक वहां फेमिनिज़्म के खिलाफ एक विरोध सा देखने को मिला, उसके बाद खिलौने जेंडर के आधार पर बंटने लगे. भारत में 90 के दशक में ग्लोबलाइज़ेशन आने के बाद नए-नए आउटलेट्स आने शुरू हुए, मॉल्स वगैरह की तरफ फोकस हुआ, और जो तरीके बड़े विकसित देशों में अपनाए जाते थे, वही यहां भी देखने को मिला. अगर हम हमारे बचपन के दिनों को ही याद करें, तो कम से कम कोई रिश्तेदार पिंक रंग का गिफ्ट देने पर तो फोकस नहीं ही करता था. तब खिलौने जेंडर के आधार पर बटे ज़रूर होते थे, लेकिन ये डिविज़न काफी कम था.

कपड़ों का हाल भी जान लीजिए

अब अगर कपड़ों की बात करें, तो जब लॉकडाउन खुलेगा, आप किसी बड़े नामी स्टोर में जाइएगा. वहां एंट्री करते साथ ही आपको छोटे लड़कों के कपड़ों का सेक्शन अलग दिखेगा और छोटी लड़कियों का अलग. बच्चे जिन्हें पता भी नहीं है कि जेंडर क्या चीज़ है, उनके दिमाग में बचपन से ही ये भेदभाव डालने की पूरी कोशिश होती है. हमने इस जेंडर डिविज़न के मुद्दे पर दो एक्सपर्ट्स से बात की. पहले हैं राकेश चंद्रा, जो लखनऊ यूनिवर्सिटी के फिलोसॉपी विभाग के हेड हैं. दूसरी हैं डॉक्टर रोली मिश्रा, ये यूनिवर्सिटी ऑफ लखनऊ में जेंडर सेंसिटाइज़ेशन सेल की कॉओर्डिनेटर हैं. दोनों ने ही स्पेन में चल रहे मूवमेंट को सही बताया है. डॉक्टर रोली कहती हैं कि ये एक अच्छा मूवमेंट है, अगर किसी महिला को पूरा हक है कि वो जीन्स या पैंट पहन सकती है, तो पुरुष को भी ये हक मिलना चाहिए कि वो स्कर्ट पहन सके. ये उसकी खुद की पसंद होनी चाहिए. वहीं राकेश चंद्रा ने भी इस मुहीम का पक्ष लिया, पर साथ में ये भी कहा कि हर प्रशासनिक संस्थान के अपने नियम हैं, अगर यूनिफॉर्म को लेकर कोई नियम है और उसका उल्लंघन लड़के ने किया है, तो उसे थोड़ी पनिशमेंट दी जा सकती है, लेकिन अगर कोई नियम नहीं है उसके बाद भी उसके साथ गलत बर्ताव किया गया है, तो ये किसी भी स्तर पर सही नहीं है. राजेश चंद्रा ने इस बात की भी आलोचना की है कि बच्चे को सायकोलॉजिस्ट के पास भेजा गया. वो कहते हैं कि उसने जो किया, वो कोई दिमागी दिक्कत नहीं है, वो उसकी अपनी पसंद थी. राकेश चंद्रा ने कहा-

“ये बात बिल्कुल सही है कि हम लोगों ने ये तय कर रखा है कि लड़कियां गुलाबी रंग पहनेंगी, लड़के नीला रंग. ये यूरोपियन इतिहास की घटना है. एक पेंटर ने एक पेंटिंग बनाई थी, ब्लू बेबी. उसके बाद से ये हुआ कि लड़के ब्लू पहनेंगे. हिंदुस्तान में तो आदमी रंग-बिरंगे कपड़े पहनते थे. लेकिन यूरोप के प्रभाव में यहा भी ऐसा होने लगा. ये सारे भेद लोगों ने बनाए. जो बाज़ार है, वो आपको बदलने की कोशिश नहीं करता. बाज़ार ये देखता है कि लोग क्या सोच रहे हैं. उदाहरण देखिए- जब हिंदुस्तान में मैगी आया, तो चिकन नूडल आता था, फिर उन्होंने देखा कि यहां वेज खाया जाता है तो वेजिटेरियन नूडल बनाया. यानी बाज़ार को तो सिर्फ सामान बेचना है जिस तरह भी बेचे. आप बाज़ार को दोष नहीं दे सकते. ये तो आपकी व्यक्तिगत मानसिकता है. बाज़ार को तो कस्टमाइज़ करके सामान बेचने में और पैसे मिलते हैं.”

डॉक्टर रोली मिश्रा ने कहा-

“गुलाबी क्या केवल लड़कियों का रंग है और नीला केवल लड़कों का? क्या हम इस रंग के कॉपीराइट के साथ पैदा हुए हैं. जब आप स्टोर में जाते हैं, तो आप देखते हैं कि आपको लड़कियों से जुड़े हुए ज्यादातर सामान गुलाबी रंग के दिखेंगे. यहां तक कि अगर आप दुकानदार से कहेंगे कि बच्ची का कपड़ा दिखाइए, तो वो पहले गुलाबी रंग का ही दिखाएगा. ये तरीके हमने-आपने ही बनाए हैं. ये नियम हैं एक तरह से जो पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं. सेक्शन्स का डिविज़न अगर आप सहूलियत के लिहाज़ से कर रहे हैं तो स्वीकार किया जा सकता है, पर आप इस वजह से कर रहे हैं कि आप हमें ये बता सकें कि ये लड़की की साइड है, ये लड़के की साइड है, तो ये सही नहीं है.”

हेना गेट्सबी एक स्टैंडअप ऑस्ट्रेलियन कॉमेडियन हैं. nanette नाम का उनका एक गीत बहुत फेमस हैं. उसमें वो एक बहुत ज़रूरी बात कहती हैं कि लड़के और लड़कियों में फर्क से कहीं ज्यादा समानताएं हैं. मगर हम हमेशा उनके बीच के फर्क पर ही फोकस करते हैं. थोड़ा सोचिए. इस बात पर सोचिए कि आपकी बेटी को भी स्पेस टॉयज़ से खेलने का हक है. आपके बेटे को भी गुलाबी चमकिली हेयर क्लिप्स लगाने का हक है.


वीडियो देखें: डेढ़-दो साल से वो लावारिस शवों को आखिरी विदाई देने का काम करने वाली सपना की कहानी क्या है?

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