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18 महीने बंधक बना कर रखी गई लड़की अपने देश लौटी तो उसे 'आतंकवादी' कह दिया गया

सिल्विया रोमानो. 18 महीने तक पूर्वी अफ्रीका में बंधक बना कर रखी गईं. 11 मई को आखिरकार अपने देश, अपने घर इटली लौटीं. लोकल पुलिस ने उन्हें सुरक्षित घर पहुंचाया. लेकिन उनके इस्लाम अपना लेने की ख़बरों के बीच इटली में उनकी सुरक्षा पर ख़तरा बताया जा रहा है. इतना खतरा, कि उन्हें ‘नियो-टेररिस्ट’ यानी नव आतंकवादी तक कह दिया गया है वहां की मीडिया द्वारा.

कौन हैं ये सिल्विया रोमानो?

24 साल की इटैलियन महिला हैं. केन्या में अफ्रीका मिलेले नाम की चैरिटी के साथ काम कर रही थीं. वहां से उन्हें पिछले साल नवंबर में किडनैप कर लिया गया था. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ इटैलियन मीडिया ने सिल्विया का बयान छापा. इस बयान में सिल्विया ने बताया कि उन्हें एक ऐसे गैंग ने बंधक बनाया था, जो अल-शबाब मिलिटेंट ग्रुप से संबंधित है. अल शबाब सोमालिया नाम के देश में मौजूद इस्लामिक संगठन है जिसे आतंकवादी का दर्जा देकर US और UK ने बैन कर रखा है. ये इस्लाम की वहाबी शाखा को मानते हैं, और इन्होंने अपने कंट्रोल में आने वाले क्षेत्रों में सख्ती से शरिया लागू कर रखा है.

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इटली की लोकल पुलिस सिल्विया को उनके घर तक पहुंचाने आई. वो मिलान में रहती हैं. (तस्वीर: AP)

क्या हुआ सिल्विया के साथ?

केन्या से किडनैप करने के बाद उन्हें पैदल सोमालिया ले जाया गया. और वहां पहुंचने के बाद छह बार उनकी जगह बदली गई. 535 दिन कैद में बिताने के बाद आखिरकार उन्हें छुड़ाया गया. इसके बारे में ये अफवाह भी उड़ी कि इटली की सरकार ने अल-शबाब को पैसे देकर सिल्विया की रिहाई करवाई. लेकिन इस बात को वहां की सरकार नकार रही है. खैर, जब सिल्विया के छूटने की खबर आई, तो इटली में लोग बेहद खुश हुए. लेकिन 11 मई को जब वो घर लौटीं तो उन्हें देखकर लोग हैरान रह गए. सिल्विया ने सिर से लेकर पांव तक ढंकने वाला कपड़ा पहन रखा था. इसे जिल्बाब कहते हैं.

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जैसे ही सिल्विया अपने घर की तरफ बढ़ीं, लोगों के हुजूम ने उन्हें घेर लिया. (तस्वीर: AP)

लोगों का गुस्सा किस बात पर फूटा?

सिल्विया ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने बंधक रहने के दौरान वहां इस्लाम अपना लिया था. उनका नाम भी अब बदलकर आयशा हो गया है. जैसे ही ये खबर सामने आई, सिल्विया की आलोचना शुरू हो गई. इस वक़्त वहां पर डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में है और लीग पार्टी अपोजिशन में. डेमोक्रेटिक पार्टी को फाइव स्टार मूवमेंट नाम की पार्टी का समर्थन भी हासिल है. वहीं  लीग पार्टी को वहां की दक्षिणपंथी पार्टी माना जाता है. उसके नेताओं ने सरकार को इस मामले में घसीट लिया है. लीग पार्टी के नेता अलेसांद्रो पगानो ने तो सिल्विया के लिए ‘नियो-टेररिस्ट’ शब्द तक का इस्तेमाल कर दिया.

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सिल्विया के लिए सोशल मीडिया पर भी कई हेट कैम्पेन चल रहे हैं. (तस्वीर: AP)

इस पूरे मामले को लेकर सिल्विया उर्फ़ आयशा का क्या कहना है?

NYT की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने अपने पर्सनल फेसबुक पेज पर लिखा:

‘मैं आपसे गुजारिश करती हूं कि मुझे डिफेंड करने के लिए क्रोधित मत होइए. मेरे साथ जो सबसे बुरा घटित होना था, वो हो चुका. मैंने हमेशा अपने दिल की सुनी है, और वो कभी भी मुझे धोखा नहीं देगा”.

सिल्विया से प्रेम, ‘आयशा’ से नहीं?

पिछले कुछ सालों में यूरोपीय देशों में इस्लाम के प्रति डर और दुराव की भावनाएं बढ़ी हैं, ऐसा ओपन सोसाइटी फाउंडेशन का कहना है. ये संस्था 120 देशों में काम करती है, और मानवाधिकारों के लिए चलाए जाने वाले प्रोग्राम्स इत्यादि को फंड उपलब्ध कराती है. इनके अनुसार 11 सितंबर 2001 को अमेरिका के ट्विन टावर्स पर हुए हमले ने मुस्लिमों के प्रति दुनिया के नज़रिए को एक बहुत बड़ा झटका दिया. उसके बाद से लंदन, पेरिस, बार्सिलोना जैसी जगहों पर जिहाद के नाम पर किए गए हमलों ने इस डर को बढ़ावा दिया है. इस्लाम के नाम का इस्तेमाल करके आतंक फैलाने वाले लोगों की वजह से आम मुस्लिम भी कठघरे में आ गए हैं.

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सिल्विया के बहाने इटली में एक बार फिर इस्लाम और धर्मांतरण पर बहस तेज हो गई है.(तस्वीर: AP)

इटली में ‘इस्लामोफोबिया’ की कहानी

जैसा अपने ऊपर पढ़ा कि इस समय इटली में डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में है. लेकिन इससे ठीक पहले लीग पार्टी वहां सत्ता में आई थी. मैटियो साल्विनी वहां के आंतरिक मामलों के मंत्री बने. उनके कार्यकाल के दौरान इटली ने इमिग्रेशन रोकने पर जोर दिया. उनकी पार्टी का रवैया खुले तौर पर एंटी-मुस्लिम रहा है.  लेकिन इस देश में इस्लाम के प्रति दुराव की भावना नई नहीं है. 1920 के दशक में यहां मुस्लिमों को बसने नहीं दिया जाता था. क्योंकि उनके धर्म को ‘आम नैतिकता’ के विरुद्ध समझते थे लोग. अभी भी माइग्रेशन के ज़रिए इटली आने वाले लोगों में से अधिकतर इस्लाम को मानने वाले हैं. और इस वक़्त इटली में 26 लाख मुस्लिम रह रहे हैं. उन्हें लेकर आम जनता का नजरिया भी नेगेटिव ही है. ये हम नहीं कह रहे. 2017 में Pew द्वारा की गई एक स्टडी कहती है. जिसमें 69 फीसद इटैलियन लोगों ने मुस्लिमों को लेकर नेगटिव ओपिनियन दिया.

Italian Insider Muslims
कट्टरवाद का विरोध करते मुस्लिम. (सांकेतिक तस्वीर: Italian Insider)

इस्लाम को इटली में रिकग्नाइज नहीं किया जाता. वैसे इटली में धर्म को चुनने की स्वतंत्रता दी गई है. लेकिन रोमन कैथलिक चर्च को वरीयता मिलती है. दूसरे धर्म जैसे जुडाइज्म (यहूदी धर्म) इत्यादि जिनको रिकग्निशन चाहिए होता है, उनके लिए ख़ास कॉन्ट्रैक्ट होते हैं. जिन्हें इंतेसा (intesa) कहा जाता है.  ये कॉन्ट्रैक्ट बनने पर, और इसके नियम-कानून मानने पर ही उन्हें इटली में पहचान दी जाती है और वो पूरी तरह ऑपरेट कर पाते हैं. इस्लामिक संगठन इसके लिए पिछले कई सालों से अप्लाई कर रहे हैं, लेकिन उन्हें ये नहीं मिला है.  ‘अल जज़ीरा’ के लिए इलेन्या गोस्तोली लिखती हैं. कि इसका मतलब ये कि मस्जिदों को पब्लिक फंडिंग नहीं मिल सकती, उनके धार्मिक त्यौहार और शादियों को आधिकारिक रिकग्निशन नहीं मिलता, और इबादत करने वाली जगहों को बनाने के लिए कोई नियम कानून नहीं है.

एक यूरोपियन फेनोमेनन 

इस्लामोफोबिया के बढ़ने के मामले में इटली इकलौता देश नहीं है. कई देश अपने कानूनों में बदलाव कर रहे हैं. ख़ास तौर पर रिफ्यूजियों, और प्रवासियों के लिए. जिनमें से कई इस्लाम को मानने वाले भी हैं. डेनमार्क ने 2018 में एक नया क़ानून पास किया जिसके मुताबिक़ कुछ खास इलाकों में रहने वाले लोगों के बच्चे हफ्ते में 25 घंटे अपने परिवार से दूर समय बिताएंगे. ताकि वे दानिश भाषा और वहां के कल्चर को सीख सकें. जिन इलाकों को चिह्नित किया गया है,वहां अधिकतर मुस्लिम परिवार रहते हैं.

डेनमार्क ही नहीं, दूसरे देशों में भी इस तरह के कदम उठाए गए हैं. फ्रांस और नॉर्वे ने ऐसे धार्मिक कपड़े बैन कर दिए हैं जिनसे सिर और चेहरा ढंका जाए (नकाब, हिजाब, बुर्का).  उनके इन क़दमों के पीछे तर्क ये दिए जाते हैं कि कोई भी चीज़ जिससे आपकी धार्मिक पहचान उजागर होती हो, वो पब्लिक स्पेस में नहीं होनी चाहिए क्योंकि वो एक धर्म निरपेक्ष देश हैं. जिन कपड़ों से पहचान छुपाई जा सके, वो भी एक सिक्योरिटी थ्रेट की तरह देखे जाते हैं.

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सिल्विया के जिल्बाब को देखते ही उन्हें टार्गेट करना शुरू कर दिया गया था. (तस्वीर: AP)

एक बेहद कॉमन तर्क जो अक्सर दिया जाता है वो ये भी है कि अगर सऊदी अरब में जाने पर वहां के कायदे कानून मानने पड़ते हैं. लड़कियां/महिलाएं अपने सिर ढकती हैं. तो किसी दूसरे देश में जाने पर भी वहां के नियम-कानूनों का पालन ज़रूरी है.

यही नहीं. मुद्दा सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं. फ्रांस में 2013 में एक स्कूल ने घोषणा की थी कि स्कूल के खाने में सिर्फ पोर्क मीट (सूअर का मांस) ही दिया जाएगा. इस पर काफी बवाल हुआ था. ख़ास तौर पर मुस्लिम और यहूदी लोगों ने इस पर सवाल उठाए थे. क्योंकि इस्लाम में सूअर का मांस खाना हराम माना जाता है. वहीं स्कूल ने ये तर्क दिया कि उनके लिए कुछ बच्चों के लिए अलग इंतजाम करना परेशानी का सबब बन रहा है. इसी लाइन पर हलाल मांस के अनिवार्य किए जाने पर भी बहस कई देशों में चल रही है.

सिल्विया एक आतंकी संगठन के कब्जे से छूटकर आई हैं. उनके कन्वर्जन पर सवाल उठ रहे हैं. तहर बिन जेलोन नाम के मोरक्कन लेखक  ने ला रिपब्लिका नाम के इटैलियन न्यूजपेपर में लिखा,

‘ऐसे आतंकियों के दबाव में इतने महीने गुजारने के बाद धर्म परिवर्तन करना, जो इस्लाम का पर्दा ओढ़कर देशों से पैसे वसूल करते हैं, एक ऐसी चॉइस है जो बहस को जन्म देती है’.

ऐसी बहसों के बीच फंसा इटली इकलौता देश नहीं है. अकेली सिल्विया नहीं हैं.


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