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99 फीसद सेक्स वर्कर बेरोज़गार, बाकी 'दूर' से दे रहीं सेक्स सेवाएं

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अमित कुमार

अमित कुमार ‘मीत’: पेशे से सामाजिक कार्यकर्ता और मिज़ाज से लेखक-पत्रकार. जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और 3 साल से कुछ ज्यादा समय तक एक्टिव मीडिया में काम करने के बाद पिछले 7  सालों से सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहे हैं. उनका लिखा ये आर्टिकल हम आपको पढ़वा रहे हैं.


 

नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (NACO) की मानें तो देश में तकरीबन 9 लाख सेक्सवर्कर हैं. लेकिन यौनकर्मियों के लिए काम करने वाले संगठन ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्सवर्कर्स (AINSW) की अध्यक्ष कुसुम कहती हैं कि NACO उन यौनकर्मियों की संख्या बता रहा है जिनके साथ वो कार्यक्रम संचालित कर रहा है. लेकिन ऐसी बड़ी संख्या उन यौनकर्मियों की है जो नाको के कार्यक्रम में खुद को रजिस्टर नहीं करवाती हैं. या अपने सीमित संसाधनों की वजह से नाको उन तक पहुंच नहीं पाता.

कुसुम का मानना है कि देश में यौनकर्मियों की संख्या 30 लाख से भी ज्यादा है. सामान्य नज़रें यौनकर्मियों को सिर्फ रेड लाइट इलाकों के कमरों तक देख पाती हैं मगर यौनकर्मियों की एक बहुत बड़ी संख्या घरेलू महिलाओं, घरेलू कामगारों, प्रवासी महिलाओं, दिहाड़ी मज़दूर, कॉलेज में जाने वाली लड़कियों, कॉलगर्ल्स वगैरह की है. जिन पर आम समाज ज्यादा ध्यान नहीं देता. असंगठित मजदूरों की तरह काम करने वाली सैकडों महिलाएं, काम ना मिल पाने या शोषण को ना सहन करने की स्थिति में यौनकार्य को चुनती हैं. इन महिलाओं को भी कई बार गिनती में शामिल नही किया जाता.

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मामला सिर्फ भारत ही नहीं, विदेशो तक फैला है. यहां तस्वीर में मेक्सिको की सेक्स वर्कर्स हैं. (सांकेतिक तस्वीर:AP)

लॉकडाउन के साथ अंसगठित क्षेत्रों में काम करने वाले तकरीबन 14 करोड़ लोगों पर नौकरी जाने का खतरा मंडरा रहा है. सवाल ये है कि जब भारत को मिलाकर दुनिया के कई देशों में यौनकार्य को काम का दर्जा ही नही दिया गया, तो यौनकर्मियों की इस 30 लाख की संख्या को बेरोजगारों में शामिल करना भी छूट ही गया होगा? सवाल सिर्फ यौनकर्मियों की संख्या का नही, सवाल उनके परिवार के सदस्यों का भी है, जिनको जोड़ा जाए तो प्रभावित लोगों की संख्या करोड़ों में पहुंच जाती है. अब बात लाखों की नही, बल्कि करोड़ों की होनी चाहिए.

लॉकडाउन के दौरान स्थिति

मुंबई में यौनकर्मियों के साथ काम करने वाली संस्था ‘आस्था परिवार’ की मैनेजर सीमा सैयद ने बताया कि यहां रेड लाइट इलाकों कमाठीपुरा, ग्रांट रोड, खेतवाड़ी से तकरीबन 5 हजार यौनकर्मी रहती हैं. 25 मार्च को अचानक से लॉकडाउन के बाद यौनकर्मियों पर खाने, पीने और रोजगार का संकट गहराता गया. घरों में रखा राशन, दवाइयां तो लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में ही खत्म हो गए. डर इतना था कि यौनकर्मी बैंकों से अपने पैसे तक नही निकाल पाईं. जिससे उनके सामने भूखे मरने तक का संकट आन पड़ा.

सीमा बताती हैं,

“सामाजिक संस्थाओं और कुछ व्यक्तिगत प्रयासों की वजह से यौनकर्मियों तक सूखा राशन, पका खाना, दवाइयां पहुंचाई जा रही हैं. लेकिन धीरे-धीरे दानदाताओं की संख्या भी कम होती जा रही है. जिसका असर निसंदेह यौनकर्मियों तक पहुंचने वाली सहायता पर पड़ेगा.

यौनकर्मियों के सामने दोहरी समस्या आन पड़ी है. जिसमें उनको अपने गुजारे का इंतजाम भी करना है और गांव में रहने वाले अपने परिवार तक भी पैसा पहुंचाना है. जिसके लिए यौनकर्मियों ने अपनी बहुत मामूली से जमापूंजी को अब निकालना शुरू किया है.”

ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्सवर्कर्स की अध्यक्ष कुसुम ने परतों को थोड़ा और खोला. वो कहती हैं:

यौनकर्मियों के चुने हुए इलाकों तक मदद पहुंचाना संभव है लेकिन उन यौनकर्मियों तक मदद पहुंचाना बड़ी चुनौती है, जो रेड लाइट इलाकों से काम ना कर, घरों, होटलों, ढाबों, सड़कों से काम करती हैं. सेक्स वर्कर्स रोज कमाती और रोज खाती हैं. अगर एक दिन कमाई ना हो तो, पूरे परिवार पर जीवनयापन का संकट आ जाता है. नेटवर्क ने पूरे देश में अपने साथी संगठनों की मदद से रेड लाइट इलाकों में रहने वाली सेक्स वर्कर्स के साथ, पर्दे के पीछे रहने वाली लाखों सेक्स वर्कर्स तक मदद पहुंचाई है. हमने कुछ संगठनों की मदद से यौनकर्मियों के बैंक खाते में तीन-तीन हजार रूपये की आर्थिक सहायता पहुंचाने का भी काम किया है.

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कुछ NGO हैं जो मदद भी कर रहे हैं, लेकिन वो पूरी नहीं पड़ रही. (सांकेतिक तस्वीर: PTI)

कुसुम का मानना है कि दिल्ली की तकरीबन 60 फीसदी सेक्सवर्कर्स अपने गृह राज्यों या घरों को लौट गई हैं. काम तो पूरी तरह से ठप्प ही पड़ा है. जो बची-खुची सेक्सवर्कर्स हैं, वो भी परेशान हैं. कुसुम ने बताया कि अभी हाल ही में एक लड़की को अनचाहा गर्भ हुआ जिसके लिए सरकारी अस्पताल के धक्के खाते रह गए मगर उस लड़की का अबॉर्शन नहीं हुआ. मजबूरी में कुछ पैसों का इंतजाम कर, प्राइवेट अस्पताल में सेवा लेनी पड़ी.

कोलकाता के रेड लाइट इलाके सोनागाछी में काम करने वाले देश के सबसे बड़े यौनकर्मियों के संगठन ‘दूरबार महिला समन्वय कमिटी’ की मेंटर भारती डे कहती हैं:

“यौनकर्मियों ने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने में गजब का प्रदर्शन किया है. पूरे बंगाल में हजारों मामलों में एक भी यौनकर्मी शामिल नही है, क्योंकि हमने सरकार के द्वारा दिए गए प्रत्येक दिशा-निर्देश का पालन किया है. दूरबार के कार्यकर्ताओं ने लॉकडाउन से पहले ही घर-घर जाकर, फोन के द्वारा यौनकर्मियों और उनके परिवार के सदस्यों को कोरोना से बचने के उपाय बताए थे, जो प्रयास आज भी जारी हैं.”

लॉकडाउन के बाद की स्थितियां

इस सवाल पर यौनकर्मियों और उनके संगठनों का जवाब लगभग एक जैसा है जिसमें काम का संकट, जीवनयापन की चुनौतियां, मानसिक तनाव में इज़ाफा, हिंसा और भेदभाव में बढ़ोतरी जैसी समस्याएं सामने आती है. नाम ना बताने की शर्त पर उत्तरप्रदेश के गोरखपुर की एक यौनकर्मी बताती हैं:

“मेरे बच्चे का जन्मदिन था, बोला केक खाना है. हमारे पास दूध तक के पैसे नही थे, केक कहां से लाते. खैर, केक वाले की दुकान पर गए तो केक वाले ने सेक्स करने की शर्त पर केक बनाने की बात कही. महिला का बेटा शाम को केक काट पाया, क्योंकि मां को लॉकडाउन में सेक्सवर्क करना पड़ा.”

हाल ही में UNAIDS ने एक स्टेटमेंट जारी करके स्वास्थ्य और सामाजिक सुविधाओं की प्राप्ति पर पर्याप्त बजट की उपलब्धता पर जोर दिया. इसी के साथ यौनकर्मी समुदाय की जरूरतों और उनकी स्थिति पर विशेष ध्यान देने की अपील भी की. भारती डे कहती हैं कि नोटबंदी के दौरान यौनकर्मियों की बहुत सारी पूंजी बर्बाद हो गई. ब्याज पर पैसा लिया, जिसका भुगतान पूरा ही हो रहा था कि ये कोरोना आ गया. जो थोड़ा बहुत जोड़ा था, वो भी इसमें चला जाएगा.

नई टेक्नोलॉजी से उम्मीद

‘नॉर्मल’ की नयी परिभाषा रची जा रही है. जिसमें शामिल है फिजिकल डिस्टेंसिंग. इस ‘न्यू नॉर्मल’ के साथ सेक्सवर्क कैसे संभव हो रहा है, इसकी बानगी हमें दिल्ली से पता चली. दिल्ली स्थित अप्सरा फाउंडेशन की सदस्य सुनीता ने बताया कि यौनकर्मियों ने फोन के द्वारा सेक्सवर्क के कुछ नए प्रयोग किए हैं. जिसमें विडियो कॉलिंग और वॉयस कॉलिंग के माध्यम से कुछ लड़कियों ने सेक्सवर्क शुरू किया है. हालांकि सुरक्षा के सवाल पर सुनीता बताती हैं कि ये प्रयास अभी कुछ रेग्युलर क्लाइंट के साथ ही शुरू किया है, इसलिए भरोसे के आधार पर काम शुरू किया गया है. इस काम के एवज़ में कभी फोन रिचार्ज हो जाता है तो कभी पेटीएम या गूगल पे से हमारे पास पैसे आ जाते हैं. सुनीता कहती है कि अभी यौनकर्मियों को डिजीटल पेमेंट के तरीकों को सीखना चाहिए.

मुंबई के मसाज पार्लर में काम करने वाली एक 25 साल की यौनकर्मी कहती हैं:

“हमारे काम को लेकर भी हमें बहुत चिंता है. मसाज के साथ हम सेक्सवर्क करके अपना और अपने परिवार का पेट भरते हैं. लेकिन कोरोना की वजह से हम फोनसेक्स से काम करना सीख रहे हैं. अपने चेहरे को बिना दिखाए हमें क्लाइंट को विडियो सेक्स की सेवा भी देनी पड़ती है. जिससे बहुत ज्यादा तो नही, लेकिन इतने पैसे आ जाते हैं कि अपने घर का खर्चा चल जाता है.”

आखिर चाहती क्या हैं सेक्स वर्कर्स

1. महाराष्ट्र के सोलापुर स्थित क्रांति महिला संघ की प्रोग्राम मैनेजर रेणुका कहती हैं कि अगर सरकार के 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज का फायदा यौनकर्मियों तक नही पहुंच पाता तो ये सरकार की बहुत बड़ी चूक और भेदभावपूर्ण रवैया होगा. सबसे पहले सरकार को हर प्रकार की पेंशन की राशि में कम से कम 50 फीसदी की बढ़ोतरी करनी चाहिए और एक आपातकालीन पेंशन फंड की व्यवस्था करनी चाहिए. जिसका फायदा एकल महिला, प्रवासी मजदूर, यौनकर्मी, ट्रांसजेंडर, एचआईवी और गंभीर बीमारी से संक्रमित लोगों, बुजुर्गों, विकलांगों, बेघरों इत्यादि को मिल पाए.

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(सांकेतिक तस्वीर: PTI)

2. AINSW की अध्यक्ष कुसुम बताती हैं कि पिछले ढाई दशकों से भी ज्यादा समय से देश में एड्स नियंत्रण कार्यक्रम भारत सरकार चला रही है. सरकार उस कार्यक्रम के माध्यम से यौनकर्मियों तक पहुंचे. इसी के साथ यौनकर्मियों द्वारा संचालित सैकड़ों संगठन और यूएन एजेंसियां पूरे देश में काम करते हैं, वो भी माध्यम हो सकता है, सेवाओं और राहत को पहुंचाने का. कुसुम कहती हैं कि यौनकार्य पर ये संकट कम से कम आने वाले 1-2 साल तक रहने वाला है. इसलिए सरकार को चाहिए कि यौनकर्मियों के साथ बैठकर समावेशी योजना बनाए जिससे लाखों यौनकर्मियों तक सामाजिक सुविधा, आर्थिक मदद पहुंच सके. अगर कोई भी यौनकर्मी हिंसा या तनाव से ग्रसित है तो सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं का दायित्व है कि उन विषयों पर काम करें. पुलिस को संवेदनशील होनी की आवश्यकता है.

3. राजस्थान के अजमेर में काम करने वाली सुल्ताना का कहना है कि NACO को एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के बजट से यौनकर्मियों तक सहायता पहुंचानी चाहिए. जिसमें मास्क, सेनेटाइजर के वितरण के साथ राशन का वितरण भी बेहद जरूरी है.

4. तमिलनाडू की पूंगडी कहती हैं कि सरकार को प्रत्येक यौनकर्मी के अकाउंट में कम से कम 2000 रूपये मासिक ट्रांसफर करना चाहिए, जिससे हम अपने घरों का राशन खरीद सकें. बच्चों के लिए दूध का इंतजाम कर सकें.

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(सांकेतिक तस्वीर: PTI)

5. ऊषा कॉपरेटिव की शताब्दी साहा कहती हैं कि जब सभी लोग अपनी सेविंग निकाल लेंगे तो कॉपेरिटव के सामने भी संकट खड़े हो जाएंगे. कर्मचारियों की सैलरी और संचालन पर भी संकट आ जाएगा. सरकार को चाहिए कि कॉपरेटिव को विशेष पैकेज देकर इतने बड़े संकट से हमें उबारे.

बहरहाल यौनकर्मी संगठनों की कुछ सराहनीय पहल से सरकारी महकमों और संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों के बीच बातचीत शुरू हो चुकी है. इसी कड़ी में 20 मई को NACO ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय को पत्र लिखकर निवेदन किया है कि महिला यौनकर्मियों, ट्रांसजेंडर, एचआईवी संक्रमित लोगों को सभी सामाजिक सुविधाओं की प्राप्ति सुनिश्चित की जाए. इसी के साथ उम्मीद की जा सकती है कि जल्दी ही कोई बेहतर योजना यौनकर्मियों के जीवन में एक नई रोशनी लेकर आएगी.


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