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बार-बार अचानक होने वाली घबराहट के बारे में ये बात न जानना महंगा पड़ सकता है

यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछ लें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.

वेदांत. कानपुर का रहने वाला है. 29 साल का. दिल्ली की बड़ी एमएनसी में काम करता है. सब नॉर्मल चल रहा था. जीवन घर, दफ़्तर के बीच कट रहा था. वीकेंड दोस्तों के साथ. लाइफ में कोई बड़ी टेंशन नहीं थी. करीब 8 महीने एक दिन उसे अचानक बेचैनी होने लगी. सांसें तेज़ हो गईं. पल्स रेट बढ़ गया. बिन बात उसे तेज़ डर लगने लगा. भयानक घबराहट. दिल ऐसा लग रहा था जैसे फट जाएगा. वेदांत की हालत देख उसके साथ काम करने वाले उसे डॉक्टर के पास लेकर गए. सबको लगा उसे हार्ट अटैक पड़ा है. डॉक्टर ने टेस्ट वगैरह लिखे. दवाई दी. कुछ टाइम बाद उसे थोड़ा ठीक लगने लगा. वो घर आ गया. अब जब टेस्ट के रिजल्ट आए तो सब नॉर्मल. कोई दिक्कत नहीं.

दो हफ़्ते बाद फिर वही चीज़ हुई. इस बार भी सब नॉर्मल. उसके बाद तो ये सिलसिला बन गया. हर कुछ दिन में एक अजीब सा अटैक पड़ने लगा. हाल ये हो गया कि वेदांत ऑफिस जाने से कतराने लगा. दोस्तों से कन्नी काट ली. यहां तक कि फ़ोन या दरवाज़े की घंटी से भी उसे डर लगता था. एक दिन उसका एक दोस्त उससे मिलने ज़बरदस्ती पहुंच गया. वेदांत उसके सामने रोया. पूरी बात बताई. वेदांत का दोस्त उसे एक साइकोलॉजिस्ट के पास लेकर गया. पता चला वेदांत फिजिकली तो ठीक था. पर वो जूझ रहा था एंग्जायटी से. सीवियर एंग्जायटी.

हमारे आसपास कई वेदांत हैं. जिन्हें खुद नहीं मालूम है कि वो किस चीज़ से जूझ रहे हैं. क्योंकि ये कोई बीमारी नहीं है. दिखती नहीं है. एंग्जायटी एक मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम है. जिसे महज़ घबराहट समझकर लोग उस पर ध्यान नहीं देते. इसलिए हमने डॉक्टर राकिब अली से बात की. वो क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं. बीएल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में.

क्या होती है एंग्जायटी?

एंग्जायटी एक प्रकार का नेगेटिव इमोशन है जैसे गुस्सा, डिसगस्ट, गिल्ट, दुःख. नेगेटिव इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि ये हमें अपने मन के लेवल पर अकेला, होपलेस महसूस करवाती है. ये हमें शारीरिक तौर पर महसूस हो सकती है, मानसिक तौर पर हो सकती है या दोनों का कॉम्बिनेशन भी हो सकती है.

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एंग्जायटी में पर काफ़ी लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक लक्षण बने रहते हैं.

-शारीरिक तौर पर घबराहट, तेज़ धड़कन महसूस होना, प्यास ज़्यादा लगना, हाथ पैर फूल जाना, चक्कर आना और सिर में दर्द रहना

-मानसिक तौर पर अप्रिय घटना के बारे में चिंता करते रहना. किसी मैटर पर बहुत ज्यादा सोचना. याददाश्त पर असर पड़ना, फोकस न कर पाना.

एंग्जायटी और डर में एक जैसा ही महसूस होता है, फिर ये दोनों अलग कैसे हैं?

डर में डेंजर प्रेजेंट में होता है. उसमें धड़कन कुछ समय के लिए बढ़ती है. हाथ-पैर में खून का दौरान कुछ समय के लिए बढ़ जाएगा. पर कुछ समय बाद हम उसे ओवरकम कर लेंगे और वो ठीक हो जाएगा. एंग्जायटी में काफ़ी लंबे समय तक ये लक्षण बने रहते हैं. बार-बार उभर आते हैं.

Here's how anxiety can impact your physical health | PhillyVoice
एंग्जायटी और उससे जुड़े डिसऑर्डर्स का इलाज मुमकिन है.

एंग्जायटी अगर आसानी से कंट्रोल न हो या इसके एपिसोड्स रेगुलर हों तो क्लिनिकल एंग्जायटी डिसऑर्डर का खतरा हो सकता है. नॉर्मल एंग्जायटी लाइफस्टाइल में मामूली बदलाव करके कंट्रोल में की जा सकती है. लेकिन क्लिनिकल एंग्जायटी के लिए ट्रीटमेंट लेना ज़रूरी होता है. ये तीन तरह के होते हैंः

जेनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑर्डर (Generalised anxiety disorder). इसमें आप डे टू डे लाइफ से जुड़ी चीज़ों के बारे में चिंता करते रहते हैं. बच्चों की पढ़ाई, पैसे की चिंता. और वो इस लेवल पर हो जाती है कि आप 24 घंटे उसके बारे में सोचते रहते हैं.

फ़ोबिया एक स्पेसिफ़िक ऑब्जेक्ट या सिचुएशन पर फोकस्ड होते हैं. ये अलग तरह की एंग्जायटी प्रोड्यूस करते हैं. ये अटैक के फॉर्म में महसूस होती है. पैनिक अटैक के फॉर्म में. फिर दूसरा अटैक न आ जाए इस बारे में आप डरते रहते हैं

ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसॉर्डर (obsessive compulsive disorder). आपने सुना होगा लोग बार-बार हाथ धोते हैं. उनके दिमाग में विचार आते हैं, वो तब तक आते हैं जब तक कोई कंपल्सिव एक्ट न कर दें. जैसे अगर मैंने टेबल छू ली तो कहीं इन्फेक्शन न हो जाए. मैं मर न जाऊं. तो वो बार बार हाथ धोते हैं. कुछ लोग बार-बार चेक करते हैं कि गैस बंद की कि नहीं, या दरवाज़े की कुंडी लगाई या नहीं.

इन तीनों ही तरह की एन्जायटी का इलाज साईकायट्रिस्ट करते हैं.

यानी अगर आपको एंग्जायटी की दिक्कत है तो उसका इलाज मुमकिन है. लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है इसकी पहचान करना. डिनायल मोड से बाहर आना कि हमें तो मेंटल दिक्कतें नहीं हो सकती हैं. साथ ही जरूरी है कि दोस्तों का, परिवार का साथ मिले. इस पर खुलकर बात करने की जरूरत है ताकि लोग जागरूक हो सकें. अपना और अपनों के तन और मन दोनों की सेहत का ख्याल रखें.


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