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सीमा कुशवाहाः पायल बेचकर कॉलेज की फीस भरी थी, अब निर्भया के दोषियों को फांसी तक पहुंचा दिया

20 मार्च. सुबह 5:30 बजे का वक्त. तिहाड़ जेल में चार दोषियों को फांसी दे दी गई. ये चारों 2012 के निर्भया गैंगरेप और मर्डर मामले के दोषी थे. नाम- पवन, अक्षय, मुकेश और विनय. वारदात हुई थी 16 दिसंबर, 2012 के दिन. सवा सात साल बाद दोषियों को फांसी हुई. निर्भया के पैरेंट्स ने इंसाफ के लिए लंबी लड़ाई लड़ी. मां आशा देवी जमी रहीं. इस लड़ाई में उनके साथ डटी रहीं सीमा कुशवाह. वो निर्भया की वकील हैं.

आइये जानते हैं कि कौन हैं सीमा और वह इस केस से कैसे जुड़ीं.

8-10 लोगों की वो मीटिंग जिसने वकील बनाया

UP के इटावा के छोटे से गांव उग्गरपुर से आती हैं. पिता किसानी करते थे. बचपन से ही पढ़ाई में मन लगता था. आठवीं तक की पढ़ाई अच्छे से हो गई, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे गांव जाना था. जो कि 3-4 किलोमीटर दूर था. घरवाले बेटी की सुरक्षा को लेकर परेशान हो गए. स्कूल न भेजने का फैसला लेने वाले थे. तभी पिता ने अपने 8-10 दोस्तों के साथ मीटिंग की. एक छोटी सी पंचायत टाइप की बैठी. इस बैठक में फैसला हुआ कि सीमा को आगे पढ़ने दिया जाएगा.

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सीमा कुशवाहा इटावा की रहने वाली हैं. IAS बनना चाहती थीं, लेकिन निर्भया केस ने फैसला बदलवा दिया. (फोटो- सीमा का फेसबुक पेज)

जब कॉलेज की फीस के लिए पायल बेचनी पड़ी थी

12वीं के बाद सीमा चली गईं औरैया. ग्रेजुएशन करने के लिए. उसी दौरान पिता की मौत हो गई. घरवालों ने भी कहा कि अब उन्हें पढ़ाई के लिए खुद पैसे जुगाड़ने होंगे. सीमा ने हमसे बात की. बताया,

‘पैसे नहीं थे कॉलेज की फीस के लिए. बुआ ने सोने के कान के और पायल दी थी मुझे. मैंने उन्हें बेच दिया. जो पैसे आए उससे कॉलेज की फीस भरी. बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया. किसी तरह ग्रेजुएशन किया.’

इसके बाद सीमा पहुंचीं कानपुर. कानपुर यूनिवर्सिटी से वकालत की पढ़ाई की. तब दीदी और जीजाजी ने कॉलेज की फीस दी. दीदी रहती थीं इटावा में. कॉलेज था कानपुर में. LLB के पहले साल तो सीमा ने इटावा से कानपुर डेली अप-डाउन किया. 160 किलोमीटर की दूरी थी. सुबह 4:30 बजे जातीं और आने में रात हो जाती. फिर भी पैसों की तंगी थी, इसलिए इटावा में ही दीदी के पास रहीं. दूसरे साल कानपुर शिफ्ट हो गईं. वहां एक लोकल मैगजीन में पार्ट-टाइम जॉब करके पैसों का जुगाड़ किया. सीमा कहती हैं,

‘मैं बचपन में झांसी की रानी, किरण बेदी इन सबके बारे में पढ़ा-सुना था. मैं सोचती थी कि ये सब मैं क्यों नहीं बन सकती. इसलिए मेरे अंदर एक जिद थी पढ़ने की. बाहर पढ़ने जाती थी, तो लड़के अजीब-अजीब कमेंट भी करते थे. अंदर में एक गुस्सा था कि हम भी तो इंसान हैं. हमें पुरुषों की तरह अधिकार क्यों नहीं हैं. ये लोग हमें क्यों असुरक्षित महसूस करवाते हैं. मैं क्यों घर में बैठूं. क्यों न पढ़ूं?’

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इस तस्वीर में सीमा निर्भया के माता-पिता के साथ दिख रही हैं. (फोटो- सीमा का फेसबुक पेज)

जब निर्भया केस ने रास्ता बदलवा दिया

2011 से दिल्ली में रह रही हैं. कानपुर से वकालत की पढ़ाई करने के बाद दिल्ली आई थीं. IAS बनने. लेकिन दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड ने फैसला बदलवा दिया. दिल्ली की सड़कों पर, इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन के सामने हज़ारों की भीड़ के साथ निर्भया के लिए धरने पर बैठीं. निर्भया के इंसाफ के लिए आंदोलन में शुरू से आखिरी तक शामिल रहीं. जनवरी 2013 में जब साकेत कोर्ट में पहली बार इस मामले में चार्जशीट दाखिल हुई, तब निर्भया के परिवार से संपर्क में आईं. 2014 में कानूनी तौर पर इस केस से जुड़ीं. सीमा ने बताया,

‘ट्रायल कोर्ट ने चारों को फांसी की सजा सुनाई, मार्च 2014 में हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी. उसके बाद मामला जाना था सुप्रीम कोर्ट. मैं लगातार अंकल-आंटी (निर्भया के पैरेंट्स) के टच में रहती थी. उनसे जब ये पूछती थी कि सुप्रीम कोर्ट में किस तारीख के लिए केस लिस्ट किया गया है, तब वो कहते कि उन्हें पता नहीं है, कुछ समझ नहीं आ रहा. इसके बाद मैं कानूनी तौर पर इस केस से जुड़ गई. सुप्रीम कोर्ट जाना शुरू किया. केस की लिस्टिंग के लिए. कई चक्कर लगाए, तब कहीं केस की लिस्टिंग हुई. सुनवाई हुई. मई, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी फांसी की सजा को बरकरार रखा.’

2017 से लेकर मार्च 2020 तक कई सारी याचिकाएं डाली गईं. निर्भया के पैरेंट्स की तरफ से भी और दोषियों की तरफ से भी. पैरेंट्स जल्द से जल्द फांसी की सजा दिलवाना चाहते थे, दोषी टालने की कोशिश में थे. दिसंबर से लेकर मार्च तक इस केस में बहुत उथल-पुथल मची रही. तीन बार फांसी की तारीख आगे बढ़ाई गई. सीमा ने कभी भी निर्भया के पैरेंट्स को हिम्मत नहीं हारने दी.

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जब दिल्ली में निर्भया केस हुआ था, सीमा मुखर्जी नगर में रहकर IAS की तैयारी कर रही थीं. (फोटो- सीमा के फेसबुक पेज से)

एपी सिंह के लिए कड़ा मैसेज

दोषियों के वकील कई बार मीडिया में आकर बेतुके बयान दे चुके हैं. इस पर जब हमने सीमा से सवाल किया तब उन्होंने एपी सिंह को कड़ा मैसेज दिया. कहा,

‘जो व्यक्ति ये कह दे कि अगर मेरी बेटी निर्भया की जगह होती, तो मैं खुद उसे आग लगा देता, तो ऐसे व्यक्ति का खुद का क्रिमिनल माइंडसेट है. जब आदमियों के रात में बाहर निकलने पर रोक नहीं है, तो औरतों पर क्यों? पुरुषों ने औरतों के लिए टाइम डिसाइड किया है.’

अब बाकी लड़कियों के लिए लड़ेंगी

सीमा कहती हैं कि निर्भया को इंसाफ दिलाने के बाद वो कोशिश करेंगी कि देश की बाकी लड़कियों के साथ भी न्याय हो. उन्होंने कहा,

‘सिस्टम अगर सपोर्ट करेगा तो मैं एक वकील के नाते बाकी लड़कियों को न्याय दिलाने की कोशिश करूंगी. मैं सरकार को लेटर लिखकर कहूंगी कि जो-जो केस पेंडिंग हैं, उन पर जल्द से जल्द सुनवाई हो.’

छह साल तक निर्भया के इंसाफ के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने वाली सीमा को अब हर कोई सैल्यूट कर रहा है. सोशल मीडिया पर लोग इनके फैन हो गए हैं.


वीडियो देखें: दोषियों को फांसी पर लटकते देखना चाहती हैं निर्भया की मां, जानिए नियम क्या कहता है?

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