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4 साल जेल काटकर निकलीं शशिकला तमिलनाडु की राजनीति को फिर अपने इशारों पर चला पाएंगी?

यह 1995 का साल और सितंबर का महीना था. उस दिन मद्रास (आज के चेन्नई) में एक शाही शादी हो रही थी, जिसकी पूरे देश में चर्चा थी. चर्चा इसलिए क्योंकि इस शादी से जुड़े इंतजामात में करोड़ों रुपये खर्च किए गए थे. देश के तमाम बड़े नेता, अभिनेता और उद्योगपति इस शादी में शामिल हुए थे. लेकिन यह शाही शादी आखिर थी किसकी? तो चलिए इसका जवाब हम आपको बता देते हैं.

यह शाही शादी थी वी.एन. सुधाकरन की. सुधाकरन यानी उस वक्त तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता के दत्तक पुत्र. और स्पष्ट शब्दों में कहें तो जयललिता की दोस्त विवेकानंदन कृष्णावेणी शशिकला के भतीजे की, जिन्हें जयललिता ने गोद ले रखा था. सुधाकरन की शादी शिवाजी गणेशन की पोती सत्यलक्ष्मी से हो रही थी.

जयललिता के दत्तक पुत्र सुधाकरन की शादी 90 के दशक की सबसे चर्चित शादियों में से एक थी.
जयललिता के दत्तक पुत्र सुधाकरन की शादी 90 के दशक की सबसे चर्चित शादियों में से एक थी.

इस शादी के बाद तमिलनाडु के बाहर आम लोगों ने पहली बार शशिकला का नाम सुना, जो उस वक्त तमिलनाडु की सत्ता में किसी भी मंत्री से ज्यादा रसूख रखती थीं. कई लोग तो उन्हें डिफैक्टो सीएम (de facto chief minister) तक कहते थे. वही शशिकला भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल में लंबा वक्त गुजारने के बाद 27 जनवरी को रिहा हो गईं. लेकिन कोरोना वायरस से संक्रमित होने के कारण विक्टोरिया अस्पताल में भर्ती हैं. अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वो परिवार के पास जा सकेंगी. शशिकला के पास से जांच एजेंसियों को घोषित आय से 66 करोड़ रुपए ज्यादा की संपत्ति मिली थी. इसी मामले में वह मामले में फरवरी 2017 से बेंगलुरू के पारापन्ना अग्रहारा के सेंट्रल जेल में बंद थीं.

कौन हैं शशिकला?

शशिकला तमिलनाडु के मन्नारगुडी इलाके की रहने वाली हैं. 80 के दशक में मद्रास में एक विडियो पार्लर चलाती थीं. उनके पति नटराजन कडलोर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट वीएस चंद्रलेखा के दफ्तर के एक कर्मचारी हुआ करते थे. चंद्रलेखा को तमिलनाडु के उस वक्त के मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंद्रन (MGR) का करीबी माना जाता था. MGR की करीबी तमिल फिल्मों की एक्ट्रेस जयललिता से भी थी. चूंकि MGR भी फिल्मी बैकग्राउंड से थे, इसलिए जयललिता से उनकी नजदीकी स्वाभाविक थी. उस दौर में जयललिता और चंद्रलेखा- दोनों का MGR के दफ्तर में अक्सर उठना-बैठना था. इन बैठकों में अक्सर चंद्रलेखा के साथ उनके मातहत काम करने वाले नटराजन भी जाया करते थे. कई बार नटराजन अपने साथ अपनी पत्नी शशिकला को भी लेकर जाते. शशिकला के वहां जाने का एक मक़सद यह भी था कि शशिकला विडियोग्राफी की शौकीन थीं. उन्हें बड़े-बड़े लोगों के विडियो बनाना अच्छा लगता था. अब चूंकि कैमरे का सामना करने की अभ्यस्त जयललिता भी अक्सर वहां होती थीं, इसलिए कैमरा चलाने में एक्सपर्ट शशिकला से उनकी अच्छी पटरी बैठने लगी. जयललिता अपने परिवार से कोई खास मतलब नहीं रखती थीं, इसलिए उन्हें शशिकला से इमोशनल सपोर्ट भी मिलने लगा.

MGR का निधन और जयललिता के अच्छे-बुरे दौर

1987 में MGR नहीं रहे. उनके बाद सरकार से लेकर MGR की पार्टी अन्नाद्रमुक तक- हर जगह MGR की पत्नी जानकी रामचंद्रन का दखल हो गया. हद तो तब हो गई, जब जयललिता को MGR के शव के पास भी नहीं जाने दिया गया. यहां तक कि उनके बाल पकड़कर और घसीटकर वहां से हटाया गया था.

MGR की मृत्यु और उसके बाद पार्टी और परिवार से बेदखल जयललिता को परिस्थितियों ने एकदम से एकाकी बना दिया. लेकिन इसी एकाकीपन ने जयललिता और शशिकला के संबंधों को और मजबूती दी. उस दौर में दोनों के संबंधों में इतनी प्रगाढ़ता आ गई थी कि जयललिता ने शशिकला के भतीजे सुधाकरन को गोद ले लिया. इसके बाद जयललिता ने अपनी पार्टी AIADMK (ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) खड़ी की. 1991 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर राज्य की सत्ता संभाली. उनके सत्ता संभालते ही पावर काॅरिडोर में शशिकला की धमक बढ़ने लगी. अचानक से उन्हें डीफैक्टो सीएम माना जाने लगा. राज्य के मंत्री और सीनियर अधिकारी उन्हें सलाम ठोकने लगे. जयललिता को अम्मा और शशिकला को चिनम्मा यानी मौसी कहा जाने लगा.

जयललिता के शासनकाल में शशिकला की ख़ूब चलती थी.
जयललिता के शासनकाल में शशिकला की ख़ूब चलती थी.

लेकिन एक IAS अधिकारी चंद्रलेखा को इस नए निजाम की कथित नाजायज हरकतों को बर्दाश्त करने में दिक्कत हो रही थी. उन पर कथित तौर पर AIADMK के लोगों ने तेजाब फेंक दिया. उसके बाद वह नौकरी से इस्तीफा देकर सुब्रमण्यम स्वामी की जनता पार्टी में शामिल हो गईं. बताते चलें कि अभी जिस केस में शशिकला अपनी सजा पूरी करके  बाहर निकली हैं, उसे भी करीब 2 दशक पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ही उजागर किया था. लेकिन यह सियासत है और इसमें कभी दोस्ती, तो कभी दुश्मनी और कभी दोस्ती-दुश्मनी दोनों साथ-साथ चलती रहती है.

यही वह दौर भी था, जब जयललिता और शशिकला दोनों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे. अकूत संपत्ति इकठ्ठा करने के सबूत मिलने लगे. कोर्ट-कचहरी का चक्कर शुरू हो गया. 1996 के चुनावों में तो तमिलनाडु की सत्ता भी हाथ से खिसक गई.

सुब्रमण्यम स्वामी की बवाली चाय पार्टी

मार्च 1999 में दिल्ली के एक होटल में जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी (जो अब भाजपा के नेता बन चुके हैं) ने एक चाय पार्टी दी. इस चाय पार्टी में सोनिया गांधी और विपक्ष के कई नेताओं के साथ-साथ जयललिता भी पहुंचीं. अपनी दोस्त शशिकला और उनके पति नटराजन के साथ. इस चाय पार्टी के बाद जयललिता ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस ले लिया, और सरकार गिरने की नौबत आ गई. लगा कि कांशीराम और उनकी बसपा केंद्र सरकार को बचा लेगी. लेकिन यहां पर जयललिता के शशिकला कनेक्शन ने अपना रोल निभाया, और बचा-खुचा काम सुब्रमण्यम स्वामी ने पूरा किया. उस वर्ष अंबेडकर जयंती के दिन दिल्ली में एक कार्यक्रम में कांशीराम और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने एकसाथ हिस्सा लिया. माना जाता है कि दोनों को मिलाने में बड़ी भूमिका निभाई शशिकला के पति नटराजन ने. लोग कहते हैं कि नटराजन और कांशीराम का अक्सर उठना-बैठना था. एक ट्रस्ट की बैठकों में. उस दौर में गाजियाबाद के संतोष मेडिकल कॉलेज को एक ट्रस्ट चलाता था, और उस ट्रस्ट में दोनों ट्रस्टी हुआ करते थे.

सुब्रमण्यम स्वामी की चाय पार्टी में सोनिया गांधी और जयललिता.
सुब्रमण्यम स्वामी की चाय पार्टी में सोनिया गांधी और जयललिता.

उसके बाद की कहानी तो सब जानते हैं कि लोकसभा में कांशीराम की पार्टी बसपा यकायक पलट गई. मायावती और अन्य बसपा सांसदों ने वाजपेयी सरकार के खिलाफ वोट दे दिया और सरकार 1 वोट से गिर गई.

जयललिता से कट्टी

2001 में जयललिता एक बार फिर तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज हो गईं. एक बार फिर शशिकला को उनका पुराना रुतबा वापस मिल गया. लेकिन 2006 में फिर से जयललिता की हार हुई. इस दरम्यान जयललिता का कोर्ट-कचहरी का चक्कर भी चलता रहा. इसी दौरान उन्हें कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी भी छोड़नी पड़ी, जिस पर कुछ समय बाद उनकी वापसी हो गई. लेकिन यही वह दौर भी था, जब जयललिता और शशिकला के संबंधों में खटास आनी शुरू हुई. जयललिता को लगने लगा कि पार्टी की खराब हो रही छवि के लिए शशिकला और उनके परिवारवालों का भ्रष्ट तौर-तरीका जिम्मेदार है. शशिकला खुद को पार्टी के भीतर जयललिता की उत्तराधिकारी के तौर पर भी पेश करने लगी थीं. दोनों के बीच संबंध इतने खराब हो गए कि जयललिता ने शशिकला के भतीजे सुधाकरन को दिया गया दत्तक पुत्र का दर्जा वापस ले लिया. 2011 आते-आते तो नौबत यहां तक आ गई कि जयललिता ने शशिकला को पार्टी से ही निकाल दिया. इसी साल जयललिता की सत्ता में वापसी भी हो गई.

जयललिता और शशिकला के खिलाफ सुब्रमण्यम स्वामी ने भ्रष्टाचार के अनेक मामले उजागर किए थे.
जयललिता और शशिकला के खिलाफ सुब्रमण्यम स्वामी ने भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किए थे.

लेकिन कुछ ही वर्षों में दोनों के बीच सुलह-सपाटा हो गया. शशिकला की पार्टी में वापसी हो गई. सियासत के जानकार इस सुलह-सपाटे के पीछे 2 वजह मानते हैं.

पहली, जयललिता का खराब स्वास्थ्य, जिसके चलते उन्हें एक करीबी सहयोगी की जरूरत थी.

दूसरी, तमिलनाडु का जातीय समीकरण, जिसमें शशिकला की थेवर जाति एक बड़ा वोट बैंक है.

शशिकला की वापसी का जयललिता को फायदा भी मिला. 2016 में तमिलनाडु में लंबे समय बाद किसी रूलिंग पार्टी की सत्ता में वापसी हुई. जयललिता के साथ-साथ शशिकला भी अपने पुराने रुतबे के साथ पावर काॅरिडोर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगीं. जयललिता अब पहले जैसी स्वस्थ नहीं थीं. इस कारण से शशिकला का रसूख पहले की तुलना में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था.

लेकिन इसी दौर में शशिकला के साथ कई और विवाद जुड़ने लगे. पहले तो सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोप ही थे, लेकिन अब उन पर जयललिता को धीमा जहर देने का आरोप लगा. जयललिता के परिवार के लोगों की पावर काॅरिडोर में एंट्री की कोशिश के चलते रोज-रोज कलह बढ़ने लगी. जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार और शशिकला के एक और भतीजे टीटीवी दिनाकरन की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जोर मारने लगी.

लेकिन इन सबके बीच 5 दिसंबर 2016 को जयललिता परलोक सिधार गईं. उसके बाद उनके शव और उनसे जुड़ी रस्मों की अदायगी के लिए एक बार फिर शशिकला और जयललिता के परिवार के लोग आपस में भिड़ गए. अंततः शशिकला भारी पड़ीं. जयललिता के अंतिम संस्कार से जुड़ी रस्में भी उन्होंने ही अदा कीं.

सीएम बनने की ख्वाहिश और जेल

जयललिता के निधन के बाद ओ. पनीरसेल्वम को तमिलनाडु का सीएम बनाया गया. पनीरसेल्वम पहले भी सीएम की जिम्मेदारी संभाल चुके थे, जब जयललिता को केस-मुकदमों की वजह से जेल जाना पड़ा था. लेकिन शशिकला को उनका सीएम बनना पसंद नहीं था. कहा जाता है कि वो खुद या अपने पति नटराजन को इस पद पर देखना चाहती थीं. इसके लिए शशिकला ने कोशिशें भी शुरू कर दीं. विधायक भी उनके पीछे लामबंद होने लगे. वे जयललिता की जगह पार्टी की महासचिव चुन ली गईं. पनीरसेल्वम को गद्दी छोड़ने का फरमान जारी कर दिया गया. लेकिन तभी आय से अधिक संपत्ति का एक मामला सामने आ गया, और पूरा परिदृश्य ही बदल गया. न्यायालय ने जांच एजेंसियों के इस दावे पर अपनी मुहर लगा दी कि शशिकला ने सत्ता का बेजा इस्तेमाल करते हुए अकूत संपत्ति खड़ी की है और उनके पास अपनी घोषित संपत्ति से 66 करोड़ रुपये ज्यादा की संपत्ति है. शशिकला को 4 साल कैद की सजा सुनाई गई. इस सजा का मतलब यह था कि मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत उन्हें 4 साल जेल में रहना होगा, और जेल से छूटने से अगले 6 साल तक वो कोई भी पद संभालने के अयोग्य हो जाएंगी. लेकिन पार्टी की मंशा के आगे झुकते हुए पनीरसेल्वम ने सीएम की कुर्सी छोड़ दी. तब शशिकला के प्रतिनिधि के तौर पर AIADMK के वरिष्ठ नेता ई. पलानीसामी ने तमिलनाडु की सत्ता संभाली. लेकिन शशिकला के जेल जाते ही पलानीसामी और पनीरसेल्वम में दोस्ती हो गई. इस दोस्ती का नतीजा यह निकला कि शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरन को ही पार्टी से निकाल दिया गया. इसके बाद दिनाकरन ने अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम (AMMK) के नाम से अपनी पार्टी बना ली.

शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरन
शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरन

शशिकला के सामने मौजूद विकल्प

शशिकला की अब जेल से रिहाई हो गई है. जाहिर है कि अब उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी जोर मारेगी ही. ये अलग बात है कि वो अगले 6 सालों तक न तो कोई चुनाव लड़ सकती हैं, और न ही किसी सार्वजनिक पद पर बैठ सकती हैं. ऐसे में उनके सामने क्या विकल्प हैं? आइए इन विकल्पों की चर्चा करते हैं.

पहला विकल्प : शशिकला AIADMK ज्वाइन कर लें, और पलानीसामी-पनीरसेल्वम की जोड़ी के अधीन काम करें. लेकिन यक्ष प्रश्न यही है कि पलानीसामी और पनीरसेल्वम आगामी चुनाव के मौके पर भ्रष्टाचार के मामले में सजा पा चुकीं शशिकला को पार्टी में शामिल करने का रिस्क लेंगे?

दूसरा विकल्प: अपने भतीजे दिनाकरन की AMMK पार्टी को मजबूत करें, और राज्य में तीसरा मोर्चा बनाएं. पिछले लोकसभा चुनाव में AMMK को तमिलनाडु में 4 प्रतिशत वोट मिले थे.

तीसरा विकल्प: राजनीति से तौबा कर लें, क्योंकि वैसे भी अगले 6 साल तक न शशिकला कुछ कर नहीं सकतीं. वैसे भी उनके खिलाफ विदेशी मुद्रा के दुरुपयोग से संबंधित मुकदमे अब भी चल रहे हैं. 900 करोड़ के कोडानाडु टी इस्टेट का मामला भी अदालत में है.


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