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34 साल की उम्र में PM बनने जा रही सना मरीन की सफलता के पीछे की कहानी

फिनलैंड यूरोप में एक छोटा सा देश है. यहां पर अभी नई प्रधानमंत्री चुनी गई हैं, नाम है सना मरीन. ख़ास बात ये है कि वो सिर्फ 34 साल की हैं. और प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही मौजूदा समय में वो दुनिया की सबसे कम उम्र की प्रधानमंत्री बन जाएंगी. यही नहीं, वहां की वर्तमान गठबंधन सरकार में जो साथी पार्टियां हैं, उनकी भी लीडर महिलाएं ही हैं.

ये सब पढ़कर आपको लग रहा होगा कि फिनलैंड जैसा देश महिलाओं के लिए कितना अच्छा है. वहां लीडरशिप की पोजीशन में इस वक़्त इतनी सारी महिलाएं हैं. जोकि बेहद कम देखने को मिलता है. लेकिन फिनलैंड और इसके आस-पास के देशों में अपनी जगह बनाने के लिए महिलाओं ने काफी संघर्ष किया है.

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सना मरीन पर कई आर्टिकल लिखे जा रहे हैं. बताया जा रहा है किस तरह वो सरकार में ट्रांसपोर्ट और कम्युनिकेशन मिनिस्टर थीं. उसके बाद उन्हें पीएम पद के लिए चुना गया. लेकिन उनका सफ़र सिर्फ़ यहीं तक सीमित नहीं रहा है. (तस्वीर: Getty Images)

यूरोप के ही एक देश आइसलैंड का उदाहरण ले लीजिए. 1975 की 24 अक्टूबर को वहां की महिलाओं ने एक दिन की छुट्टी लेने का फैसला किया. स्ट्राइक पर नहीं गईं. स्ट्राइक वहां गैर कानूनी है. इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि एक दिन वो कोई काम नहीं करेंगी. घरों से लेकर ऑफिसेज तक. उस एक दिन देश को मानो ब्रेक लग गए. रेडी टू ईट खाने के पैकेट्स इतने बिके कि स्टोर उनसे खाली हो गए. पुरुषों को अपने बच्चों को ऑफिस साथ लेकर जाना पड़ा. ऑफिस वालों के हाथ-पांव फूल गए. बच्चों को बहलाने के लिए टॉफ़ी, पेन्सिल, पेपर वगैरह का इंतजाम करना पड़ा उन्हें.

जो महिलाएं छुट्टी पर चली गई थीं, उनमें से कई ने इकट्ठे होकर रैली में भाग लिया. उस साल तक आइसलैंड में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले 40 फीसद कम कमाती थीं. यानी अगर किसी काम के लिए पुरुष को 100 रुपए मिल रहे हैं, तो उसी काम के लिए महिलाओं को 60 रुपए ही मिलते थे. यही नहीं, हाउसवाइव्स की भी हालत ख़राब थे. उन्हें अपने किए गए काम के लिए कोई पहचान, कोई तारीफ़ नहीं मिलती थी. इन सभी मुद्दों को जोर शोर से उठाने के लिए 1975 में ये रैली निकाली गई. आइसलैंड की तकरीबन 90 फ़ीसद महिलाओं ने इसमें भाग लिया. इसके ठीक अगले साल ही संसद में इक्वल पे यानी बराबर की सैलरी देने की गारंटी देने वाला बिल पास किया गया. यानी किसी एक काम के लिए पुरुष और स्त्री को दिए जाने वाले मेहनताने में कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.

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एक दिन की छुट्टी लेकर जश्न मनातीं आइसलैंड की महिलाएं, जिन्होंने अपने देश के पुरुषों की आंखें खोल दीं. (तस्वीर साभार : BBC)

बीबीसी में छपी रिपोर्ट के अनुसार भले ही आइसलैंड में महिलाओं को वोट देने का अधिकार 1915 में मिल गया हो, लेकिन 1975 तक सिर्फ नौ महिलाएं ही संसद तक पहुंच पाई थीं. रैली वाले साल तो संसद में सिर्फ तीन महिला सांसद मौजूद थीं. इस तरह की स्ट्राइक का आइडिया वहां के रेड स्टॉकिंग्स नाम के महिला आन्दोलन ने 1970 में भी दिया था, लेकिन उस समय महिलाओं को ये जंचा नहीं था. 1975 की इस रैली के पांच साल बाद ही आइसलैंड को उसकी पहली महिला प्रेसिडेंट मिली. Vigdis Finnbogadottir.

उस एक रैली ने कई लोगों की आंखें खोल दीं. घर और घर से बाहर महिलाओं की भूमिका का महत्त्व लोगों को समझ आया.

वोटिंग के मामले में फिनलैंड आइसलैंड से भी आगे रहा. 1906 में ही यहां महिलाओं को वोट करने का अधिकार मिला. अगले साल जो चुनाव हुए, उनमें 19 महिला सांसद चुनकर फिनलैंड की संसद पहुंचीं. ये दुनिया के सबसे पहली महिला सांसद बनीं, और इनके नाम इतिहास में दर्ज हुए.

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जो दुनिया की पहली महिला सांसद चुनी गईं, उनमें से 13 की तस्वीर. (तस्वीर: विकिमीडिया )

1994 में ही यहां मैरिटल रेप को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था. आज भी कई देशों की महिलाएं इसकी मांग कर रही हैं. इनमें भारत भी शामिल है.

सना मरीन इसलिए फिनलैंड की पीएम नहीं बनीं क्योंकि वो महिला हैं, वो इसलिए बनीं क्योंकि वो इस पद के उपयुक्त समझी गईं. लेकिन पद के लिए उपयुक्त समझे जाने की लंबी लड़ाई को परदे के पीछे रख देना भूल होगी. यही किसी भी उपलब्धि का सार है.


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