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निर्भया के दोषियों को एक साथ फांसी देने के पीछे क्या मजबूरी है?

निर्भया केस के चार दोषियों को 22 जनवरी को फांसी होनी थी. तारीख आगे बढ़ाकर 1 फरवरी तय की गई. लेकिन इस दिन भी फांसी नहीं हो सकी. वजह? 31 जनवरी को पटियाला हाउस कोर्ट के जज धर्मेंद्र राणा ने चारों दोषियों की फांसी पर स्टे लगा दिया. अब दोषियों का नया डेथ वॉरंट आने वाले दिनों में जारी किया जाएगा.

इसके पीछे वजह क्या है?

कोर्ट में ये दलील दी गई कि कानूनन एक जुर्म में अगर एक से ज्यादा दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई है, और किसी एक दोषी की याचिका अगर पेंडिंग है, तो दूसरों को फांसी नहीं दी जा सकती.

इस दलील के पीछे की कहानी

हरबंस सिंह, कश्मीर सिंह, मोहिंदर सिंह, और जीता सिंह. चार लोगों को मल्टिपल मर्डर के केस में गिरफ्तार किया गया. मोहिंदर सिंह कथित रूप से पुलिस एनकाउंटर में मारा गया. बचे तीन लोग. इन पर पीलीभीत के ट्रायल कोर्ट में मामला चला. और उन्हें दोषी करार दिया गया. साल था 1975. सभी को फांसी की सज़ा सुनाई गई. हाई कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा.

Nirbhaya Collage 700
निर्भया के मामले में सभी दोषियों को एक साथ ही फांसी होगी. इसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह 1982 का हरबंस सिंह मामला था. (तस्वीर: इंडिया टुडे)

जीता सिंह ने स्पेशल लीव पेटीशन* डाली, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया उसे. कश्मीर सिंह ने भी यही किया, और उसकी पेटीशन स्वीकार हो गई. दो साल बाद अप्रैल 1977 में जस्टिस पीएन भगवती और जस्टिस फज़ल अली ने कश्मीर सिंह की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया. हरबंस सिंह ने भी स्पेशल लीव पेटीशन डाली. वो खारिज हो गई. साल था 1978. रिव्यू पेटीशन भी खारिज हो गई. राष्ट्रपति को लिखा, कि फांसी रोक दी जाए. वो भी खारिज हो गई. साल था 1981. फांसी की सजा तय हुई, 6 अक्टूबर. फटाक से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हरबंस, और एक और याचिका दाखिल की. इस बार सुप्रीम कोर्ट ने फांसी पर स्टे लगा दिया.

(*स्पेशल लीव पेटीशन: भारत के संविधान का अनुच्छेद 136 इसकी बात करता है. इसमें किसी भी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट के सामने सुनवाई का अधिकार दिया जाता है. मिलिट्री के ट्रिब्यूनल या कोर्ट मार्शल के अलावा किसी भी निर्णय को चैलेन्ज करते हुए इस सुनवाई के लिए अपील दाखिल की जा सकती है.)

इन सबके बीच बच गया जीता सिंह. उसने एक स्पेशल लीव पेटीशन के बाद कोई भी अपील नहीं की. उसे 6 अक्टूबर, 1981 को फांसी पर चढ़ा दिया गया.

अब हरबंस सिंह का मामला कोर्ट के सामने आया. सबका माथा ठनका. एक अपराध. तीन दोषी. तीनों की अलग-अलग स्थिति. एक की घट गई, एक पर स्टे लगा, एक को फांसी पर लटका दिया गया. कोर्ट ने कहा, नाइंसाफी हुई. जीता सिंह को भी मौका मिलना चाहिए था. अब क्या हो? हरबंस के साथ क्या किया जाए. कोर्ट ने कहा, कि राष्ट्रपति चाहें तो फांसी की सजा माफ़ कर दें. वही हुआ. 1982 में हरबंस सिंह बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश में हरबंस सिंह की फांसी की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया गया.

इसके बाद ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि किसी जुर्म के लिए अगर मौत की सजा सुनाई गई, और उसके एक से ज्यादा दोषी हैं, और किसी को फांसी दी जा रही है, तो जेल सुपरिटेंडेंट को ये सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि दूसरे दोषी की मौत की सजा कम तो नहीं की गई है. अगर ऐसा हुआ है, तो उसे अपने वरिष्ठों को बताना चाहिए.

यही नहीं, दिल्ली जेल की मैनुअल का नियम 854 भी यही कहता है. कि अगर किसी मामले में एक से ज्यादा व्यक्ति को मौत की सजा सुनाई गई है, और किसी एक ने भी अपील या स्पेशल लीव पेटीशन डाली है, तो सबके लिए फांसी की तारीख आगे बढ़ जायेगी. सिर्फ उस व्यक्ति की नहीं.

Delhi Jail Manual 700
दिल्ली जेल मैनुअल का वो हिस्सा जो बताता है कि एक जुर्म के एक से ज्यादा दोषियों को अगर मौत की सजा सुनाई जाती है, तो उन्हें साथ में ही फांसी होगी.

अभी तक क्या हुआ है मामले में?

चार दोषी हैं. पवन गुप्ता, मुकेश सिंह, विनय कुमार शर्मा, और अक्षय कुमार. इनमें से विनय कुमार शर्मा की दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजी गई है. 7 जनवरी, 2020 को कोर्ट ने 22 जनवरी को फांसी की तारीख तय की थी.  उसके बाद मुकेश कुमार ने दया याचिका राष्ट्रपति को भेजी. राष्ट्रपति ने उसे खारिज किया. फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय के खिलाफ दर्ज की गई अपील को भी खारिज कर दिया. इसके बाद दूसरी बार 17 जनवरी को फांसी की तारीख तय हुई 1 फरवरी. लेकिन अब फिर से फांसी टल गई है. निर्भया की मां फैसले के बाद कोर्ट के बाहर ही फूट-फूट कर रो पड़ीं. उन्होंने कहा, लड़ाई जारी रहेगी. विनय और अक्षय की क्यूरेटिव पेटीशन सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है. पवन ने अभी तक क्यूरेटिव पेटीशन दाखिल नहीं की है. क्यूरेटिव पेटीशन क्या होती है आप यहां पढ़ सकते हैं. 


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