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क्या ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट यूनियन प्रेसिडेंट रश्मि सामंत को हटाने की साजिश रची गई?

रश्मि सामंत. 22 साल की हैं. कर्नाटक के उडूपी जिले से ताल्लुक रखती हैं. बीते महीने यानी फरवरी में खबर आई कि रश्मि ने ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट यूनियन चुनाव जीता. ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला. लेकिन चुनाव जीतने के एक सप्ताह के अंदर ही रश्मि ने इस्तीफा दे दिया. क्यों? क्योंकि उनके ऊपर आरोप लगे कि कुछ साल पहले उन्होंने रेसिस्ट, यहूदी विरोधी और समलैंगिकों के प्रति नफ़रत फैलाने वाले कमेंट सोशल मीडिया पर किए थे. रश्मि ने इन कमेंट के लिए माफी भी मांगी. हालांकि, इसके बाद भी उनके ऊपर हमले जारी रहे है. रश्मि के शब्दों में कहें तो ये हमले ‘साइबर बुलीइंग’ के स्तर तक पहुंच गए. इससे परेशान होकर रश्मि भारत आ गईं.

भारत आने के बाद रश्मि ने कुछ मीडिया संस्थानों को इंटरव्यू दिए. यहां उन्होंने ‘साइबर बुलीइंग’ और ट्रोल को लेकर खुलकर बात की. यह भी आरोप लगाया कि उन्हें एक साजिश के तहत निशाना बनाया गया. साथ ही उनके जन्मस्थान, उनके रंग और धर्म को लेकर भी उन्हें ट्रोल किया गया. इन आरोपों पर हम बाद में आएंगे. लेकिन उससे पहले आपको थोड़ा रश्मि के बारे में और उन्होंने जिन मुद्दों पर चुनाव लड़ा, उसके बारे में बता देते हैं. साथ ही यह भी बताएंगे कि रश्मि के वे कमेंट कौन से थे, जिन्हें लेकर उन्हें रेसिस्ट, यहूदी विरोधी और होमोफोबिक बताया गया.

Rashmi Samant कौन हैं?

रश्मि सामंत ने कर्नाटक के मनीपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली है. उनके लिंक्डइन अकाउंट से पता चलता है कि वे क्लाइमेट को लेकर काफी संजीदा हैं. खासकर सस्टेनेबल एनर्जी के यूज को लेकर. साल 2020 में उन्होंने ऑक्सफर्ड में दाखिला लिया. यहां वे एनर्जी सिस्टम में M.Sc. कर रही हैं.

अपनी पढ़ाई के साथ-साथ रश्मि काम भी करती रही हैं. जून 2016 से लेकर मई 2017 तक रश्मि ने मनीपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के एडिटोरियल बोर्ड में लेखिका के तौर पर काम किया. इसके बाद गोवा शिपयार्ड लिमिटेड में उन्होंने इंटर्नशिप की. वहीं 2018 में उन्होंने यूनीवर्सिटी ऑफ केमिस्ट्री एंड टेक्नॉलजी में रिसर्च असिस्टेंट के तौर पर काम किया. यह यूनिवर्सिटी प्राग में है.

Rashmi Samant कर्नाटक के उडूपी जिले से ताल्लुक रखती हैं. उन्होंने पढ़ाई के साथ काम करना भी शुरू कर दिया था. फोटो उनके ट्विटर हैंडल से ली गई है.
Rashmi Samant कर्नाटक के उडूपी जिले से ताल्लुक रखती हैं. उन्होंने पढ़ाई के साथ काम करना भी शुरू कर दिया था. फोटो उनके ट्विटर हैंडल से ली गई है.

रश्मि सामंत मनीपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालजी में स्टूडेंट काउंसिल की टेक्निकल सेक्रेटरी रही हैं. यहां से निकलने के बाद वे ऑक्सफर्ड एविएशन सोसाइटी की महासचिव रहीं.

किन मुद्दों पर लड़ा चुनाव?

रश्मि ने काफी प्रोग्रेसिव मुद्दों पर चुनाव लड़ा. उन्होंने अपने मैनिफेस्टो में होमोफोबिया और ट्रांसफोबिया से लड़ने की बात कही. मतलब LGBT समुदाय के लोगों के खिलाफ जो पूर्वाग्रह और नफरत होती है, उसे खत्म करने की बात.

इसके साथ ही रश्मि सामंत ने ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के सिलेबस का डिकॉलोनाइजेशन करने की बात कही. साथ ही कैंपस को और अधिक समावेशी बनाने की वकालत भी की. डिकॉलोनाइजेशन का मतलब यह है कि उस नजरिए को खत्म करना, जिसके तहत ब्रिटेन खुद को पूरी दुनिया का रहनुमा मानता है. इस नजरिए के तहत जो पढ़ाई होती है, उसमें बताया जाता है कि 18वीं से लेकर 20वीं शताब्दी तक ब्रिटेन ने दुनिया के जिन देशों पर कब्जा किया, वो असल में वहां के लोगों को कथित तौर पर सभ्य और समृद्ध बनाने के लिए किया. यहां आपको बता दें कि ब्रिटेन में ब्लैक, एशियाई और माइनॉरिटी एथनिक ग्रुप के लोगों को हाशिए के समाज से आए हुए लोग माना जाता है.

ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में लगी सेसिल रोड्स की मूर्ति. सेसिल रोड्स को इतिहास एक साम्राज्यवादी के तौर पर याद करता है.
ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में लगी सेसिल रोड्स की मूर्ति. सेसिल रोड्स को इतिहास एक साम्राज्यवादी के तौर पर याद करता है.

रश्मि सामंत ने पूरे यूनिवर्सटी कैंपस को जल्द से जल्द सस्टेनेबल एनर्जी पर निर्भर बनाने के लिए प्रयास करने का भी वादा किया. साथ ही साथ कैंपस से उन लोगों के स्टैच्यू हटाने का भी, जिन्हें इतिहास में इम्पीयरलिस्ट फिगर्स के तौर पर जाना जाता है. उदाहरण के तौर पर सेसिल रोड्स का स्टैच्यू. इम्पीरियलिज्म का मतलब उस विचारधारा या नजरिए से है, जिसमें वेस्ट के लोगों को अच्छा और ईस्ट के लोगों को असभ्य माना जाता है. इस तरह से यह नजरिया कहता है कि वेस्ट के लोग ईस्ट के लोगों पर राज करें और उन्हें धीरे-धीरे सभ्य बनाएं. इसी विचारधारा के तहत ही ब्रिटेन ने कई देशों को अपना गुलाम बनाया था.

Rashmi Samant को क्यों देना पड़ा इस्तीफा?

11 फरवरी को रश्मि ने चुनाव जीता. इसके बाद ऑक्सफर्ड के वीकली स्टूडेंट न्यूज़पेपर ‘चेरवेल’ में उन्हें लेकर एक आर्टिकल छपा. इस आर्टिकल में रश्मि के कुछ पुराने सोशल मीडिया कमेंट्स का जिक्र था.

दरअसल, रश्मि 2017 में मलेशिया गई थीं. उन्होंने वहां की एक फोटो भी डाली थी. इसका कैप्शन उन्होंने दिया- ‘चिंग चांग’. इसी तरह उन्होंने बर्लिन होलोकॉस्ट मेमोरियल की एक फोटो डाली. जिसका कैप्शन उन्होंने लिखा- ‘ये मेमोरियल पूर्व की यातनाओं और उनसे जुड़े क्रियाकलापों की उथली यादों को प्रदर्शित करता है’. बता दें कि बर्लिन का होलोकॉस्ट मेमोरियल उन लाखों यहूदियों की याद में बनाया गया है, जिनका हिटलर ने नरसंहार किया और जिन्हें असीमित यातनाएं दीं.

इस आर्टिकल के बाद कैंपस के छात्र रश्मि से नाराज हो गए. यूनिवर्सिटी के LGBT समूह ने उनसे इस्तीफा मांगा. वहीं दक्षिण पूर्व एशिया से आए स्टूडेंट्स ने ‘चिंग चांग’ कमेंट पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि यह रेसिस्ट कमेंट है. कैंपस के यहूदी स्टूडेंट भी रश्मि के इस्तीफे की मांग करने लगे.

रश्मि ने उन कमेंट्स के लिए माफी मांगी और 16 फरवरी को इस्तीफा दे दिया.

साजिश के तहत निशाना बनाया?

भारत आने के बाद उन्होंने कुछ बड़े खुलासे किए. दी प्रिंट को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि जब वे कैंपस और सिलेबस का डिकॉलोनाइजेशन करने की बात कर रही थीं, तो उनसे कहा गया कि कॉलोनाइजेशन तो बहुत अच्छा था. यह दुनिया के असभ्य देशों को सभ्य और समृद्ध बनाने के लिए था. उन्होंने इंटरव्यू में बताया,

“ऐसे सवाल करने वालों से मैंने कहा कि कॉलोनाइजेशन की को उन लोगों के नजरिए से देखना चाहिए, जिन्हें गुलाम बनाया गया. कॉलोनाइजेशन उन लोगों का शोषण करने का जरिया था. इससे कोई गरीबी नहीं मिटी. बल्कि लोग और गरीब ही हुए.”

और क्या कहा रश्मि ने?

रश्मि ने न्यूज 18 पर लिखे अपने लेख में कैंसिल कल्चर की भी बात की. उन्होंने कहा कि यह कैंसिल कल्चर सुधार की किसी भी गुंजाइश को खत्म कर देता है. और इसी कैंसिल कल्चर का वो शिकार हुई हैं. यहां कैंसिल कल्चर के बारे में भी आपको बता देते हैं. मान लीजिए कि आपने आज से पांच या आठ साल पहले कोई ऐसी बात कह दी हो, जो किसी का अपमान करती है. लेकिन आज आपकी सोच में बदलाव आ चुका है और पहले कही गई बात को लेकर आप माफी मांगते हैं. यहां कैंसिल कल्चर वाले लोग ये कहेंगे कि आपको माफी मांगने का कोई हक नहीं है क्योंकि आपने पहले कोई अपमानजनक बात कही थी, आपका नेचर ही ऐसा है.

रश्मि ने दि प्रिंट से कहा कि उन्हें निशाना बनाने वाले लोगों ने उन्हें अपनी बात रखने का कोई मौका ही नहीं दिया. उन्होंने यह भी नहीं देखा कि वे किस माहौल में पली-बढ़ी. उन्होंने कहा,

“मैंने अपने सारे कमेंट्स के लिए माफी मांगी. आज से चार साल पहले मैं प्रोग्रेसिव तरीके से नहीं सोचती थी. मेरे वो कमेंट गलत थे. धीरे-धीरे मेरी सोच में बदलाव आया. लेकिन कुछ लोगों को स्वीकार ही नहीं है. उन्हें लगता ही नहीं कोई सुधर सकता है या सुधार की कोई गुंजाइश भी होती है.”

सामंत ने कहा कि अगर लोग उनके बैकग्राउंड पर ढंग से विचार करते तो शायद उन्हें नया मौका मिल जाता. लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि भले ही ऊपरी तौर पर वे खुद को रेसिस्ट ना दिखाते हों, लेकिन अंदरूनी तौर पर वैसा ही सोचते हैं. उसी आधार पर काम करते हैं. रश्मि ने कहा,

“मैंने डिकॉलोनाइजेशन की बात की थी और सेसिल रोड्स की तुलना हिटलर से कर दी थी. इसलिए भी वो मुझसे बहुत नाराज थे. उन्होंने मुझे हिंदू होने की वजह से भी निशाना बनाया. मेरा हिंदू होना मुझे असहिष्णु नहीं बनाता है.”

हिटलर की ही तरह रोड्स भी नस्ल के आधार पर भेदभाव का हिमायती था. हालांकि, ब्रिटेन में ज्यादातर लोग अभी भी सेसिल रोड्स को सम्मान के साथ देखते हैं. जैसे पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने भले ही एशिया और अफ्रीका में ब्रिटेन के गुलाम देशों पर एक के बाद एक ज्यादती की, लेकिन ब्रिटेन में उन्हें सम्मान दिया जाता है.

न्यूज 18 में अपने लेख में रश्मि ने गांधी के एक कथन को कोट किया है,

“मैं एक समान्य व्यक्ति होने का दावा करता हूं. जो किसी भी दूसरे व्यक्ति की तरह गलतियां कर सकता है. हालांकि, मेरे अंदर इतनी विनम्रता है कि मैं अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकता हूं और दूसरे रास्ते पर जा सकता हूं.”

रश्मि ने यह भी दावा किया कि एक प्रोफेसर ने उनके माता-पिता को केवल इसलिए कट्टर कह दिया कि वो हिंदू धर्म को मानते हैं. उन्हें इस्लामोफोबिक भी बता दिया. सामंत ने कहा कि वे प्रोफेसर के खिलाफ शिकायत करने की तैयारी कर रही हैं. हाल फिलहाल में रश्मि का ट्विटर अकाउंट भी बैन कर दिया गया. जिसे बाद में कुछ प्रतिबंधों के साथ दोबारा शुरू कर दिया. हालांकि, उनके कुछ पुराने ट्वीट्स हटा दिए गए हैं.


 

वीडियो- साइना की बायोपिक के पोस्टर में सोशल मीडिया यूजर्स ने क्या गलती निकाल दी?

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