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'थप्पड़' में तापसी पन्नू ने जो किया वो 15 साल पहले कर देनेवाली प्रतिमा सिन्हा की कहानी

तापसी पन्नू स्टारर थप्पड़ 28 फरवरी को रिलीज़ हो गई है. डोमेस्टिक वायलेंस को एक नए नज़रिए से दिखाती है.  फिल्म के बारे में पढ़ना हो तो यहां पढ़ लीजिए. हम बात करेंगे इस फिल्म के बहाने एक कहानी की. कहानी एक ऐसी महिला की जिसने अपनी निजी ज़िन्दगी में वही कदम उठाया, जैसा तापसी ने. आज से पंद्रह साल पहले. ये कहानी है प्रतिमा सिन्हा की.

वाराणसी से हैं. लेखिका और कवयित्री हैं. हिंदी और उर्दू में इनके संग्रह आ चुके हैं. इन्होंने शेयर की अपनी कहानी. हम उनकी इजाज़त से आपको यहां पढ़वा रहे हैं.


‘थप्पड़’ फ़िल्म का तकरीबन ढाई मिनट लंबा ट्रेलर बार-बार देखती हूं. हर बार अलग-अलग संवाद को सुनने और उसके एक-एक शब्द को प्याज़ के छिलके की तरह उतार कर समझने की कोशिश कर रही हूं.

बस एक थप्पड़ ही तो…

डिवोर्सी का टैग लग जाएगा…

थोड़ा बहुत तो बर्दाश्त करना पड़ता है औरत को….

अब यही होना बाक़ी रहा है…

सब कुछ बहुत जाना-पहचाना, सुना-सुना सा क्यों लग रहा है? हां, यह कहानी मेरी भी है, जिसे सुनाने की बात कभी मेरे ज़हन में नहीं आई. मुझे हमेशा यह लगता रहा कि कौन सुनेगा इसे? किसे फ़र्क़ पड़ता है इस कहानी से? क्यों ज़रूरी है किसी को अपना अतीत, अपनी कहानी सुनाना?

बरसों पहले एक थप्पड़ ही तो था, बस एक थप्पड़…..

जिसके बाद मेरा फ़ैसला था,

और नहीं.

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प्रतिमा मूल रूप से बनारस की हैं. लेकिन काम के सिलसिले में पूरे देश में आना-जाना होता है इनका. (तस्वीर: फेसबुक)

जिस समाज में ससुराल और पति नाम के जीव के तमाम अत्याचार सहकर भी, शादी जैसे ‘पवित्रतम, जन्म जन्मांतर के बंधन की मोहर’ से सुसज्जित संबंध निभाने को सर्वसम्मति से सर्वोत्कृष्ट आचरण और स्त्रीधर्म माना जाता हो. ऐसी सहनशील स्त्रियों को देवी पद पर सुशोभित किया जाता हो. वहां बस एक थप्पड़ और ‘ज़रा से अपमान’ की प्रतिक्रिया में विवाह जैसी दैवीय (?) संस्था को ख़ारिज कर ‘डाइवोर्स’ ले लेना, मुझे ‘निकृष्ट, कुलनाशिनी, कुलप्रतिष्ठाभंजक और चरित्रहीन’ ही साबित कर सकता था. और किया भी.

यह बात दूसरी है कि मेरे फ़ैसले की वजह सिर्फ़ एक थप्पड़ नहीं, बल्कि एक बड़े झूठ की बुनियाद पर हुई शादी और उससे मिली सामाजिक और मानसिक यंत्रणा का पूरा कुचक्र था. कोई रास्ता न दिखाई देने की बेबसी थी और उस घुटन से किसी भी तरह निकल पाने की मेरी तड़प थी.

पन्द्रह साल पहले मैं ‘थप्पड़’ की तापसी पन्नू की तरह अपनों के ही सवालों के चक्रव्यूह में घिरी हुई थी.

वो चक्रव्यूह फ़िल्मी नहीं था. जवाब के लिये कोई स्क्रिप्ट भी तैयार नहीं थी. मेरे पास किसी भी सवाल का सही-सही जवाब नहीं था सिवाय एक ज़िद के. कि मैं ऐसे रिश्ते में नहीं रह सकती, जहां एक औरत होने के लिए दिन-रात मुझे ज़लील होना पड़े. मुझे अपनी ज़िंदगी में एक ऐसा मर्द मंज़ूर नहीं जिसके लिए मैं एक शरीर से ज़्यादा हैसियत न रखूं. मैं उस समाज से थी जहां ‘मां’ बनना स्त्री जीवन की सार्थकता मानी जाती है. और मैंने अपने जीवन को सार्थक करने से सिर्फ़ इसलिए इनकार कर दिया था क्योंकि मुझसे कहा गया था

“बहुत उड़ती हो. एक बच्चा हो जाएगा तो ये पर कट जाएंगे. ज़मीन पर आ जाओगी.”

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जब प्रतिमा ने तलाक की बात की, तब उनके परिवार के साथ साथ उनके रिश्तेदारों ने भी उन्हें डराने-धमकाने की पूरी कोशिश कि. (तस्वीर: फेसबुक)

मुझे बच्चों से बेहद प्यार है और ख़ुद के औरत होने पर नाज़ है. मैं औरत होने की सज़ा के तौर पर बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थी, इसलिए मैंने मां बनने का मोह त्याग दिया. मेरे लिए सम्मान के साथ जीना ही सबसे बड़ा सवाल बन गया था.

जब मैंने विरोध करने की कोशिश की तो मुझे बताया गया कि औरतों को ऐसे ही करना होता है.

कहा गया, औरत को धैर्यवान होना चाहिए और सहनशील भी. छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाना चरित्रवान होने की निशानी नहीं है. भला कौन औरत है जिसने पति के थप्पड़ नहीं खाए? मार नहीं खाई?

‘इस देश में हज़ारों लाखों (इससे कहीं ज़्यादा) औरतें मारपीट सह कर भी शादी के पवित्र बंधन की गरिमा बचाए बैठी हैं. क्या तुम इतना बर्दाश्त नहीं कर सकती?’

मुझसे पूछा गया.

मेरा जवाब था,

‘नहीं’.

लोगों ने कहा,

क्या करोगी? कहां जाओगी ? जब लोग पूछेंगे कि मायके में क्यों हो? तब क्या जवाब दोगी? माता-पिता किसी को मुंह नहीं दिखा सकेंगे. लोग ताना मार-मार के जीना मुश्किल कर देंगे. दाने-दाने के लिए भाइयों का मोहताज होना होगा. भाभियां जूते की नोक पर रखेंगी. हर मोड़ पर बेइज़्ज़ती सहनी होगी. पिछली और अगली सात पुश्तें किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगी.

ईमानदारी के साथ कन्फ़ेस करना चाहती हूं. उस वक़्त मैं अपनी पिछली और अगली सात पुश्तों की बात तो बहुत दूर, अपने आस-पास मेरी और मेरे जीवन की चिन्ता से घिरे शुभचिंतक रिश्तेदारों की फ़िक्र से भी बहुत दूर थी.

बहुत स्वार्थी हो चुकी थी मैं. मुझे सिर्फ़ ‘मैं’ दिख रही थी. मेरी ज़िंदगी, मेरा मान-सम्मान, मेरा अस्तित्व…

इसके सिवा मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था. यहां तक कि कोई रास्ता भी नहीं. लेकिन मैं अब उस जगह पर रुकना नहीं चाहती थी जो मेरे लिए दूसरों ने मेरी अस्मिता की कीमत पर चुनी थी. मैं चल देना चाहती थी उस ओर, जिधर कोई भी रास्ता दिख तो नहीं रहा था लेकिन ‘मैं बना ही लूंगी’, जाने कहां से ऐसी ज़िद, जुनून, ताक़त और हिम्मत पैदा हो गई थी मेरे अंदर.

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आज प्रतिमा को उनके काम की वजह से जाना जाता है. पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं छपती हैं. (तस्वीर: फेसबुक)

जानती हूं यह व्यक्तिगत आक्षेप होगा, फिर भी कह रही हूं. पिता भी नहीं थे मेरे साथ. उस मुद्दे पर कभी नहीं रहे. मैं उनकी आखिरी सांस तक उनकी अपराधिनी बनी रही. वह चाहते थे कि मैं उनका फ़ैसला सिरमाथे पर रखूं. उनके बनाए रिश्ते का मान बनाए रखूं. थप्पड़ सहकर भी ख़ानदान की इज़्ज़त बचाऊं. जो कुछ हो रहा है उसे अपना दुर्भाग्य मान कर स्वीकार कर लूं, क्योंकि एक मध्यमवर्गीय परिवार की ‘अच्छी बेटियां’ ऐसा ही करती हैं.

मैं ‘अच्छी बेटी’ नहीं बन पाई. मैंने उनकी बात नहीं मानी. मेरे लिए चुने गए उनके रिश्ते को मैंने न सिर्फ़ ख़ारिज किया बल्कि उनके ही शब्दों में ‘ख़ानदान में पहली तलाक़शुदा लड़की’ होने का कलंक भी लगा दिया.

एक मजबूर लेकिन अच्छे पिता की तरह उन्होंने तलाक़ के बाद मुझे ‘अपने घर’ में आश्रय दिया. वो जानते थे कि आश्रय नहीं देने की धमकी भी मुझे मेरे फ़ैसले से डिगा नहीं पाएगी. मगर मैं, जो बचपन में उनकी आंख का तारा हुआ करती थी, उसके बाद हमेशा उनकी आंख की किरकिरी बनी रही.

उनके शब्द आज भी मुझे याद हैं,

‘तुम बहुत ग़लत कर रही हो बेटा. इस समाज में औरत बिना आदमी के नहीं रह नहीं सकती. हर औरत के सिर पर सिंदूर की लाल रेखा और साथ में एक आदमी का होना ज़रूरी है, भले ही वह अपाहिज क्यों ना हो.’

मेरी एक बहुत पढ़ी-लिखी, नौकरीशुदा और आधुनिक विचारधारा की कही जाने वाली वाली एक रिश्तेदार ( वह चाची, मामी, बुआ, मौसी, भाभी, दीदी, कोई भी थी, इससे फ़र्क नहीं पड़ता) ने मुझे नसीहत देते हुए कहा था,

‘सुनो, शादी के बाद हर औरत को एडजस्ट करना पड़ता है. बहुत कुछ बर्दाश्त करना पड़ता है. शुरू में हमने भी बहुत कठिनाई झेली है लेकिन एक बार बर्दाश्त करना सीख जाओ तो बाद में सब ठीक हो जाता है.’

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प्रतिमा से भी कहा गया, एडजस्ट कर लो. बिना पति के क्या करोगी. क्या मुंह दिखाओगी .लेकिन प्रतिमा नहीं मानीं. (तस्वीर: फेसबुक)

वह मुझे आश्वस्त कर रही थीं और मैं डर गई. मैं समझ गई कि बाद में सब कुछ ठीक नहीं होता. बल्कि जो ठीक नहीं है हम उसे बर्दाश्त करना सीख जाते हैं. और मैंने ‘बर्दाश्त करना’ सीखने से इनकार कर दिया. अपने आत्मसम्मान को काट-छांट कर ‘एडजस्ट’ होने से इनकार कर दिया. मैंने अपने ख़ानदान में एक बुरा उदाहरण बनने की कीमत चुकाई.

जब कभी पन्द्रह बरस पीछे लौटकर वह सब याद करती हूं तो लगता है जैसे किसी दूसरे की कहानी है. जो एक फ़िल्म रील की तरह मेरी आंखों के सामने चल रही है. मुझे दिखने लगते हैं नीम अंधेरे में डूबे एक कमरे में (जिसमें शायद पूरी रोशनी थी लेकिन मुझे अंधेरा ही याद आता है) बैठे मेरे ढेर सारे सगे-संबंधी. जो मुझे सर्वसम्मति से पिता के घर से वापस ससुराल लौटा देने को कटिबद्ध थे.

उनकी तैयारी पूरी थी. उनके तरकश में अकाट्य तर्क थे. मेरे भयावह भविष्य का खाका था. सामाजिक और पारिवारिक प्रतिष्ठा का भारी गुम्बद था. जिसे वह मेरे सीने पर रख देना चाहते थे और उनके मुक़ाबले मेरे पास था सिर्फ़ एक विश्वास कि ‘मैं अपने आत्म सम्मान के साथ अकेले जी कर दिखा दूंगी.’

उस भीड़ में बैठी एक बुजुर्ग महिला ने मुझे चुनौती सी देते हुए कहा था,

‘अभी तुम्हारे सामने पूरी उम्र पड़ी है. सोच लो, क्या तुम्हें जीवन में कभी किसी आदमी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी ?’

ठण्डी आवाज़ में मेरा जवाब था,

‘जिसने मुझ पर हाथ उठाया, उस आदमी की नहीं पड़ेगी.’

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आज पन्द्रह साल बाद प्रतिमा अपनी ज़िन्दगी जी रही हैं. अपनी शर्तों पर. (तस्वीर: फेसबुक)

एक थप्पड़ के प्रतिरोध में मैं एक दिशाहीन भविष्य की ओर चल पड़ी. फिर पूरे स्वाभिमान और सम्मान के साथ अपने दिशा निर्धारित की. रास्ते बनाए. उन सारी आशंकाओं और डर को जीता, जो मेरे निर्णय के उपहार के रूप में मुझे दिए गए थे.

अपने साथ बीते सच को कहानी समझकर इसलिए भुलाती रही ताकि कोई सहानुभूति ना दिखाए. अपने संघर्षों को नितांत निजी और बेकाम का मानकर बहुत साझा नहीं किया कभी.

पन्द्रह साल बाद अनुभव सिन्हा जैसे कमाल के दिग्दर्शक ने मेरी या मेरे जैसी जाने ‘कितनों’ की कहानी को सेल्यूलाइड पर उतारने का इरादा किया है.

हैरान हूं कि पन्द्रह (हकीकत में शायद सैकड़ों) साल बाद भी हम वहीं खड़े हैं. बस एक थप्पड़…. बस इतनी सी बात पर…?

उम्मीद से भरी हुई हूं कि कम से कम समाज उस एक थप्पड़ को आईडेंटिफाई करने के लिए तैयार हो रहा है, जो सिर्फ़ एक थप्पड़ नहीं होता बल्कि औरत को उसकी ‘औकात’ याद दिलाने की क्रूर शुरुआत होता है. परिवार में उसकी ‘जगह और हद’ बताने का पितृसत्तात्मक तरीका होता है.

वह थप्पड़ सिर्फ एक थप्पड़ नहीं होता. वह ‘बस इतनी सी बात’ नहीं होता.

फ़िल्म में तापसी पुन्नू उस थप्पड़ के ख़िलाफ़ हर औरत की ओर से सही प्रतिरोध दर्ज करती है…

“उसने मुझे मारा. पहली बार. नहीं मार सकता.”


वीडियो: लता भगवान करे: जो पति के इलाज के लिए 62 की उम्र में मैराथन दौड़ गईं

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