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रिया चक्रवर्ती को कोसते हुए सुशांत के इस गुनहगार को तो आप भूल ही गए !

6 सितंबर को सुशांत सिंह राजपूत की बहन श्वेता सिंह कीर्ति ने एक ट्वीट किया. अपने भाई को याद करते हुए. इससे पहले हम आगे बढ़ें आप वो ट्वीट देखें. इसमें अंग्रेजी में लिखा है:

हमने एक-दूसरे से वादा किया था कि हमेशा एक-दूसरे की रक्षा करेंगे. लेकिन मैं इसमें फ़ेल हो गई, भाई. मैं फ़ेल हो गई! लेकिन एक वादा और है जो मैं और ये पूरा देश तुमसे कर रहे हैं. कि हम सच को खोज निकालेंगे. हम तुम्हें न्याय दिलाएंगे. मैं अपने भाई को जानती थी वो कैसा था. वो जीवन और ख़ुशी से भरा हुआ था. वो बच्चे जैसा था. उसे एक ही चीज़ चाहिए थी, प्यार. कोई एक बार, प्यार से हाथ फेर दे उसके सर पर, प्यार से बात कर ले. बस खुश रहने के लिए उसको इतना ही काफ़ी था. वो ऐसा इंसान था ही नहीं. जो खुद की जान ले ले. मेरा दिल ये मानने को तैयार नहीं है. हमें अपना लक्ष्य साफ़ रखना है. हमें उसकी मौत की वजह का पता लगाना है. इसके पहले नहीं रुकना है. ये सत्य का आग्रह है.

 

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(तस्वीर: ट्विटर)

 

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बेहद मार्मिक बात है ये. ये बात वो बहन ही महसूस कर सकती है जिसने अपना भाई खोया है. लेकिन जब बात न्याय की हो. तब केवल इमोशन से काम नहीं लिया जा सकता है. तब ज़रूरी होता है लॉजिक को देखना. और साइंटिफिक टेम्परामेंट मेंटेन रखना. साइंटिफिक टेम्परामेंट का अर्थ क्या है? ये कि सुनी-सुनाई चीजों पर भरोसा करने के बजाय मेडिकल साइंस पर भरोसा रखना. और दिमाग की बीमारियां और उनका इलाज भी मेडिकल साइंस का एक बड़ा हिस्सा है. लेकिन हम कभी इसपर ध्यान ही नहीं देते.

कुछ समय पहले सुशांत की पूर्व प्रेमिका अंकिता लोखंडे ने भी मीडिया से कहा था. ‘सुशांत वो व्यक्ति नहीं था जो डिप्रेस हो जाए.’ मेडिकल साइंस की नज़र से यहां एक सवाल है. जो इन सबके बीच हमें पूछना है. वो कौन व्यक्ति होता है जो डिप्रेस होता है, अपनी जान लेता है. क्या वो किसी फिक्स टाइप का व्यक्ति होता है जो अपनी जान लेता है?

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ये सवाल किसी से पूछिए तो तपाक से जवाब मिलता है- कमज़ोर लोग. कमज़ोरी हमारे समाज में एक गाली है. हमारे आस-पास कोई सुसाइड करे तो हम उदास तो होते ही हैं. शर्मसार भी होने लगते हैं. कि दुनिया हमारे मृत बेटे, बेटी, भाई, बहन को कमज़ोर समझेगी. इसे ठीक से समझने के लिए मैंने बात की डॉक्टर कौशल जैन से. जो साइकेट्रिस्ट हैं और दिल्ली में बेस्ड संस्था सेंटर फॉर बिहेवियरल साइंसेज के डायरेक्टर हैं. डॉक्टर जैन बताते हैं:

ऐसे केस में हम अक्सर देखते हैं कि डिप्रेशन का प्रश्न ही पूरी तरह से अवॉइड करने की कोशिश की जाती है. एक समाज के तौर पर हम ये मानते ही नहीं कि ये एक बीमारी है जिसका इलाज होना चाहिए. लोगों के लिए डिप्रेशन को अपनाना बहुत मुश्किल है. ये बार-बार देखने को मिलता है की लोग डिप्रेशन शब्द का इस्तेमाल अपना उल्लू सीधा करने के लिए करते हैं. असल में किसी को पड़ी नहीं होती कि डिप्रेशन को पहचानने और उसका इलाज करवाने की ओर हमें काम करने की ज़रुरत है.

डिस्कशन फोरम ‘कोरा’ पर एक अनाम यूजर अपना अनुभव साझा करते हुए लिखते हैं:

मेरी क्लास में एक लड़की थी जिसने सुसाइड किया था. उसके साह कभी कोई पारिवारिक मसले नहीं रहे. वो स्कूल की सबसे खूबसूरत लड़की थी. वो कम लोगों से बात करती थी मगर ये सबको दिखताथा कि वो जितन खूबसूरत है, उतनी ही टैलेंटेड भी. लड़के उसके क़दमों में बिछे रहते. सीनियर उसकी इज़्ज़त करते. उसे देख कभी नहीं लगता वो डिप्रेस है. वो हमेशा खुश रहती. उसका जीवन परफेक्ट था. तो क्या वो अपनी ख़ुशी को लेकर झूठ बोलती थी? नहीं. वो खुश भी थी और सच्ची भी. उसकी मौत ने सबको चौंका दिया. हम सोचते रहे कि उसे ऐसा क्या हुआ. फिर हमें काफ़ी वक़्त के बाद महसूस हुआ कि हम उसे जानते हुए भी नहीं जानते थे. वो सबको समझती थी. मगर अपने बारे में बेहद कम बात करती. हम हमेशा उससे एकतरफ़ा संवाद करते रहे. कभी उसे समझ ही नहीं पाए.

अक्सर हमें लगता है कि डिप्रेशन से जूझ रहा व्यक्ति देवदास बना घूम रहा होगा. जबकि ये सच नहीं है. डिप्रेशन से लड़ रहे या उसका इलाज करा रहे कई लोग हर दूसरे व्यक्ति की तरह ऑफिस और घर पर उपलब्ध होते हैं. अपने सारे काम करते हैं. लोगों से मिलकर नॉर्मल भी दिखते हैं. डिप्रेशन का मरीज़ होने के लिए ज़रूरी नहीं कि इंसान आपके सामने अपना दुखड़ा रोए, खुद को कमरे में बंद कर ले या कोई ऐसे लक्षण दिखाए कि वो एब्नॉर्मल है. डॉक्टर जैन कहते हैं:

डिप्रेशन कोई ऐसी चीज़ नहीं है कि आप प्रेडिक्ट कर सकें. कि इसे होगा और उसे नहीं होगा. ये कहना हास्यास्पद है कि किसी को डिप्रेशन नहीं हो सकता. क्या आप ये कहना चाहते हैं कि बॉडी बिल्डर को फ्रैक्चर नहीं हो सकता? या स्किन के डॉक्टर को खुद स्किन की बीमारी नहीं हो सकती? लोग कहते हैं एक्सरसाइज कर लो, हेल्दी खाना खाओ, स्ट्रेस कम रहेगा. या फिर ये कि जिनको पैसों की दिक्कत है वो सुसाइड करते हैं. या फिर दोस्त-यार नहीं होते तो. सुशांत फिजिकली फिट थे, वर्कआउट करते थे. हेल्दी खाते थे. न ही किसी मायने में गरीब थे. लेकिन उन्होंने उठाया ये कदम. क्योंकि सब ठीक होते हुए भी दिमाग परेशान हो सकता है.

हम जितनी बार रिया चक्रवर्ती को हत्यारन, विषकन्या, टोटके वाली कहते हैं. उतनी बार ये तो दिखाते ही हैं कि हमारे अंदर कितना स्त्रीद्वेष, कितनी मिसोजिनी भरी हुई है. साथ ही ये भी दिखाते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य हमारे लिए सबसे गैरज़रूरी चीज़ है. डॉक्टर जैन कहते हैं:

ये दुखद है कि इस केस में सीरियस लेवल पर कभी मेंटल हेल्थ डिस्कशन हुआ ही नहीं. सतही तौर पर हुआ. जिसके कोई मायने नहीं हैं. कोई नहीं जानता कि सुशांत डिप्रेशन से जूझ रहे थे या बाइपोलर से. सब्सटेन्स अब्यूज के नुकसान क्या होते हैं. इन सब मसलों पर चुप्पी है. इसके अलावा रिया के मानसिक स्वास्थ्य पर भी कोई बात नहीं होती. जबकि वो एक्सट्रीम प्रेशर सिचुएशन के बीच है.

डिप्रेशन का शिकार कोई भी हो सकता है. आपके कॉलेज के दोस्त, जिनसे कई दिन से बात नहीं हुई. आपके पड़ोसी. आपके घर पिज़्ज़ा डिलीवर करने आया डिलीवरी बॉय. आपकी अपनी बहू. आपसे दूर रह रही बेटी. इस वीडियो को देख रहे लोगों में से कोई भी. इस वीडियो में आपके सामने बैठी मैं खुद. आपके फेवरेट स्टार या खुद आपके पिता. डिप्रेस होने वालों का टाइप नहीं होता. इसलिए उन्हें मज़बूत और कमज़ोर के टैग्स में मत बांटिये. जिस दिन हम असल मसलों पर बात करने लगेंगे, उस दिन सुशांत सिंह राजपूत को न्याय मिलेगा.


वीडियो: सोशल लिस्ट: रिया की टी-शर्ट पर ऐसा क्या लिखा कि लोग उसकी ही चर्चा कर रहे हैं?

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