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क्या PM मोदी का ये फैसला गांव की करोड़ों लड़कियों का नसीब बदल देगा?

इस 15 अगस्त मोदी ने लड़कियों के लिए एक बहुत बड़ी बात कही. उन्होंने कहा-

“हमने लड़कियों की शादी की उम्र पर विचार करने के लिए एक कमिटी बनाई है. उसपर रिपोर्ट आने के बाद केंद्र इसपर फैसला लेगा.”

अभी लड़कियों की शादी की मिनिमम उम्र 18 है. और लड़कों की 21. 18 ही वयस्क यानी एडल्ट कहलाने और लोकतंत्र में अपना नेता चुनने के लिए वोट करने की भी मिनिमम उम्र है.

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ये कमिटी सरकार की तरफ से क्यों बन रही है? मैटरनल मॉर्टेलिटी यानी मातृ मृत्युदर कम करने के लिए. यानी बच्चे को जन्म देते वक़्त, उसके पहले या उसके बाद, अपनी जान गंवाने वाली मांओं को बचाने के लिए. और अनुमान लगाने वाले ये भी अनुमान लगा रहे हैं कि इसकी एक वजह मैरिटल रेप यानी वैवाहिक बलात्कार को कम करना भी हो सकता है. क्योंकि बाल विवाह की सूरत में लड़की दिमागी रूप से शारीरिक संबंधों के लिए तैयार नहीं होती. आज के इस ब्लॉग में मैं ये समझने की कोशिश कर रही हूं इस तरह का फैसले लेने की ज़रूरत हमें क्यों पड़ रही है.

प्रतीकात्मक तस्वीर.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

नवभारत टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़:

बीते 5 साल में 3 करोड़ 76 लाख लड़कियों की शादी हुई. इनमें से 1 करोड़ 37 लाख लड़कियां 18-19 साल की थीं. वहीं 75 लाख लड़कियों की शादी 20-21 की उम्र में हुई. यानी शादी करने वाली लड़कियों में आधे से भी कहीं ज़्यादा 21 की उम्र के नीचे थीं. ये भी बता दें कि 21 साल लड़कों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र है. करोड़ों में 21 की उम्र से पहले शादी करती इन लड़कियों के बारे में एक बात और बता दूं. आपको शायद लग रहा हो कि ये गांव की औरतें होंगी. मगर इस पूरे आंकड़े में लगभग 50 लाख लड़कियां शहरी हैं. गांवों की सच्चाई और भी डराने वाली है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ कुल ग्रामीण महिलाओं में से 60 फीसद 21 की उम्र के पहले ही ब्याह दी जाती हैं.

जल्दी शादी का अर्थ होता है जल्दी बच्चा. और जल्दी बच्चा करना कई बार लड़कियों को नुकसान पहुंचा सकता है. किस तरह से नुकसान पहुंचा सकता है, ये जानने के लिए लल्लनटॉप ने बात की डॉक्टर शिवानी चतुर्वेदी से. जो गाइनकॉलजिस्ट हैं. पिछले 20 सालों से भी ज्यादा समय से प्रैक्टिस कर रही हैं. उन्होंने बताया:

18 साल की उम्र में लड़की भले ही शारीरिक रूप से तैयार हो मां बनने के लिए, लेकिन मानसिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक तरीके से बिलकुल तैयार नहीं होती है. उन्होंने बताया कि उन्होंने ऐसी पेशेंट्स भी देखी हैं जो बमुश्किल अठारह साल की हैं, और उनके क्लिनिक में आई हैं. एक ने कहा कि शादी के तीन महीने हो गए लेकिन प्रेग्नेंसी नहीं हुई. शादी के चक्कर में बोर्ड एग्जाम से पहले ही पढ़ाई छूट गई. वो लड़की बारहवीं तक की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाई. डॉक्टर शिवानी का कहना है कि ये एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था है. इसमें महिला को दबाए रखने, और उसे आगे बढ़ने का कोई भी मौका न देने की प्रवृत्ति शामिल है. डॉक्टर शिवानी के मुताबिक़, अगर लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष से 21 वर्ष की जाती है, तो पॉपुलेशन पर भी कंट्रोल बढ़ेगा. क्योंकि 18 से 21 के बीच में आमतौर पर एक से दो बच्चे हो जाते हैं.

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डॉक्टर शिवानी चतुर्वेदी(तस्वीर: स्पेशल अरेंजमेंट)

हमने कुछ महिलाओं से भी बात की, जो 21 की उम्र के पहले मां बन गई थीं.

21-22 की उम्र में मां बनीं रंजना बताती हैं:

मेरे लिए ये सुखद था. सही समय पर पहला बच्चा हो जाने से मुझे बाद के सालों में अपने लिए वक़्त मिलता है. अब मैं करियर पर फोकस कर सकती हूं. जबकि जो लड़कियां बच्चा करने में डिले करती हैं उनको दिक्कतें आने की आशंका रहती है. फ़िलहाल मैं पति से सेपरेटेड हूं. ऐसे में इस बात का सुकून रहता है कि बच्चे आसानी से पिता के पास रह पाते हैं. मैं देरी से बच्चा करती तो मेरे लिए मुश्किल हो जाता. रंजना ‘योरस्टोरी हिंदी’ की एडिटर हैं. एक सफल महिला हैं.

ऐसी ही एक सफल महिला हैं पूजा. जो मुंबई में डेंटिस्ट हैं. वो बताती हैं:

20 की उम्र में मैंने बेबी किया. तब मैं डेंटिस्ट्री की पढ़ाई कर रही थी. वो काफ़ी अच्छा फैसला था. मेरे पास पूरा टाइम था बच्चे पर ध्यान देने का. उसके बाद करियर पर फोकस करने के लिए मुझे पूरा वक़्त मिला. पढ़ाई ख़त्म करने के बाद मुश्किल हो जाता. ये मेरे लिए हेल्दी भी था. क्योंकि मैं यंग थी और ऊर्जा से भरी हुई थी. खूब मूवमेंट करती रहती. तो चीज़ें आसान थीं. जबकि दूसरा बेबी मैंने 30 की उम्र के बाद किया. जिसमें पहले के मुकाबले काफ़ी दिक्कतें आईं.

दुर्भाग्यवश हर औरत की कहानी रंजना या पूजा जैसी नहीं होती. वजह है शहरी और ग्रामीण महिलाओं के बीच फर्क. कई पढ़ी-लिखी महिलाओं के लिए जल्दी बेबी करना चॉइस का मसला हो सकता है. मगर कई आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं के लिए ये एक ऐसी चीज़ है जिसमें न उनकी ओपिनियन कोई लेता है. न ये सोचता है कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए उनके पास पैसे हैं या नहीं.

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(सांकेतिक तस्वीर: ट्विटर)

महाराष्ट्र के सतारा जिले के पास आशा वर्कर के तौर पर काम करने वाली शबाना बताती हैं:

कुछ साल पहले एक 18 साल की लड़की डिलीवरी के लिए आई थी. डिलीवरी किसी तरह हुई मगर उसके बाद खून आना बंद ही नहीं हुआ. लगातार बहे जा रहा था और लड़की की हालत बिगड़ने लगी. फिर उसे ज़िला अस्पताल लेकर गए. 15 से 20 दिन उसे वहां भर्ती रखना पड़ा.

पेशे से टीचर रहीं शिखा बताती हैं:

मेरी देवरानी को 17वें साल में बेटी हुई, सीज़ेरियन, क्योंकि डॉक्टर रिस्क लेना नहीं चाह रही थीं. तबसे उसे कमर में हमेशा तेज दर्द रहता है. अभी 8 महीने हुए, फिर भी ब्लीडिंग हो ही रही है. सिरदर्द और छोटी समस्याओं पर तो ध्यान नहीं दे रही वो. गांव में ऐसे बहुत से केस हैं. लड़की इसपर कोई राय रखे, ये भी मुमकिन नहीं है. वो तो खुद बच्ची है. उसके ऊपर बोझ इतना है- बच्चे को देखना, पति, सास के काम. कि हर वक़्त पिता को कोसती है. गांव में जो भी लड़कियां कम उम्र में मां बनीं, सभी अधूरे सपने और अधूरी पढ़ाई से दुखी तो हैं. पर समय के साथ खुद भी वैसी ही मां हो जाती हैं. कि जल्दी शादी हो, बच्चे हों, ऐसा सोचने वाली.

लड़कियों की शादी की उम्र जब 18 साल निर्धारित की गई थी, तब  शायद कोई सोच भी नहीं सकता था कि लड़कियां गर्भ धारण करने के अलावा कोई और काम भी कर सकती हैं. या फिर लड़की कब प्रेगनेंट होना चाहती है, होना चाहती भी है या नहीं, इन बातों का महत्व नहीं था. लड़कियों की इच्छा और राय जानना ज़रूरी नहीं समझा जाता था. लेकिन आज सिर्फ बच्चे पैदा करना ही महिलाओं का काम नहीं है. उनकी पढ़ाई पूरी होना, उन्हें दुनिया की समझ आना, अपने अधिकारों के बारे में पता होना- ये सब ज़रूरी है, इससे पहले कि वो शादी और मातृत्व की ओर बढ़ें. क्योंकि मां बनना एक औरत के जीवन का हिस्सा हो सकता है, पूरा जीवन नहीं.


वीडियो: म्याऊं: लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 क्यों करना चाहती है सरकार? 

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