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महाराष्ट्र: नाबालिग को फोन के बहाने 'बुलाया', शर्ट उतारी, हॉस्टल सुप्रिटेंडेट को पांच साल की जेल

आरोपी ने खुद को फंसाए जाने की बात कही.

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22 मई 2022 (अपडेटेड: 23 मई 2022, 04:56 PM IST)
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सुनवाई के दौरान सुप्रिटेंडेंट ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि स्थानीय लोग उसे फंसा रहे हैं. (फोटो - सांकेतिक)
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महाराष्ट्र के पालघर जिले की एक विशेष अदालत ने एक नाबालिग आदिवासी लड़की के मोलेस्टेशन के आरोप में एक हॉस्टल सुप्रिटेंडेंट को पांच साल की जेल की सज़ा सुनाई है. मामला तलासरी का है.

इंडिया टुडे से जुड़ी विद्या की रिपोर्ट के मुताबिक़, केस 2017-18 का है. विक्टिम धामनगांव के एक सरकारी स्कूल में दसवीं में पढ़ती थी. स्कूल के ही हॉस्टल में रहती थी. आरोपी 2007 से उसे विद्यालय में अधीक्षक के पद पर काम कर रहा था.

क्या है मामला?

तलासरी पुलिस के पास दर्ज शिकायत के मुताबिक़, 31 दिसंबर 2017 की शाम करीब छह बजे, जब पीड़िता अपने हॉस्टल के कमरे में थी, तो सुप्रिटेंडेंट ने उसे फोन करके बताया कि उसके घर से फोन आया है. जब वो ऑफिस गई तो कहा कि फोन कट गया और 9 से 9.30 बजे के बीच दोबारा फोन आएगा. इसके आगे सुप्रिटेंडेंट ने पीड़िता से कहा कि उस समय आना और किसी को न बताना. करीब 9:30 बजे सुप्रिटेंडेंट ने फिर फोन किया और कहा कि उसके घर से फोन आया है. इसलिए, वो वापस ऑफिस गई.

आरोप है कि सुप्रिटेंडेंट वहां अकेला था और उसने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया. दोषी सुप्रिटेंडेंट ने पीड़िता को शर्ट उतारने के लिए कहा. पीड़िता ने मना किया, तो उसने खुद ही उसकी शर्ट उतार दी. इसके बाद पीड़िता को मोलेस्ट किया. घटना के बारे में किसी को न बताने के लिए धमकाया.

पुलिस के पास दर्ज शिकायत में कहा गया है कि डरी हुई लड़की ने ये बात किसी को नहीं बताई. फिर 24 फरवरी, 2018 को पीड़िता ने अपनी एक क्लासमेट को इस घटना के बारे में बताया. तब ये पता चला कि उसकी क्लासमेट के साथ भी ऐसा हुआ है. फिर दोनों ने अपने और क्लासमेट्स से बात की और बात ग्रामीणों को पता चली, जो आरोपी को पुलिस के पास ले गए.

POCSO और SC/ST ऐक्ट के तहत मामला दर्ज करने के बाद ACP रैंक के एक अधिकारी को जांच का जिम्मा सौंपा गया.

कोर्ट में क्या बहस हुई?

जांच हुई. मामला अदालत में गया. सुनवाई के दौरान सुप्रिटेंडेंट ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि स्थानीय लोग उसे फंसा रहे हैं. अपना केस डिफेंड करने के लिए केस दर्ज करने में देरी का मुद्दा उठाया.

वहीं केस दर्ज होने में देरी के बारे में बात करते हुए जज ने कहा,

”पीड़िता 10वीं की छात्रा थी. हॉस्टल में रहती थी. आरोपी हॉस्टल का सुप्रिटेंडेट था. साथ में PT भी पढ़ाता था. पीड़िता उसके कन्ट्रोल में थी. इसीलिए उसने इस घटना का खुलासा नहीं किया होगा और जब उसने क्लासमेट के साथ चर्चा की, तो उसे हिम्मत मिली होगी. इसलिए शिकायत दर्ज करने में देरी, केस में कोई ख़ास मतलब नहीं रखता.”

सुप्रिटेंडेंट ने ये भी बताया कि पीड़िता ने कहा था कि घटना हॉस्टल की दूसरी मंजिल पर हुई थी, जबकि मौक़े पर पंचनामा तीसरी मंजिल का था. इसपर कोर्ट ने तर्क दिया कि घटना रात के समय हुई थी, इसलिए ठीक-ठीक बता पाना संभव नहीं भी हो सकता.

“रिकॉर्ड में ये आया है कि दूसरी मंजिल और तीसरी मंजिल, दोनों पर ही कमरा खाली था. इसलिए इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि रात की वजह से पीड़िता सही फ्लोर नहीं बता पा रही हो.”

जस्टिस केलुस्कर ने फैसले में कहा कि आरोपी सुप्रिटेंडेंट ने ऐसा कोई ठोस तर्क या सबूत नहीं दिया है, जिससे पता चलता हो कि उसे फंसाने की कोशिश की जा रही हो. दूसरी तरफ़ पीड़िता आरोपी की स्टूडेंट है, इसलिए उसके ऐसा करने की संभावना बहुत कम थी.

इसके साथ ही हेडमास्टर ने कोर्ट को बताया कि दो लड़कियों के अलावा किसी और लड़की ने आरोपी के ख़िलाफ़ शिकायत नहीं की. स्पेशल जज डीएच केलुस्कर ने ऑब्ज़र्व किया कि पूरा मामला एक गवाह की गवाही पर टिका हुआ है. साथ ही जस्टिस केलुस्कर ने तर्क दिया कि इस तरह की घटनाएं हमेशा सुनसान जगह पर होती हैं और इस मामले की तरह ही आरोपी हमेशा इस बात का ख्याल रखता है कि कोई उसे और पीड़िता को साथ न देखे. इसलिए घटना की पुष्टि करने वाला कोई गवाह नहीं है, पीड़िता की गवाही को झुठलाने का कोई आधार नहीं है.

“पीड़िता की उम्र को और वो आरोपी की छात्रा थी, इन दोनों फैक्टर्स को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि वो आरोपी के ख़िलाफ़ झूठा बयान दे रही है. इसलिए पीड़िता की एकमात्र गवाही आरोपी के ख़िलाफ़ आरोप साबित करने के लिए काफ़ी है.”

हालांकि कोर्ट ने दोषी को सात साल की जेल की सज़ा नहीं सुनाई, जो इस मामले में अधिकतम सज़ा है. ये आरोपी का पहला अपराध है, इसका हवाला देते हुए आरोपी को केवल पांच साल की कैद की सज़ा हुई.

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