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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- महिला को अपनी शर्तों पर जीने का अधिकार है

इलाहाबाद कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान टिप्पणी की.

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27 दिसंबर 2020 (अपडेटेड: 27 दिसंबर 2020, 09:09 AM IST)
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा महिला को खुद की शर्तों पर जीवन जीने का अधिकार है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा महिला को खुद की शर्तों पर जीवन जीने का अधिकार है.
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान कहा- महिला को अपनी शर्तों पर जीवन जीने का अधिकार है. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस पंकज नकवी और विवेक अग्रवाल की बेंच ने ये फैसला सुनाया. दरअसल, याचिका में पति द्वारा शिकायत की गई थी कि उसकी पत्नी को नारी निकेतन ने जबरन परिवारवालों के पास भेज दिया है, जबकि उसकी पत्नी जाना नहीं चाहती थी.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने इसी मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि "बिना किसी तीसरी पार्टी के दखल अंदाजी और रोक-टोक के महिला अपनी मर्जी से कहीं भी आने जाने के लिए स्वतंत्र है". इसके अलावा, कोर्ट ने चीफ ज्यूडिशल मजिस्ट्रेट (CJM) के आदेश को भी गलत ठहराया, जिसमें महिला को नारी निकेतन भेजने का आदेश दिया गया था. कहा कि ट्रायल कोर्ट और CWC, एटा ने इस केस में कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया.

कोर्ट ने आगे कहा कि महिला बालिग थी, उसकी डेट ऑफ बर्थ 4 अक्टूबर, 1999 थी. और ये बात ट्रायल कोर्ट ने नज़रअंदाज कर दी, वो भी तब, जब स्कूल का सर्टिफिकेट दिखाया गया था. क्योंकि बाकी कोई सबूत इसके आगे मायने नहीं रखते. स्कूल सर्टिफिकेट काफी होता है. बेंच ने महिला के पति के खिलाफ दायर उस FIR को भी खारिज कर दिया, जिसमें उस पर पत्नी के अपहरण का आरोप लगाया गया था.

बता दें कि बेंच महिला के पति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वकील के माध्यम से दलील दी गई कि पत्नी को उसकी मर्जी के बगैर CWC भेजा गया और फिर वहां से एक दिन रखने के बाद माता-पिता को सौंप दिया गया. फिर जब मामला कोर्ट पहुंचा, तो 16 दिसंबर को कोर्ट ने पुलिस से कहा कि वह 18 दिसंबर के दिन महिला को कोर्ट में पेश करें.

उस दिन महिला कोर्ट में आई. उससे बेंच ने बात की. बताया कि वो बालिग थी, इसलिए उसने शादी की और अब वो अपने पति के साथ ही रहना चाहती है. वह हिंदू है और पति मुस्लिम, इसलिए बात इतनी बढ़ गई. कोर्ट ने हिंदू महिला को उसके मुस्लिम पति से मिलवाया और किसी भी महिला को खुद की शर्तों पर जीवन जीने का अधिकार बताते हुए फैसला सुनाया.

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