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डिप्रेशन से जूझ रहे शख्स ये चार बातें हरगिज़ हरगिज़ न कहिए

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद सोशल मीडिया पर डिप्रेशन पर बात की जा रही है. सुशांत की मौत के पीछे पुलिस ने वजह डिप्रेशन बताई है. तब से कई लोग इस बात पर लिख चुके हैं कि इसे इग्नोर करना या हल्के में लेना ठीक नहीं है.

कई सवाल हैं, जो अक्सर लोगों के मन में उठते हैं. डिप्रेशन या उदासी को लेकर. कुछ चिंताएं हैं. लोग क्या कहेंगे. हम कैसे खुलकर बताएं किसी को. इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए ऑडनारी ने बात की डॉक्टर एकता पुरी से. डॉक्टर पुरी अपोलो हॉस्पिटल में चीफ क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट हैं. 21 साल से प्रैक्टिस कर रही हैं.  ये रहे डिप्रेशन से जुड़े कुछ जरूरी सवाल, और डॉक्टर पुरी के जवाब.

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डॉक्टर पुरी (तस्वीर: स्पेशल अरेंजमेंट)

1. अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जो डिप्रेशन से जूझ रहा है, तो उनको खुलकर बात करने के लिए कैसे तैयार किया जाए? क्योंकि कई बार वो लोग खुद अपने आप को किनारे कर लेते हैं लोगों से. ऐसे में क्या करें?

अगर आपको कोई अप्रोच कर रहा है, बता रहा है कि उसे ये तकलीफ है, तो सबसे पहले तो आप उसकी बात सुनिए. जजमेंटल मत होइए. उसकी क्या तकलीफ है, क्यों है, ये सब कुछ सोच-समझकर ही उससे बात करिए. उसको बोलने का मौका दीजिए. उनको ऐसी सलाहें मत दीजिए जो उन्हें पहले से पता हैं- जैसे एक्सरसाइज कर लो, टाइम पे सो लो वगैरह.

वो डिप्रेशन या उदासी में इसीलिए हैं क्योंकि वो ये सब नहीं कर पा रहे हैं. आपको उनके साथ कनेक्ट होना है. गलत और सही बाद की बात है, लेकिन जो उनकी मानसिक स्थिति है, पहले वो समझिए. सबसे पहले इस बात को स्वीकार करिए कि वो परेशान हैं, और उन्हें मदद की ज़रूरत है.

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सबसे पहले इससे जुड़ा स्टिग्मा हटाना ज़रूरी है. (सांकेतिक तस्वीर: Pexels)

2. लोगों को लगता है थेरेपी महंगी होती है. और उससे काफी स्टिग्मा भी जुड़ा हुआ है. इस बात से कैसे डील किया जाए?

सबसे पहली बात तो ये कि कई थेरेपी हेल्पलाइंस ऐसी हैं जो फ्री हैं. कई NGO भी हैं जो सुसाइड रोकने के लिए हेल्पलाइन चलाते हैं. हमें इससे जुड़ा स्टिग्मा हटाने की भी ज़रूरत है. जो हमसे बात कर रहा है अगर उसे लगता है कि थेरेपी उसके बस की नहीं है, तो हमें ये कोशिश करनी है कि वो कन्विंस हो जाए थेरेपी लेने के लिए.

एक सपोर्ट सिस्टम भी होना ज़रूरी है, जैसे उनकी फैमिली को आप आगाह करा सकते हैं कि वो व्यक्ति इस तरह की बातें सोच रहा है. ताकि हर समय उस व्यक्ति के साथ कोई रहे. अगर वो सारा दिन कमरे में बंद रह रहा है, तो उससे बातचीत करने की पूरी कोशिश की जाए. अगर उन्हें ऐसा लगे कि कोई है जो उनको सुन रहा है. किसी को उनकी परवाह है, तो वो कोई बड़ा कदम नहीं उठाएंगे.

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अपने-आप को अलग-थलग कर लेने वाले लोगों के लिए एक सपोर्ट सिस्टम होना बेहद ज़रूरी है. (सांकेतिक तस्वीर: Pexels)

3. कई लोग दवाइयां भी लेते हैं डिप्रेशन के लिए. इसके लिए कई बार लोग कह देते हैं कि ये तो ‘पागलपन की दवाई’ ले रहे हैं. या थेरेपिस्ट के पास जाने पर लोग कहते हैं कि ये तो ‘पागलों के डॉक्टर’ के पास जा रहा है. ये जो टैबू है इससे कैसे निपटा जाए?

सबसे पहले तो आप इस बात को खुद समझेंगे कि ये टैबू नहीं है. दिमाग में एक न्यूरोट्रांसमीटर होता है जिसको सेरोटोनिन कहते हैं. उसकी मात्र कम होने की वजह से डिप्रेशन होता है. ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे इन्सुलिन का कम होना और डायबिटीज होना. उसे ठीक करने के लिए आप इन्सुलिन लेते हैं. ये एक केमिकल इम्बैलेंस है. इसके लिए तो लोग कुछ नहीं कहते. इसपर स्टिग्मा नहीं लगता.

और ये स्टिग्मा बनाता कौन है? हम, क्योंकि हम ही सोसाइटी हैं. तो हटाना भी हमें ही होगा. इतने सारे सेलेब्रिटी हैं, जैसे दीपिका पादुकोण वगैरह, इन्होंने भी मेंटल हेल्थ के लिए मदद ली. अब वो इसके बारे में खुलकर बात करते हैं. ये भी एक तरीका है. डिप्रेशन के जितने भी मरीज ठीक हो गए हैं, ये उनका कर्त्तव्य बनता है कि इसमें मदद करें. अगर छुपायेंगे इसे तो डिप्रेशन को लेकर स्टिग्मा बढ़ेगा ही.

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डिप्रेशन की दवाइयों को भी उसी तरह देखा जाना चाहिए जैसी दूसरी बीमारियों की दवाई को. (सांकेतिक तस्वीर: Pixabay)

4. कई बार ऐसा होता है कि सब कुछ जानते-समझते हुए भी एक ऐसा पॉइंट आता है व्यक्ति के जीवन में,जब वो हार मानने के बेहद करीब होता है. वो इतना बेचैन हो जाता है, कि उसे और कोई रास्ता समझ नहीं आता. उस मोमेंट में क्या करें?

उस मोमेंट में आप किसी भी एक व्यक्ति से बात कर लें. वो कोई भी हो सकता है. उसे बताएं कि आपको ऐसा फील हो रहा है. भले ही वो आपका बच्चा हो, डोमेस्टिक हेल्प हो, मेट्रो में मिलने वाला कोई अजनबी हो, फेसबुक का कोई फ्रेंड हो. कोई भी, और हर कोई हो सकता है. कई बार हम अपने ही अंदर इन चीज़ों को दबा कर रखते हैं, अपने पूर्वाग्रह बना लेते हैं. लेकिन जैसे ही हम उन्हें किसी के साथ शेयर करते हैं, हमें लगता है कि ये इतनी बड़ी बात तो नहीं थी.

दूसरा एक उपाय है. अगर आपको कोई भी नहीं मिलता अपनी बात कहने के लिए, तो एक डायरी लिखना शुरू कर दीजिए. जो भी आपके अंदर है, एक बार उसे लिखिए. उसमें अपनी बुरी से बुरी और अच्छी से अच्छी बातें लिख डालिए. लिखते-लिखते ही हमें कई बार समझ आ जाता है. कि शायद इस बात का कुछ न कुछ हल मेरे पास ज़रूर होगा.

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अपनी बातें शेयर करना बेहद ज़रूरी है. इससे मन हल्का होता है. भले ही वो आप किसी से भी करें. अगर कोई आपसे बांटना चाहता है अपने मन की बात, तो सुन लें. (सांकेतिक तस्वीर: Pexels)

5.जो लोग मेंटल हेल्थ की परेशानियों से जूझ रहे हैं. उनसे बात करते हुए कौन-सी चीज़ें कहने से बचना चाहिए?

#पहली बात. कभी भी उनको ये न कहिए कि ‘तुम तो पागल हो, तुमसे पूछने का क्या फायदा’. उनके ओपिनियन को कम करके मत आंकिए. अगर वो इसके लिए मदद ले रहे हैं, तो उन्हें इस बात के लिए नीचा मत दिखाइये. एक व्यक्ति के तौर पर उनकी वैल्यू इस बात से कम नहीं हो जाती. वरना उन्हें लगता है कि अब वो किसी भी चीज़ में कुछ बोल नहीं पाएंगे. फैमिली में अक्सर लोग इस तरह की बातें कह देते हैं. लेकिन आपको एक व्यक्ति को उसकी बीमारी से अलग रखकर देखना चाहिए. ये बीमारी टेम्पररी है, ठीक हो जाएगी. लेकिन उस आदमी का महत्त्व घट नहीं जाता.

#दूसरी बात. उनसे ऐसी बात न कहें कि ‘ये तो सब तुम्हारे भीतर है. तुम्हें स्ट्रांग ही तो बनना है. स्ट्रांग बनो’. ये गलत बात है, नहीं कहना चाहिए. अगर वो बन सकता तो बन ही जाता. लोग जूझ रहे व्यक्ति के ऊपर ही ज़िम्मेदारी डाल देते हैं. कहते हैं, फाईट करो, फेस करो. ऐसा नहीं करना चाहिए.

#तीसरी बात. लोगों ने एक चीज़ आजकल पकड़ रखी है. बोल देते हैं रूटीन बनाओ.  डिप्रेशन से बाहर निकलना है तो एक्सरसाइज करो, पॉजिटिव सोचो, मेडिटेशन करो, टाइम से सोओ, शेड्यूल बनाओ. जिंदगी का मकसद ढूंढो, तो डिप्रेशन ख़त्म हो जाएगा. ये बहुत ही टिपिकल चीज़ें हैं. मेरे कई क्लाइंट्स हैं, बच्चे हैं, उनके मम्मी-पापा यही कहते हैं कि एक्सरसाइज करो ठीक हो जाओगे. ये सच नहीं है. क्योंकि दिक्कत के भावनात्मक पक्ष पर फोकस ही नहीं है. हां, समय पर सोना, एक्सरसाइज करना, शेड्यूल होना, ये सब मददगार साबित होते हैं, लेकिन वो डिप्रेशन का जवाब नहीं हैं. उसका इलाज नहीं हैं.

#चौथी बात. लोगों पर उनके डिप्रेशन का दोष मढ़ना बंद करिए. अगर किसी को ये महसूस कराया जाएगा कि उसका डिप्रेशन उसकी अपनी वजह से है, तो उसका गिल्ट और खुद को लेकर असंतुष्टि और बढ़ जाती है. चाहे वो किसी भी वजह से हो, आज तो सबसे महत्वपूर्ण काम उस व्यक्ति को ऐसी परिस्थिति से बाहर निकालना है. उसकी गलतियां दिखाना किसी भी तरह से मदद नहीं करेगा.

अगली बार आप या आपका कोई करीबी व्यक्ति डिप्रेशन में जाने लगे, या ऐसा लगे कि उसे काउंसिलिंग की ज़रूरत है, तो ये टिप्स आपके लिए मददगार साबित होंगी. याद रखिए, WHO के मुताबिक़ हर 40 सेकंड में दुनिया में कहीं न कहीं किसी व्यक्ति की मौत सुसाइड से होती है. आपका सही बर्ताव एक व्यक्ति को बचा सकता है.


वीडियो: सुशांत सिंह राजपूत ने आठ महीने पहले ही डिप्रेशन की बात बता दी थी?

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