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क्रिकेट वेबसाइट ने एक अच्छी पहल की लेकिन स्त्री विरोधियों को छरछर क्यों लगा?

क्रिकेट. हमारे देश में तो एकदम पॉपुलर खेल है. छोटे सा छोटा मैच हो या एकदम हाई वोल्टेज मुकाबला. जनता टकटकी लगाकर हर मैच देखती है. टीवी पर ना देख पाए तो ऑनलाइन वेबसाइट या एप्लिकेशन पर स्कोर देखती है. वहां कमेंट्री पढ़ती है. मुझे याद है कि मैं दसवीं में था. कस्बे में रहता था. वहां लाइट की काफी समस्या थी. हर बार टीवी पर मैच देख पाना पॉसिबल नहीं हो पाता था. ऐसे में क्रिकइन्फो और क्रिकबज जैसी वेबसाइट्स ही मेरा सहारा थीं. यहां कमेंट्री पढ़कर लगता था कि मैच ही देख रहा हूं.

फिलहाल खबर ये है कि क्रिकइन्फो में काम करने वाले एक एम्पलाई ने ट्वीट किया. ट्वीट किया ही था कि बवाल मच गया. लोगों के अंदर जिनती कुंठा हो सकती थी, उन्होंने उतनी उलेड़ दी. सबसे पहले ट्वीट पर नजर डालिए. जिसे ESPN क्रिकइन्फो में काम करने वाले श्रेष्ठ शाह ने किया. उन्होंने लिखा-

“जेंडर निष्पक्षता की दिशा में आज से क्रिकइन्फो ने एक और कदम उठाया है. हमारी वेबसाइट और कवरेज में आज से ‘बैट्समैन’ शब्द की जगह ‘बैटर’ और ‘मैन ऑफ द मैच’ की जगह ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ का प्रयोग किया जाएगा. हमें आशा है कि दूसरे संस्थान भी इन शब्दों को नार्मलाइज करने के लिए हमें ज्वाइन करेंगे.”

कहना ना होगा कि ये एक बेहतर कदम है. मूल रूप से पुरुषों द्वारा डॉमिनेट किए जाने वाले खेल में महिलाओं को रिप्रजेंटेशन देने और उन्हें वेलकम फील कराने का छोटा ही सही, लेकिन पॉजिटिव कदम. वैसे तो एक ढंग के समाज में इस कदम की सराहना होनी चाहिए थी, लेकिन यहां लोग अपनी स्त्री विरोधी सोच के साथ मैदान में कूद पड़े. वो अलग बात है कि इस समय नवरात्र चल रहे हैं और चहुं ओर औरतों को सम्मान देने और उन्हें देवी मानने की बातें हो रही हैं.

एक यूजर ने मजाक उड़ाते हुए लिखा कि क्या हिंदी कमेंट्री में भी बदलाव किए जाएंगे? जैसे छक्के को छक्की कहा जाए और चौके को चौकी?

किसी ने रिद्धमान साहा के रिएक्शन का मीम पोस्ट किया. रिद्धिमान साहा के नाम में ‘मैन’ आता है ना.

इसी तरह से एक यूजर ने लिखा कि अब से क्रिकइन्फो की साइट पर डॉन ब्रैडमैन को डॉन ब्रैडप्लेर, संजू सैमसन को संजू सैमकिड और शुभमन गिल को शुभप्लेयर गिल के नाम से जाना जाएगा.

एक यूजर तो इतना आहत हो गया कि क्रिकइन्फो को बहिष्कार की धमकी दे डाली और कहा कि वो अब क्रिकबज का इस्तेमाल करेगा.

दीपक नाम के यूजर ने सभी सीमाएं लांघते हुए हिदायत दी कि आपको पुरुष खिलाड़ियों के लिए प्लेयर विद बॉल्स और महिला खिलाड़ियों के लिए प्लेयर विद ब्रेस्ट का इस्तेमाल करना चाहिए. यहां ‘बॉल्स’ का मतलब टेस्टिकल्स से है.

इस यूजर ने अपनी कुंठा को यह पूछते हुए दिखाया कि फाइन लेग और डीप फाइन लेग का क्या? क्या ये शब्द सही हैं? इसे ऐसे समझिए कि आए दिन इसी सोच के लोग शॉर्ट्स और रिप्ड जींस पहनने वाली लड़कियों पर अपनी जांझ और टांग दिखाने का आरोप लगाते हुए उन्हें चरित्रहीन घोषित कर देते हैं. कई बार तो रेप होने का कारण भी यही बता देते हैं कि लड़की छोटे कपड़े पहनकर अपना बदन दिखा रही थी.

ये यूजर तो कुंठा के नेक्स्ट लेवल पर पहुंच गया. यूजर ने क्रिकेट से जुड़ी दूसरी बातों को बदलने की बात लिख दी. जैसे चाइनामैन को ईस्ट एशियन प्लेयर. टेस्ट मैच जर्सी को रेनबो जर्सी. व्हाइट वाश को रेस न्यूट्रल वाश. बॉल्स को स्त्रियों के जननांग. इसी से पता चलता है कि आदमी के अंदर कितनी घृणा और कुंठा भरी हुई है.

इन भाईसाहब ने एलजीबीटी समुदाय के प्रति अपनी घटिया सोच को दिखाते हुए पूछा कि अब से ‘बेहतरीन छक्के’ को ट्रांसफोबिक माना जाएगा?

ऐसा नहीं है कि सबने इस कदम का मजाक ही उड़ाया या फिर अपनी कुंठा दिखाई. कुछ ने इस कदम का स्वागत भी किया. एक यूजर ने लिखा,

“यहां किए गए कुछ कमेंट दयनीय हैं. यह एक प्रगतिशील कदम है, जो हमेशा अच्छा होता है. यह उन महिला खिलाड़ियों के लिए है, जिन्हें क्रिकेट में हमेशा नजरंदाज किया जाता है और वेलकम फील नहीं कराया जाता. जो लोग भी यहां यह लिख रहे हैं कि ये कदम खराब है और मैं वोक कल्चर से घृणा करता हूं. वो बहुत कट्टर हैं.”

स्वाति नाम की यूजर ने इस कदम के लिए बधाई दी और कहा कि वो क्रिकइन्फो को सपोर्ट करती हैं.

एक और यूजर ने इस कदम के लिए क्रिकइन्फो की सराहना की और कुंठा भरे कमेंट्स को टॉक्सिक बताया.

क्रिकेट राइटर एंड्रयू फिडेल फर्नांडों ने लिखा कि पहले मुझे लगता था कि ‘बैट्समैन’ शब्द क्रिकेट की शब्दावली में इतना घुला मिला है कि इसे लिंग के नजरिए से देखने की जरूरत नहीं है. लेकिन फिर जो महिलाएं क्रिकेट से ताल्लुख रखती हैं, उन्होंने कहा कि ये समावेशी शब्द नहीं लगता है. बैट्समैन को बैटर करने से कोई आफत नहीं आ जाएगी.

सम्यक जैन नाम के यूजर ने लिखा कि जिस तरह के कमेंट्स इस ट्वीट पर आए हैं, वो अपने आप में बता रहे हैं कि यह बदलाव करना कितना जरूरी था.

तो देखा आपने कैसे लोगों ने अपनी स्त्री विरोधी सोच का खुलेआम प्रदर्शन किया. क्रिकइन्फो को सलाह दे डाली कि अगर महिलाओं का भला करना ही है तो अपनी ऑर्गेनाइजेशन में महिला कर्मचारियों को रखें, उन्हें इतनी सैलरी दें. दूसरी ओर कई लोगों ने इस कदम की सराहना की. क्रिकेट में जेंडर डिसक्रिमिनेशन और जेंडर न्यूट्रैलिटी को लाने के लिए उठाए जा रहे कदमों को और गहराई से समझने के लिए हमने अपनी सहयोगी मेघा सिन्हा से बात की. मेघा जेंडर स्टडी और क्रिकेट में समान रूप से हस्तक्षेप रखती हैं. उन्होंने बताया-

“मैंने इस ट्वीट को लेकर अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग कमेंट्स पढ़े. ये कदम अच्छा है. लोगों की प्रॉब्लम है कि सिर्फ शब्द क्यों बदले जा रहे हैं. क्यों नहीं क्रिकइन्फो अपनी फीमेल एम्पलॉयीज़ को ज्यादा सैलरी देता या फिर विमेन क्रिकेट को ज्यादा से ज्यादा कवर क्यों नहीं करता. लेकिन उन्हें ये समझ नहीं आ रहा कि जो पैट्रियार्की होती है, उसे कैरी किए जाने का एक जरिया भाषा भी है. क्रिकेट में हमेशा बल्लेबाज को बैट्समैन ही कहते आ रहे हैं. कई फीमेल क्रिकेट राइटर को ये इनक्लूसिव नहीं लगता. विमेन प्लेयर्स को भी नहीं लगता. ये इनक्लूसिव है भी नहीं. पैट्रियार्की दो तरह की होती है. पहली एकदम से खुली हुई और दूसरी छिपी हुई. दूसरी वाली इस तरह के शब्दों के जरिए आगे बढ़ती रहती है. क्रिकइन्फो ने इसे एड्रेस करने की दिशा में कदम उठाया है. इसमें टाइम लगेगा. लेकिन हमें इस कदम का स्वागत करना चाहिए.”

मेघा ने हमें यह भी बताया कि हर फील्ड की तरह क्रिकेट को जेंडर न्यूट्रल बनाने की कवायद काफी पुरानी है. और छोटे-छोटे कदमों से ही इसमें सफलता मिल सकती है. हमने उनसे यह भी पूछा कि क्रिकेट में ऐसे कौन से और शब्द हैं, जिन्हें जेंडर न्यूट्रल बनाने की जरूरत है. उन्होंने बताया-

“सबसे पहले तो यह कि क्रिकेट को जेंटलमैन गेम कहना बंद होना चाहिए. क्रिकेट में महिलाओं का बड़ा योगदान रहा है. सबसे पहला वर्ल्ड कप महिलाओं ने 1973 में खेला था. उसके बाद 1975 में पुरुषों का वर्ल्ड कप हुआ. दूसरे भी शब्द हैं. जैसे थर्डमैन. ये सुनने में भले छोटा शब्द लगे. या इसे बदलने का लोग मजाक उड़ाएं. लेकिन इन छोटी-छोटी बातों से बहुत फर्क पड़ता है.”

वैसे क्रिकेट में ‘बैटर’ और ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ जैसे शब्दों का प्रयोग पहले भी होता रहा है. अगर आप अंग्रेजी कमेंट्री सुनते हों या फिर क्रिकेट से जुड़े अंग्रेजी आर्टिकल पढ़ते हों, तो इस बात की पूरी संभावना है कि आप इन दो शब्दों से दो चार जरूर हुए होंगे. प्रजेंटेशन सेरेमनी में ‘प्लेयर ऑफ द मैच’, ‘प्लेयर ऑफ द सीरीज या टूर्नामेंट’ का प्रचलन बहुत पहले से है. लेकिन यह पहली बार है जब क्रिकेट की फील्ड में बहुत पुरानी और प्रसिद्ध संस्था ने इस तरह का स्टैंड लिया हो और कहा हो कि अब हम इसका ही प्रयोग करेंगे. अगर दूसरे संस्थान ऐसा करते हैं, तो निश्चित तौर पर इस फील्ड में जेंडर न्यूट्रैलिटी लाने के प्रयासों को गति मिलेगी. बाकी कोई भी चीज एकदम से तो होती नहीं है. वो कहावत है ना- करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान, रसरी आवत जात तें सिल पर परत निशान!


 

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