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'घर बनाने वाले ठेकेदार मुझसे ठीक से बात नहीं करते क्योंकि मैं औरत हूं': परिणीति

परिणीति चोपड़ा. हाल ही में इनकी एक पिक्चर आई थी. संदीप और पिंकी फरार. पहले थिएटर में आई, बाद में OTT पर रिलीज़ हुई. क्रिटिक्स इस फिल्म की खासी तारीफ कर रहे हैं. फिल्म के बैलेंस्ड नज़रिए को लेकर. उसमें सेक्सिज़्म दिखाया गया और ये बताया गया है कि ये हमारी जड़ों में इतनी गहराई तक पहुंचा हुआ है कि हमारे आसपास सेक्सिज़्म हो रहा होता है और हमें पता भी नहीं चलता. सेक्सिज़्म माने किसी और को कमतर आंकना या जज करना, सिर्फ इसलिए कि वो एक औरत है.

परिणीति ने ‘संदीप और पिंकी फरार’ को लेकर फिल्म कम्पेनियन से बात की. सेक्सिज़्म से जुड़े एक सवाल पर उन्होंने बताया कि वो खुद भी कई बार सेक्सिज़्म की शिकार हो चुकी हैं. उन्होंने बताया,

“मैं अपने घर का रिनोवेशन करवा रही हूं. पर कॉन्ट्रैक्टर्स मुझसे ठीक से बात नहीं करते क्योंकि मैं एक औरत हूं. वो पूछते हैं कि घर में कोई और हैं बात करने के लिए. मैं कहती हूं कि नहीं, ये मेरा घर है. इसे मैंने खरीदा है. इसके पैसे मैंने दिए हैं. तो मैं ही डिसाइड करूंगी कि टाइल कौन सा लगेगा. वो मुझसे बात ही नहीं करते.”

इस तरह के अनुभव कई और औरतों को भी रहे हैं. मेरे अपने भी. जब आप अपने घर के किसी काम के लिए कारपेंटर, इलेक्ट्रिशियन या प्लमर बुलाते हैं. और उसे काम बता रहे होते हैं. तो वो पूछता है- मैडम, सर नहीं हैं क्या? सर से उनका मतलब आपके पति, भाई, पिता या बड़े शहरो में प्रेमी से भी हो सकता है. मतलब कोई भी हो, काम बताने वाला व्यक्ति पुरुष होना चाहिए, कोई औरत नहीं.

‘संदीप और पिंकी फरार’ में एक सीन है. इसमें घर के सदस्य खाना खाने बैठे हैं. पुरुष सदस्य खाना खा रहे हैं. महिलाएं खड़ी हैं. परिणीति का किरदार अपनी प्लेट में खाना निकालने को होता है तो रघुबीर यादव का किरदार उन्हें कुछ न कुछ सर्व करने को कहता है. इस सीन को परिणीति अपना फेवरिट सीन बताती हैं. वो कहती हैं कि इसमें पैट्रिआर्की इतनी स्पष्ट दिखाई गई है. और इस सीन से देश के तमाम घरों की औरतें रिलेट कर पाएंगी.


क्योंकि ज्यादातर घरों में ये इतना आम है कि औरतों ने इसे ही सही मान लिया है. इसे ही नियम मान लिया है कि औरतें पुरुषों को खाना परोसने के बाद ही खाएंगी. कि काम से लौटने के बाद पुरुषों को चाय-पानी पूछना औरतों का फर्ज़ है. पर काम से लौटी औरतों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है. घरों में छोटी लड़कियों को शुरुआत से ही घर के काम सिखाए जाते हैं, पर लड़कों नहीं.

परिणीति ने बताया कि उनके अपने घर में भी उनकी मां पहले सबको खाना खिलाती थीं, उसके बाद खुद खाती थीं. उन्होंने बताया कि ऐसा उनके पापा ने कोई दबाव नहीं बनाया था. पर चूंकि हमेशा से ऐसा होता आया है तो उनकी मां को भी वही सही लगता था.

सेक्सिज़्म असल में क्या है

शुरुआत में हमने सेक्सिज़्म को लेकर एक लाइन लिखी. हालांकि, सेक्सिज़्म का दायरा इतना बड़ा है कि उसे उस एक लाइन में समेट देना गलत होगा. कुछ छोटे-छोटे उदाहरण से समझते हैंः

– क्या ऐसा हुआ है कि आपको अपनी गाड़ी सर्विसिंग के लिए देनी हो या कोई बड़ा सामान लेना हो और आपके घर के पुरुष सदस्य आपको ये कहकर रोकें, कि तुम वहां न जाओ मैं करवा दूंगा. या साथ चलेंगे. तुमसे अकेले होगा नहीं.

– अगर आपको अपने हर छोटे-बड़े फैसले में किसी पुरुष की एडवाइज़/गाइडेंस की ज़रूरत महसूस हो.

– अगर घर में मेहमान आने पर, फिर चाहे वो आपके करीबी या दोस्त क्यों न हों, अगर आपका पार्टनर उनके साथ बैठकर गप्पे लड़ाए और आपके सिर चाय नाश्ते की ज़िम्मेदारी आए. बिना कहे ही.

– अगर कोई ऐसी टिप्पणी आप सुनें कि तुम तो लड़की हो तुमको क्या टेंशन (काम, अप्रेज़ल, छुट्टी किसी भी चीज़ को लेकर)

– अगर दफ्तर में आपके काम से ज्यादा आपके लुक्स पर चर्चा हो. आपके कपड़ों की साइज़, उसकी स्लीव, उसके पैटर्न पर कमेंट्स किए जाएं.

– बेटियों पर घर के काम सीखने का दबाव बनाना और हमउम्र बेटों को खेलने देना.

– लड़कियों पर खास तरह के जॉब ऑप्शन्स थोपना कि उनके लिए वही सही है. उन्हें अपने मन का सब्जेक्ट या करियर न चुनने देना.

– लड़कियों को एक तरह से चलने, बोलने, बैठने के लिए कहते रहना जिससे वो ‘सभ्य’ दिखें और लड़कों सी उद्दंड न दिखें.

ये सब सेक्सिज़्म के दायरे में आता है. और ये महज़ इस भेदभाव भरी मानसिकता के कुछ उदाहरण भर हैं. औरतों को औरत होने की वजह से जो कुछ सुनना या झेलना पड़ सकता है, उसके उदाहरण इतने ज्यादा मिल जाएंगे कि किताबों के हज़ारों पन्नों में न समाएं.


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