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मेडिकल कॉलेज में लड़कों से ज्यादा लड़कियां हैं, फिर देश में फीमेल डॉक्टर्स की कमी क्यों?

आज है नेशनल डॉक्टर्स डे. उम्मीद है आप सभी ने अपने-अपने डॉक्टर दोस्तों को विश ज़रूर कर दिया होगा. नहीं किया है तो अभी भी कर सकते हैं. इसलिए नहीं कि आज उनका दिन, बल्कि इसलिए करिए क्योंकि वो हैं तो हम और आप सही-सलामत हैं. कोविड महामारी के दौरान उन्होंने बिना रुके और बिना थके लगातार काम किया था. डॉक्टर्स डे आखिर क्यों मनाया जाता है? दूसरा, हम कुछ फीमेल डॉक्टर्स के ऐसे एक्सपीरियंस से भी आपको रूबरू कराएंगे, जो अभी तक आपकी नज़रों से दूर थे. ज़ाहिर है, एक आम औरत की तरह उन्हें भी कदम-कदम पर सेक्सिज़म का सामना करना पड़ा है, माने लैंगिक भेदभाव का. और ये भेदभाव डॉक्टरी की पढ़ाई से शुरू होकर लाइफटाइम तक चलता रहता है. कैसे? सब बताएंगे एक-एक करके.

कब और क्यों शुरू हुआ?

1 जुलाई 1882 के दिन पटना में, जो कि उस वक्त बंगाल प्रेसिडेंसी के तहत आता था, वहां जन्म हुआ एक बच्चे का, जिसने आगे चलकर मेडिकल की फील्ड में बहुत नाम कमाया. एक सफल और शानदार फिज़िशियन बना. महात्मा गांधी तक का इलाज किया. एक शानदार नेता भी बना. इतना शानदार कि 1948 में उन्हें पश्चिम बंगाल राज्य की कमान सौंप दी गई. यानी उस राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया गया. जिसकी हम बात कर रहे हैं उनका नाम है डॉक्टर बिधान चंद्र रॉय. डॉक्टर और राजनेता के तौर पर इन्होंने बहुत काम किया था. जाधवपुर टीबी अस्पताल, विक्टोरिया इंस्टीट्यूट, चितरंजन कैंसर अस्पताल और महिलाओं समेत बच्चों के लिए चितरंजन सेवा सदन की स्थापना डॉक्टर बिधान ने ही की थी. फरवरी 1961 में उन्हें भारत रत्न की उपाधी भी दी गई थी. आखिरी समय तक डॉक्टर बिधान पश्चिम बंगाल के सीएम रहे. 1 जुलाई 1962 में, 80 बरस की उम्र में उनका निधन हो गया. बर्थ एनिवर्सरी और डेथ एनिवर्सरी, दोनों ही एक दिन पड़ती है. इसी दिन, माने 1 जुलाई को साल 1991 से हमारे देश में नेशनल डॉक्टर्स डे के तौर पर मनाया जा रहा है. डॉक्टर बिधान की याद में. इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने इसकी शुरुआत की थी. ये दिन बिधान समेत देश के उन सभी डॉक्टर्स को समर्पित है, जो दिन-रात जनता की जान बचाने का काम करते हैं.

Bidhan Chandra Roy
बिधान चंद्र रॉय, पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री थे.

भारत में कितनी फीमेल डॉक्टर्स?

साल 2019 में सरकार ने पार्लियामेंट को जानकारी दी थी, बताया था कि मौजूदा वक्त में हमारे देश में प्रति 1457 व्यक्तियों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है, जबकि WHO का नॉर्म कहता है कि प्रति हज़ार व्यक्ति पर एक डॉक्टर होना चाहिए. वहीं अगर एलोपेथिक डॉक्टर्स की बात करें तो देशभर में 11.57 लाख माने साढ़े 11 लाख से कुछ हज़ार ज्यादा रजिस्टर्ड डॉक्टर्स हैं. अब अगर फीमेल डॉक्टर्स की बात करें, तो इसे लेकर WHO ने साल 2016 में एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसके मुताबिक, देश के कुल हेल्थ वर्कर्स में महिलाओं की संख्या 38 फीसद है. हेल्थ वर्कर्स में सभी डॉक्टर्स, नर्स मिडवाइव्स वगैरह सब शामिल हैं. वहीं एलोपैथिक डॉक्टर्स की बात करें तो कुल संख्या का केवल 16.8 फीसद हिस्सा फीमेल डॉक्टर्स का है. नर्सेज़, मिडवाइव्स वगैरह को देखें, तो कुल संख्या का 83.4 फीसद हिस्सा फीमेल्स का है. सभी तरह के डॉक्टर्स की बात करें तो कुल फीमेल हेल्थ वर्कर्स में से 17.1 फीसद फीमेल्स डॉक्टर हैं.

अब ऐसा नहीं है कि औरतें मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए कम संख्या में जा रही हैं. वो जाती तो ज्यादा संख्या में है, लेकिन आगे चलकर वो प्रैक्टिस नहीं कर पातीं. जैसे साल 2016 में ही टाइम्स ऑफ इंडिया में एक रिपोर्ट छपि थी, जिसमें बताया गया था कि पिछले पांच बरसों में भारत में पुरुषों की तुलना में 4,500 से अधिक महिला डॉक्टर्स को प्रोड्यूस किया है. साल 2014-15 में मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के लिए जाने वाले कुल स्टूडेंट्स में 51 फीसद हिस्सा लड़कियों का था. उस साल 23,522 सीट्स लड़कियों को मिली थीं, तो 22,934 सीट्स लड़कों को. माने लड़कियां जाती हैं तो मेडिकल कॉलेज में पढ़ने के लिए, लेकिन फिर भी फीमेल डॉक्टर्स का शॉर्टेज अभी भी बना हुआ है.

साल 2011 में मेडिकल जर्नल लेंसेट में एक पेपर पब्लिश हुआ था- “ह्यूमन रिसोर्सेज़ फॉर हेल्थ इन इंडिया” नाम से. जिसमें बताया गया था कि कुल एलोपैथिक डॉक्टर्स में से केवल 17 फीसद महिलाएं हैं, और ग्रामीण इलाकों में पोस्टेड कुल डॉक्टर्स में से 6 फीसद संख्या औरतों की है. लड़कियां मेडिकल कॉलेज में तो ज्यादा संख्या में एंट्री ले रही हैं, लेकिन जब बात पोस्ट-ग्रेजुएशन और डॉक्टोरल लेवल की आती है, तो यहां औरतों की संख्या केवल एक तिहाई है. ऐसा Indi5 नाम के जर्नल में छपि एक रिपोर्ट कहती है, जिसका टाइटल है women in medicine. कुछ अन्य नामी डॉक्टर्स ने मिलकर एक स्टडी की थी, जिसमें पता लगा था कि मेडिसिन की फील्ड मेल-डॉमिनेटेड इसलिए है क्योंकि इसमें बहुत देर-देर तक काम करना होता है, और कई औरतों के लिए ये मुमकिन नहीं हो पाता, इसलिए क्योंकि आज भी हमारी सोसायटी में औरतों के ऊपर ही परिवार की ज्यादा ज़िम्मेदारी होती हैं. फीमेल डॉक्टर्स आज भी घर और करियर के बीच जगल करती दिखती हैं.

हमने ये जानने की भी बहुत कोशिश की कि मेडिकल की किस फील्ड में औरतों की संख्या ज्यादा है. हमें एग्जेक्ट आंकड़े तो नहीं मिले. लेकिन बहुत सारी रिपोर्ट्स पढ़कर पता लगा कि ज्यादातर औरतें प्रीक्लिनिकल और पैराक्लीनिकल सब्जेक्ट्स जैसे एनाटॉमी, फिज़ियोलॉजी, फार्माकोल़जी, पैथालॉजी, माइक्रोबायोलॉजी से जुड़ी हुई हैं. इसका बड़ा कारण यही समझ आया कि औरतों को आज भी घर और काम दोनों मैनेज करना होता है, और इन फील्ड्स में एक निश्चित समय सेट होता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि सर्जन या मेडिकल की बाकी फील्ड में औरतें नहीं हैं, हैं, लेकिन संख्या कम है. प्रॉपर डॉक्टर वाली फील्ड, माने जिसमें आप ट्रीटमेंट भी करते हो, उसमें गायनेकोलॉजी ऐसी फील्ड है, जहां महिलाओं की संख्या ज्यादा है पुरुषों के मुकाबले.

सेक्सिज़म का सामना करना पड़ता है

अब आते हैं सबसे अहम मुद्दे पर. हमारी सोसायटी में कोई भी ऐसी फील्ड नहीं है, जहां काम करने वाली औरतों को सेक्सिज़म माने लैंगिक भेदभाव का सामना न करना पड़ता हो. मेडिकल की फील्ड भी इससे अछूती नहीं है. हमें कोरा पर एक सवाल दिखा, ये कि-

“एक भारतीय महिला डॉक्टर की लाइफ कैसी होती है?”

इस पर एक महिला डेंटिस्ट ने कई सारे पॉइंट्स बताए. लिखा-

“मरीज़ सिस्टर माने नर्स कहकर पुकारते हैं. जब उन्हें मैं बताती हूं कि मैं डेंटिस्ट हूं, तो उन्हें हैरानी होती है. कई साल से मैं ये सिचुएशन का सामना कर रही हूं. लगभग हर फीमेल डॉक्टर और डेंटिस्ट को उनके पूरे करियर में एक न एक बार तो सिस्टर-नर्स कहकर पुकारा ही जाता है. दूसरा- जब मैं मरीज़ को बताती हूं कि उनका दांत निकालना पड़ेगा, तो वो पूछते हैं कि क्या मैं ये सर्जरी कर सकती हूं या फिर उन्हें किसी मेल डेंटिस्ट से कंसल्ट करना होगा. लोग यही सोचते हैं कि सर्जरी जैसे काम केवल पुरुष ही कर सकते हैं और हमारे जैसी महिलाएं केवल प्रिसक्रिप्शन लिख सकती हैं. लोग कहते हैं कि डॉक्टर से ही शादी करना, अच्छी बिज़नेस डील होगी. खुद का अस्पताल खोलने की जब बात कहूं, तो लोग सीधे से मना करते हैं. कहते हैं कि तुम महिला हो, हैंडल कैसे करोगी?”

कोरा पर हमें और भी कई सारे सवाल दिखे, जो फीमेल डॉक्टर्स से जुड़े हुए थे. किसी में पूछा गया था कि फीमेल डॉक्टर्स की लाइफ कितनी मुश्किल होती है? किसी में पूछा गया था कि हमारे देश में फीमेल सर्जन कम क्यों हैं? इनके जो भी जवाब हमने पढ़े, उसमें ज्यादातर लोगों ने, जिनमें से कई तो खुद डॉक्टर्स थे, उन्होंने यही लिखा कि फीमेल डॉक्टर की लाइफ ज्यादा टफ होती है, ऐसा इसलिए क्योंकि उनसे काम के साथ-साथ घर और बच्चों को संभालने की भी उम्मीद की जाती है. देर तक फ्री होकर काम करने में भी दिक्कत आती है, कारण यही है कि उन्हें घर जाकर बच्चों को पढ़ाना और खिलाना होता है.

Quora
कोरा में पूछे गए सवाल.

कोरा पर ही एक मेडिकल स्टूडेंट ने अपना एक्सपीरियंस बताया. एक बार मेडिकल कॉलेज में क्लास के दौरान उनके प्रोफेसर ने कहा कि “लड़कियों का तो फिर भी आसानी से निकल जाता है, मैं चाहता हूं कि जो हमारे लड़के हैं वो टफ बनें, क्योंकि उन्हें मेडिकल फील्ड में काफी कुछ देखना पड़ता है.” माने ये धारणा कई लोगों की है कि लड़कियां खून से डर जाती हैं, सर्जन नहीं बन पातीं. तो उन्हें हम याद दिला दें कि ज्यादातर गायनेकोलॉजिस्ट आज भी महिलाएं ही हैं, इस फील्ड में तो मुश्किल से मुश्किल सर्जरी करनी होती है. एक साथ दो-दो जानें बचानी होती हैं. ढेर सारा खून भी निकलता है. मतलब खून से डरने वाला तर्क तो यहीं पर खत्म हो गया.

पढ़ाई और प्रोफेशन के दौरान और किस तरह के लैंगिक भेदभाव का सामना फीमेल डॉक्टर्स को करना पड़ता है. ये जानने के लिए हमारे साथी नीरज बात की डॉक्टर शिल्पा पवार से. ये ओब्स्टेट्रिक्स और गायनेकोलॉजिस्ट हैं. वो कहती हैं-

“सरकारी अस्पतालों में अक्सर ये होता है कि पब्लिक फीमेल डॉक्टर्स को नर्स या सिस्टर ही कहती हैं. हां नर्स और सिस्टर के काम का भी हम आदर करते हैं, लेकिन हम उन लोगों को नहीं समझा सकते, बस हम अपना काम करते हैं. कॉमन पब्लिक को यही लगता है कि कोई महिला केवल सिस्टर हो सकती है, बड़ी डॉक्टर नहीं. लोग मेल डॉक्टर्स को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं, उन्हें लगता है कि वो ज्यादा अच्छा काम करेंगे. और सर्जरी की बात जब आती है, तब तो उन्हें मेल डॉक्टर्स की चाहिए. जबकि फीमेल डॉक्टर्स भी उतना ही काम करती हैं, जितना मेल डॉक्टर्स करते हैं.”

Dr Shilpa
डॉक्टर शिल्पा पवार.

शादी के मुद्दे पर डॉक्टर शिल्पा कहती हैं-

“पढ़ाई के दौरान ही हमारे ऊपर परिवार का प्रेशर रहता है कि शादी जल्दी कर दी जाए, क्योंकि डॉक्टरी की पढ़ाई बहुत लंबी होती है, सुपर स्पेशलाइज़्ड डॉक्टर बनने के लिए 12 से 13 साल की पढ़ाई करनी पड़ती है. इसलिए ये प्रेशर रहता है कि मेडिकल फील्ड में जा रही है, शादी हो पाएगी या नहीं. क्योंकि ज्यादा उम्र की लड़कियों को लड़के भी प्रिफर नहीं करते. जब हमें फील्ड चुनना होता है, तब भी काफी रेस्ट्रिक्शन होते हैं. सारे लोग चाहते हैं कि ये गायनेकोलॉजिस्ट बने, ऑर्थोपेडिक्स, सर्जरी, कार्डियक सर्जरी वाली फील्ड में औरतों का होना बहुत ही रेयर है. क्योंकि उन्हें प्रेशर दिया जाता है कि गायनी ही करो, या कूल ब्रांच लो, क्योंकि परिवार को भी टाइम देना है. महिलाएं अपनी पसंद से फील्ड नहीं ले सकतीं. अगर किसी महिला को हड्डी का डॉक्टर बनना है, तो 99 परसेंट ऐसा होगा कि लोग उसे सपोर्ट नहीं करेंगे. अगर किसी को कार्डियक सर्जन या न्यूरो सर्जन बनना है, तो भी बना करेंगे. कहेंगे कि दिनभर का काम रहता, तुम कर पाओगी?”

अब थोड़ा पर्सनल एक्सपीरियंस बताती हूं. मेरी एक दोस्त है. जो अब MBBS डॉक्टर हो चुकी है और PG कर रही है. मैंने उसकी जर्नी खुद देखी है. MBBS के लिए कॉलेज में एडमिशन मिलना आसान नहीं था, दो साल लगातार कोशिश करने पर दाखिला मिला. छह साल की MBBS वाली पढ़ाई की. फिर कुछ महीने किसी अस्पताल में काम किया. स्पेशलाइज़ेशन करना था, कार्डियोलॉजिस्ट बनना चाहती थी, इसके लिए फिर उसने एग्जाम्स की तैयारी की और फाइनली उसे अच्छा कॉलेज मिल गया. अभी वो स्पेशलाइज़ेशन कर रही है. ज़ाहिर है भारत में लड़कियों की शादी की तो तथाकथित ‘बेस्ट एज’ माने 21 से 25 के बीच की उम्र, तो उसकी निकल गई. और वो अभी भी पढ़ ही रही है. ऐसे में उसके परिवार वाले आए दिन उसके ऊपर शादी का प्रेशर बनाते हैं. इतना ही नहीं जब शुरुआत में उसने डॉक्टर बनने के फैसले के बारे में घर पर बताया था, तो रिश्तेदारों ने कहा था कि बूढ़ी हो जाएगी डॉक्टर बनने के चक्कर में और शादी भी नहीं हो पाएगी. ऐसी कई डॉक्टर्स हमारे बीच हैं, जो शादी के प्रेशर के चलते बेहद परेशान रहती हैं.

इन सारे डिस्कशन के बीच गायनेकोलॉजिस्ट के मुद्दे पर भी बात करना ज़रूरी है. जो ज्यादातर फीमेल डॉक्टर्स ही होती हैं. कोई नियम नहीं है, लेकिन फिर भी इस फील्ड में औरतों की संख्या ज्यादा होती है. इसे ‘फेमिनिन’ फील्ड माना जाता है, क्योंकि औरतों से जुड़ी दिक्कतों का इलाज डॉक्टर्स को करना पड़ता है. ऐसे में अगर कोई पुरुष गायनेकोलॉजिस्ट बनता है, तो उसे काफी कुछ सुनना पड़ता है. मेल गायनेकोलॉजिस्ट को लेकर घटिया-घटिया जोक्स भी चलते हैं, जिन्हें लोग बड़े हल्के अंदाज़ में बोलकर निकल जाते हैं. एक सिटकॉम है बिग-बैंग थ्योरी, उसमें राज कुथ्रोपल्ली नाम के कैरेक्टर के पिता गायनेकोलॉजिस्ट ही होते हैं, उन्हें लेकर राज के दोस्त बड़े बेहूदे कमेंट्स भी करते हैं. सिटकॉम अगर देखा होगा, तो आप समझ गए होंगे.


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