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13 साल पुरानी अपनी किस गलती के लिए आज लपेटे जा रहे हैं संजय दत्त?

संजय दत्त. उनका एक 2008 का ऐड वायरल है. ऐड है हेवर्ड्स 5000 सोडा का. हां सोडा का, क्योंकि बियर का विज्ञापन तो कर नहीं सकते. खैर. दो मिनट का ये ऐड है और उसमें संजय दत्त ने हर वो बात बोल दी है जो गलत है. इसमें वो ऐसे मर्दों को लताड़ रहे हैं जो वैक्स करवाते हैं, या रंगीन कपड़े पहनते हैं या कॉकटेल पीते हैं. उनके मुताबिक, मर्दों को हार्ड, स्ट्रॉन्ग सोडा ही पीना चाहिए. क्योंकि यही मर्दानगी असली पहचान है.

इस ऐड को बडी बिट्स नाम के फेसबुक पेज ने इतिहास की कब्र से खोदकर निकाला है. ऐड में वो क्या कह रहे हैं, पॉइंट्स में जानते हैं.

प्रॉब्लम ये है कि कई सारे मर्द लंबे बालों में दिखते हैं आजकल, पैर वैक्स करते हैं. छाती के बाल शेव करते हैं. मर्दों को जिम में होना चाहिए लेकिन वो जिम से ज्यादा टाइम पार्लरों में बिताते हैं. ये मर्द सिर्फ नाम के हैं.

#ये कुकिंग करना चाहते हैं. बच्चों का ख्याल रखना चाहते हैं. 

उनको बहनजी टाइप महसूस करना है. उनकी तरह कपड़े पहनने हैं, उनकी तरह मेकअप और लोशन लगाने हैं. इनके साथ कुछ गड़बड़ है जो पर्पल, पिंक कपड़े पहनते हैं, ये मैनली नहीं है. गर्ली है. मर्दों को ब्लू, ब्लैक ग्रे रंग पहनने चाहिए. फेशियल, लिपग्लॉस, हैंडक्रीम्स, कैलरी काउंटिंग से हमारा कुछ लेना देना नहीं होना चाहिए. 

# भारत के मर्दों, हम खतरे में हैं. मैनलीनेस के अपने गिफ्ट को खो रहे हैं. तो हमें बाल नहीं बढ़ाने चाहिए, अपने पैरों-छाती से बाल नहीं हटाने चाहिए, दाढ़ी बढ़ानी चाहिए, लंबे साइड बर्न्स रखने चाहिए.

# लड़कियों की तरह स्कूटर पर नहीं, बाइक पर चलो. घर की प्लमिंग, दरवाज़े-खिड़कियां हम खुद ठीक करो. क्रिकेट और फुटबॉल देखो, न कि सास-बहू ड्रामा. बुलडॉग-लैब्रा पालो, न कि पॉमरेनियन-पूडल.

#पर सबसे ज़रूरी है कि हमें बेवकूफी भरे पिंक कॉकटेल और सिसी बियर नहीं पीने चाहिए, केवल हेवर्ड्स 5000 सोडा पियें. ये एक नई क्रांति है जो मैं शुरू करना चाहता हूं, ये है मर्दानगिरी.

इस ऐड की खासी आलोचना हो रही है. अनुराग चौहान नाम के एक वेरिफाइड यूज़र ने लिखा,

मुझे यकीन नहीं हो रहा. ये कितना अजीब, बेतुका और असंवेदनशील ऐड है. पुरुष होने की ऐसी डेफिनिशन की वजह से ही समाज में इतनी प्रॉब्लम्स हैं.

कई लोगों ने इस ऐड को लेकर संजय दत्त की आलोचना भी की. कुछ कमेंट्स देखिए,

#सही बात है. मर्दों को खाना नहीं बनाना चाहिए. बच्चों का ख्याल नहीं रखना चाहिए और सिली पिंक कॉकटेल नहीं पीनी चाहिए. उसकी जगह कोकेन लेना चाहिए. जेल जाना चाहिए. एकदम बेहूदा. कहां से आते हैं ये लोग.

#ये क्या बकवास कर रहा है. अपने लंबे बालों वाले दिन भूल गया क्या. तब ये अपने बाल भी रंगता था. तब उसकी मर्दानगी कहां थी? क्या उसके कहने का मतलब है कि उस वक्त कम मर्द था या नामर्द था. खुद करे तो स्टाइलिश, दूसरे करे तो गर्लिश. वाह रे मर्दानगी.

ट्विटर पर एक यूज़र ने सवाल किया,

“मैं एडवर्टाइज़िंग के दिग्गजों से सवाल पूछना चाहती हूं, संजय दत्त के इस बहुत अजीब, टॉक्सिक मर्दानगी का प्रचार करने वाले हेवर्ड्स 5000 के पीछे कौन सी टीम थी?”

हालांकि, कुछ ऐसे लोग भी थे जो संजय दत्त का बचाव करते दिखे. कहा कि एक्टर्स पैसों के लिए ऐसा करते हैं. उसकी आंखों में देखों, वो बस स्क्रिप्ट पढ़ रहे हैं. ये बस एक विज्ञापन है. उसके लिए उन्हें ऐसे ट्रोल नहीं करना चाहिए.

क्या गलत है उस ऐड में?

अ…. उम…. सबकुछ. पहली लाइन से लेकर आखिरी लाइन तक उस ऐड में सबकुछ गलत है. ऐड में संजय दत्त मर्दानगी की जो परिभाषा दे रहे हैं, असल में वो एक टॉक्सिक मर्दानगी है. मतलब, ऐसी मर्दानगी जो औरतों पर तो अत्याचार करती ही है, साथ ही संवेदनशील-समझदार पुरुषों पर भी एक तय ढांचे के अनुसार ढलने का दबाव बनाती है. कुछ साल पहले मैंने एक वर्कशॉप अटेंड की थी. तीन दिन की उस वर्कशॉप में काफी विस्तार में बताया गया था कि कैसे मर्दानगी के निशाने पर पुरुष सबसे ज्यादा होते हैं.

– मर्द रोते नहीं हैं.
– मर्द घर, रसोई के काम नहीं करते.
– मर्द बच्चे नहीं संभालते
– मर्द रंगीन कपड़े नहीं पहनते
– मर्द सॉफ्ट ड्रिंक नहीं पीते
– मर्द नाचते नहीं हैं, वो बस भंगड़ा पाते हैं.

 


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कई मर्द रोना आने पर भी अपना रोना रोकते हैं. कई मर्द गुलाबी कमीज़ पसंद आने पर भी उन्हें खरीदने से बचते हैं, क्योंकि वो तो लड़कियों का कलर है. कई मर्द दूसरों के सामने अपने घर के काम करने में शर्मिंदा महसूस करते हैं. वो रसोई में खट रही या बच्चों के बीच जूझ रही अपनी पत्नी की मदद करना चाहते हैं, पर करते नहीं. क्योंकि किसी ने देख लिया तो वो क्या सोचेगा. कई फिल्में हैं, जिनमें बीवी पर धौंस जमाने वाला पति हीरो बना दिया जाता है. टीवी सीरियल्स में बार-बार ये दिखाया जाता है कि औरत प्रोफेशनली चाहे जो अचीव कर ले, चाहे वो जितनी थकी हो, पति के घर लौटते ही उसे गर्मागर्म चाय बनाकर देना उसकी जिम्मेदारी है. अगर वो ऐसा नहीं करती तो वो बुरी पत्नी बना दी जाती है. बहुत याद करने पर भी एक या दो पुरुष किरदार ही याद आते हैं जो घर या रसोई का काम करते दिखते हैं. और उनको भी कोई दूसरा किरदार क्या औरतों की तरह इन सब चीज़ों में उलझे हो, टाइप की बातें ज़रूर सुना जाता है.

इसलिए डियर मेन, ये अच्छी बात है कि आपमें रंगों का अच्छा टेस्ट है. ये अच्छी बात है अगर आप अपनी स्किन और बालों के सौंदर्य पर ध्यान देते हैं. इसमें कोई बुराई नहीं है कि आप सॉफ्ट ड्रिंक्स पीना पसंद करते हैं. इससे अच्छा क्या होगा कि आपका बच्चा आपके साथ रहना ज्यादा पसंद करता है. खाना पकाना एक आर्ट भी है और ज़रूरत भी. अच्छी बात है कि आप केवल सर्वाइवल के लिए नहीं, स्वाद के लिए भी खाना बनाना सीखना चाहते हैं. पेट के तौर पर आप खरगोश पालें, जर्मन शेपर्ड पालें या फिर बिल्ली, ये पूरी तरह आपकी चॉइस है. और इसका आपकी मर्दानगी से कोई लेना देना नहीं है. इसमें कोई बुराई नहीं है, अगर आपको क्रिकेट, फुटबॉल में रुचि नहीं है. क्योंकि मर्द होना इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि आप क्या पहनते या पीते हैं.

मर्द में कितनी मर्दानगी और स्त्री में कितना स्त्रीत्व है, इन बातों का वैसे भी क्या मतलब रहा जाएगा अगर हम समझदार और संवेदनशील न बन सकें?


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