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जेल में बंद औरतों के बच्चे किस हाल में रहते हैं?

साल 2013. मीडिया में नई-नई नौकरी लगी थी. रायपुर में. दफ्तर में एक साथी थे, जो साल के कुछ खास मौकों पर अपनी बेटी को लेकर सेंट्रल जेल के महिला सेल में जाते थे. मिठाई, खिलौने वगैरह लेकर. एक बार मुझे भी ले गए. महिला सेल में महिलाएं तो थीं ही, उनके साथ उनके बच्चे भी थे. किसी का एक बच्चा, गोदी में. तो किसी-किसी के दो साल, चार साल के दो-तीन बच्चे उनके साथ थे. इन बच्चों की परवरिश कैसे होती होगी, उनके पोषण का ख्याल कैसे रखा जाता होगा, उनकी पढ़ाई का क्या? ऐसे कुछ सवाल मन में आए, पूछने पर बताया गया कि बच्चों के न्यूट्रिशन और हेल्थ का खास ख्याल रखा जाता है. जो बच्चे पढ़ाई की उम्र के हैं वो बाहर स्कूल भी जाते हैं पढ़ने के लिए. अब महिला कैदियों के साथ रहने वाले बच्चों को लेकर एक नई रिपोर्ट सामने आई है.

नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट (NCPCR)ने ये रिपोर्ट निकाली है. इस रिपोर्ट में जेल में कैद महिलाओं के बच्चों को लेकर जेल प्रशासन की तरफ से लापरवाही की बात कही गई है. ये रिपोर्ट 144 लोगों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है. इनमें महिला कैदी, उनके बच्चे, चिल्ड्रन होम/हॉस्टल के मुखिया, स्कूल के हेड मास्टर और जेल अधिकारी शामिल हैं.
रिपोर्ट पर बात करने से पहले जेलों में महिलाओं के साथ रह रहे बच्चों के आंकड़ों पर नज़र डाल लेते हैं.

अक्टूबर, 2020 में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने साल 2019 की क्राइम रिपोर्ट जारी की थी. इसमें जेल के आंकड़े भी शामिल थे. इसके मुताबिक,

– 31 दिसंबर, 2019 तक भारत की जेलों में करीब 1,543 महिला कैदियों के 1,779 बच्चे जेल में रह रहे थे.
– इनमें से 1,212 महिलाएं अंडरट्रायल थीं यानी उन पर केस चल रहा था. उनके 1,409 बच्चे जेल में थे.
– 325 महिलाएं सजायाफ्ता थीं, उनके 363 बच्चे जेल में रह रहे थे.

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जेल में बंद महिलाओं के बच्चे छह साल की उम्र तक उनके साथ रह सकते हैं. उसके बाद उन्हें या तो किसी रिश्तेदार को सौंपा जाता है, या फिर चाइल्ड केयर होम भेज दिया जाता है. सांकेतिक फोटो- Pixabay

महिला कैदियों के बच्चों को लेकर क्या कहता है नियम?

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक, छह साल की उम्र तक बच्चे जेल के अंदर अपनी मां के साथ रह सकते हैं. इस दौरान उनके पोषण का ख्याल रखा जाएगा. जेल के अंदर ही आंगनवाड़ी की व्यवस्था की जाएगी. छह साल का होने के बाद बच्चों को उनके अभिभावकों को सौंपा जाएगा. अगर किसी बच्चे को सामान्य पारिवारिक वातावरण नहीं मिल पाता है तो जेल अधीक्षक की जिम्मेदारी है कि वो इसे लेकर डायरेक्टरेट ऑफ सोशल वेलफेयर को जानकारी देंगे. ताकि उन बच्चों को सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट की तरफ से चलाए जा रहे चाइल्ड केयर होम्स में भेजा जा सके.

इसे लेकर जुविनाइल जस्टिस ऐक्ट, 2015 कहता है कि इन बच्चों को स्पेशल केयर और प्रोटेक्शन की ज़रूरत है. चाइल्ड वेलफेयर कमिटी की ज़िम्मेदारी है कि अपनी मांओं पर निर्भर इन बच्चों को रजिस्टर्ड हॉस्टल या होम्स में रखा जाए.

अब आते हैं NCPCR Report पर

चाइल्ड केयर होम्स और हॉस्टल्स में रह रहे बच्चों को लेकर कुछ दिक्कतें इस रिपोर्ट में सामने आई हैंः

– जुविनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 के मुताबिक ऐसे केयर होम्स में रहने वाले बच्चों की नियमित अंतराल पर काउंसिलिंग ज़रूरी है. ज्यादातर सेंटर्स में तभी काउंसिलिंग दी जाती है जब इसकी ज़रूरत महसूस होती है, न कि रेगुलर. सर्वे के दौरान किसी भी केयर होम में ट्रेंन्ड काउंसलर नहीं मिला.

– सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक, बच्चों को हफ्ते में कम से कम एक बार उनकी मां से मिलवाया जाए. ताकि, मां और बच्चे के बीच एक हेल्दी रिलेशनशिप डेवलप हो सके. हालांकि, ज्यादातर केयर होम्स में रह रहे बच्चे एक लंबे गैप के बाद अपनी मांओं से मिल पाते हैं. इसकी एक वजह सामने आई कि ये केयर होम और जेल अलग-अलग शहरों में हैं. ऐसे में निश्चित अंतराल पर बच्चों को उनकी मांओं से मिलाना संभव नहीं हो पाता है. चाइल्ड केयर होम्स की तरफ से ये भी कहा गया कि कई बार इन बच्चों की विज़िट के लिए अप्रूवल आने में ही काफी वक्त लग जाता है. इसके चलते भी देरी होती है. कुछ है चाइल्ड केयर होम ऐसे पाए गए जो हर महीने या तीन महीने में बच्चों को उनकी मां से मिलवाने लेकर जाते हैं. कई मामलों में साल-सालभर तक बच्चे अपनी मांओं से नहीं मिल पाते. मांओं को बच्चों की प्रोग्रेस रिपोर्ट भी नहीं दिखाई जाती  है.

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NCPCR की विज़िट में कई बच्चों ने क्लासमेट्स द्वारा बुली किए जाने की शिकायत की थी. सांकेतिक फोटो- Pixabay

– इस सर्वे में करीब 12 प्रतिशत बच्चों ने बताया कि जिन स्कूलों में वो पढ़ने जाते हैं वहां उनके क्लासमेट्स उन्हें इस बात को लेकर परेशान करते हैं कि उनकी मां जेल में बंद हैं. इसका बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है. जो उनकी शारीरिक, सामाजिक और शैक्षिक ग्रोथ को नुकसान पहुंचा सकता है.

– सेरेब्रल पॉल्सी से जूझ रहे बच्चों की एजुकेशनल नीड्स के लिए इन केयर होम्स में कोई व्यवस्था नहीं है. उन्हें सामान्य स्कूलों में नहीं भेजा जा सकता है. ऐसे में पुणे के एक सेंटर में सेरेब्रल पॉल्सी से जूझ रहे दो बच्चे पूरे दिन सेंटर में ही रहते हैं. इसे लेकर NCPCR ने संबंधित अधिकारियों और डीएम को पत्र लिखा है कि इन बच्चों को तत्काल ऐसे होम्स में शिफ्ट किया जाए जहां उनकी स्पेशल नीड्स का ख्याल रखा जा सके.

– गाज़ियाबाद के एक चाइल्ड केयर होम में पाया गया कि वहां आशा दीप फाउंडेशन की तरफ से धार्मिक शिक्षा दी जा रही है. यहां सरप्राइज़ विज़िट में NCPCR को गैर ईसाई बच्चों के लॉकर से 26 बाइबल मिले.

– जेल में रह रही महिलाओं के बच्चों को चाइल्ड वेलफेयर कमिटी या जिला कलेक्टरेट या फिर डिपार्टमेंट ऑफ सोशल वेलफेयर के आदेश के बाद ही किसी हॉस्टल या चाइल्ड केयर होम में डाला जा सकता है. दिल्ली में एक पायलट स्टडी में NCPCR ने पाया कि बच्चों को इनके आदेश के बिना ही हॉस्टलों में भेज दिया गया. ये भी पाया गया कि बच्चों को अलग-अलग हॉस्टल या बोर्डिंग स्कूल भेजने में जेल अथॉरिटी वहां काम कर रहे NGO की मदद लेती है. जो कि जुविनाइल जस्टिस एक्ट के नॉर्म्स के खिलाफ है.

– NCPCR के पटना और मुजफ्फरपुर जेल के अधीक्षकों ने बताया कि वहां रह रही महिलाओं के बच्चों को चाइल्ड केयर होम में भेजने का एक भी मामला नहीं है. उन्होंने बताया कि वहां रह रही क्रमशः छह और तीन महिलाओं के छह साल के ज्यादा उम्र के बच्चे अपने रिश्तेदारों के साथ रह रहे हैं. हालांकि, इन महिलाओं से बातचीत में पता चला कि ये बच्चे अपने भाई-बहनों के साथ रह रहे हैं, उनका ख्याल रखने के लिए कोई वयस्क या गार्जियन उनके साथ नहीं रहता है.

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बिहार की दो जेलों में जेल प्रशासन ने बताया कि महिलाओं के बच्चे अपने रिश्तेदारों के साथ रह रहे हैं. जबकि, ये बच्चे बिना किसी वयस्क अभिभावक की देखरेख के अपने भाई-बहनों के साथ रह रहे थे. सांकेतिक फोटो- Pixabay

– भायखला जेल में ये पाया गया कि जेल से चाइल्ड केयर होम भेजे गए बच्चों की लिस्ट ही अपडेट नहीं हुई है. चिल्ड्रन होम में NCPCR ने पाया कि जेल से आए बच्चे वहां हैं ही नहीं, उन्हें किसी और चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट में भेज दिया गया है. और जेल की लिस्ट में इस बात की जानकारी ही नहीं है.

देश के सबसे बड़े जेल में क्या स्थिति है?

एडवोकेट प्रज्ञा पारिजात सिंह. इन्होंने दिल्ली की तिहाड़ जेल में महिला कैदियों को लेकर काफी काम किया है. उन्होंने बताया कि तिहाड़ में बंद महिला कैदियों के साथ पांच साल तक के उनके बच्चे रहते हैं. उन्होंने बताया कि अगर बच्चे बहुत छोटे हैं, दूध पीते हैं केवल उसी केस में बच्चों को दिनभर मांओं के साथ रखा जाता है. दो साल या उससे बड़ी उम्र के बच्चों को कैम्पस में ही मौजूद आंगनबाड़ी में रखा जाता है. ये बच्चे दिनभर वहां खेलते हैं, पढ़ते हैं और शाम को अपनी मांओं के पास आ जाते हैं. प्रज्ञा ने बताया कि तिहाड़ में बंद कई कैदियों के बच्चे बाहर चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट्स में रहते हैं, इन बच्चों को नियमित अंतराल पर उनकी मांओं से मिलवाया जाता है.

प्रज्ञा कहती हैं,

“मुझे खुद अचंभा हुआ था ये देखकर. तिहाड़ बहुत बड़ी जेल है. यहां कैम्पस के अंदर रह रहे बच्चों का ख्याल तो रखा ही जाता है. बाहर रहने वाले बच्चे समय-समय पर अपनी मांओं से मिल पाएं उसकी भी व्यवस्था है. बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए जिन सेंटर्स में वो रहते हैं वहां उनकी काउंसिलिंग भी होती है.”

यानी तिहाड़ में व्यवस्था ठीक है. लेकिन देश के बाकि जेलों में स्थिति कमोबेश वैसी ही है जैसी NCPCR की रिपोर्ट में सामने आई है. NCPCR ने अपनी रिपोर्ट में कुछ सुझाव भी दिए हैं, उम्मीद है कि उन सुझावों को अमल में लाया जाएगा और महिला कैदियों के बच्चों की शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक ज़रूरतों का खास ध्यान रखा जाएगा.


प्रेगनेंट औरतों के साथ इन कंपनियों ने क्रूरता की हद पार कर दी!

 

 

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