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नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में वो मिला जो 70 साल में नहीं हुआ

भारत के मशहूर अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का दिया हुआ एक बहुत फेमस फ्रेज़ है – ‘मिसिंग विमेन’. इसके लिटरल मीनिंग पर मत जाइएगा. इस फ्रेज़ के ज़रिए अमर्त्य ने 90 के दशक में एक ऑब्ज़र्वेशन को हाईलाइट किया था. ऑब्ज़र्वेशन ये कि एशिया के डेवलपिंग नेशंस, मेनली इंडिया और चाइना में विमेन रेशियो, मेन्स के तुलना में काफी कम है. इंडिया की बात करें तो उस वक़्त 1000 पुरुषों पर 927 महिलाएं थीं.

अमर्त्य सेन
आज भारत में उस स्तिथि में बदलाव आया है जिसके बारे में अमर्त्य सेन ने 1990 में चेताया था.

अमर्त्य सेन ने इस रेशियो में कितनी महिलाएं कम हैं, इसका कैलकुलेशन किया. डॉ सेन का मानना था कि अगर इंडिया और चीन में मेल-फीमेल सेक्स रेश्यो बराबर होता, महिलाओं और पुरुषों को बराबर देखभाल मिलती तो आज 20 करोड़ महिलाएं ज़िंदा होतीं. यह उन महिलाओं की कुल संख्या का अनुमान है, जिनकी लिंग भेदभाव के कारण समय से पहले मृत्यु हो गई.

खैर, इसके बारे में मैं आज आपको इसलिए बता रहे हैं क्योंकि डॉ सेन के ऑब्ज़रवेशन से जुड़ी एक खबर आई है. आज 20 साल बाद, भारत में उस स्तिथि में बदलाव आया है जिसके बारे में सेन ने 1990 में चेताया था. खबर ये है कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक देश में पहली बार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या ज्यादा हुई है. इस रिपोर्ट में और क्या क्या ख़ास है, आगे बताएंगे.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की 5 खास बातें

सबसे पहले आपको बताते हैं ये कि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे नाम की ये भरी भरकम सी बला क्या है. दरअसल, ये एक सर्वे है जो पूरे भारत में किया जाता है. भारत के अलग अलग प्रदेशों के परिवार इसके सैंपल का हिस्सा होते हैं. उस सैंपल के आधार पर ऑब्जरवेशन सामने आते हैं. इस सर्वे को भारत का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय यानी Ministry of Health and Family Welfare कंडक्ट कराता है. इसका टेक्निकल आयाम International Institute for Population Sciences- (IIPS) देखता है.

इस सर्वे की शुरुआत 1992-93 में हुई थी. दूसरा सर्वे 1998-99 में हुआ. तीसरा 2005-2006. चौथा 2014-2015 में. और कल जो रिपोर्ट आई वो NFHS का पांचवा सर्वे था. इस बार ये सर्वे यूपी, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड समेत 14 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में किया गया. इस सर्वे के 5 ख़ास ऑब्जरवेशन पर हम आज बात करंगे.

# सबसे पहली और सबसे अच्छी बात : मेल-फीमेल सेक्स रेश्यो में सुधार.

देश में पुरुषों के मुकाबले अब महिलाओं की संख्या ज्यादा हो गई है. अब 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं. गांवों में प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,009 महिलाएं थीं और शहरों में ये आंकड़ा 956 है. आंकड़ों से ये साफ है कि भारत में अब महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. जबकि इससे पहले हालात कुछ अलग थे. 1990 के दौर में हर 1000 पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या महज़ 927 थी. साल 2005-06 में हुए तीसरे NHFS सर्वे में ये 1000-1000 के साथ बराबर हो गया. इसके बाद 2015-16 में चौथे सर्वे में इन आंकड़ों में फिर से गिरावट आ गई. 1000 पुरुषों के मुकाबले 991 महिलाएं थीं. अब पहली बार ऐसा हुआ है कि देश में महिलाओं के अनुपात ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है.

# फर्टिलिटी रेट में कमी

फर्टिलिटी रेट में गिरावट देखी गयी है. ये 2.2 से घटकर 2 हो गया है. मतलब पहले एक मां औसतन 2.2 बच्चे पैदा करती थी. अब वो औसतन 2 बच्चे पैदा कर रही है. इस गिरावट का सीधा मतलब ये कि कम बच्चे पैदा हो रहे हैं. इसका सीधा असर देश की पॉपुलेशन पर होगा.

# इंस्टीट्युशनल बर्थ और C-सेक्शन डिलीवरी में बढ़त देखी गई है.

इंस्टीट्युशनल बर्थ का मतलब है किसी हेल्थ केयर सेंटर या हॉस्पिटल हेल्थकेयर वर्कर की मदद से की गई डिलीवरी. और C सेक्शन डिलीवरी का मतलब सीज़ेरियन डिलीवरी या ऑपरेशन के ज़रिए की गई डिलीवरी. अब देश में 89% डिलीवरी इंस्टीट्युशनल हैं. पुदुचेरी और तमिलनाडु में ये 100% है. यानी वहां हर बच्चा अस्पताल और हेल्थकेयर सेंटर में ही जन्म लेता है.

# खुद का बैंक खाता रखने वाली महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी.

अपने नाम का बैंक अकाउंट रखने वाली महिलाओं की संख्या में 25% की बढ़ोतरी हुई है. आज देश में 78.6% महिलाएं अपना बैंक खाता ऑपरेट करती हैं. 2015-16 में यह आंकड़ा 53% ही था.

# देश की आधी से ज्यादा महिलाएं और बच्चे अनीमिया से पीड़ित हैं.

अनीमिया यानी खून की कमी. देश में 6 से 59 महीने तक के बच्‍चे और 15 से 50 साल तक की लड़कियों-महिलाओं की आधी से ज्‍यादा आबादी खून की कमी से पीड़ित हैं. बच्चों की बात करें तो, शहरी क्षेत्रों में बच्चों में खून की कमी की संख्या 64.2 है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आबादी 68.3% है. इस तरह देश में 67.1% बच्‍चों में खून की कमी है. NFHS-4 में यह संख्‍या 58.6% थी.

सेक्स रेशियो
साल 2005-06 में हुए तीसरे NHFS सर्वे में सेक्स रेशियो 1000-1000 हो गया था

15-49 वर्ष की 57.2% गैर-गर्भवती महिलाएं भी अनीमिया से पीड़ित हैं.

ये रिपोर्ट हमें ये बताती है कि साल 2021 में हम कहां खड़े हैं. वैसे तो हम उस युग में जी रहे हैं जहां हम 5जी टेस्टिंग करने वाले हैं. पर महिलाओं की क्या स्थिती है ये आप सब के सामने है.


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