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तालिबान ने पिता को मारा, देश छूटा... फुटबॉल में नाम बनाया और अब डॉक्टर बन गई पूर्व PSG स्टार

“मेरे पिता अफ़ग़ान सेना में जनरल थे, उन्हें तालिबान ने मार दिया. मैं 10 साल की थी. अपनी मां और चार बहनों के साथ. एक ऐसी जगह जहां स्कूल नहीं जा सकते, काम नहीं कर सकते या नॉर्मल जीवन नहीं बिता सकते. एक ऐसी जगह जहां सपनों की इजाज़त नहीं थी. मेरी मां ने किसी तरह से हमें वहां से निकालने का तरीक़ा निकाला. 2 महीने बाद, मैं एक ट्रक के पीछे कैरियर में बैठी हूं. अंधेरा है, ठंड है, मुझे डर लग रहा है. मगर सबसे ज़्यादा.. भूख लग रही है. ट्रक का सफ़र कुछ 50 घंटे का था. हमें डेनमार्क के बाहरी इलाक़े में उतारा गया. वहां एक पुलिस अफ़सर ने देखा कि हम भूखे हैं. उसने हमें दूध, केला और टोस्ट दिया. यह एक सामान्य व्यवहार है. लेकिन मेरे लिए यह एक ऐसा व्यवहार है, जो मेरे जीवन में मेरे लिए किसी ने कभी नहीं किया था.”

ये नादिया नदीम की कहानी का बस एक हिस्सा है. आप पूछेंगे ये कौन? नादिया डेनमार्क की इंटरनैशनल फुटबॉल प्लेयर हैं. अब तक 99 इंटरनैशनल मैच खेल चुकी हैं, PSG और मैनचेस्टर सिटी जैसी बड़ी टीम्स के लिए खेल चुकी हैं. फुटबॉल में अपना करियर जारी रखते हुए नादिया ने मेडिकल की पढ़ाई की और पांच साल का कोर्स पूरा करके अब वो डॉक्टर नादिया बन गई हैं.

‘मेरी ज़िंदगी जैसी किसी की ज़िंदगी न हो’

अफगानिस्तान के हेरात में 2 जनवरी, 1988 को जन्मीं नादिया के पिता रबानी खान अफ़ग़ान सेना में बड़े अफसर थे, वो बाद में जनरल भी बने. 1996 से 2001 तक तीन चौथाई अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का क़ब्ज़ा था. स्पोर्ट्स ट्रिब्यून को दिए हुए अपने इंटरव्यू में नादिया ने बताया कि उनका बचपन एक बबल में बीता. अपने परिवार के साथ वह काबुल में एक अपार्टमेंट कॉन्प्लेक्स में रहती थीं. कोई भी सिक्योरिटी चेक के बिना न आ सकता था, न जा सकता था.

“हम हमेशा आदेश का पालन करते थे. हमेशा. घर में सब बागी थे, लेकिन जैसे ही घर से बाहर निकलते थे हमें समझ आता था कि कुछ भी हो सकता है. एक बच्चे के तौर पर अगर आपको कोई कहता है कि इस लाइन के पार मत जाना, वरना मारे जाओगे. तो तुम्हें लगता है कि हां इस लाइन के अंदर ही रहना है.”

जनरल रबानी ख़ान
नादिया नदीम की मां हामिदा नदीम और पिता जनरल रबानी ख़ान.

जनरल रबानी ख़ुद बहुत स्पोर्टी थे. अफ़ग़ानिस्तान नेशनल हॉकी टीम के लिए खेलते थे और फ़ुटबॉल भी उन्हें बहुत पसंद था. 1996 से 2001 तक आधिकारिक तौर पर बुरहानुद्दीन रब्बानी अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति थे, पर वे अफ़ग़ानिस्तान में नहीं थे. उनकी ऐब्सेंस में जनरल रबानी तालिबान की आंख का कांटा बने हुए थे. यह वो वक़्त था जब तालिबान एक के बाद देश के प्रभावशाली लोगों की हत्या कर रहा था. एक दिन उन्हें एक मंत्री से मीटिंग के लिए बुलाया गया, नादिया के पिता मीटिंग में गए और कभी वापस नहीं आए.

नादिया, उनकी मां हामिदा नदीम और उनकी चार बहनें काबुल में उसी अपार्टमेंट में जनरल रबानी ख़ान का इंतज़ार करती रहीं. जब उन्हें समझ आ गया कि वो वापस नहीं आएंगे तो हमीदा ने वहां से निकलने के लिए संपत्ति बेचनी शुरू कर दी. उनके घर, अपार्टमेंट, गाड़ी, जूलरी, सब कुछ. एक रात वो नादिया के पास आईं और कहा,

‘कल हम यहां से निकल जाएंगे. किसी को बताना मत. कहीं जाना मत.’

सामान बांधा और अगली रात नादिया का परिवार एक मिनीवैन में बैठ कर निकल गया. पाकिस्तान के कराची पहुंचे और वहां दो कमरे वाले एक घर में ठहरे. एक इंटरव्यू में नादिया ने बताया‌ कि एक मोटी मूंछ वाला शख्स उनसे वहां मिलने आता था. वह नादिया के परिवार को लंदन भेजने के लिए उनकी मदद कर रहा था. लंदन में नादिया के कुछ रिश्तेदार थे. उस समय फोन या इंटरनेट नहीं था. एक दिन वह शख़्स आया और नादिया कि मां से कहा कि 4 लोगों के पासपोर्ट का इंतज़ाम हुआ है. इसका मतलब यह हामिदा और उनकी तीन बेटियां उनके साथ जा सकती हैं. हमीदा ने साफ़ मना कर दिया.

1 महीने बाद वो शख़्स फिर से आया. इस बार 6 पासपोर्ट के साथ. काग़ज़ पर अब वे पाकिस्तानी नागरिक थे.

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नादिया और उनकी बहनें गिती और डायना नदीम. (तस्वीर- इंस्टाग्राम)

अपनी जीवनी में नादिया लिखती हैं,

“मां ने कहा कोई भी एक लफ़्ज़ नहीं कहेगा. यह ओशन थर्टीन जैसा एक फ़िल्मी सीन था. जहां सबको पता है कि क्या हो रहा है, लेकिन कोई कुछ नहीं करता. क्योंकि उन्हें कुछ नहीं करने के ढेर सारे पैसे मिले थे.

हम कराची एयरपोर्ट से प्लेन में बैठे और इटली के मिलान में उतरे. वहां एक खस्ताहाल अपार्टमेंट में ठहरे.”

दो दिन बाद, दो ईस्ट यूरोपियन लोग आए और नादिया के पूरे परिवार को अपनी पुरानी कार में बैठा कर एक ट्रक के पास ले गए. सिग्नल दिया और नादिया, उनकी मां हमीदा और उनकी चार बहनें दौड़ के ट्रक के कैरियर में चढ़ गईं. ट्रक में घोर अंधेरा था और केवल दो आवाज़ें सुनाई दे रही थीं. एक ट्रक के इंजन की और एक पन्नी की जो ट्रक के कैरियर को ढकने के लिए इस्तेमाल हुई थी. उस समय अनंत लग रहे समय के बाद अचानक से ट्रक रुका. ट्रक का ड्राइवर दौड़ कर पीछे आया. दरवाज़ा खोला और चिल्लाने लगा, ‘बाहर निकलो! बाहर निकलो!’ नादिया का परिवार बाहर आया और वह आदमी गायब हो गया. उन्हें लंदन जाना था, लेकिन उन्हें ग्रामीण डेनमार्क के एक रिफ्यूजी कैंप में उतार दिया गया था.

इस घटना को याद करते हुए नादिया ने लिखा है,

“उस ड्राइवर की जियोग्राफी बहुत ख़राब थी. लेकिन उससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था, क्योंकि बहुत दिनों बाद मैं पहली बार सुरक्षित महसूस कर रही थी.”

कैंप में हर जगह से लोग थे. अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया, कॉन्गो, इराक़, आर्मीनिया, रूस. कुछ साल नादिया उसी कैंप में ही रहीं. कैंप में पहली बार लड़कियों को फ़ुटबॉल खेलते हुए देखा. फ़ुटबॉल की ट्रेनिंग ली.

फ़ुटबॉल करियर

हामिदा ने परिवार की लीगल असाइलम के लिए अर्जी दी. अर्जी स्वीकार हुई और उसके साथ शुरू हुआ नादिया का फ़ुटबॉल करियर. साल 2004 में 16 साल की नदिया ने ऑलबर्ग के B52 क्लब से अपने प्रोफ़ेशनल करियर की शुरुआत की. मां ने शुरू में विरोध जताया तो कोच घर आ गए. कहा, अगर नादिया खेलेगी, तो उसे स्पॉन्सर मिलेंगे. इसके बाद हामिदा ने नादिया को खेलने की परमिशन दी.

इसके बाद 2005 से 2006 तक टीम विबोर्ग के लिए खेलीं. फिर 2006 से 2012 तक रिशकॉ के डेनिश फुटबॉल क्लब IK स्कॉवबैकेन के साथ नादिया ने अपनी एक पहचान बनाई. सितंबर 2012 में नादिया नदीम ने फॉर्चूना हॉरिंग फुटबॉल क्लब के साथ अपना चैंपियंस लीग डेब्यू किया और स्कॉटिश चैंपियन ग्लास्गो सिटी को 2-1 से हराने में दोनों गोल नादिया ने ही मारे.

इसी बीच एक खेल और हुआ. डेनिश राष्ट्रीयता क़ानून के तहत नादिया 18 की उम्र से पहले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट के लिए अप्लाई नहीं कर सकती थीं. 2006 में जब वह 18 साल की हुई तो FIFA के एलिजिबिलिटी रूल्स ने नादिया को डेनमार्क के लिए खेलने से रोक दिया. FIFA के एलिजिबिलिटी रूल्स कहते थे कि कोई भी प्लेयर जो पांच साल तक डेनमार्क निवासी नहीं है, वह उसकी इंटरनेशनल टीम में नहीं खेल सकता. इसके बाद डैनिश फुटबॉल एसोसिएशन ने इन क़ानूनों को चुनौती दी. इसके बाद FIFA के लीगल विभाग ने एक अपवाद के तौर पर नादिया को खेलने का मौक़ा दिया. 2009 से अब तक नादिया डेनिश नेशनल टीम के लिए 99 मैच खेल चुकी हैं.

2012 से 2015 तक फॉर्चूना के साथ ही रहीं. जनवरी 2016 में नदीम पोर्टलैंड थॉर्न्स मैं चली गईं. और 2016-17 वाले सीज़न ने नादिया को एक अंतरराष्ट्रीय पहचान दी. 2016 में टीम ने NWSL चैंपियनशिप जीती और इस सीज़न में नादिया टीम की टॉप स्कोरर रहीं. 2017 में टीम दूसरे स्थान पर रही, लेकिन सीज़न के 37 गोल्स के साथ अपनी पहचान क़ायम कर चुकी थीं.

नादिया नदीम
पोर्टलैंड थॉर्न्स (2016-17), मैनचेस्टर सिटी (2018), पीएसजी (2019-20) के साथ नादिया का करियर अपने उरूज पर पहुंचा.

सितंबर 2017 में नादिया ने FA विमेन सुपर लीग के लिए मैनचेस्टर सिटी के साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन किया. जनवरी 2018 में उन्होंने क्लब जॉइन किया और अपने पहले ही मैच के शुरुआती 6 मिनट में अपना पहला गोल कर दिया. साल के अंत में वो मैनचेस्टर सिटी से अलग हो गईं और जनवरी, 2019 में उन्होंने पेरिस सेंट जर्मेन (PSG) फ़ुटबॉल क्लब जॉइन किया और अपने पहले सीज़न के बाद जुलाई में उन्होंने अपना कॉन्ट्रैक्ट बढ़ा दिया. 2019 सीज़न के लिए नादिया टीम की वाइस कैप्टन भी रहीं. अभी नादिया रेसिंग लुइविले फ़ुटबॉल क्लब के साथ NWSL चैंपियनशिप खेल रही हैं.

सर्जन के रूप में नई पारी

आप सोच रहे होंगे कि हमने आपको यह कहानी अभी क्यों सुनाई?  क्योंकि हाल ही में नादिया डॉक्टर बन गई हैं. नादिया ने डेनमार्क की यूनिवर्सिटी ऑफ़ आर्हस से मेडिसिन की पढ़ाई पूरी की है.

यूके की स्पोर्ट्स बाइबल से बातचीत में नादिया कहती हैं,

“मैं लोगों की मदद करना चाहता थी. मुझे फुटबॉल पसंद है लेकिन मैंने इसे कभी पेशे के रूप में नहीं सोचा. यह सिर्फ मेरा जुनून है. भले ही मुझे इसे खेलने के लिए पैसे मिलते हैं, मैं खुशी से मुफ्त में खेल सकती हूं. मैं चाहती थी इससे ज़्यादा करूं. मैं कुछ ऐसा करना चाहती थी, जिससे मैं लोगों के जीवन पर प्रभाव डाल सकूं.

एक डॉक्टर होने के नाते ऐसी परिस्थितियां पैदा होती हैं जहां आप लोगों की मदद कर सकते हैं. मैंने इसे शुरुआती सेमेस्टर से पसंद किया है. यह मैं हूं. मुझे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद है. मुझे अस्पताल में रहना पसंद है. आपके कंधों पर भी ज़िम्मेदारी का दबाव मुझे पसंद है.”

फ़ील्ड से हटकर, नदीम अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं हक़ की मुखर आवाज़ के रूप में उभरी हैं. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महिला और स्थानीय संगठनों के लिए 29,000 पाउंड्स (क़रीब 30,000 लाख रुपये) जुटाने में मदद की है.

5 जुलाई, 2019 को यूनेस्को के महानिदेशक ऑड्रे अज़ोले ने डेनिश फुटबॉल स्ट्राइकर को लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के लिए यूनेस्को चैंपियन नामित किया.


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