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ब्लड डोनेशन से जुड़े वो झूठ जो सच लगते हैं, और वो सच जो झूठ लगते हैं

प्रिया (बदला हुआ नाम) 27 बरस की है. एक मीडिया चैनल में काम करती है. कॉलेज के टाइम से ही ब्लड डोनेट करती आ रही है. अभी कुछ महीने पहले भी उसे ब्लड डोनेट करने का मौका मिला, लेकिन इस बार भी हर बार की तरह उसके परिवार वालों ने ऐसा करने से मना किया. क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है कि ब्लड डोनेट करने से प्रिया को कमज़ोरी आ जाएगी. खैर, प्रिया ने पहले भी किसी की नहीं सुनी थी, अब भी नहीं सुनी और ब्लड डोनेट किया ही. प्रिया की तरह ही ऐसे कई लोग हैं, जिनके परिवार वाले उन्हें तरह-तरह की दलीलें देकर ऐसा करने से रोकते हैं. ब्लड डोनेशन से जुड़े कई सारे मिथक लोगों के दिमाग में घर बनाकर बैठे हुए हैं. इस आर्टिकल में हमने इन्हीं कुछ मिथकों की सच्चाई टटोलने की कोशिश की है. इसके लिए हमने बात की डॉक्टर किरण चौधरी से. वो डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अस्पताल के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन डिपार्टमेंट की हेड हैं. ये डिपार्टमेंट ब्लड डोनेशन कैंप्स ऑर्गेनाइज़ करता है.

आगे पढ़ें ब्लड डोनेशन से जुड़े मिथ और उनकी सच्चाई के बारे में-

मिथ- ब्लड डोनेट करने से कमज़ोरी आती है

सच्चाई- डॉक्टर किरण का कहना है कि कमज़ोरी वाली बात लोगों की धारणाओं पर निर्भर करती है. वैज्ञानिक तौर पर देखें तो ब्लड डोनेशन से कमज़ोरी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा,

“खून हमारी लाइफ लाइन है और लोग ये बात जानते भी हैं. लोग इस तरह की खबरें भी सुनते रहते हैं कि ज्यादा खून बहने से मौत हो गई. और ऐसा होता भी है. इसी वजह से लोगों को लगता है कि ब्लड डोनेट करने से शरीर कमज़ोर हो जाएगा. ये एक तरह की धारणा उनके मन में बन गई है. और यही बात लोग एक-दूसरे से कहते रहते हैं. यही सब सुनकर लोग कमज़ोरी वाली बात को सच मानने लगे हैं. लेकिन वैज्ञानिक तौर पर देखा जाए तो ब्लड डोनेशन से शरीर में कमज़ोरी नहीं आ सकती. शरीर के अंदर पांच से छह लीटर खून रहता है. उसमें से हम या तो 350 या 450 ml खून ही निकालते हैं. वज़न के हिसाब से. हम उतना ही निकालते हैं, जिससे डोनेट करने वाले को कोई नुकसान न हो. हम लोग ब्लड देने के पहले ही कहते हैं कि आप एक लीटर पानी पीकर आ जाइए. तो ऐसे में जब ब्लड बाहर निकलता है, तो वो लिक्विड कम से कम उसके वॉल्यूम को तो शरीर में पूरा कर देता है. इसलिए आदर्श तौर पर कमज़ोरी होनी नहीं चाहिए.”

मिथ- दुबले लोगों को ब्लड नहीं देना चाहिए

सच्चाई- ये भी बड़ा फैला हुआ मिथ है कि दुबले लोगों को ब्लड नहीं डोनेट करना चाहिए. इस पर डॉक्टर किरण कहती हैं कि दुबले-पतले होने से मतलब नहीं होता. मतलब होता है वज़न से. डोनेटर का वज़न कम से कम 45 किलो या इससे ज्यादा होना चाहिए. 45 किलो से लेकर 60 किलो के बीच वाले व्यक्ति का 350 ml ब्लड लिया जाता है और 60 से ऊपर वालों का 450 ml. RML अस्पताल की वेबसाइट के मुताबिक, 18 से 60 बरस की उम्र वाले लोग ब्लड डोनेट कर सकते हैं.

मिथ- ब्लड डोनेट करने से आदमी नपुंसक हो जाता है

सच्चाई- ये ऐसा अजीब मिथ है जो देश के उन सभी डॉक्टर्स ने, जो ब्लड डोनेशन के कैंप में शामिल होते हैं, उन्हें सुनना पड़ता है. खैर, इसमें तो डॉक्टर किरण सीधे तौर पर न ही कहती हैं.

मिथ- वेजिटेरियन्स को खून नहीं देना चाहिए

सच्चाई- ये मिथ ज़ाहिर तौर पर गलत है. इसे भी डॉक्टर किरण ने सिरे से नकारा है. वो कहती हैं कि इंसान वनस्पति और मांस, दोनों खाता है. दोनों शरीर में जाकर या तो कार्बोहाइड्रेट्स में या प्रोटीन में टूटते हैं. यानी कुछ भी खाओ, शरीर का फंक्शन तो एक समान ही रहता है.

मिथ- पति अगर पत्नी को ब्लड देगा, तो वो भाई-बहन हो जाएंगे

सच्चाई- ज़ाहिर तौर पर ये बात भी अपने आप में हास्यास्पद है. डॉक्टर किरण ने अपने ब्लड डोनेशन कैंप के दौरान लोगों का ये तर्क भी कई बार सुना है.

Blood Donation 1
कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने भी ब्लड डोनेशन कैंप में ब्लड डोनेट किया. तस्वीर 15 दिसंबर 2020 की है. (क्रेडिट- PTI)

अब वो बातें, जो लगती तो मिथ हैं, लेकिन जिनमें लॉजिक भी है.

# क्या लड़कियों को पीरियड्स में ब्लड डोनेट नहीं करना चाहिए?

डॉक्टर किरण कहती हैं कि ये मिथ नहीं है. सच है. पीरियड्स के दौरान लड़कियों का ब्लड नहीं लिया जाता है. डॉक्टर ने कहा,

“ये मिथ नहीं है. जब लड़कियों के पीरियड्स चलते हैं, तब हम उनका ब्लड लेते ही नहीं हैं. इसलिए नहीं लेते हैं कि अगर पीरियड हो रहा है, तो हम सब जानते हैं कि ब्लड जा रहा है शरीर से. खैर, ये ब्लड लॉस इतना भी नहीं होता कि आपको अनिमिक कर दे, लेकिन क्योंकि ये हर महीने होता है, तो ऐसे में सही मात्रा में शरीर को आयरन, प्रोटीन सब मिलना ज़रूरी है. और अगर ये सब नहीं मिलते, तो लॉन्ग रन में औरतें अनिमिक हो जाती हैं.”

# प्रेग्नेंसी और स्तनपान के दौरान क्या ब्लड दिया जा सकता है?

जवाब है नहीं. न तो प्रेगनेंट औरतों को ब्लड डोनेट करना चाहिए और न ही स्तनपान करा रही औरत को. डॉक्टर किरण कहती हैं कि ये सारी बातें मेडिकल क्राइटेरिया में आती हैं, ये मिथ नहीं हैं.

# O+ ब्लड ग्रुप क्या यूनिवर्सल डोनर है?

इसका जवाब एक लाइन में दिया ही नहीं जा सकता. ‘द रेड क्रॉस ब्लड’ की वेबसाइट के मुताबिक, रेड ब्लड सेल्स में कुछ एंटीजन्स मौजूद होते हैं. एंटीजन्स माने ऐसे सब्स्टेंस जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को ट्रिगर करें. रेड ब्लड सेल्स में दो तरह के एंटिजन्स होते हैं- A और B. साथ ही Rh फैक्टर करके एक प्रोटीन भी होता है. वो जिनके शरीर में होता है उनका ब्लड ग्रुप पॉज़िटिव होगा, और जिनके में नहीं होता है, उनका निगेटिव होगा. यानी A और B एंटीजन्स और Rh फैक्टर की मौजूदगी और गैर-मौजूदगी से ही किसी व्यक्ति का ब्लड ग्रुप डिसाइड होता है-

– अगर रेड ब्लड सेल्स में केवल एंटीजन A मौजूद हो, और Rh फैक्टर भी मौजूद रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा A+. और अगर Rh फैक्टर मौजूद न रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा A-.

– अगर एंटीजन B और Rh फैक्टर मौजूद रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा B+. और अगर Rh फैक्टर मौजूद न रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा B-.

– अगर A और B दोनों की मौजूद रहें और Rh फैक्टर भी रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा AB+. और अगर Rh फैक्टर न रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा AB-.

– अगर रेड ब्लड सेल्स में कोई भी एंटीजन न रहे और Rh फैक्टर मौजूद रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा O+. और अगर Rh फैक्टर भी न रहे, तो ब्लड ग्रुप होगा O-.

डॉक्टर किरण बताती हैं कि वैसे तो जिसका जो ब्लड ग्रुप होता है, उसे ज़रूरत पड़ने पर उसी ब्लड ग्रुप का खून चढ़ाया जाता है, लेकिन कई बार इमरजेंसी में, अगर उसी सेम ब्लड ग्रुप का खून न मिल सके, तो O+ को प्राथमिकता देते हैं. लेकिन O+ केवल A+, B+ और AB+ को चढ़ाया जा सकता है. निगेटिव ब्लड ग्रुप वालों को नहीं. क्योंकि O+ में भले ही A या B कोई एंटीजन न रहे, लेकिन Rh फैक्टर तो मौजूद रहता ही है.

‘द रेड क्रॉस ब्लड’ की वेबसाइट के मुताबिक, यूनिवर्सल डोनर O- ब्लड ग्रुप को माना गया है. क्योंकि इसमें न तो कोई एंटीजन होता है और न ही Rh फैक्टर होता है. इसलिए ये किसी भी दूसरे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्ति को इमरजेंसी में, तब जब उसके ब्लड ग्रुप का खून न मिल सके, तब चढ़ाया जा सकता है.

# निगेटिव-पॉज़िटिव ब्लड ग्रुप वालों की शादी के बाद क्या बच्चे पैदा करने में दिक्कत होती है?

डॉक्टर किरण ने बताया कि अगर किसी कपल में महिला Rh निगेटिव है और पति Rh पॉज़िटिव है, तो उनके पहले बच्चे के वक्त तो कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन दूसरी प्रेग्नेंसी के दौरान बच्चे को खतरा हो सकता है, तो इसका भी तोड़ है. डॉक्टर्स एंटी-डी देकर बच्चे की रक्षा करते हैं. वहीं अगर पत्नी Rh पॉज़िटिव है और पति Rh निगेटिव है, तो किसी भी प्रेग्नेंसी में दिक्कत नहीं आती.

अगर तथ्यों को छोड़ दें, तो ऊपर बताए गए इन्हीं कुछ मिथकों की वजह से भारत में ज़रूरत के हिसाब से ब्लड डोनर्स की संख्या कम है. हर वो व्यक्ति, जो 18 से 60 के बीच का है, 45 किलो से ज्यादा वज़न है, हिमोग्लोबीन 12.5 g% से ज्यादा है, किसी बड़ी बीमारी से नहीं जूझ रहा, वो ब्लड डोनेट कर सकता है. वैसे भी जब आप किी डोनेशन कैंप में जाएंगे, तो वहां पहले एक्सपर्ट्स आपका वज़न, आपका हिमोग्लोबीन, बीपी वगैरह जांचते हैं, और अगर आपको फिट पाते हैं, तभी ब्लड लिया जाता है.

‘इंडिया स्पेंड’ वेबसाइट की जून 2018 की एक रिपोर्ट है, जिसके मुताबिक, भारत में 2016-17 में 60 टैंकर खून की कमी हुई थी. ये कमी दूर तभी हो सकती है, जब ज्यादा से ज्यादा हेल्दी लोग आगे आकर ब्लड डोनेट करें. और ज़रूरतमंदों की मदद करें. आपके आगे आने से लाखों लोगों की ज़िंदगियां बच सकती हैं. इसलिए कहा जाता है-

रक्तदान महादान है.


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