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क्या औरत के गर्भ पर सरकार और कानून का अधिकार होना चाहिए?

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सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका फ़ाइल हुई, साल 2009 में. फ़ाइल करने वाले का नाम डॉक्टर निखिल दातार. इस याचिका में ये मांग की गई कि महिलाओं को एबॉर्शन कराने की छूट 26 हफ़्तों तक दी जानी चाहिए. इस वक़्त ये समय सीमा कुछ शर्तों के साथ  20 हफ़्तों की है.

हाल ही में इसपर स्वास्थ्य मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को एफिडेविट दिया. उसमें कहा कि महिलाओं का प्रेग्नेंसी ख़त्म करने का परम अधिकार नहीं है. मिनिस्ट्री ने एक और याचिका के जवाब में कहा,

‘नागरिकों के अभिभावक के तौर पर ये राज्य नैतिकता और कर्तव्य से प्रतिबद्ध है. और गर्भ में मौजूद बच्चे (जिसकी जीवन योग्यता बढ़ चुकी है) के जीवन के संरक्षण का हक़ भी रखता है.’

क्या है MTP एक्ट?

1971 में बिल पेश किया गया था. 1972 में पास होकर लागू हुआ. पूरा नाम है : Medical Termination of Pregnancy Act 1971. ये एक्ट बताता है कि किन परिस्थितियों में महिला अपना एबॉर्शन करा सकती है. किनसे करा सकती है, कहां करा सकती है. लेकिन इन सभी नियमों को समझने से पहले ये बता देना ज़रूरी है कि एबॉर्शन और मिसकैरिज में अंतर होता है. एबॉर्शन यानी मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी. यानी दवाइयों या मेडिकल सहायता से गर्भपात कराना. वहीं मिसकैरिज का मतलब होता है प्राकृतिक कारणों की वजह से गर्भपात होना, या बिना किसी मेडिकल छेड़छाड़ के बच्चे का गिर जाना.

(सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई)
गर्भपात को लेकर सरकार नया संशोधन लाने वाली है, ऐसा रिपोर्ट्स बता रही हैं. (सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई)

अब नियम क्या हैं MTP एक्ट के?

# कौन करा सकता है?

1. प्रेगनेंट महिलाएं जिनकी प्रेग्नेंसी 12 हफ़्तों से कम की हो. तब तक किसी एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर की सलाह पर वो एबॉर्शन करा सकती हैं.

2. ये समय सीमा 20 हफ़्तों तक बढ़ाई जा सकती है, अगर दो मेडिकल प्रैक्टिशनर हामी भरें एबॉर्शन की.

# किस आधार पर कराया जा सकता है एबॉर्शन?

1. या तो मां की जान को खतरा हो. या फिर बच्चे के पैदा होने पर उसके विकलांग या मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का खतरा हो.

2. बच्चे के जन्म लेने से पहले ही कोई ऐसा विकार पता चले जिसका कोई इलाज नहीं है.

3. या फिर ऐसी हालत में जब इस प्रेग्नेंसी से या बच्चे के पैदा होने से महिला को गहरी मानसिक पीड़ा हो.

4. जैसे रेप के मामले या फिर शादी-शुदा महिलाओं के कॉन्ट्रासेप्टिव (गर्भ निरोधक) फेल हो जाने के मामले.

# कहां और किससे कराया जा सकता है?

1. सरकार द्वारा रजिस्टर किए हुए मेडिकल प्रैक्टिशनर ही एबॉर्शन की अनुमति दे सकते हैं.

2. सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त क्लिनिक में ही इसे कराया जाना चाहिए. चाहे वो सरकारी हो या प्राइवेट. लेकिन उसका MTP सेंटर के रूप में रजिस्टर्ड होना आवश्यक है.

3. यदि आस- पास ऐसी कोई सुविधा नहीं, तो तब तक के लिए ऐसे सेंटर में ही एबॉर्शन करवाना चाहिए जिसे सरकार से तदर्थ अनुमति दी गई हो.

4. चाहे पिल्स लेकर किया गया एबॉर्शन हो या एनेस्थेसिया देकर सर्जिकली किया गया एबॉर्शन हो, ये डॉक्टर की गाइडेंस में ही होगा. उसके बिना एबॉर्शन नहीं करवाया जा सकता.

(सांकेतिक तस्वीर-पिक्साबे)
हाल में ही अमेरिका के कई राज्यों में एबॉर्शन पर बैन लगाने के कानून पेश किए गए. इस  को लेकर जगह जगह विरोध प्रदर्शन हुए.(सांकेतिक तस्वीर-पिक्साबे)

# क्या महिला की मर्जी के बिना एबॉर्शन किया जा सकता है?

1. नहीं. अठारह साल से ऊपर की किसी भी महिला, जो मानसिक रूप से स्वस्थ है, की अनुमति लिए बिना एबॉर्शन नहीं किया जा सकता.

2. यदि महिला अठारह वर्ष से कम उम्र की है, तो उसके अभिभावक की सहमति आवश्यक है.

3. यदि महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो उसके अभिभावक की सहमति आवश्यक है.

# मांग क्या हो रही है?

1. मांग ये है कि एबॉर्शन कराने की समयावधि बढ़ाकर 26 हफ़्तों की कर दी जाए.

2. इसके पीछे तर्क ये दिया जा रहा है कि कई बीमारियां ऐसी हैं जो भ्रूण के विकास के क्रम में काफी बाद में पता चलती हैं.

3. ऐसे में अगर एबॉर्शन की अनुमति ना हुई तो मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता है.

4. मांग ये भी है कि कई बार परिस्थितियां ऐसी होती हैं जिनमें शुरुआत में एबॉर्शन करवाने की हालत  में महिला नहीं होती. ऐसे में उसे बाद में भी एबॉर्शन करवाने का हक़ होना चाहिए.

इन नियमों के खिलाफ जाकर गर्भपात करने वाले को दो साल से लेकर सात साल तक की सज़ा का प्रावधान है.

इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल एथिक्स ने 2015 में एक स्टडी की. उसके अनुसार 10 से 13 फीसद मांओं की मृत्यु असुरक्षित गर्भपातों की वजह से होती है. इस बिल में बदलाव की मांग करने वालों का ये कहना है कि यदि समय सीमा नहीं बढ़ाई गई, तो महिलाओं को असुरक्षित उपायों का सहारा लेना पड़ेगा जोकि उनकी जान के लिए ख़तरनाक हो सकते हैं.

आज भी कई शहरों और गांवों में मेडिकल सुविधाएं इतनी बेहतर नहीं हुई हैं कि समय पर डॉक्टर उपलब्ध हो सकें. ऐसे में उन महिलाओं का क्या क्या जो सेफ एबॉर्शन चाहती ह=तो हैं पर उनके पास साधन ही नहीं है? सरकार के आने वाले संशोधन में इस मुद्दे को ध्यान में रखा जाएगा. (सांकेतिक तस्वीर)
आज भी कई शहरों और गांवों में मेडिकल सुविधाएं इतनी बेहतर नहीं हुई हैं कि समय पर डॉक्टर उपलब्ध हो सकें. ऐसे में उन महिलाओं का क्या क्या जो सेफ एबॉर्शन चाहती तो हैं पर उनके पास साधन ही नहीं है? सरकार के आने वाले संशोधन में इस मुद्दे को ध्यान में रखा जाएगा. (सांकेतिक तस्वीर)

इस एक्ट में बदलाव की बात चल रही है. कई लोगों का ये भी कहना है कि इसमें कॉन्ट्रासेप्टिव फेल होने पर गर्भपात कराने का आधार सिर्फ शादीशुदा महिलाओं के लिए दिया गया है. गैर शादीशुदा महिलाओं के लिए नहीं. क्योंकि उसका टैबू अभी भी है समाज में. यही नहीं, किसी मेडिकल प्रैक्टिशनर  की अनुमति के बिना एबॉर्शन न करवा पाना एक तरह से महिलाओं के अपने शरीर पर हक़ के दायरे को कम करता है. यही नहीं, अनमैरिड लड़कियों की प्रेग्नेंसी के मामले में एबॉर्शन पिल्स ही देने के लिए डॉक्टर मोटी फीस भी वसूलते हैं, द मिंट में छपी रिपोर्ट के अनुसार.

सरकार MTP एक्ट में एमेंडमेंट यानी संशोधन करने की तैयारी में है. जानकारी के अनुसार ये बिल अभी विधि मंत्रालय (लॉ मिनिस्ट्री) के पास विचाराधीन है. उसके बाद बदलावों के साथ ये पेश किया जाएगा. स्वास्थ्य मंत्रालय ने डॉक्टर निखिल दातार की याचिका को प्रीमैच्योर यानी असामयिक बताया है. ये भी कहा गया है कि आने वाला संशोधन इन सभी मुद्दों को ध्यान में रखकर ही बनाया गया है जो वक्त आने पर सामने रखा जाएगा.


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