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MP सरकार ने सरकारी कागज़ में 'सैलून' को 'सेक्स' लिखा, विरोध हुआ तो लजा गए

हमारे देश में इस वक्त धीमी गति से ही सही, लेकिन कोरोना की वैक्सीन लग ज़रूर रही है. इसी सिलसिले में मध्य प्रदेश की सरकार ने एक लिस्ट निकाली, वैक्सीनेशन की प्राथमिकता वाली लिस्ट. इसमें कुछ प्रोफेशन्स को शामिल किया गया, और कहा गया कि इनसे जुड़े लोगों को जल्द से जल्द, प्राथमिकता में लेते हुए कोरोना की वैक्सीन लगाई जाए. जैसे ही ये लिस्ट सामने आई, सोशल मीडिया पर हंगामा हो गया. खासतौर पर मध्य प्रदेश कांग्रेस की टीम जमकर एक्टिव हो गई. क्यों? क्योंकि इस लिस्ट में सेक्स वर्कर्स का भी नाम शामिल था. पूरा मामला आपको डिटेल में बताएंगे आज की बड़ी खबर में. और ये भी बताएंगे कि कैसे खुद को अति प्रोग्रेसिव बताने वाले राजनीतिक दल, असल में दकियानूसी सोच को ही बढ़ावा दे रहे हैं.

मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से ये लिस्ट जारी हुई थी 30 मई 2021 के दिन. राज्य के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की तरफ से इसे निकाला गया था. सभी ज़िलों के कलेक्टर्स को संबोधित किया गया था. लेटर में लिखा था-

“महामारी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए नवीन कार्ययोजना के तहत, उच्च जोखिम समूहों को सूचीबद्ध कर, प्राथमिकता के आधार पर, कोविड-19 टीकाकरण किया जाना बहुत ज़रूरी है. इसलिए निर्देश दिया जाता है कि 100 प्रतिशत ऑन साइट रजिस्ट्रेशन आधारित सत्र आयोजित कर, उच्च जोखिम समूहों का टीकाकरण कराया जाना सुनिश्चित करें.”

बस इसी उच्च जोखिम समूहों में व्यापारी, सिलेंडर सप्लाई करने वाले, पेट्रोल पम्प स्टाफ, घरों में काम करने वाली महिलाएं, सब्ज़ी-फल की दुकान लगाने वाले लोग, मज़दूर, मॉल-होटल में काम करने वाले लोगों को शामिल किया गया था. और आखिरी नाम लिखा था- सेक्स वर्कर. इसी लेटर को मध्य प्रदेश कांग्रेस ने ट्वीट किया. सेक्स वर्कर्स के टीकाकरण को प्राथमिकता देने वाले फैसले पर सवाल उठाए. और बेहद ही ओछी बात लिखी.

इसके बाद हेल्थ डिपार्टमेंट की तरफ से नया आदेश जारी किया और सेक्स वर्कर की जगह सैलून वर्कर लिखा गया. ‘आज तक’ से जुड़े रवीश पाल सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग ने माना कि ये टाइपिंग मिस्टेक थी, और गलती से सैलून वर्कर की जगह सेक्स वर्कर लिखाया था.

Sex Workers Corona
बदला हुआ निर्देश. (फोटो- रवीश पाल सिंह)

बात हुई, बवाल मचा, बदलाव हुआ और फिर सब शांत हो गए. नहीं. यहां शांत होना या रुकना सही नहीं होगा. इस वाकये ने हमारे दिमाग में कई सारे सवाल खड़े कर दिए हैं. पहला- सैलून को गलती से सेक्स टाइप करना, बहुत खटक रहा है. दूसरा- अगर आपने वाकई सेक्स वर्कर को शामिल किया था, तो ये अच्छा कदम था. इसमें कुछ भी खराबी नहीं थी. अगर वो टाइपो न होकर वाकई आपका इंटेंशन होता, तो हमें खुशी होती. हम बिना किसी संदेह के साथ ये कह सकते हैं कि सेक्स वर्कर्स हाई रिस्क कैटेगिरी में आते हैं. उनके पास रोज़ाना सैंकड़ों लोग जाते हैं, अपनी ज़रूरत पूरी करने, ऐसे में सेक्स वर्कर्स को संक्रमित होने का खतरा ज्यादा होता है. क्योंकि कोई ये बता नहीं सकता है कि उनके कॉन्टैक्ट में आने वाला व्यक्ति संक्रमित है या नहीं. तीसरा- आपने रिवाइज़्ड लेटर में सेक्स वर्कर्स को हटा दिया, सवाल उठता है ऐसा क्यों किया? क्या कांग्रेस के विरोध के चलते आप ऐसा करने पर मजबूर हुए? या वाकई आपसे टाइपो हुआ था? या मोरल प्रेशर ने आपसे ये बदलाव करवाया? ऐसा भी तो हो सकता था, कि आप सेक्स वर्कर्स को हटाए बिना ही सैलून वर्कर्स को शामिल कर लेते. इसमें कोई खराबी नहीं थी.

कांग्रेस ने दिखाई घटिया मानसिकता!

अब आते हैं कांग्रेस पर. इन्होंने जो ट्वीट किया वो तो कतई ओछा ट्वीट था. क्यों? क्या सेक्स वर्कर्स इंसान नहीं हैं? कांग्रेस पार्टी समय-समय पर ये बताने से बिल्कुल नहीं चूकती कि वो कितनी प्रोग्रेसिव है. उसकी सोच बाकी पार्टियों से अलग है और आगे है. विरोधी पार्टी, खासतौर पर BJP को भी बार-बार कांग्रेस ये अहसास करवाने की कोशिश करती है, कि उनकी यानी BJP की सोच या एक्शन बहुत रिग्रेसिव हैं या पिछड़े ज़माने के हैं. 9 मार्च 2018 के दिन इंडियन एक्सप्रेस वेबसाइट पर एक खबर छपि थी, जिसमें सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार के कामकाज पर उंगली उठाते हुए रिग्रेसिव विज़न होने की बात कही थी. इंटोलरेंस के मुद्दे पर उन्होंने कहा था-

“हमारी आजादी पर हमला हो रहा है. आज हम एक रिग्रेसिव विज़न को अपना रहे हैं.”

कांग्रेस वही पार्टी है, जिसके बड़े नेता ने खुद सेक्स वर्कर्स के हक में बड़ी-बड़ी बातें कही थीं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने दिल्ली की GB रोड जाकर सेक्स वर्कर्स से मुलाकात की थी. तब कहा था-

“पिछले कुछ बरसों में मैंने सेक्स वर्कर्स के लिए कई सारी स्कीम्स लॉन्च की हैं. मैंने कोशिश की है कि सेक्स वर्कर्स के बच्चे स्कूल जाएं और उन्हें हेल्थ समेत बाकी सारी सुविधाएं भी मिलें. इन्हें सामान्य तौर पर बाकी राजनीतिक दल नज़रअंदाज़ कर देते हैं.”

इस दौरान कपिल सिब्बल ने BJP के तब के उम्मीदवार हर्ष वर्धन और आप उम्मीदवार आशुतोष पर सवाल उठाए थे, कहा था कि वो चांदनी चौक को बिलॉन्ग नहीं करते. दरअसल, तीनों ही नेता अपनी-अपनी पार्टी की तरफ से चांदनी चौक सीट से खड़े हुए थे.

क्यों मचा इतना बवाल?

जिस पार्टी के नेता दावा करते हैं कि सेक्स वर्कर्स के लिए बहुत सारी स्कीम्स लॉन्च की है, ये कहते हैं कि कोई भी सेक्स वर्कर्स की तरफ ध्यान नहीं देता, वही पार्टी अब मध्य प्रदेश में सरकार का विरोध करने के चक्कर में नीचे गिरते नज़र आ रही है. अपने ट्वीट में एमपी कांग्रेस ने लिखा है कि ‘शिवराज जी, वरीयता तय करिये पर लज्जा बनी रहे’. हमारा सवाल कांग्रेस से ये है कि सेक्स वर्कर्स को वैक्सिनेशन में वरीयता देने में किस बात की शर्म? वो भी तो भारत के नागरिक हैं. उनके पास भी हर किसी की तरह आधार कार्ड है, वोटर आईडी कार्ड है. सरकार बनाने में उनका भी हाथ है, वो भी वोट देते हैं. भले ही सेक्स वर्क को भारत में अभी तक वैधता नहीं मिली है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि इस काम में शामिल लोगों को आप नज़रअंदाज़ कर दें. चुनाव के वक्त आप खुले दिल से उनके पास जाते हैं, वोट मांगने, तो वैक्सीनेशन पर प्राथमिकता मिलने के चलते इतना विरोध क्यों? HIV की रोकथाम के लिए जब मुहीम छिड़ी थी, तब लोग जागरूकता के लिए सेक्स वर्कर्स के पास पहुंचे थे न, तो फिर कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए उन्हें क्यों प्राथमिक कैटेगिरी में शामिल न किया जाए.

इस मुद्दे पर हमने बात की AINSW यानी ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स के नेशनल कॉर्डिनेटर अमित कुमार से. मध्य प्रदेश में जो हुआ उस पर उन्होंने कहा-

“सबसे पहली बात तो ये कि आज के दौर में ये दुर्भाग्यपूर्ण लगता है. इसलिए क्योंकि जहां पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से देश में HIV प्रोग्राम चल रहा है, और उसको भारत सरकार चला रही है, कोई पार्टी नहीं चला रही, जब उस कार्यक्रम के तहत HIV की सेवाएं हाई रिस्क ग्रुप तक पहुंचाने की बात होती है, तो उसमें कहीं न कहीं सेक्स वर्कर भी शामिल हैं. HIV का ग्राफ गिरा है, तो उसमें भी सेक्स वर्कर शामिल रही हैं. ऐसे में कोरोना वैक्सीन के मामले में हाई रिस्क ग्रुप में सेक्स वर्कर को पहले रखना, फिर बदलकर सैलून वर्कर कर देना, काफी दुर्भाग्यपूर्ण है. सैलून वर्कर को भी मिलना चाहिए, ज़रूर मिलना चाहिए, लेकिन सेक्स वर्कर्स को भी ज़रूरी है. सेक्स वर्कर्स की वलनरेबिलिटी काफी ज्यादा है, क्योंकि उनका काम उस तरह का है कि कोविड में उन्हें ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड़ता है. तो पहली प्राथमिकता के आधार पर उनका वैक्सिनेशन करना बहुत ज़रूरी है.”

Amit

सेक्स वर्क का कानूनी स्टेटस क्या है?

इन सबके बाद सवाल उठता है कि हमारे देश में सेक्स वर्क का कानूनी स्टेटस क्या है. क्या ये लीगल है या नहीं. जवाब जानने के लिए हमने कई सारी वेबसाइट्स खंगाली और वकील तृप्ती टंडन से भी हमने बात की. हमें ये जानकारी मिली है कि सेक्स वर्क को हमारे देश में कानूनी मान्यता मिली भी है और नहीं भी मिली है. बीच का मामला है. कैसे? इसके जवाब में तृप्ती कहती हैं-

“किसी के साथ सेक्स करना और बदले में पैसे लेना, ये अपने आप में गैर-कानूनी नहीं है. लेकिन इसके लिए कंडिशन ये है कि सेक्स वर्कर अडल्ट होनी चाहिए और सेक्स उसकी सहमति से होना चाहिए. अगर असहमति से सेक्स हुआ, तो वो रेप कहलाएगा. माने 18 से ऊपर की उम्र हो और सहमति से अगर पैसे के बदले सेक्स हो, तो ये गैर-कानूनी नहीं है. लेकिन ये किस जगह पर हो रहा है, इससे फर्क पड़ता है. उस हिसाब से कानून बने हुए हैं. एक कानून है The Immoral Traffic (Prevention) Act, जिसे ITPA कहते हैं. इस एक्ट का सेक्शन 7 कहता है कि किसी भी स्कूल, अस्पताल या पूजा घर जैसे पब्लिक प्लेस के 200 मीटर के अंदर अगर कोई ऐसी जगह हो, जहां सेक्स वर्क होता हो, तो ये गैर-कानूनी होगा. ब्रॉथल एरिया भी गैर-कानूनी है. ब्रॉथल माने जहां दो से ज्यादा सेक्स वर्कर सेक्स वर्क कर रही हैं या उनसे कोई करवा रहा है, तो ये भी गैर-कानूनी कहलाएगा. ब्रॉथल को बंद किया जा सकता है. ITPA का सेक्शन 3 इसकी बात करता है. इसलिए किस जगह पर सेक्स वर्क हो रहा है, ये काफी बड़ा फैक्टर है.”

सेक्स वर्क, भले ही कानूनी मान्यता प्राप्त प्रोफेशन नहीं है, लेकिन इतिहास के नज़रिए से ये हमारे देश में काफी पुराना प्रोफेशन रहा है. इतना पुराना कि इसकी शुरुआत का एग्जेक्ट वक्त बता पाना मुश्किल है. इस काम को लीगल करने के लिए समय-समय पर बात होती रही है. साल 2009 की बात है. बचपन बचाओ आंदोलन ने एक PIL डाली थी सुप्रीम कोर्ट में, चाइल्ड ट्रैफिकिंग के खिलाफ. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार के सॉलिसिटर जनरल से कहा था-

“जब आप कहते हैं कि ये दुनिया का सबसे पुराना प्रोफेशन है और कानून के ज़रिए आप इसे कम नहीं कर पा रहे हैं, तो आप इसे लीगल क्यों नहीं कर देते? ऐसे में फिर आप ट्रैफिकिंग को मॉनिटर कर पाएंगे, रिहेबिलिटेशन की तरफ ध्यान दे पाएंगे और जो भी इस प्रोफेशन में शामिल होगा उसे मेडिकल सुविधा मुहैया करवा पाएंगे. कई मामलों में ये ट्रेड काफी सफोस्टिकेटेड तरीके से होता है, तो इसे लीगल क्यों नहीं कर दिया जाता?”

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद एक्टिविस्ट का धड़ा दो हिस्सों में बंट गया था. एक वो जो सेक्स वर्क को लीगल करने के पक्ष में थे, दूसरे वो जो विरोध में. विरोध करने वालों का कहना था कि ऐसा करने से पिम्प्स यानी दलाल और ब्रॉथल्स को पावर मिल जाएगी कि वो इंसान की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा दे दें. बच्चों और औरतों की ट्रैफिकिंग बढ़ेगी, सेक्स वर्कर्स की संख्या भी बढ़ जाएगी. लिगलाइजेशन को सपोर्ट करने वालों का कहना है कि इससे बच्चों को सुरक्षा मिलेगी, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा भी मिलेगी.

इस मुद्दे पर तृप्ती टंडन कहती हैं कि लिगलाइजेशन से ज्यादा ज़रूरी है सेक्स वर्क को डिक्रिमिनलाइज़्ड करना. जब इसे अपराध के दायरे से बाहर कर देंगे, तब अगला कदम इस प्रोफेशन को लीगल करने की तरफ उठाया जाना चाहिए.


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