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एक-तिहाई से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा से पीड़ित, NFHS की नई रिपोर्ट में डराने वाले खुलासे

नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे. NFHS. 5 मई को गुजरात के वडोदरा में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने NFHS-5 का नया डेटा जारी किया. नई रिपोर्ट में सामने आया है कि देश में लगभग एक तिहाई महिलाओं ने शारीरिक या यौन हिंसा का सामना किया है. हालांकि, रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा में कमी आई है. मामलों की संख्या 31.2% से घटकर 29.3% हो गई है.

सर्वे में फिज़िकल, मेंटल और सेक्शुअल वायलेंस को लेकर चिंता में डालने वाले खुलासे हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़, 18 से 49 साल की करीब 30 फीसदी महिलाओं ने 15 साल की उम्र से शारीरिक हिंसा का सामना किया है. वहीं, सर्वे की 6% महिलाएं अपने जीवन में सेक्शुअल वायलेंस का शिकार हुई हैं.

विवाहित महिलाओं के आंकड़े

सेक्शुअल वायलेंस एक बात है. और, उसके आस-पास का सामाजिक स्टिग्मा एक दूसरी बात है. इसीलिए हम सुनते हैं कि कितने मामले विक्टिम की तरफ़ से दर्ज ही नहीं किए जाते. रिपोर्ट में इससे संबंधित भी एक डेटा है, जो बताता है कि शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं में से केवल 14 फीसदी महिलाएं अपने एक्सपीरियंस को सामने लाती हैं, आगे लेकर जाती हैं.

वैवाहिक हिंसा. मतलब पार्टनर द्वारा की गई हिंसा. सर्वे में पाया गया है कि 18 से 49 साल के एज-ग्रुप की 32% विवाहित महिलाएं फिज़िकल, सेक्शुअल या इमोशनल हिंसा से पीड़ित हैं. वैवाहिक हिंसा में सबसे ज़्यादा मामले शारीरिक हिंसा के हैं. सबसे ज़्यादा मामले कर्नाटक से हैं, 48 फीसदी. इसके बाद बिहार, तेलंगाना, मणिपुर और तमिलनाडु. लक्षद्वीप में घरेलू हिंसा के सबसे कम मामले रिपोर्ट किए गए हैं, 2.1 फीसदी.

आप इसे ‘पुरुषों के लिए ऐसा कोई सर्वे नहीं होता’ कह कर ख़ारिज करें, इसके पहले आपको बता देते हैं कि रिपोर्ट में पुरुषों से जुड़ी संख्या भी है. NFHS-5 के नए डेटा के मुताबिक़, देश में 4 फीसदी पुरुष भी घरेलू हिंसा का सामना करते हैं.

घरेलू हिंसा की वजहें क्या हैं?

देखिए अगर ये कह दिया जाए कि पितृसत्ता कारण है, तो बड़ा वेग हो जाएगा. हमारे समाज और हमारी कलेक्टिव कॉन्शियसनेस में जिस तरह से पितृसत्ता काबिज़ है, उसे पहचानना होगा. एक-एक फैक्टर समझना होगा. नहीं तो हम किसी लॉजिकल समाधान तक नहीं पहुंच पाएंगे. जैसे इस रिपोर्ट में बताया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक़, महिलाओं के ख़िलाफ़ शारीरिक हिंसा के 80% से ज़्यादा मामलों में अपराधी पति होता है. लेकिन हमें समझना होगा कि वो कौन से फैक्टर्स हैं, जो ऐसे मामलों को प्रभावित करते हैं. रिपोर्ट में शिक्षा, हेल्थ, क्लास, परिवेश पर अच्छी इन्साइट्स हैं, जो आगे की दिशा तय करने में काम आ सकती हैं.

Domestic Violence
रिपोर्ट के मुताबिक़, शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं में से केवल 14% महिलाएं मामले को लेकर सामने आती हैं (फोटो – थप्पड़ फ़िल्म का एक सीन)

शिक्षा और वेल्थ, दोनों पक्षों पर एक जैसा असर ही डालता है. जिन पतियों ने स्कूली शिक्षा पूरी की हैं, उनमें वैवाहिक हिंसा करने की संभावना आधी (21%) होती है. उनके मुक़ाबले जिनके पास स्कूली शिक्षा नहीं है (43%).

फिर मामला है शराब का. मदिरा, मय, जो कहें. पति का शराब पीना, लिट्रली एक बड़ी वजह है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन महिलाओं के पति अक्सर शराब पीते हैं (कहिए ऐल्कोहॉलिक हैं), उनमें से 70 फीसदी महिलाएं फिज़िकल या सेक्शुअल वायलेंस से पीड़ित हैं.

अब आते हैं शहर बनाम गांव वाले मसले पर. रिपोर्ट में पता चलता है कि ग्रामीण इलाक़ों में महिला पीड़िताओं (32%) की संख्या शहरी इलाक़ों (24%) के मुक़ाबले ज़्यादा है. रिपोर्ट की एक फाइंडिंग में कहा गया है कि एक महिला की शिक्षा और धन हिंसा पर असर डालते हैं. इस स्थिति में बेहतरी ला सकते हैं. स्कूली शिक्षा पूरी न करने वाली महिलाओं की तुलना में शिक्षा पूरी करने वाली महिलाओं की स्थिति बेहतर है. आर्थिक ब्रैकेट का भी रोल है. सबसे कम वेल्थ-ब्रैकेट में महिलाओं के बीच शारीरिक हिंसा के मामले 39% और ज़्यादा वेल्थ-ब्रैकेट में 17% मामले दर्ज किए गए हैं.

एज-ब्रैकेट को भी एक फैक्टर माना गया है. ये पाया गया है कि 18 से 29 साल की महिलाओं की तुलना में 40 से 49 साल की महिलाओं को ज़्यादा हिंसा का सामना करना पड़ता है.

रिपोर्ट में और क्या बातें सामने आईं?

कॉन्ट्रासेप्टिव से संबंधित भी एक फाइंडिंग है. रिपोर्ट के अनुसार, जो महिलाएं इम्प्लॉयड हैं, उनमें मॉर्डर्न कॉन्ट्रासेप्टिव्स के इस्तेमाल की संभावना ज़्यादा है. उनकी तुलना में जो इम्प्लॉयड नहीं है.

आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में कॉन्ट्रासेप्टिव मेथड्स के बारे में लगभग सभी को पता है. हालांकि, परिवार नियोजन के लिए इन तरीक़ों का इस्तेमाल केवल 56.4 फीसदी है.

एक और बात चिंता में डालने वाली है. बाल विवाह के आंकड़े. नए डेटा में सामने आया है कि राष्ट्रीय स्तर पर शादी की क़ानूनी उम्र से कम उम्र में शादी करने की दर में कमी आई है, लेकिन पंजाब, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, त्रिपुरा और असम में इस दर में बढ़ोतरी हुई है. NFHS-5 के मुताबिक़, सर्वे में शामिल 23.3 फीसदी महिलाओं की शादी 18 साल से पहले ही हो गई. पुरुषों में कम उम्र में शादी का आंकड़ा 17.7 फीसदी दर्ज किया गया है.


NFHS की रिपोर्ट में महिलाओं पर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं

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