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मोहन भागवत ने सही कहा, पढ़े-लिखे लोग ज्यादा तलाक लेते हैं, पर इसमें बुराई क्या है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत अपने एक बयान की वजह से विवाद में हैं. उन्होंने कहा कि पढ़े-लिखे अमीर परिवारों में तलाक के मामले ज़्यादा होते हैं. इसके पीछे वजह ये है कि पढ़ाई और पैसे के साथ घमंड भी आता है. इसकी वजह से परिवार टूट जाते हैं.

रविवार 16 फरवरी को अहमदाबाद में हुई एक मीटिंग में RSS के कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों को संबोधित कर रहे थे मोहन भागवत. इसी दौरान उन्होंने तलाक पर भी बात की. मोहन भागवत ने कहा,

‘आजकल तलाक के मामले काफी बढ़ गए हैं. लोग छोटी-छोटी बातों पर लड़ लेते हैं. घमंड की वजह से परिवार टूट रहे हैं. समाज भी बर्बाद हो रहा है क्योंकि वो भी एक परिवार की ही तरह है. बिना परिवार के समाज नहीं होता. महिलाओं को जागरूक होना चाहिए, क्योंकि वो समाज का आधा हिस्सा हैं. समाज की जो हालत आज है, वो पिछले 2000 सालों में हो रही घटनाओं की वजह से हुई है. महिलाएं घर के भीतर बंद कर दी गई थीं. ये सब 2,000 साल पहले नहीं होता था. वो हमारे देश का स्वर्णिम काल था.’

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डिवोर्स को आज भी समाज में एक टैबू माना जाता है. पहले के मुकाबले अब लोग इसे लेकर थोड़ा सामान्य हुए हैं, लेकिन वो भी अधिकतर बड़े शहरों में देखने को मिलता है. (सांकेतिक तस्वीर: Pixabay)

तलाक तलाक तलाक!

इंडिया टुडे में छपी 2018 की एक रिपोर्ट बताती है कि इंडिया में हजार शादियों में से 13 शादियों में डिवोर्स होता है. यानी लगभग एक फीसद जोड़ियां ही तलाक लेती हैं. स्पेन, फ्रांस, और रशिया जैसे देशों में ये 50 से 60 फीसद तक है. यानी 1000 शादी-शुदा जोड़ों में से 500 से 600 जोड़े तलाक लेते हैं वहां. भारत में तलाक की दर दुनिया में सबसे कम है.

हमने बात की सुप्रीम कोर्ट वकील विजया लक्ष्मी से. उन्होंने बताया:

‘हर डिवोर्स केस के फैक्ट अलग होते हैं. इनके पीछे जनरली बड़े इशूज नहीं होते, छोटे इशूज ही होते हैं. एडजस्टमेंट की दिक्कत होती है. पहले पेरेंट्स वगैरह मामले को सॉर्ट करवा देते थे. लेकिन आज के सिनैरियो में दोनों के परिवार वाले भी कॉम्प्रोमाइज नहीं करना चाहते हैं. डिवोर्स के पीछे समय न मिलना, कम्युनिकेशन की कमी जैसे रीजन होते हैं लेकिन ये बात जनरलाइज नहीं की जा सकती. जो डिपेंडेंट महिलाएं होती हैं, या फिर उनके पेरेंट्स के पास पैसे नहीं होते, तो वो लोग सेटलमेंट के लिए तैयार हो जाते हैं. अगर लड़की इंडिपेंडेंट होती है, वर्किंग है, उसके पेरेंट्स सपोर्टिव हैं, तो वो झुकने को तैयार नहीं होते.

कई बार डिवोर्स केसेज इसलिए भी डाले जाते हैं लड़कों की साइड से, ताकि लड़की पर प्रेशर क्रियेट किया जा सके. ये स्टेटमेंट पब्लिक के लिए जनरल तरीके से नहीं कहा जा सकता. मजूरी करने वाली, कम पढ़ी लिखी औरतें मार खाकर भी घर पर ही रहती हैं. डिवोर्स के बारे में या तो सोचती भी नहीं या झिझकती हैं.’

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कम पढ़ी-लिखी, या पति पर निर्भर रहने वाली महिलाओं के लिए डिवोर्स लेना कठिन होता है, क्योंकि उनके पास कोई ऑप्शन नहीं होता. (सांकेतिक तस्वीर: Pixabay)

श्रेष्ठ जैन एडवोकेट हैं. मैट्रीमोनियल केसेज, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स में स्पेश्लाइज करते हैं. इनसे भी हमने बात की. इन्होंने हमें बताया,

‘डिवोर्स जिनके बीच हो रहा है, वो लोग कॉम्प्रोमाइज करने के लिए तैयार नहीं होते. करियर और सक्सेस के चक्कर में लोग अपना भी ख्याल रखना भूल रहे हैं. पार्टनर और बच्चों को समय देना भी मुश्किल हो जाता है . मैंने एक पचास साल साल के कपल का डिवोर्स होते हुए भी देखा है. जज ने पूछा कि डिवोर्स क्यों ले रहे हो, तो पत्नी ने सिर्फ इतना कहा, ‘मैं इस इंसान से बात नहीं कर सकती’.

सबसे पहली बात, कई महिलाओं को उनके राइट्स ही पता नहीं होते. दूसरी बात अगर वो अपनी दिक्कतें पेरेंट्स से डिस्कस करती हैं, तो उनके पेरेंट्स भी उन पर प्रेशर डाल देते हैं. तीसरी बात, अगर वो हिम्मत करके पुलिस तक भी जाए, तो पुलिस वाले ही उन्हें डरा देते हैं. जब वो देखते हैं कि इन लोगों के पास केस लड़ने की कूवत नहीं है. चौथी बात. अगर कोर्ट तक कोई पहुंचे भी, तो सही वकील मिलना बहुत मुश्किल होता. क्योंकि हर वकील मुफ्त में केस नहीं लड़ता.

मोहन भागवत की कही बात सही है. पढ़े-लिखे और अमीर लोगों के बीच तलाक के मामले ज़्यादा होते हैं. क्योंकि वहां महिलाओं के पास ये ऑप्शन है कि वो अपने दम पर खड़ी हो सकें. अपना ख्याल रख सकें. जो लोग कम पढ़े लिखे, और गरीब घरों से आते हैं, उनके पास इस तरह के ऑप्शन नहीं होते. महिलाएं ये सोच कर चुप रह जाती है, कि मर्द छोड़ देगा तो जायेंगी कहां. कौन पूछेगा. और अगर बाल बच्चे हैं उनके, तो दिक्कत और बढ़ जाती है.

मोहन भागवत का बयान गलत नहीं है. उनसे हमारा मतभेद बुनियादी है. उन्हें लगता है कि तलाक एक बुरी चीज़ है. लेकिन हमारा ये मानना है कि एक बुरी शादी में रहने से कहीं बेहतर तलाकशुदा होना है. चाहे वो पति हो या पत्नी, दोनों के लिए.


वीडियो:शीला दीक्षित के इस कार्यकाल में सबसे ज्यादा महिलाएं पहुंची थीं दिल्ली की विधानसभा में

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