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गोद में नवजात को उठाकर धूप में चलती, थककर मरती ये महिलाएं कौन हैं?

30 साल की एक महिला. महाराष्ट्र के नासिक से मध्य प्रदेश के सतना के लिए निकली थी. पैदल. रास्ते में अस्पताल नहीं मिला आस-पास. सड़क किनारे बच्चे को जन्म दिया. उसके बाद उसे गोद में लेकर 160 किलोमीटर चली.


 

एक मां, जिसके दो बच्चे रायगड के हॉस्टल में पढ़ते थे, वो विरार से उन्हें लेने आई. पैदल. ताकि अपने बच्चों को लेकर घर वापस लौट सके. लौटते हुए चप्पलें घिस गईं. पैरों में छाले पड़ गए


 

17 दिन के बच्चे को गोद में लिए सड़क पर चलती एक मां. क्योंकि उसे मुंबई से विदर्भ पहुंचना है. अपने घर.


 

नौ महीने की प्रेग्नेंट महिला, 100 किलोमीटर चली, ताकि हैदराबाद से ओडिशा पहुंच जाए.


 

21 साल की लड़की, लगातार 230 किलोमीटर चली. उसे रत्नगिरि पहुंचना था. नहीं पहुंच सकी. बीच रास्ते में उसकी मौत हो गई.


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एक औसत आदमी दिन में तकरीबन 10 हजार कदम चल ले, तो उसकी सेहत के लिए अच्छा होता है. कई मोबाइल एप्लीकेशन आते हैं, जो ये मापते हैं कि आज दिन में आप कितने कदम चले. कितनी कैलोरी जलाईं. नक़्शे पर पार्क का मैप उभर कर आ जाता है. कहां-कहां गए आप. फिर उसका स्क्रीनशॉट लेकर आप शेयर करें अपने दोस्तों के साथ.

कौन सा ऐप बनाया जाए कि इन मांओं और बेबस औरतों के कदम माप लिए जाएं? जो दिखा दे कि इतने किलोमीटर बाद थककर ये सड़क किनारे बैठ गई थीं. चिलचिलाती धूप में. आगे सड़क पर पड़ने वाले चौराहे के पास रुकने पर उन्हें पानी नसीब हुआ था.

लॉकडाउन के तीसरे चरण में श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलने के बावजूद मज़दूरों को ठीक से पता नहीं कि इसके लिए कहां रजिस्ट्रेशन कराना होगा. फाइल फोटो: PTI
फाइल फोटो: PTI

ट्रेनें चल तो रही हैं, फिर?

लॉकडाउन में उनके लिए स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं. फिर भी हज़ारों मज़दूर अभी भी सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा कर रहे हैं. पटरियों पर थककर सो रहे हैं. कुछ ट्रेन से कट रहे हैं. कोई सुनने वाला नहीं है. तमाम मज़दूरों के पास ट्रेन से जाने के लिए ज़रूरी डॉक्यूमेंट नहीं हैं. कई मामलों में उन्हें ले जाने वाली ट्रेनों को गृह राज्य ने अप्रूव नहीं किया है. वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन नहीं हो रहा है. हेल्पलाइन नंबर पर मदद नहीं मिल रही है.

हिंदुस्तान टाइम्स  की रिपोर्ट के मुताबिक, मोहम्मद इमरान कहते हैं कि उन्होंने 6 मई, बुधवार को राजस्थान के अजमेर से उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद के लिए चलना शुरू किया. उनकी पत्नी प्रेग्नेंट है. साथ में बच्चे भी हैं. 600 किमी दूर घर है. बस, ट्रेन, कुछ मिली नहीं. वो कहते हैं कि अगर कोई वाहन मिलता है, तो ठीक वरना हम पैदल ही जाएंगे. भूखे मरने से अच्छा है, चलते जाना.

ये मजदूर गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों से लौटे हैं. (Photo: India Today)
(तस्वीर: India Today)

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चलना इसलिए, क्योंकि चलना उम्मीद है उनके लिए. जिनको कहीं पहुंचने की जल्दी होती है, वो रास्ते नहीं देखते. अपने बच्चों को पेट में संभाले, कमर पर टिकाए, कंधों पर उठाए चलती ये औरतें वहां पहुंच जाना चाहती हैं, जहां इनके बच्चों को ख़तरा न हो. अपने पैरों से चप्पल निकाल अपने बुतरुओं को पहना देती हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि वो घर पहुंच जाएंगी. वो घर, जहां उनके पैरों के नीचे की मिट्टी इतनी बेरहम नहीं होगी. वहां उनका बच्चा नंगे पांव खेलेगा. मुंबई से विदर्भ, हैदराबाद से ओडिशा, दिल्ली से बनारस … सड़कें हैं कि ख़त्म होने का नाम नहीं लेतीं. अपने-अपने गांवों, क़स्बों से जब थाली, हाथ वाले पंखे और बक्से लेकर चली थीं ये माएं, तो सड़कें और पटरियां इतनी लंबी नहीं थीं क्या?
धीरे-धीरे आगे बढ़ रही इन औरतों के पांव भारी हैं. रोटी हाथ में हो तो हवा से हल्की, और ना हो तो सारी धरती से भारी होती है. पांव में उन्हीं ग़ायब हो चुकी रोटियों का भार लिए ये माएं कब तक चलती रहेंगी?

17 Days Baby Ndtv
वो 17 दिन का नवजात बच्चा जिसे गोद में लेकर उसकी मां कई किलोमीटर चलती रही. (तस्वीर साभार: NDTV)

इंसान ने बना ली हैं वो घड़ियां, जो मापती हैं क़दम. संगमरमर पे चलते, मशीन पर भागते पैर. इन औरतों के हाथ में बांध कर तो देखो, रो पड़ेंगी वो घड़ियां. पंखा अपनी उम्र भर चलता है, लेकिन पहुंचता कहां है? कहीं नहीं. बस यूं समझ लीजिए कि सरकार बहादुर के सिर पर बंधा पंखा हैं ये मजदूर औरतें. उम्र भर चलें तो भी कहां पहुंचेंगी? कहीं नहीं.

उनके लिए ‘जर्नी’ का कोई अर्थ नहीं. उनके लिए डेस्टिनेशन ही सब कुछ है. वो गंतव्य, जो मरीचिका की तरह लुभाता रहता है. एक कदम और, एक कदम और. बस एक कदम. जब तक इंसान थक कर गिर न पड़े. इन क़दमों को पता है कि जहां का रास्ता पकड़कर ये निकले हैं, वहां तक पहुंचना बहुत मुश्किल है. लेकिन कहीं न कहीं से निकलने के बाद कहीं न कहीं जाना लाज़मी है. ख़ास तौर पर उनके लिए जिनके पास दूसरा कोई उपाय न हो. तो एक उम्मीद के साथ निकल पड़ते हैं ये नंगे पैर. कि शायद रास्ते में कोई जुगाड़ हो जाएगा. कोई पानी पिला जाएगा. कोई खाना दे जाएगा. कोई जगह मिल जाएगी. कोई बस दिख जाएगी. सरकार कोई गाड़ी चलवा देगी.

कुछ तो होगा.

कुछ होता ज़रूर है. इनमें से कुछ की कहानियां हेडलाइनें बन जाती हैं. एक दिन के अख़बार पर. उनका घर उनसे अब भी उतना ही दूर होता है. चप्पल तब भी घिस रही होती है. उनके साथी तब भी मर रहे होते हैं.

इसी बीच दूर कहीं किसी के ऐप पर नोटिफिकेशन आती है

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