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कोरोना ड्यूटी कर रहे डॉक्टर्स ने ऐसी-ऐसी बातें बताईं जो कभी बाहर नहीं आईं

6 मई की सुबह एक खबर मिली. गुजरात के वडोदरा ज़िले में MBBS फाइनल ईयर के एक स्टूडेंट ने कथित तौर पर सुसाइड कर लिया. ‘इंडिया टुडे’ के दिग्विजय पाठक की रिपोर्ट के मुताबिक, स्टूडेंट का नाम सिद्धार्थ भद्रेचा था. फाइनल ईयर की पढ़ाई के साथ-साथ, कोविड वार्ड में भी उसकी ड्यूटी लगा दी गई थी, शुरुआती जांच में माना जा रहा है कि कोविड वार्ड के स्ट्रेस की वजह से उसने सुसाइड जैसा कदम उठाया. पुलिस को एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें सिद्धार्थ ने लिखा है कि तनाव में आकर वो ये कदम उठा रहा है और उसके जाने के बाद इस केस की जांच न हो, साथ ही उसके शरीर के अंगों को दान कर दिया जाए. फिलहाल पुलिस इस मामले की जांच कर रही है और ये पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर क्यों सिद्धार्थ इतना डिप्रेस हो गया कि उसने ऐसा कदम उठाया.

इसी तरह का एक मामला पिछले हफ्ते दिल्ली से भी सामने आया था. यहां साकेत स्थित मैक्स अस्पताल में कोविड वार्ड में पोस्टेड एक डॉक्टर ने कथित तौर पर सुसाइड कर लिया था. इस मामले में भी एक सुसाइड नोट मिला था, जिसमें डॉक्टर ने साफ वजह तो नहीं बताई थी, लेकिन अपने परिवार के लिए इमोशनल मैसेज ज़रूर छोड़ा था. जांच में पता चला था कि डॉक्टर विवेक की आंखों के सामने रोज़ाना सात से आठ कोरोना मरीज़ दम तोड़ रहे थे, जिससे वो काफी परेशान थे. दूसरा पुलिस को ये भी पता चला था कि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी में परेशानी चल रही थी.

अभी जो दो मामले हमने आपको बताए हैं, दोनों ही केस में डॉक्टर्स कोविड वार्ड में ड्यूटी कर रहे थे. हम ये नहीं कह रहे कि कोविड वार्ड में ड्यूटी लगने की वजह से उन्होंने ये कदम उठाया, लेकिन इस संभावना को भी नकार नहीं सकते कि कोरोना की वजह से आ रही निगेटिव खबरें स्ट्रेस के लेवल को काफी ज्यादा बढ़ा रही हैं. पहले से परेशान कोई व्यक्ति अगर लगातार निगेटिव माहौल में रहे, तो इसका उसके दिमाग पर बुरा असर ही पड़ता है. और हमारे डॉक्टर्स लगातार इसी माहौल में रहने के लिए मजबूर हैं. उनके पास कोई ऑप्शन भी नहीं है. कोरोना के मरीज़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसे में डॉक्टर्स को भी लगातार काम करना पड़ रहा है. इस सिचुएशन का उनकी मेंटल हेल्थ पर भी असर पड़ रहा है.

क्या कहते हैं डॉक्टर्स ?

हम कोरोना से मरने वालों के आंकड़ों में लगातार इज़ाफा होते देख रहे हैं. परिवार टूटता देख रहे हैं. ये दर्द हममें से बहुत से लोग महसूस कर रहे हैं. लेकिन इन आंकड़ों का बुरा असर अगर किसी पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है, तो वो हैं डॉक्टर्स. वो रोज़ मरीज़ की सांसें उखड़ते देखते हैं. हर दिन मौतें देख रहे हैं. डेढ़ साल से PPE किट पहनकर वो कोरोना से लड़ रहे हैं, ऐसे में मौत के आंकड़े उन्हें भी फ्रस्ट्रेट कर रहे हैं. इस मुद्दे पर हमने देश के अलग-अलग शहरों में रहने वाले पांच डॉक्टर्स से बात की. इन सबकी ड्यूटी कोरोना वार्ड में या तो अभी लगी हुई है, या फिर ये ड्यूटी कर चुके हैं. हमने उनसे पूछा कि इतनी सारी मौतें देखकर उनके दिमाग पर, उनकी मेंटल हेल्थ पर किस तरह का असर पड़ रहा है, और वो इन सबसे कैसे डील कर रहे हैं? इस सवाल के जवाब में बालाघाट में मेडिकल ऑफिसर की पोस्ट पर तैनात डॉक्टर प्रियांशी शुक्ला कहती हैं-

“पहले मैंने या कभी किसी और डॉक्टर्स ने ऐसा सोचा नहीं था कि हम इतनी मौत देखेंगे. और आज जब हम ये देख रहे हैं, तो कहीं न कहीं हर मौत के साथ एक बची हुई एंग्ज़ायटी रह जाती है. जो हमारे रोज़ाना की ज़िंदगी पर असर डालती है. इससे डील करने में हमारे परिवार वाले बहुत साथ देते हैं. जैसे मैं अपने बारे में कहूं तो मेरे परिवार वाले पूरी कोशिश करते हैं कि मेरे आस-पास पॉज़िटिव माहौल रहे.”

Dr Priyanshi

दरभंगा के प्रसाद पॉलीक्लिनिक के डायरेक्टर डॉक्टर उत्सव राज से भी हमने बात की. उन्होंने कहा,

“हम भी संवेदनशील हैं. जब किसी मरीज़ की मौत होती है तो हमें दुख होता है, अफसोस होता है. लगता है कि हम अपने मरीज़ के लिए कुछ नहीं कर पाए. उसे मृत देखकर हमें भी बहुत तकलीफ होती है. कई बार खाना नहीं खा पाते, कई बार नींद नहीं आती है. ये सोच-सोचकर मन घबराता है कि आगे अगर किसी मरीज़ के साथ भी ऐसा होगा तो हम कैसे उसके सामने अपनी संवेदनशीलता को प्रकट करेंगे. कैसे उन्हें समझाएंगे, कैसे हौसला देंगे.”

Dr Utsav

मुंबई के नानावटी अस्पताल की गायनेकोलॉजिस्ट डॉक्टर सुरुचि देसाई कहती हैं,

“हम भी इंसान हैं. थक चुके हैं हम. कोई पावर बैटरी नहीं है कि रिचार्ज कर लो. ये हमारी ड्यूटी है तो हम करेंगे. कई बार कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहते हैं कि आप तो इस अस्पताल में काम कर रहे हो, वैक्सीन लगवा दो. लोग कॉल लगाने के पहले एक बार भी नहीं सोचते. आप समझ रहे हो इससे हमारे अंदर कितना फ्रस्ट्रेशन आ रहा है.”

Dr Suruchi

इस मुद्दे पर बालाघाट के संवाददाता अतुल वैद्य ने डॉक्टर भजन लिलहरे से भी बात की. जो डिस्ट्रिक्ट अस्पताल में तैनात हैं. वो कहते हैं कि रोज़ सुबह जब वो अस्पताल में एंट्री करते हैं, तो अस्पताल के बाहर मरीज़ों की लंबी लाइन देखते हैं, जिसे देखकर उन्हें बहुत दुख होता है. उन्हें इस बात का दुख होता है कि सबको अस्पतालों में बेड दिलाना इस वक्त मुमकिन नहीं है, और कम संसाधनों में ही उन्हें ज्यादा से ज्यादा मरीज़ों का इलाज करना पड़ रहा है. ऐसे में कई मरीज़ दम तोड़ देते हैं, जो उन्हें अंदर तक बुरा फील करवाता है.

इसी मुद्दे पर डॉक्टर उत्सव राज कहते हैं कि जब वो मरीज़ों की लंबी लाइन देखते हैं, तो उन्हें इस बात का डर महसूस होता है कि हो सकता है कि किसी दिन वो भी इस लाइन का हिस्सा न बन जाएं. वो कहते हैं-

“ये देखकर डर महसूस होता है. इसलिए होता है कि हो सकता है कि इस लाइन में कभी मैं भी खड़ा रहूं. ऐसा नहीं है कि मैं डॉक्टर हूं तो मुझे बिस्तर मिल ही जाएगा, मेरा इलाज हो ही जाएगा. और मैं बच ही जाऊंगा. इस बात की कोई गारंटी नहीं है. ये ज़रूर है कि मुझे वैक्सीन लग चुकी है, तो मुझे गंभीर संक्रमण नहीं होगा. लेकिन मैं भी इस लाइन का हिस्सा बन सकता हूं. फिर भी मन कहता है कि अभी जो काम है वो करते जाओ, जब जो स्थिति आएगी, उसका सामना भी हम उसी तरह से करेंगे.”

सबसे चैलेंजिंग क्या है?

दौर में सबसे ज्यादा चैलेंजिंग काम परिवार वालों को मरीज़ की मौत की जानकारी देना होता है. डॉक्टर प्रियांशी शुक्ला, बालाघाट में मेडिकल ऑफिसर हैं. कोविड ICU में पोस्टेड हैं. उनसे भी आज तक के संवाददाता अतुल वैद्य ने बात की. वो बताती हैं कि उनके लिए ये काम सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है. डॉक्टर प्रियांशी कहती हैं,

“जब हमें मरीज़ के घरवालों को डेथ के बारे में जानकारी देनी होती है, तो ये बहुत चुनौतीपूर्ण होता है. खासतौर पर तब जब आप एक 25 साल के लड़के की मौत के बारे में उसके 60 साल के बाप को बताते हो. ये बहुत मुश्किल होता है. साथ ही उनके जो सवाल होते हैं, वो भी दिल तोड़ने वाले होते हैं. जैसे हाल ही में हमारे एक पेशेंट की डेथ हुई थी, उसका बेटा था कुछ 18-19 साल का. उसने मुझसे पूछा कि पापा के आखिरी शब्द क्या थे, उन्हें ज्यादा तकलीफ तो नहीं हुई. तो ऐसी चीज़ें जब कोई पूछता है तो उसे एक्सप्लेन करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं.”

कई बार जब डॉक्टर्स मरीज़ के मौत की जानकारी उसके परिवार वालों को देते हैं, तो उन्हें गुस्से का सामना भी करना पड़ता है, तो कई बार समझाने पर परिवार वाले समझ भी जाते हैं, लेकिन कभी-कभी गुस्से में मरीज़ के परिवार वाले अस्पतालों में तोड़-फोड़ तक कर देते हैं. अभी दो दिन पहले इसी तरह की एक घटना यूपी के महाराजगंज के महिला अस्पताल में बने कोविड अस्पताल में देखने को मिली. मरीज़ों के परिवार वालों ने ज़ोरदार हंगामा किया था. स्वास्थ्यकर्मियों को अनाप-शनाप बातें कही थीं. इस पर हमने उसी अस्पताल में पोस्टेड डॉक्टर प्रमोद से बात की. उनसे पूछा कि इस तरह की तोड़-फोड़ वाली घटनाओं से, हंगामे से वो कैसे डील करते हैं. उन्होंने कहा-

“हम उस बैकग्राउंड से नहीं आते कि किसी से लड़ सकें. हमारा काम जान बचाना है. और ऐसा नहीं है कि जब हम किसी मरीज़ की मौत के बारे में बताते हैं, तो सभी के परिवार वाले गुस्सा करते हैं, कुछ समझदारी से भी रिस्पॉन्ड करते हैं. कुछ हैं जो गुस्से में इस तरह की हरकतें करते हैं. मैं उनका कन्सर्न भी समझता हूं. लेकिन जनता को अब ये समझना होगा कि ये कंडिशन ही ऐसी है, हम भी हेल्पलेस हैं, जितना हो सकता है हम कर रहे हैं.”

Dr Pramod

डॉक्टर प्रमोद ने हमें बताया कि महाराजगंज की घटना के बाद उनके मन में डर बैठ गया है. डर इस बात का कि मरीज़ के परिवार वाले किस तरह से रिएक्ट करेंगे. ज़ाहिर है हिंसक घटना का सामना करने वाला हर व्यक्ति कहीं न कहीं डर महसूस करता ही है. और डॉक्टर्स भी इंसान ही होते हैं. लेकिन डॉक्टर प्रमोद कहते हैं कि इस डर की वजह से वो अपना फर्ज निभाना नहीं भूल सकते. वो फिर भी काम कर रहे हैं और करते रहेंगे.

इसी मुद्दे पर हमने नानावटी अस्पताल की डॉक्टर सुरुचि देसाई से भी बात की. ये गायनेकोलॉजिस्ट हैं. कोविड पॉज़िटिव प्रेगनेंट औरतों की डिलीवरी करवाती हैं. वो कहती हैं कि डॉक्टर्स लगातार डेढ़ साल से काम कर रहे हैं, ईमानदारी से अपना फर्ज निभा रहे हैं, ऐसे में जब जनता तोड़-फोड़ करती है, या डॉक्टर्स पर उल्टे-सीधे आरोप लगाती है, तो उन्हें बहुत दुख होता है. वो कहती हैं-

“लोगों के अंदर इतनी हिम्मत कैसे आ जाती है कि वो जाकर किसी मेडिकल पर्सन पर हमला कर देते हैं. क्या आप अपनी आर्मी के साथ भी इस तरह की चीज़ें करोगे. क्या आपकी हिम्मत है. इस वक्त हम भी एक आर्मी हैं. कम से कम हमें इज्जत तो दो.” 

मेंटल हेल्थ पर क्या असर?

सभी डॉक्टर्स, जो कोरोना के मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं, या कर चुके हैं, वो सब इस वक्त बेहद परेशान हैं. कुछ डॉक्टर्स लगातार काम करने की वजह से फ्रस्ट्रेट हो चुके हैं, तो कुछ के दिमाग में ये सवाल घूम रहा है कि ये सब कब खत्म होगा. मेंटल हेल्थ पर निगेटिव असर पड़ रहा है. इस मुद्दे पर हमने सायकायट्रिस्ट डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी से भी बात की. वो बताते हैं कि उनके पास कई सारे जूनियर डॉक्टर्स के कॉल आते हैं, जो एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं. ये कि वो अब हेल्पलेस महसूस कर रहे हैं. क्योंकि इसके पहले इतनी ज्यादा तादाद में किसी बीमारी से मौत होते उन्होंने नहीं देखी है. डॉक्टर प्रवीण कहते हैं-

“जिस स्केल में ये महामारी आई है, उस स्केल में हममें से किसी ने भी ऐसा नहीं देखा है. किसी डॉक्टर ने कभी इस लेवल पर मौत नहीं देखी है. 25, 26, 27 साल के लोग दम तोड़ रहे हैं. इन सबका सीधा असर डॉक्टर्स के ऊपर भी पड़ रहा है. पहले हमारी प्रोफेशनल लाइफ और पर्सनल लाइफ अलग होती थी, लेकिन अब ऐसी स्थिति हो गई है कि हर डॉक्टर के घर पर भी कोरोना का मरीज़ है. ऐसे में उनके लिए भी चिंता रहती है. काम के दौरान भी दिमाग में ये चलता है कि अगर ऑक्सीजन लेवल कम हो गया, तो कहां एडमिट कराएंगे, क्योंकि अभी डॉक्टर्स के लिए भी एडमिशन आसान नहीं है. आप चौबीस घंटे इस चीज़ से डील कर रहे हैं. मेरे कई साथी जो ICU में काम कर रहे हैं, वो बताते हैं कि नींद नहीं आ रही है, एंग्ज़ायटी हो रही है.”

Dr Praveen Tripathi

डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी से जब हमने पूछा कि क्या निगेटिव घटनाओं का असर इस कदर हो सकता है कि कोई डॉक्टर सुसाइड तक करने के बारे में सोच ले. इस पर डॉक्टर प्रवीण कहते हैं-

“उन दो सुसाइड के केस में एग्जेक्टली क्या हुआ, उसके बारे में बोलना मुश्किल है. लेकिन इस टाइम पर हम देख रहे हैं कि सब-सिंड्रोमल एंग्ज़ायटी और डिप्रेशन के सिम्पटम डॉक्टर्स में देखने को मिल रहे हैं. सब-सिंड्रोमल यानी बीमारी तक नहीं पहुंचे हैं, लेकिन सिम्पटम आ रहे हैं. जो आस-पास दिख रहा है अभी, वो काफी खराब है. डॉक्टर, नर्स, हेल्थ केयर वर्कर्स सबकी शारीरिक और मानसिक हालत काफी प्रभावित हो रही है. एक और फैक्टर है गिल्ट. आप रोज़ अपने घर से अस्पताल जाते हैं, PPE किट पहनकर मरीज़ को देखते हैं. लेकिन आपको इस बात का भी डर रहता है कि कहीं आप वार्ड से ये वायरस अपने घर न ले जा लें. ये डर 24 घंटे आपके साथ रहता है. तो एंग्ज़ायटी भी है अलग लेवल पर, डर है, गिल्ट भी है,  तो ये सारी चीज़ें डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स को परेशानी में डाल रही हैं. हो सकता है कि कुछ लोगों में ये चीज़ें एक्सट्रीम लेवल पर भी जा सकती हैं.”

सभी डॉक्टर्स ने जनता से अपील की है कि वो बिना वजह से घर से बाहर न निकलें. मास्क लगाएं, सोशल डिस्टेंसिंग बनाकर रखें. क्योंकि इन्हीं सब लापरवाहियों की वजह से कोरोना के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं डॉक्टर्स का कहना है कि अस्पतालों की संख्या लिमिटेड है, ऐसे में अगर जनता लापरवाह रही तो वो चाहकर भी हर किसी को नहीं बचा पाएंगे.


वीडियो देखें: कोरोना में रोज़ सैकड़ों मौतें देखने वाले डॉक्टरों ने क्या बताया?

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