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पीरियड्स में पैड के बजाए कपड़ा इस्तेमाल करने की गलती कहीं आप तो नहीं कर रहीं?

बचपन में मेरी एक दोस्त थी, जो बोर्डिंग स्कूल में पढ़ती थी. जब वो क्लास सिक्स्थ में थी, तब एक डांस कॉम्पिटिशन में उसने हिस्सा लिया था. तैयार होते वक्त उसके हाथ से आलता, जिसे कई लोग माहौर भी कहते हैं, वो सफेद रंग के मोजे पर गिर गया. हॉस्टल आकर उसने मौज धोए और आंगन में सुखा दिया. उसी शाम हॉस्टल की बड़ी लड़िकयों ने छोटी लड़कियों को अपने पास बुलाया. हॉल में बैठाया और आंगन में सूख रहे मोजे के बारे में पूछा कि वो किसका है. मेरी दोस्त ने जवाब दिया. चूंकि मोजे में आलते का लाल रंग ठीक से गया नहीं था, तो सीनियर गर्ल्स को लगा कि हो सकता है कि किसी छोटी बच्ची के पीरियड्स आए हों और डर के मारे उसने अपना मोजा इस्तेमाल किया हो. मेरी दोस्त ने बताया कि वो उसका मोजा था और उसमें आलता गिरा था. मेरी दोस्त और उसकी बाकी क्लासमेट्स तब तक पीरियड्स के बारे में कुछ नहीं जानती थीं. बड़ी लड़कियों को लगा कि अब सही वक्त है इन्हें सबकुछ बता दिया जाए. एक मीटिंग हुई, छोटी लड़कियों को बताया गया कि पीरियड्स क्या होता है, और इस दौरान किन बातों का ध्यान रखा जाए? लड़कियों को सख्त हिदायत दी गई कि वो भूलकर भी कभी भी कोई कपड़ा इस्तेमाल न करें.

मेन्स्ट्रुअल हाइजीन डे का मकसद क्या है?

अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने ये घटना आपको क्यों बताई. इसलिए बताई क्योंकि आज मेन्स्ट्रुअल हाइजीन डे है. इसका मकसद है कि पीरियड्स को लेकर लोगों के दिमाग में जागरूकता लाई जाए. हमारे देश में अभी भी बहुत सारी औरतें ऐसी हैं, जो पीरियड्स के वक्त साफ-सफाई की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देती हैं और मेन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स की जगह आज भी वो कपड़ा ही इस्तेमाल करती हैं.

‘डाउन टू अर्थ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पहला तो पीरियड के मुद्दे पर आज भी हमारे देश के कई हिस्सों में खुलकर बात नहीं होती. इसे टैबू ही माना जाता है. इसी वजह से कई युवा लड़कियां प्रॉपर मेन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स के बारे में जान ही नहीं पातीं. दूसरा- सैनिटरी नैपकिन या बाकी मेन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स तक उनकी पहुंच ही नहीं होती. तीसरा- इन प्रोडक्ट्स को इस्तेमाल करने का तरीका ही पता नहीं होता. चौथा- इतने पैसे नहीं होते कि मेन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स खरीद पाएं. BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ औरतें जहां इस दौरान कपड़ा इस्तेमाल करती हैं, तो गरीब तबके से आने वाली कई औरतें अखबार, कागज़, राख और रेत तक का इस्तेमाल करने को मजबूर हैं.

आंकड़े क्या कहते हैं?

नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे यानी NFHS (2015-16) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 336 मिलियन यानी 33 करोड़ 60 लाख औरतों को पीरियड्स आते हैं. इनमें से 121 मिलियन यानी 12 करोड़ 10 लाख औरतें यानी 36 फीसद औरतें ही प्रॉपर मेन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करती हैं. हालांकि NFHS 2019-20 की रिपोर्ट इन आंकड़ों में थोड़ा इम्प्रूवमेंट होने की बात करती है. ये सर्वे दावा करता है कि 15 से 24 के बीच की लड़कियों के अंदर पीरियड्स को लेकर जागरूकता देखने को मिली है. सर्वे में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस एज ग्रुप की लड़कियों द्वारा पीरियड प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करने का डाटा दिया गया था. जिसके मुताबिक, आंध्र प्रदेश में मेन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने वाली लड़कियों की संख्या 85 फीसद है, जबकि NFHS-4 यानी 2015-16 के दौरान ये संख्या 67 फीसद थी. अंडमान-निकोबार में ये संख्या 98.9 फीसद है, जबकि NFHS-4 में ये आंकड़ा 90.3 फीसद था. असम में मौजूदा आंकड़ा 66.3 फीसद है, जबकि NFHS-4 में ये संख्या 44.8 फीसद थी. मिज़ोरम को छोड़कर सभी राज्यों में इस आंकड़े में बढ़ोतरी देखी गई थी. यहां NFHS-4 में ये आंकड़ा 93.4 फीसद था, और NFHS-5 में ये घटकर 89.8 फीसद हो गया.

एक बात की तरफ ध्यान दीजिए, NFHS-5 में ये केवल 15-24 साल के बीच आने वाली लड़कियों की बात की गई है, 24 से ज्यादा वाली औरतों के आंकड़े नहीं बताए गए हैं. ज़ाहिर है, युवा पीढ़ी टाइम के साथ जागरूक हो रही है, तो वो पीरियड्स के दौरान हाइजीन की तरफ ज्यादा ध्यान दे रही है. जो अच्छी बात है. लेकिन ये भी एक सच है कि कई सारी लड़कियां हमारे देश में ऐसी भी हैं, जिन्हें जब पीरियड्स आने शुरू होते हैं, उनके स्कूल जाने पर रोक लगा दी जाती है. कुछ लड़कियों को हर महीने करीब दो या तीन दिन के लिए स्कूल से छुट्टी करनी पड़ती है.

सवाल उठता है कि क्या हमारी सरकार की तरफ से मेन्स्ट्रुअल हाइजीन को बढ़ावा देने के लिए कोई कदम उठाए गए हैं या नहीं? जवाब है कि हां कोशिश की गई है. NFHS की जिस रिपोर्ट के बारे में हमने पहले ज़िक्र किया, उसमें ये कहा गया है कि स्थानीय स्तर पर बनने वाले नैपकिन्स, सैनिटरी नैपकिन्स, टेम्पोन और मेन्स्ट्रुअल कप्स पीरियड्स के दौरान प्रोटेक्शन के लिहाज़ से हाइजीनिक हैं. इसके अलावा नेशनल हेल्थ मिशन की एक स्कीम है, जिसे MHS कहते हैं. यानी मेन्स्ट्रुअल हाइजीन स्कीम्स. इसका मकसद है कि मेन्स्ट्रुअल हाइजीन को लेकर युवा लड़कियों को जागरूक किया जाए. ग्रामीण इलाकों की युवा लड़कियों तक सैनिटरी नेपकिन्स की पहुंच बनाई जाए, नैपकिन के पर्यावरण फ्रेंडली डिस्पोज़ल के बारे में बताया जाए. इस स्कीम के तहत आशा कार्यकर्ताओं को ये ज़िम्मेदारी दी गई है कि गांव की लड़कियों को 6 रुपए की दर पर सैनिटरी नैपकिन का एक पैकेट मुहैया कराया जाए, जिनमें छह नैपकिन्स होंगे. इन नैपकिन्स को “फ्रीडेज़’ कहा गया है. लेकिन समय-समय पर इस स्कीम की आलोचना होती रही है. ‘द वायर’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस स्कीम में नैपकिन के सप्लाई में दिक्कत देखी गई है. दूसरा ये नहीं बताया जाता कि इनका इस्तेमाल कैसे किया जाए, कितने-कितने घंटों में इन्हें चेंज किया जाए. ऐसे में पहली बार इसका इस्तेमाल करने वालों के लिए ये एक चैलेंज ही है.

कपड़ा इस्तेमाल करने में क्या दिक्कत?

सवाल उठता है कि क्या होता है जब पीरियड्स के दौरान हाइजीनिक प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल न किया जाए. जवाब है कई तरह के इन्फेक्शन हो सकते हैं. इसे ठीक से जानने के लिए हमने बात की डॉक्टर सुच्ची गुप्ता से. ये आगरा सदर अस्पताल में गायनेकोलॉजिस्ट हैं. उन्होंने कहा-

“ग्रामीण क्षेत्र की औरतें आज भी कपड़ा इस्तेमाल करती हैं. पिछड़े तबके की औरतें सूखे पत्ते का भी इस्तेमाल करती हैं. जिससे खून बहने की वजह से वहां बैक्टिरिया और फंगस पनप जाते हैं, जिसकी वजह से बदबूदार स्राव होता है. प्राइवेट पार्ट में इन्फेक्शन फैल सकता है. जिसकी वजह से उन्हें लगातार दर्द और सूजन की शिकायत आ जाती है. साथ ही कपड़े के लगातार इस्तेमाल की वजह से स्किन रैशेज़ हो जाते हैं. छाले भी पड़ सकते हैं. आगे जाकर ये छाले अगर लगातार बने रहें, तो कैंसर का भी रूप ले सकते हैं.”

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डॉक्टर सुच्ची गुप्ता, आगरा सरकारी अस्पताल

कैसे प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करें?

अब आपको बताते हैं कि पीरियड्स के दौरान किस तरह के मेन्स्ट्रुअल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. सबसे कॉमन इस्तेमाल तो है सैनिटरी नैपकिन्स का. ये शहरों में तो मिलते ही हैं, और अब गांवों में भी ये पहुंच रहे हैं. सबसे आसानी से इन्हें आप एक्सेस कर सकते हैं. अगर इनकी कीमत की बात करें, तो सरकार की तरफ से दिए जाने वाले नैपकिन की कीमत एक रुपए होती है, जो ग्रामीण इलाकों की लड़कियों को मुहैया कराया जाता है. बाकि पैड की क्वालिटी और साइज़ के हिसाब से इसका रेट डिसाइड होता है. आपको 30 रुपए में छह से लेकर 100 रुपए में छह पैड तक मिल जाएंगे. साइज़ की बात करें, तो लार्ज और एक्स्ट्रा लार्ज साइज़ में ये पैड्स आते हैं. ब्लड फ्लो के हिसाब से आप इनका इस्तेमाल कर सकते हैं. दूसरा हैवी फ्लो के लिए विंग्स वाले पैड्स भी आते हैं. हर पैड को पांच से छह घंटे के बीच बदलना चाहिए, ताकि आपको किसी तरह का इन्फेक्शन न हो.

दूसरा प्रोडक्ट है टैम्पोन. ये कॉटन के एक पाइप की तरह होता है. डरिए मत, हमने पाइप की तरह कहा है, पाइप नहीं. ये सॉफ्ट होता है. गोल और लंबे कुशन की तरह. इसका टिप राउंडेट होता है. आपको इसे पीरियड के दौरान वजाइना में इन्सर्ट करना होता है. ये कॉटन में ब्लड सोक लेता है. इसे हर चार घंटे में बदलना होता है. इसे निकालने के लिए नीचे एक थ्रेड लगा होता है, उसे खींचकर आसानी से आप इसे रिमूव कर सकते हैं. इसकी दिक्कत ये है कि ग्रामीण इलाकों में मिलना मुश्किल है. इसकी कीमत भी क्वालिटी और ब्रांड पर डिपेंड करती है. अमूमन 200 से 300 रुपए के बीच में आपको 16 टैम्पोन का पैक मिलता है.

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टैम्पोन, सैनिटरी नैपकिन और मेन्स्ट्रुअल कप.

तीसरा प्रोडक्ट है मेन्स्ट्रुअल कप्स. इसे भी आपको वजाइना में इनसर्ट करना होता है. जैसे तेल वाली कुप्पी में आप तेल इकट्ठा करते हैं, वैसे ही इनका काम आपके मेन्स्ट्रुअल ब्लड को इकट्ठा करने का होता है. ये सिलिकॉन या रबड़ जैसे मटेरियल से बने होते हैं. आप इन्हें अलग-अलग तरह से फोल्ड करके इन्सर्ट कर सकते हैं. इसे आप 10 से 12 घंटे तक इस्तेमाल कर सकते हो. और ये रियूज़ेबल है. इसे रिमूव करने के बाद अच्छे से सैनिटाइज़ करके दोबारा भी यूज़ किया जा सकता है. ये इन्वॉयरमेंट फ्रेंडली प्रोडक्ट है. इसकी कीमत भी ब्रांड और क्वालिटी पर डिपेंड करती है. 150 रुपए का भी मिलता है और 500 तक का भी. दिक्कत यही है कि ग्रामीण इलाकों में इसकी पहुंच भी कम ही है.


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