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कोरोना लॉकडाउन: बेसहारा गरीबों पर चुटकुले बना रहे लोगों के लिए 2 मिनट का मौन

एक मेमे है. सॉरी, मीम. जो वॉट्सऐप और फेसबुक पर चल रहा है. शायद आपके पास भी आया हो:

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वो मीम जिसे लोग बढ़चढ़ कर शेयर कर रहे है. (तस्वीर: सोशल मीडिया)

दो महिलाओं की तस्वीरें हैं. एक तरफ लिखा है, कामवाली. ये थोड़े भरे बदन की महिला है. दूसरी तरफ घरवाली. ये बेहद दुबली महिला है. ऊपर लिखा हुआ है, 21 दिन के बाद.

मीम बनाने वाला कहना चाह रहा है,

21 दिनों का लॉकडाउन है. इस समय कोई भी बाहर नहीं निकला रहा. कामवालियां छुट्टी पर हैं. तो घर के काम उसमें रहने वाली महिलाएं करेंगी. इस तरह घर के काम करने के लिए आने वाली डोमेस्टिक हेल्प अपने घर बैठेंगी, और मोटाएंगी. वहीं घर पर रहने वाली मम्मियां, चाचियां, मौसियां, बीवियां इत्यादि घर की साफ़-सफाई और बर्तन धोने वाले काम करके पतली हो जाएंगी.

देखकर यही बुझाता है कि मीम वाले भैय्या को न तो कामवालियों का आइडिया है. न घरवालियों का.

सॉरी ब्रो. पर यहां आप इधर उधर निकल गए.

नंबर 1.

घरों में जाकर काम करने वाली महिलाओं की ज़िन्दगी के बारे में कितना जानते हैं आप? सिर्फ इसलिए कि कुछ दिनों के लिए उन्हें घर बैठना पड़ रहा है, आपको लगता है वो मोटा जाएंगी? हम कहेंगे तो आप को समझ आएगी नहीं. तो खुद ऐसी ही एक महिला की बात सुन लीजिए. नाम है बिजली. नॉएडा में काम करती हैं. घरों में जाकर. उनकी ये हालत है,

का करें दीदी घर पे बैठे हैं. न चावल हैं, न दाल है. तेल भी नहीं है. पति रिक्शा चलाते हैं, कल चलाने निकले तो पुलिस से दो डंडे खाकर वापस आए हैं. घर में दो बड़े बच्चा है और छोटा एक साल का बच्चा है. आस-पास सब चीज़ इतना महंगा हो गया है कि सब्जी को तो हाथ लगाने में भी डर लगता है. दो दिन से नमक और चावल खा रहे हैं. मसाला-उसाला कुछ नहीं है घर पे. एक घर से तनख्वाह लेके आई थी तो हाथ में थोड़ा पैसा है. नहीं तो ऊ भी नहीं होता.

नमक और उबले चावल खाने से इतना मोटा तो शायद ही कोई हो पाए. है न?

नंबर 2

अब आते हैं ‘घरवालियों’ पर. जो इस वक़्त पूरी तरह चारदीवारी में बंद हैं, उन पर क्या असर पड़ रहा है. यहां हम उन महिलाओं की बात कर रहे हैं, जो जॉब नहीं करतीं. घर पर ही रहती हैं, सारा काम देखती हैं. जिनको हम और आप ‘हाउसवाइफ’ कहते हैं. रेणु, बिहार के सीतामढ़ी गांव से हैं. इनसे हमने पूछा, इस लॉकडाउन का क्या असर पड़ा है उन पर.

घर में जो औरत रहती है, उसका काम तो रोज का ही रहता है. बढ़ यही चीज गया है कि सारा दिन बच्चा और सयान सब घर में रहता है. पहले दिन में दो बार चाय बनता था, अब चार बार बनता है. काम करने का टाइम बढ़ गया है. टीवी देखने का भी टाइम नहीं मिलता. सबको खाना खिलाते, नहाते डेढ़ दो बज जाता है. गेट तक से बाहर नहीं निकल पा रहे. बच्चा सब भी दुखी है. पहले थोड़ा बाहर-वाहर निकल जाते थे, अब वो भी नहीं है.

ये एक सैम्पल हैं. उन लाखों करोड़ों महिलाओं में से, जो इन सिचुएशंस से जूझ रही हैं. लेकिन सोफे पर बैठे-बैठे टेबल तोड़ने वालों को मज़ाक उड़ाने के लिए असबसे आसान टार्गेट इन्हीं का मिलता है. क्यों? क्योंकि बीवियों और ‘कामवालियों’ पर जोक तो अरसे से बनते आए हैं. कोरोना का रोना तो महज बहाना है.

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घर के काम करने वाली ‘दीदियों’ की याद तभी आती है, जब वो नहीं आतीं. गहर पर रहकर घर के काम करने वाली महिलाओं के काम की कीमत तब पता चलती है, जब वो घर पर मौजूद न हों. जोक तो फिर भी बना ही दिए जाते हैं.(सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)

इस मीम की एक ख़ास बात और है. जो शायद इसे बनाने वाले के दिमाग में नहीं आई. शायद क्या, पक्का ही नहीं आई. सेक्सिस्म तो सामने है नज़र के, उसके नीचे एक परत और है. प्याज की तरह. छीलेंगे, तो आंख परपराएगी. क्योंकि हिम्मत नहीं है उसका सच झेलने की. ये वीडियो देख लीजिए, फिर बात करते हैं.

मुकेश सिंह सेंगर NDTV के स्पेशल कोरेस्पोंडेंट हैं. उन्होंने ये शूट किया. इसमें एक लड़का है, जो तीन दिनों से अपने घर नहीं जा पाया है. क्योंकि यातायात के पब्लिक साधन बंद हो गए हैं. मेहनत-मजूरी करके पैसे कमाता है. बाहर पुलिस डरा रही है, मारने के लिए दौड़ा रही है, ऐसा उसने बताया.

ये समाज का वो तबका है जिसे पॉलिटिकल साइंस में पेरीफेरी (Periphery) कहते हैं. यानी हाशिया. मिडिल क्लास या अपर क्लास, जिसे समाज अपना ‘भद्र’ तबका कहता है, उसे इनकी याद तभी आती है, जब ये अपनी ‘तय जगह’ और ‘तय समय’ पर नहीं होते. खुद सोचिए. रोज़ आपके घर काम करने वाली दीदी आती हैं, तब उनका ध्यान आता है? जब वो तीन दिन छुट्टी पर जाती हैं, तब महसूस होता है कि कितना कुछ है जो वो करती हैं.

इस मीम में उस तबके के लिए छिपी हुई एक खीज है. कि इन्हें घर बैठने को कैसे मिल गया. हम यहां वर्क फ्रॉम होम करके दिमाग भुनवा रहे हैं. इनको बैठे-ठाले छुट्टी मिल गई.

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क्रिएटिव बनने, और हंसी पैदा करने की कोशिश करने के चक्कर में जिन लोगों की तकलीफों का मज़ाक उड़ा रहे हैं लोग, कल उनसे नज़रें कैसे मिलायेंगे? (सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)

स्त्रीद्वेष और वर्गभेद, दोनों बैठे-ठाले आपको एक मीम में मिल रहे हैं. ऐसा हमेशा नहीं होता. हंस लीजिए जितना हंसना है. उसके बाद सोचिएगा ज़रूर. जब हंस चुके हों, और सोच चुके हों, तो ये आर्टिकल पढ़ लीजिएगा.


वीडियो: कोरोना डायरीज: लॉकडाउन के दौरान घर पर सामान भर रहे हैं, तो पहले इनकी बात सुन लें

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