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प्रेगनेंट औरतें छुट्टियां न लें, उसके लिए बहुत ही घटिया तरीके अपना रही कुछ कंपनियां

अभी तीन चार दिन पहले की बात है. मैं ऑडनारी शो को आए मेल्स चेक कर रही थी. वही सारे मेल्स जो आप हमें भेजते हैं. उसी दौरान मेरी नज़र एक मेल पर अटक गई, जिसे एक महिला ने हमें भेजा था. उस महिला ने बताया कि उसकी कंपनी ने मैटरनिटी लीव को लेकर उसके साथ काफी ज्यादा भेदभाव किया था. उसे ठीक से छुट्टियां नहीं दी गई थीं और उसे काफी ज्यादा परेशान भी किया गया था. इस महिला की परेशानी जानने के बाद हमने सोचा कि क्यों न मैटरनिटी लीव के मुद्दे पर ही आज आपसे बात की जाए. केवल यही एक महिला ऐसी नहीं हैं, जिनके साथ मैटरनिटी लीव को लेकर कोई दिक्कत हुई हो, बल्कि ऐसे कई सारे केस हमारे सामने आ चुके हैं. कहीं पर मां बनने वाली औरत को उसकी कंपनी ने ठीक से लीव नहीं दी, तो कहीं पर नौकरी से ही निकाल दिया. ये सब तब हुआ जब हमारे देश में मैटरनिटी लीव को लेकर एक खास कानून है. किस तरह की दिक्कतें औरतों को झेलनी पड़ रही है? उनकी कंपनियां अपने ऊपर लगे आरोपों पर क्या कहती हैं? और हमारा कानून क्या कहता है? सब पर हम डिटेल में बात करेंगे.

क्या है पूरा मामला ?

काजल (काल्पनिक नाम) गुरुग्राम में बायोवर्ल्ड नाम की एक कंपनी में काम करती हैं. उन्होंने बताया कि पिछले साल जनवरी में उन्होंने बायोवर्ल्ड कंपनी जॉइन की थी. फरवरी में उन्हें पता चला कि वो प्रेगनेंट हैं. अप्रैल में उन्होंने इस बात की जानकारी अपनी कंपनी को दी. और उसके बाद उन्होंने HR से कई बार मैटरनिटी लीव पॉलिसी के बारे में जानकारी मांगी. क्रेश सुविधा के बारे में भी जानकारी मांगी. लेकिन HR की तरफ से उन्हें कुछ नहीं बताया गया. फिर आ गया सितंबर का महीना. डिलीवरी की ड्यू डेट पास थी, इसलिए 9 सितंबर से काजल ने मैटरनिटी लीव मांगी. कंपनी की तरफ से कहा गया कि 9 सितंबर को वो अपना लैपटॉप जमा कर दें और लीव पर चली जाएं. 15 सितंबर को काजल की बेटी हुई. फिर फरवरी 2021 में उन्हें HR की तरफ से एक मेल आया और बताया गया कि 15 जुलाई 2020 से लेकर 8 सितंबर 2020 को प्री मैटरनिटी लीव के तौर पर कंसिडर किया जाएगा. काजल कहती हैं कि इन आठ हफ्तों में उन्होंने छुट्टी नहीं ली थी, बल्की पूरा काम किया था. उन्होंने काम किया या नहीं, ये साबित करने के लिए उन्होंने हमें एक मेल का स्क्रीनशॉट भी भेजा. काजल ने 10 फरवरी 2021 के दिन आए एक मेल का स्क्रीनशॉट भी हमें भेजा. दोनों ये रहे-

Maternity Leave 2
बाएं से दाएं: काजल को जुलाई 2020 में आया एक मेल. 10 फरवरी को HR द्वारा भेजा गया मेल.

इस मेल में HR ने काजल से कहा था कि उन्होंने 8 हफ्ते की प्री डिलीवरी और 18 हफ्ते की पोस्ट डिलीवरी लीव ले ली है, और ये छुट्टियां अब खत्म होने वाली हैं, इसलिए एक हफ्ते के भीतर वो दोबारा काम पर आना शुरू कर दें. काजल का कहना है कि उन्होंने कभी भी प्री डिलीवरी लीव नहीं ली थी. और किस तरह के दावे काजल ने किए, सुनिए उन्हीं की ज़ुबानी-

“मेरी जॉइनिंग के वक्त मुझे अपॉइन्टमेंट लेटर दिया गया. लेकिन HR ने मुझे कोई मैटरनिटी बेनिफिट्स, जनरल पॉलिसीज़ और क्रेच पॉलिसीज़ के बारे में नहीं बताया. न ही इनसे जुड़े कोई दस्तावेज़ दिए गए. 1 फरवरी को मुझे मेरे प्रेगनेंट होने के बारे में पता चला. 20 मार्च को जब लॉकडाउन हुआ, तो कंपनी के साइड से मुझे लैपटॉप दिया गया और कहा गया कि मुझे घर से काम करना होगा. 23 अप्रैल को मैंने HR को प्रेग्नेंसी के बारे में बताया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. 22 जून को HR मैनेजर स्वाति ने मुझसे डिलीवरी की ड्यू डेट का डॉक्यूमेंट मांगा. एक फॉर्म दिया गया, जिसमें सारी जानकारी भरनी थी. मैंने 21 सितंबर को ड्यू डेट होने की जानकारी दी. ये भी कन्फर्म किया कि मैं 9 सितंबर तक मैटरनिटी लीव शुरू करूंगी. इसके बाद उनका कोई जवाब नहीं आया. मैंने कई बार लीव पॉलिसी और मैटरनिटी पॉलिसी मांगी, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. 8 सितंबर को मैंने HR राम स्वरूप जी को कॉल किया. उन्होंने बताया कि 26 हफ्ते की मैटरनिटी लीव होती हैं. इस हिसाब से मेरी छुट्टी 10 मार्च 2021 तक होती हैं. पर मुझे HR ने 3 फरवरी 2021 को मेल किया. कहा कि मेरी छुट्टी 16 जनवरी को खत्म हो चुकी हैं. मैंने उनसे पूछा कि ये टाइम पीरियड आप किस चीज़ में काउंट करेंगे, तो उन्होंने मुझे जवाब दिया कि आपकी सारी कैज़ुअल लीव्स इसमें डिडक्ट हो जाएंगी. आप जल्दी ऑफिस जॉइन कीजिए. काफी मेल करने के बाद HR ने 10 फरवरी को लीव पॉलिसी भेजी. उसमें लिखा था कि आपके 8 हफ्ते की छुट्टी आपको डिलीवरी डेट से पहले लेनी होती है, जो आपकी खत्म हो चुकी है. फिर फरवरी में मुझे सैलेरी नहीं दी. 20 फरवरी को 16 हज़ार रुपए ट्रांसफर किए, जबकि मेरी सैलेरी 27 हज़ार है. उसके बाद मैं कोविड के टाइम में अपने छह महीने के बच्चे को लेकर उनके पास गई. और उनसे पूछा कि आप सैलेरी क्यों नहीं दे रहे, तो उन्होंने बोला कि हमारे यहां कुछ ऑडिट चल रहा है, तो आपकी सैलेरी रुकी हुई है. दी भी जाए या नहीं दी जाए. उन्होंने मुझे कहा कि आप 11 मार्च से जॉइन कर लीजिए. मैंने उन्हें बताया कि कोविड की सिचुएशन में सरकार ने सारे क्रेचेस बंद कर रखे हैं, तो मैं अपने बच्चे को कहां लेकर जाऊं. उन्होंने कहा कि ये आपकी ज़िम्मेदारी है, आप देखिए.”

काजल का आरोप है कि चूंकि उनके पति ऑन साइट ड्यूटी पर हैं, इसलिए वो अकेले अपने बच्चे को घर पर छोड़कर काम पर नहीं जा सकती हैं, इसलिए वो अपनी कंपनी से ये गुज़ारिश कर रही हैं कि उन्हें वर्क फ्रॉम होम दे दिया जाए. काजल का कहना है कि इंडियन मैटरनिटी बेनिफिट (एमेंडमेंट) एक्ट-2017 के तहत उन्हें वर्क फ्रॉम होम दिया जा सकता है. क्योंकि एक्ट में कहा गया है कि अगर महिला कर्मचारी के काम का नेचर ऐसा है, जिसे वो घर से भी कर सकती है, तो कंपनी की रज़ामंदी से उसे वर्क फ्रॉम होम दिया जा सकता है.

काजल का आरोप है कि उन्हें HR की तरफ से कंपनी की मैटरनिटी पॉलिसी के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी. जबकी अगर हम हमारे देश में लागू एक्ट की बात करें तो उसमें ये कहा गया है कि हर कंपनी को किसी महिला की जॉइनिंग के वक्त उसे मैटरनिटी एक्ट के तहत मिलने वाले लाभ की सारी जानकारी देनी होती है. काजल ने हमें ये भी बताया कि उन्होंने अपने साथ हुए भेदभाव को लेकर नेशनल कमीशन फॉर विमन यानी NCW में भी शिकायत की थी, NCW ने बायोवर्ल्ड को नोटिस भी भेजा था. जिस पर कंपनी की तरफ से जवाब दिया गया-

“इसके संदर्भ में हमने फैक्ट्स को जांचा, और पाया कि काजल ने मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट के तहत मिलने वाली सारी सुविधाएं ली हैं. और उसी हिसाब से उस वक्त की जो पेमेंट बनती थी, हमने उन्हें दे दी है. इसलिए जो भी आरोप शिकायतकर्ता ने हमारे ऊपर लगाए हैं वो गलत और निराधार हैं.”

काजल ने अपनी कंपनी के ऊपर तीन गंभीर आरोप लगाए हैं. पहला ये कि 15 जुलाई से लेकर 9 सितंबर 2020 के बीच आने वाले दिनों में काजल ने काम किया था, लेकिन कंपनी ने इसे प्री-डिलीवरी लीव माना और छुट्टियां काट दी. दूसरा कंपनी ने जॉइनिंग के दौरान मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट की कोई जानकारी नहीं दी. तीसरा- HR ने उनकी सारी छुट्टियों का बैलेंस ज़ीरो कर दिया. चौथा- उन्हें जानकारी दिए बिना ही उनकी सैलेरी घटा दी.

इन सब आरोपों के जवाब जानने के लिए हमने HR से कॉन्टैक्ट करने की कोशिश की. राम स्वरूप जी, जिनका ज़िक्र काजल ने अपनी बाइट में किया था, उन्हें कॉल किया हमने, तो उन्होंने इस मुद्दे पर बात करने से मना कर दिया. एक अन्य HR पर्सनेल को हमने कई बार कॉल किया, उन्होंने फोन नहीं उठाया. फिर हमने मेल भी किया, लेकिन अभी तक उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया है. यानी सीधे तौर पर हम उनका पक्ष नहीं जान पाए हैं. मेल के जवाब का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन NCW को दिए जवाब की कॉपी हमारे पास मौजूद है, जिसके ज़रिए हमें पता चला कि कंपनी ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है.

दूसरा केस सुनिए

इसी तरह का एक और केस आया था साल 2018 में. गाज़ियाबाद में एक इंस्टीट्यूट है, जिसका नाम है संस्कार कॉलेज ऑफ फार्मेसी एंड रीसर्च. जनवरी 2018 में यहां सुष्मिता मिश्रा नाम की एक महिला ने असिस्टेंट प्रफ़ेसर के तौर पर नौकरी शुरू की. साल के अंत में इंस्टिट्यूट की तरफ से ये कहा गया कि जो लोग भी मैटरनिटी लीव लेना चाहते हैं, वो मैनेजमेंट को एडवांस में बता दें ताकि लीव मैनेज की जा सके. सुष्मिता ने बता दिया कि अप्रैल 2019 से उन्हें मैटरनिटी लीव चाहिए होगी. जब ये बात उन्होंने मैनेजमेंट के सामने रखी, तो उनके ऊपर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाना शुरू कर दिया गया. आगे उनके साथ क्या हुआ, सुनिए खुद सुष्मिता की ज़ुबानी-

“मैंने 3 जनवरी 2018 को संस्कार एजुकेशनल ग्रुप जॉइन किया था. जैसे ही मेरा प्रोबेशन पूरा होने वाला था, 3 जनवरी 2019 को, तो वहां के मैनेजमेंट ने मुझे टर्मिनेट कर दिया, विंटर वेकेशन लीव को सेंक्शन करते हुए. उनका कारण ये था कि चूंकि मैं प्रेगनेंट थी, तो मुझे मैटरनिटी लीव नहीं देना चाहते थे. लेकिन उन्होंने कारण ये दिखाया कि वो मुझे प्रोबेशन पीरियड में रिलीव कर रहे हैं. उसके बाद मैंने हर जगह शिकायत की. यूपी सरकार के पास में. सीएम पोर्टल में शिकायत की. डॉक्टर AKTU यूनिवर्सिटी में शिकायत की. वहां से फैसले भी आए, लेकिन उन्होंने मुझे कोई भी पैसा नहीं दिया. कोई भी अगर बॉडी उनसे कन्सर्न करती है, जैसे ह्यूमन राइट्स, नेशनल कमीशन फॉर विमन, या फिर सीएम पोर्टल से वहां पूछताछ होती है, तो वो कहते हैं कि उनका चेक तैयार है, वो आकर ले जाएं. लेकिन मेरा ये कहना है कि जब उन्होंने मेरे कॉलेज जाने में मुझे टर्मिनेट कर दिया, गेट बंद कर दिया, तो मैं दोबारा उनके कॉलेज में क्यों जाऊं. ये सिंपल तरीका है कि वो मुझे मेरी मैटरनिटी लीव, मेरी सैलेरी रिलीज़ करें, और मेरे अकाउंट में डलवा दें. मैं ऑनलाइन नो ड्यूज़ भरकर दे सकती हूं. लेकिन वो ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं. लगातार परेशान कर रहे हैं. आज तक रिलीव नहीं किया, इस्तीफा स्वीकार नहीं किया.”

Sushmita
सुष्मिता. जो संस्कार इंस्टिट्यूट में पढ़ाती थीं.

सुष्मिता को अभी तक न तो रिलीव किया गया है और न ही उनका इस्तीफा मंज़ूर किया गया है. हमने इस मुद्दे पर कॉलेज की HR हेड से बात करनी चाही. उन्होंने हमें कुछ जवाब नहीं दिया, कह दिया कि मेल करिए. मेल हमने कर दिया है, लेकिन जवाब शो शूट होने तक आया नहीं था. खैर, जब 2018 में ये मामला पहली बार सामने आया था, तब संस्कार इंस्टिट्यूट के HR की तरफ से सुष्मिता को एक मेल किया गया था. कहा गया था कि 31 दिसंबर 2018 से उनकी सर्विस की ज़रूरत इंस्टिट्यूट को नहीं है. हमारी साथी प्रेरणा ने उस वक्त इंस्टिट्यूट के मीडिया अफेयर्स देखने वाले मुन्ना मिश्रा से बात की थी. तब उन्होंने इंस्टिट्यूट के ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया था. कहा था-

“हमने एम्प्लॉयी को इसलिए रिलीव नहीं किया क्योंकि वो प्रेग्नेंट हैं. हम उन्हें कंटीन्यू करते, चाहे वो प्रेग्नेंट हों या न हों. लेकिन हमारी प्रायोरिटी स्टूडेंट्स हैं. हमें फीडबैक आया था कि स्टूडेंट्स उनसे खुश नहीं हैं. हमने उन्हें रिजाइन करने के लिए इसलिए कहा ताकि उनको टर्मिनेट ना करना पड़े. इस तरह वो दूसरी नौकरी भी आराम से ढूंढ सकती थीं. वो महिला हैं, संयोग से अभी प्रेग्नेंट भी हैं इसलिए इसे भावनात्मक इशू बना रही हैं. उनके सर्विस अग्रीमेंट में लिखा था कि एक साल के प्रोबेशन में उनको हटाया जा सकता है. वो प्रोबेशन पर थीं. कॉलेज को परफॉरमेंस से इशू था’.

हालांकि हमारी साथी ने तब कुछ स्टूडेंट्स से भी बात की थी, उनमें से ज्यादातर स्टूडेंट्स ने कहा था कि वो अपनी टीचर से संतुष्ट थे, वो अच्छा पढ़ाती थीं.

तीसरा केस भी जानिए-

एक और केस आया था मई 2020 में. असम के गुवाहाटी से. यहां एक जर्नलिस्ट को उसके चैनल ने इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था. क्या हुआ था जर्नलिस्ट के साथ, सुनिए-

“जनवरी 2020 में मुझे पता चला कि मैं प्रेगनेंट हूं. मैं रिपोर्टर हूं, लेकिन प्रेग्नेंसी के बाद मैंने डेस्क पर काम किया. फिर कोरोना आ गया, तो ऑफिस से मुझे कहा गया कि आप लीव ले लो, क्योंकि कोविड आ गया है. मौखिक तौर पर मुझे 15 दिन की लीव दी, फिर दोबारा से 15 दिन की लीव दे दी. पूरे एक महीने, यानी अप्रैल 2020 में मैंने लीव ली. उसके बाद मैं 1 मई को ऑफिस गई. जब मैं गई, तो मुझे बोला गया कि आपको लेकर एक्पेक्टेशन नहीं थी ऑफिस में. मैंने पूछा कि किसने मुझे एक्पेक्ट नहीं किया था. बोला गया कि ऑफिस मैनेजमेंट ने. मैंने पूछा कि क्यों, तो बोला गया कि आप प्रेगनेंट हैं, तो अभी आप काम नहीं कर सकती हो. मैंने कहा कि मैं तो सहज हूं काम करने के लिए. फिर मैंने CMD से बात की. पूछा कि क्या आपने मुझे ऑफिस में एक्पेक्ट नहीं किया था. उन्होंने कहा कि हां आपके आने की उम्मीद नहीं थी, क्योंकि आप प्रेगनेंट हो. मैंने पूछा कि क्या मैं मैटरनिटी लीव ले लूं. तो उसी समय CMD सर ने कहा कि हम लोगों का कोई मैटरनिटी लीव नहीं है, आप रिज़ाइन कर दो. फिर मैं क्या करूं, उस टाइम सब गड़बड़ हो गया. फिर मैंने रिज़ाइन कर दिया.”

हालांकि जर्नलिस्ट के आरोपों के बाद चैनल ने सफाई में कहा था कि उन्होंने अपने कर्मचारी के सामने वर्क फ्रॉम होम करने का ऑप्शन रखा था. ये तो हमने आपको तीन केस बताए हैं. ऐसे कितने सारे केस हमारे सामने जब-तब आते हैं. जहां प्रेगनेंट औरतों को मैटरनिटी लीव लेने के दौरान काफी ज्यादा दिक्कत होती है. कुछ कंपनियां ज़ाहिर है कि अपनी महिला कर्मचारियों का ध्यान रखते हुए उन्हें उनके सारे अधिकार देती हैं, लेकिन कुछ कंपनियां आज भी, कानून होने के बाद भी इस अधिकार से वंचित रखती हैं.

अब जब इस कानून की इतने बार हमने बात कर ही दी है, तो जानते हैं कि ये मैटरनिटी बेनिफिट (एमेंडमेंट) एक्ट-2017 आखिर क्या है? क्या सुविधाएं इस कानून से मिलती है. इस एक्ट को ठीक से समझने के लिए हमने बात की एक्सपर्ट से. उन्होंने कहा-

“हमारे देश में मैटरनिटी लीव का कानून 2017 में संशोधित हुआ है. वो ये कहता है कि कोई भी महिला, कोई भी कंपनी या कोई भी सेक्टर में काम करती है, चाहे वो पब्लिक सेक्टर हो या प्राइवेट सेक्टर हो, उसमें अगर वो 80 दिन से ज्यादा काम कर चुकी है, तो वो उसके तहत मैटरनिटी लीव की सुविधा ले सकती है. इस लीव में भले ही आप काम पर नहीं आओगे, लेकिन आपको पेड सैलेरी मिलेगी. पहले 16 वीक की लीव मिलती थी, अब ये बढ़कर 26 वीक की हो गई है. महिला के ऊपर निर्भर करता है कि वो कब ले. वैसे जो आपकी डिलीवरी डेट होती है, उससे आठ हफ्ते पहले से आप इसके लिए एप्लीकेबल होते हो. यानी डिलीवरी डेट के आठ हफ्ते पहले से आप ये लीव ले सकते हो. और जब तक आपका 26 वीक पूरा नहीं होता है, ले सकते हो. अगर आप डिलीवरी डेट के पहले ये लीव नहीं लेते हो, तो बाद में भी आप इसे ले सकते हो.” 

कंपनियों का, उनके HR का काम होता है अपने एम्प्लॉयीज़ से अधिकतम काम करवाना. होना भी चाहिए. हर कर्मचारी को कंपनी की बेहतरी के लिए अपना 100 फीसद देना ही चाहिए. मगर दिक्कत तब शुरू होती है जब हार्ड वर्क के इस एथिक में पितृसत्ता आती है. बड़ा भारी शब्द है पितृसत्ता. आसान भाषा में कहें तो इसका अर्थ है कि हर चीज़ को पुरुष के पॉइंट ऑफ़ व्यू से देखना. बच्चा तो पैदा हो गया. छुट्टी क्यों चाहिए? मर्द से बरारी चाहिए तो मर्द की तरह काम भी करे. काम नहीं कर रही है 6 महीने तो हम तनख्वाह क्यों दें? हमने कहा था क्या कि करियर के बीच में बच्चा पैदा करो? या घर ही चला लो, या दफ्तर ही कर लो. ये वो तमाम बातें हैं जो वर्कप्लेस पर महिलाओं के सामने या पीठ पीछे कही जाती हैं, जब वे प्रेगेनेंट होती हैं. सिर्फ पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी ऐसी बातें करती देखी जाती हैं क्योंकि वो भी इसी पेट्रीयार्कल यानी पितृसत्ता वाली सोच से ग्रसित होती हैं.

इस तरह की बातें करते हुए, सोचते हुए जो मूल बात लोग भूल जाते हैं वो ये है कि बच्चा पैदा करने का टास्क भी तो कुदरत ने औरत को ही दिया है. क्या उसे उसका बेनिफिट नहीं देना चाहिए? जो दुनिया को आगे बढ़ा रही है, जो अगर बच्चे पैदा करना बंद कर दे तो कुछ साल बाद इन कंपनियों में काम करने वाले लोग ही नहीं बचेंगे. क्या उसे इन कंपनियों से पेड छुट्टियां नहीं मिलनी चाहिए? क्या वो अगर अपने बच्चे पैदा करने के अधिकार का इस्तेमाल करती है, ठीक उसी तरह जिस तरह वो बच्चे नहीं पैदा करने या भ्रूण अबॉर्ट करने का अधिकार इस्तेमाल कर सकती हैं, तो क्या उन्हें इसकी सज़ा देनी चाहिए? हम वही समाज हैं न, जो मां पर कविताएं लिखते हैं, गीत लिखते हैं और उनको देवी का दर्जा देने में एक मिनट नहीं लगाते. तो फिर प्रेगनेंसी में मैटरनिटी लीव देने में क्यों हमारी जान जाती है?


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