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स्वेज नहर में जहाज फंसने के लिए क्या एक महिला जिम्मेदार थी?

बीते दिनों खबर आई कि स्वेज नहर में एक जहाज फंस गया. और ऐसा फंसा कि दुनिया के तमाम देशों को कुल मिलाकर 54 अरब डॉलर का नुकसान हो गया. ये एवरग्रीन कंपनी का एवर गिवेन जहाज था. इसके फंसने की वजह से छह दिनों तक स्वेज नहर में ट्रैफिक जाम लगा रहा. जहाज के दोनों तरफ दूसरे छोटे और बड़े जहाजों की लंबी कतारें लग गईं. स्वेज नहर का ट्रेड रूट एक महत्वपूर्ण ट्रेड रूट है. समुद्री रास्ते से होने वाले दुनिया के कुल ट्रेड का 10 फीसदी हिस्सा इसी रूट से होता है. यूरोपीय, दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए यह रूट काफी कारगर है. क्योंकि इस रूट की वजह से जहाजों को पूरे अफ्रीकी महाद्वीप का चक्कर नहीं लगाना पड़ता.

जब 23 मार्च को यह 400 मीटर लंबा और हजारों टन वजनी जहाज स्वेज नहर में फंसा, तभी से इसके फंसने के कारणों पर चर्चा होने लगी. किसी ने शिप के कैप्टन और क्रू को जिम्मेदार ठहराया तो किसी ने रेगिस्तानी हवाओं को. लेकिन इस बीच कुछ लोगों ने एकदम अलग ही कारण खोज लिया. उन्होंने एक महिला को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया. कौन है ये महिला? क्या वो सचमुच इस जाम के लिए जिम्मेदार थी? अगर नहीं, तो उसके खिलाफ किसने साजिश रची? इन सब सवालों के जवाब देंगे इस आर्टिकल में. साथ ही यह भी जानेंगे कि भारत की मर्चेंट नेवी और इससे जुड़े एजुकेशन सेक्टर में महिलाओं की स्थिति क्या है? इसके साथ ही एक ऐसी महिला के बारे में आपको बताएंगे जो इस सेक्टर में अपने बलबूते पर सबसे ऊंचे पद पर पहुंचीं.

Marwa Elselehadar को बनाया गया निशाना

अभी मैंने आपको स्वेज नहर के जाम के बारे में बताया. यह भी बताया कि इस जाम से दुनिया को कितना बड़ा नुकसान हुआ. यह भी कि लोगों ने इसके पीछे तमाम लोगों को जिम्मेदार ठहराया लेकिन फिर बात आकर एक महिला पर रुक गई. उस महिला का नाम है मारवा एल्सलेहदर. मारवा मिस्र की पहली महिला शिप कैप्टन हैं. 29 मार्च को फंसे हुए एवर गिवेन जहाज को निकाल दिया गया. और इसके बाद मारवा के खिलाफ फेक न्यूज की बाढ़ गई. ट्रोल्स ने कहा कि यही होता है जब किसी महिला को जहाज चलाने की जिम्मेदारी दे दी जाती है. कुछ ने बकायदा फोटोशॉप के जरिए फेक आर्टिकल लिख दिए, यह बताते हुए किस तरह से मारवा की गलती की वजह से जहाज स्वेज नहर में फंस गया.

Marwa Elselehdar मिस्र की पहली शिप कैप्टन हैं. वे इस पद पर बड़ी मेहनत से पहुंची हैं. फोटो उनके इंस्टाग्राम से ली गई है.
Marwa Elselehdar मिस्र की पहली महिला शिप कैप्टन हैं. वे इस पद पर बड़ी मेहनत से पहुंची हैं. फोटो उनके इंस्टाग्राम से ली गई है.

लेकिन यह पूरी कहानी गलत थी. दरअसल, जब एवर गिवेन नाम का भारी भरकम जहाज स्वेज नहर में फंसा तब मारवा वहां से सैकड़ों किलोमीटर दूर एलेक्जेंड्रिया में थीं. वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, जहाज के फंसने के समय ना केवल मारवा अपनी जिम्मेदारी निभा रही थीं, बल्कि इसके बाद उन्होंने जहाज को निकलवाने में भी अपनी ओर से पूरी सहायता दी. गलत तरीके से खुद को टारगेट किए जाने के जाने को लेकर भी मारवा काफी दुखी हुईं. इसे लेकर उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर वीडियो भी डाला. इसमें उन्होंने कहा,

“मैं स्तब्ध थी. पहले ये तो लगता था कि मुझे टारगेट किया जाएगा क्योंकि मैं इस फील्ड में एक सफल महिला हूं. लेकिन मैं श्योर नहीं थी. फेक न्यूज पढ़कर मुझे दुख हुआ. क्योंकि मैंने इस पोजीशन पर पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है. जो कोई भी इस फील्ड में काम कर रहा है, उसे पता होगा कि आज मैं जिस पोजीशन पर हूं, वहां पहुंचने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है, कितना प्रयास करना पड़ता है. एक व्यक्ति को कई साल समुद्र में गुजारने पड़ते हैं. उससे भी पहले पढ़ाई करनी होती है. एग्जाम देने होते हैं.”

एल्सलेहदर का एक्सपीरिएंस कोई अनोखा नहीं है. महिलाओं को रोजमर्रा के स्तर पर इस तरह के एक्सपीरिएंस से दो चार होना पड़ता है. मसलन, सड़क पर अगर कोई महिला गाड़ी चलाती दिख जाती है, तो आसपास के पुरुष कहते हैं कि पक्का ये एक्सीडेंट करेगी. स्कूटी चलाती लड़कियों पर आए दिन तंज कसे जाते हैं. कहा जाता है कि मैडम, स्कूटी में ब्रेक हाथ से लगाने होते हैं, उसे पैरों से मत रोकना. कोई महिला अगर गाड़ी चला रही है और अगर उसका कोई छोटा मोटा एक्सीडेंट भी हो जाता है, तो इस तरह की वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर वायरल कराई जाती हैं. लोग शेयर करके चटखारे लेते हैं. गोया आदमियों से तो कभी एक्सीडेंट होते ही ना हों. जैसे वे तो मां की कोख से ही ड्राइविंग लाइसेंस लेकर आते हैं.

यह भी कहा जाता है कि महिलाएं इमोशन ड्रिवेन होती हैं. कभी भी गाड़ी रोक देती हैं, कभी भी अचानक से मोड़ देती हैं. सड़क पर कोई जाम लगा हो तो लोगों का पहला रिएक्शन यही होता है कि जरूर किसी महिला ड्राइवर की गलती की वजह से ये हुआ होगा. वो अलग बात है कि नासा के मिशन मार्स में जो रोवर मंगल ग्रह पर गया है, उस प्रोजेक्ट को एक महिला स्वाती मोहन ने ही लीड किया. उस रोवर की दिशा और गति तय करने की जिम्मेदारी उनकी ही थी. और उन्होंने उसे बखूबी निभाया भी.

मैरीटाइम सेक्टर में भारतीय महिलाओं का हाल

लौटते हैं मारवा एल्सहेल्दर पर. उनके लिए मिस्र की पहली महिला शिप कैप्टन बनना आसान नहीं था. उन्होंने इसके लिए बहुत मेहनत की. तमाम समाजों की तरह की मिस्र भी एक पुरुष प्रधान समाज है. वहां महिलाओं का इस तरह का जॉब करना अच्छा नहीं माना जाता. लेकिन मारवा ने लगभग हर ऑड को तोड़ते हुए अपने लिए जगह बनाई. और यही कारण रहा कि वो ट्रोल्स के निशाने पर आ गईं.

भारत में भी इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े अच्छे नहीं है. इंटरनेशनल मैरीटाइम एसोसिएशन नाम के संगठन के मुताबिक जहां दुनिया भर में इस क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का हिस्सा मात्र दो फीसदी है, वहीं भारत में ये एक फीसदी ही है. मतलब इस क्षेत्र में काम करने वाली केवल एक प्रतिशत महिलाएं ही या तो किसी शिप में कैप्टन हैं या फिर दूसरी लीड पोजीशन पर हैं. कमोबेश यही हाल मैरीटाइम एजुकेशन सेक्टर का है. एक रिसर्च पेपर के मुताबिक मैरिटाइम सेक्टर में पढ़ने वाले कुल स्टूडेंट्स में लड़कियों का हिस्सा केवल एक फीसदी है.

भारत सरकार ने इस सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के प्रयास भी किए हैं. इस संबंध में सरकार ने 2019 में कुछ नए नियम बनाए थे. ये नियम उन शिप मैनेजिंग कंपनियों पर लागू होती हैं, जो मर्चेंट नेवी एक्ट 1958 के तहत 500 ग्रॉस रजिस्टर्ड टनेज के शिप्स ऑपरेट करती हैं. इन नियमों के तहत महिलाओं को 2 साल का एज रिलैक्सेशन दिया गया है. इसके साथ ही साथ उनके रिक्रूटमेंट और प्लेसमेंट को भी आसान बनाया गया है. महिलाओं को मैटेरनिटी लीव देने और जहाजों पर जेंडर सेंसिटाइजेशन कार्यक्रम चलाने की बात भी इन नए नियमों में है. सरकार का मानना है कि ऐसा करने पर मर्चेंट नेवी सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी.

पहली बार भारत की छह महिला नवल ऑफिसर्स ने INSV तरिणी को ऑपरेट किया और पूरी दुनिया का चक्कर काटा.
पहली बार भारत की छह महिला नवल ऑफिसर्स ने INSV तरिणी को ऑपरेट किया और पूरी दुनिया का चक्कर काटा.

आर्टिकल की शुरुआत में हमने कहा था कि हम आपको ऐसी महिला के बारे में बताएंगे, जो अपने बलबूते पर मर्चेंट नेवी सेक्टर में सबसे ऊंची पोस्ट पर पहुंचीं. उनका नाम है राधिका मेनन. राधिका मेनन केरल के त्रिसूर जिले से ताल्लुक़ रखती हैं और भारत की पहली महिला मर्चेंट नेवी शिव कैप्टन हैं. 1991 में शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया में रेडियो ऑफिसर के तौर पर उन्होंने अपना करियर शुरू किया था. साल 2012 में उन्हें मर्चेंन नेवी में कैप्टन नियुक्त किया. उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मोड़ साल 2015 में आया. जब उन्होंने बंगाल की खाड़ी में एक डूबती नाव में फंसे सात मछुआरों की जान बचाई. उस समय खाड़ी में तूफान की स्थिति बनी हुई थी और जहां मछुआरे फंसे हुए थे, वहां जहाज लेकर जाना खतरे से खाली नहीं था. इसके लिए उन्हें इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन और भारत सरकार की तरफ से असाधारण साहस दिखाने का पुरस्कार भी मिला. पहली बार दुनिया में किसी महिला कैप्टन को यह अवॉर्ड मिला था. इस पूरे घटनाक्रम के बारे में उन्होंने भारत सरकार के सागरमाला प्रोजेक्ट की एक फिल्म में बात भी की. उन्होंने कहा-

“जब मैंने दूरबीन से देखा तो ऐसा लगा कि नाव में कोई नहीं है. वो नाव गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के तो काबिल नहीं थी. मौसम खराब था. तेज हवाएं चल रही थीं. और नाव बही चली जा रही थी. हम नाव के पास पहुंचे. गैंट लाइन नीचे डाली. जब तक नाव के लोग गैंट लाइन पकड़ते, वो और दूर चली गई. हमने दोबारा प्रयास किया. नाव अब हमारी शिप से टकरा रही थी. हमारी शिप भी बहुत ज्यादा हलचल कर रही थी. इसकी वजह से गैंट लाइन टूट गई. नाव और दूर चली गई. तीसरे प्रयास में हमें सफलता मिली. “

इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गेनाइजेशन ने जब उन्हें अवॉर्ड दिया तो राधिका ने बस इतना कहा कि वे तो केवल अपनी ड्यूटी कर रही थीं, किसी दूसरे कैप्टन की तरह ही. इसी तरह टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने उन चैलेंजेस के बारे में बताया, जो इस सेक्टर में महिलाओं के सामने आते हैं. उन्होंने बताया कि वो इन चुनौतियों के बारे में पहले से ही जानती थीं, इसलिए पूरी तैयारी के साथ आई थीं.

इसी इंटरव्यू में उन्होंने मैरीटाइम सेक्टर में महिलाओं की कम हिस्सेदारी और उन्हें किस तरह का माहौल मिलता है, इस बारे में भी बात की. उन्होंने बताया-

“ये सेक्टर ऐसा है, जहां पुरुषों की चलती है. जो भी महिला यहां काम करने आती है. उसे गलत तरीके से जज किया जाता है. उसकी योग्यता पर सवाल उठाए जाते हैं. माहौल उतना अच्छा नहीं होता. लेकिन धीरे-धीरे चीजें बदल रही हैं. महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है. लेकिन धीरे-धीरे ये भी ठीक हो जाएगी. पैरेंट्स को भी अपना माइंडसेट बदलने की जरूरत है. किसी भी दूसरे काम की तरह ही यह भी एक काम ही है.”

राधिका मेनन की तरह ही कुछ और महिलाओं ने भी इस सेक्टर में अपनी पहचान बनाई है. इनमें से एक नाम है सोनाली बनर्जी का. इलाहाबाद की सोनाली बनर्जी देश की पहली महिला मैरीटाइम इंजीनियर हैं.  इसी तरह चेन्नई की रेशमा निलोफर देश की पहली मैराटाइम पायलट हैं. इस सेक्टर में महिलाओं ने और भी उपलब्धियां हासिल की हैं. जैसे पहली बार भारत की छह महिला नवल ऑफिसर्स ने INSV तरिणी को ऑपरेट किया और पूरी दुनिया का चक्कर काटा. इन महिला ऑफिसर्स में लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी, पी स्वाती, बी एश्वर्या, प्रतिबा जामवाल और लेफ्टिनेंट पायल गुप्ता, एस विजया देवी शामिल थीं. हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में इस सेक्टर में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ेगी और वे नए रिकॉर्ड बनाएंगी.

ये भी उम्मीद करते हैं कि ऐसे मेल-डॉमिनेटेड पेशों में धीरे धीरे औरतें बढेंगी तो एक समाज के तौर पर हमारी बुद्धि थोड़ी खुलेगी. और दुनिया में होने वाले हर युद्ध, हर त्रासदी हर एक्सीडेंट का दोष हम बिना सोचे समझे महिलाओं पर मढ़ना बंद कर देंगे.


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