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जिन्होंने आलिया भट्ट के इस ऐड में हिंदू-मुस्लिम देख लिया, उन्हें जीवन में कुछ अच्छा नहीं लग सकता!

मान्यवर मोहे. औरतों के ट्रेडिशनल कपड़ों का ब्रांड है. सोशल मीडिया, टीवी नहीं होता तो इनकी दुकानों के बाहर लिखा मिलता- शादी-पार्टी के कपड़ों के ऑर्डर लिए जाते हैं. खैर. इनका एक नया ऐड आया है, जिसमें आलिया भट्ट नज़र आ रही हैं. इस ऐड को लेकर जमकर बवाल हो गया है. लोग मान्यवर मोहे पर हिंदू संस्कृति के अपमान के आरोप लगा रहे हैं. आलिया भट्ट और उनके परिवार को लेकर भद्दी बातें लिख रहे हैं.

क्या है इस ऐड में?

ऐड में Alia Bhatt एक दुल्हन बनी हैं. वो बता रही हैं कि कैसे एक बेटी न पराई होती है और न ही धन, जिसे किसी को दान कर दिया जाए. वो कहती हैं,

“दादी बचपन से कहती है, जब तू अपने घर चली जाएगी तुझे बहुत याद करूंगी… ये घर मेरा नहीं?… पापा की बिगड़ैल हूं, मुंह से बात निकली नहीं और डन. सब कहते थे पराया धन है इतना मत बिगाड़ो, उन्होंने सुना नहीं… पर ये भी नहीं कहा कि न मैं पराई हूं, न धन… मां चिड़िया बुलाती हैं मुझे. कहती है अब तेरा दाना-पानी कहीं और है… पर चिड़िया का तो पूरा आसमां होता है न?… अलग हो जाना, पराया हो जाना, किसी और के हाथ सौंपा जाना… मैं कोई दान करने की चीज़ हूं? क्यों सिर्फ कन्यादान?”

इसके बाद दिखाया जाता है कि दूल्हे के माता-पिता भी उसका हाथ वैसे ही पकड़कर आलिया के हाथ में देते हैं जैसे कन्यादान के वक्त लड़की के माता-पिता करते हैं. आखिर में आलिया कहती हैं, ‘नया आइडिया, कन्या मान.’

आप ऐड देखिए.

ये विज्ञापन सवाल कर रहा है उस पैट्रियार्किअल व्यवस्था पर जिसमें मायके में एक लड़की हमेशा पराए घर की होती है और ससुराल में पराए घर से आई लड़की. ये विज्ञापन सवाल कर रहा है कि कन्या क्या कोई चीज़ है जिसका दान कर दिया जाए? क्या किसी को एक व्यक्ति पर इतना अधिकार हो सकता है कि वो उसका दान कर सके? ऐसी कई लड़कियां हैं जो नहीं चाहतीं कि उनकी शादी में कन्यादान की रस्म हो, क्योंकि ये उन्हें ऑब्जेक्टिफाई करता है, किसी ऐसी चीज़ में रिड्यूस कर देता है जिसे एक व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति को दान कर सकता है. साथ ही ये रस्म उस विचार पर जोर देता है कि शादी के बाद एक लड़की की हर जिम्मेदारी उसके ससुराल के प्रति होती है, अपने माता-पिता और परिवार के प्रति नहीं.

ये पूरी बात इस विज्ञापन में बेहद अच्छे तरीके से कही गई है. कई लोगों ने इस ऐड की सराहना की है और सुझाव भी दिए हैं. एकता नाम की यूजर ने लिखा,

“कई बार भारतीय विज्ञापन फिल्मों और टीवी से ज्यादा प्रोग्रेसिव होते हैं.”

शाहनवाज़ नाम के यूजर ने लिखा,

“गहरे मैसेज के साथ एक खूबसूरत ऐड. रूढ़िवाद की बेड़ियों को तोड़ने का वक्त है. पुरानी परंपराओं के साथ-साथ लिंग आधारित नियमों को भी बदलने की ज़रूरत है.”

लॉइटरिंग लॉयर नाम के ट्विटर हैंडल से लिखा गया,

“ये विज्ञापन बराबरी की बात कर रहा है. जब एक माता-पिता अपनी बेटी सौंप रहे हैं, तो दूल्हे के माता-पिता भी अपना बेटा सौंपें. हो सकता है कि थ्योरी में कन्यादान की परंपरा रिग्रेसिव न हो, लेकिन केवल कन्या का दान रिग्रेसिव है. “

एक और ट्वीट में उन्होंने लिखा,

“जिस तरह सरकार पर सवाल उठाने से आप देश विरोधी नहीं हो जाते, उसी तरह अपने धर्म की रिग्रेसिव परंपराओं पर सवाल उठाने से आप एंटी हिंदू या एंटी मुस्लिम नहीं हो जाते. समय के साथ बढ़ने से ही हम उस पास्ट की बेड़ियों से निकल पाते हैं जिसके हम गुलाम रहे हैं.”

सागरिका चक्रवर्ती ने लिखा,

“जब तक हम पिछड़ी, दबाने वाली कुरीतियों पर बात नहीं करेंगे तब तक हम बदलाव की बात शुरू नहीं कर सकते.”

ये तो हुए वो लोग जो उस नज़रिए को समझ पा रहे हैं जो मान्यवर मोहे का ये विज्ञापन रखना चाह रहा है. लेकिन सोशल मीडिया ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जो संस्कृति और परंपरा के नाम पर इतने अंधे हुए बैठे हैं कि उन्हें सही सवाल भी अटैक लगते हैं. और इस कथित अटैक से बचने का उन्हें एक तरीका समझ आता है दूसरे धर्म पर सवाल, सवाल उठाते दिख रहे शख्स पर सवाल, उसके परिवार पर सवाल. ऐसा ही हो रहा है इस ऐड के साथ.

लोगों ने आलिया भट्ट की परवरिश पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. महेश भट्ट और पूजा भट्ट की वो तस्वीर ले आए जिसमें वो दोनों किस कर रहे हैं. कि आलिया की तो परवरिश ही ऐसी है. वो ऐसी ही बात करेंगी. कई लोग इसे सनातन धर्म पर हमला बता रहे हैं.

वृंदा नाम की यूज़र ने लिखा,

“कन्यादान एक पिता के जीवन का बड़ा और भावुक क्षण होता है. जिस बेटी को आपने बड़ा किया, उसका ख्याल रखा उसकी जिम्मेदारी उसके पति को सौंपना. ये पैट्रिआर्किअल है?”

हॉनेस्टली, वृंदा जी! यही पैट्रिआर्की है.

हालांकि, ज्यादातर लोग इस बात पर आहत हुए कि हिंदू धर्म की परंपरा पर सवाल उठ रहे हैं लेकिन दूसरे धर्म पर नहीं.

अभिजीत नाम के यूज़र ने लिखा,

“मा बारे में क्या मालूम है? और हमेशा हिंदुइज्म को टारगेट क्यों किया जाता है. मुस्लिमों पर वीडियो बनाओ. वो लोग निकाह को सेक्स का कॉन्ट्रैक्ट कहते हैं, उस पर वीडियो बनाओ. हिंदू आपके ग्राहक हैं और आप हमारे खिलाफ ही बात कर रहे हो?”

गौरव अरोड़ा नाम के यूज़र ने लिखा,

“तीन तलाक रोको. बुर्का बैन करो. पॉलीगैमी रोको. मस्जिदों में महिलाओं को जाने दो. उन्हें पढ़ने दो. उन्हें काम करने दो. फिल्म देखने दो. वो जो पहनना चाहती हैं पहनने दो. गाने दो. डांस करने दो. क्या आप इस्लाम की इन बुराइयों पर कभी बात करेंगी आलिया भट्ट?”

कुछ लोग तो इतने आहत हो गए कि उन्होंने मान्यवर को बायकॉट करने तक की बात कह दी.

मोहित वर्मा नाम के यूज़र ने लिखा,

“हमारे यहां दो शादियां होनी हैं. मैं प्रण लेता हूं कि मैं अपने परिवार और दोस्तों को मान्यवर से खरीदारी न करने को कहूंगा. ये ऐड हिंदू सेंटिमेंट्स के खिलाफ है. पहले कन्यादान का मतलब पता करो.”

कुछ लोगों ने ये भी लिखा कि मान्यवर एक ऐसा ब्रांड है जो महंगी, तामझाम वाली खर्चीली शादियाों को प्रमोट करता है. और दूसरी तरफ बराबरी का ढोंग दिखा रहा है. कई लोगों ने लिखा कि असल में चाहिए कि शादियों में इतने खर्च को प्रमोट न किया जाए. कोर्ट मैरिज या साधारण शादियों को प्रमोट किया जाए. ताकि उनमें होने वाली फिज़ूलखर्ची से बचा जा सके. हालांकि, मान्यवर मोहे एक ब्रांड है, जिसके विज्ञापन का सबसे पहला मकसद ही है अपना सामान बेचना. उसका टारगेट ऑडियंस ही वो परिवार हैं जहां शादी या कोई फंक्शन होना हो. ऐसे में उससे ये उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वो महंगी शादियों के खिलाफ स्टैंड ले.

ये आप पर निर्भर करता है कि आप कैसी शादी करना चाहते हैं. लेकिन मान्यवर का ये विज्ञापन किसी भी नज़रिए से धार्मिक भावना आहत करने वाला नहीं है. एक ज़माना होता था, जब लड़कियों को पढ़ने-नौकरी पर जाने की आज़ादी नहीं होती थी. तब कन्यादान के रूप में पिता उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी उनके पति को सौंपते थे. लेकिन अब वक्त बदल गया है. लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हैं. वो समाज और घर की जिम्मेदारी उतनी ताकत से निभा रही हैं जितनी ताकत से पुरुष निभा रहे हैं. तो जब जिम्मेदारियां बंट रही हैं तो रिवाज़ भी उस हिसाब से बदलने चाहिए. और सबसे ज़रूरी ये है कि एक लड़की को उसके पिता, पति या भाई जिम्मेदारी की तरह देखना बंद करें और एक इंसान के तौर पर देखें. आखिर में, जितना गलत बुर्का है, उतना ही गलत घूंघट है. जितना गलत औरतों को मस्जिद में जाने से रोकना है, उतना ही गलत पीरियड्स के दिनों में उनके साथ भेदभाव करना है. सही है तो सिर्फ बराबरी. बराबर अधिकार. जीवन पर, प्रेम पर, अधिकारों पर और जिम्मेदारियों पर भी.


आते ही छा गया कैडबरी कंपनी का नया ऐड, क्या खास है उसमें?

 

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