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कोरोना कहकर लड़की पर थूकने के पीछे दो सौ साल पुरानी नफरत बोल रही है

नज़ीर एक:

साल 2020. दिल्ली का विजयनगर. यहां कई स्टूडेंट्स रहते हैं. पास में नॉर्थ कैम्पस है दिल्ली यूनिवर्सिटी का. इसलिए यहां पर कई पीजी और फ्लैट्स हैं. यहीं की एक लड़की. मणिपुर की. उसके ऊपर किसी ने गुटखे की पीक फेंकी. कथित रूप से ‘कोरोना’ चिल्लाकर. और फिर अपने सफ़ेद स्कूटर पर निकल गया.

इस घटना के वायरल होने के बाद गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के लिए एक एडवाइजरी जारी की. उस एडवाइजरी में कहा गया,

ऐसे मामले सामने आए हैं जहां उत्तर-पूर्व के लोगों को COVID-19 से जोड़ कर उन्हें परेशान किया गया है. ये नस्लभेदी है, और उनके लिए पीड़ादायक और दिक्कत पैदा करने वाला है. राज्यों की कानून संबंधी एजेंसियों से दरख्वास्त है कि उन्हें इस मामले को लेकर संवेदनशील बनाया जाए, और इस तरह के हैरेसमेंट के मामले जब रिपोर्ट हों तो वे सही एक्शन लें. 

नज़ीर दो:

साल 2014. दिल्ली का लाजपतनगर. यहां पर 20 साल का निदो तानियाम नाम का लड़का अपने दोस्त से मिलने आया था. पास की एक दुकान से एक पता पूछा. वहां कथित रूप से उसके बालों के स्टाइल का मज़ाक बनाया गया. उस पर नस्लभेदी टिप्पणी की गई. बात बढ़ गई, और सात-आठ लोगों ने मिलकर निदो को बहुत मारा-पीटा. बीच-बचाव के बाद वो टिटनेस का इंजेक्शन लेकर घर लौटा. रात को सो गया, लेकिन अगले दिन उठा नहीं. निदो को AIIMS ले जाया गया, तो पता चला उसकी मौत हो चुकी है.

Nido Taniam
निदो अरुणाचल प्रदेश से था. उसे लोगों ने दिल्ली में पीट-पीट कर मार दिया. उसके बालों और उसके स्टाइल का मज़ाक उड़ाया था. नस्ली टिप्पणियां की थीं उसपर. ऐसे आरोप लगे. (तस्वीर: ट्विटर)

नज़ीर तीन:

आज़ादी से पहले का भारत. कई क्लब और जिमखानों के बाहर एक तख्ती टंगी होती थी. उन पर लिखा होता था, इंडियन्स एंड डॉग्स नॉट अलाउड. यानी भारतीयों और कुत्तों का अंदर आना मना है. ये इसलिए, क्योंकि श्वेत ‘मालिक’ इन देसी लोगों के संपर्क में कैसे आ सकते थे. ये उनके स्तर से बेहद नीचे की बात थी.

Dogs And Indian Not Allowed Rep Image
आज़ादी से पहले इस तरह के साइनबोर्ड दिखना भारत में आम बात थी. (सांकेतिक तस्वीर)

नज़ीर चार:

साल 1941 से लेकर 1945. नाज़ी जर्मनी और उसके आस-पास का इलाका. यहां तकरीबन साठ लाख यहूदी लोगों को मार डाला गया. कंसंट्रेशन कैम्प्स में. मास शूटिंग में. क्योंकि उन्हें मरवाने वाला एडोल्फ हिटलर ये मानता था कि दुनिया में सिर्फ आर्य नस्ल ही सबसे ‘शुद्ध’ है. उनके अलावा ‘अशुद्ध’ नस्लों को जीने का हक़ नहीं होना चाहिए.

Holocaust Wiki
मानव इतिहास के सबसे शर्मनाक कृत्यों में से एक, जिसने ना सिर्फ जानें लीं, बल्कि पूरी दुनिया को सिखा दिया कि नफरत को अगर समय रहते रोका न जाए तो क्या हो सकता है. (तस्वीर: विकिमीडिया कॉमन्स)

नज़ीर पांच:

साल 1954. अमेरिका. कथित ‘आज़ाद लोगों का देश’. इस साल तक अमेरिका के राज्यों में श्वेत और अश्वेत बच्चों की पढ़ाई के लिए अलग स्कूल रखे जाने का प्रावधान था. इस साल सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय सुनाया कि राज्यों द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में इस तरह का नस्लभेद नहीं चलेगा. भले ही श्वेत और अश्वेत बच्चों की संख्या बराबर ही क्यों न हो.

Linda Brown And Her Baby
अमेरिकी स्कूलों में नस्लभेदी व्यवस्था को पलट दिया गया था, लेकिन ये शुरुआत थी. इस तस्वीर में एक अश्वेत मां अपनी बेटी को इस महत्वपूर्ण फैसले के बारे में बता रही है. मां का नाम नेटी हंट, और बेटी का निकी हंट है. ये सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियों पर बैठी हुई हैं.(तस्वीर: ट्विटर)

नज़ीर छह:

साल 1955. रोजा पार्क्स. एक अश्वेत महिला. बस पकड़ कर कहीं जा रही थीं. उस बस में श्वेत और अश्वेत पैसेंजर्स के लिए सीटें अलग थीं. अश्वेत लोग बस में पीछे बैठते थे. श्वेत लोग आगे. उस दिन बस में श्वेत पैसेंजर्स की संख्या बढ़ गई. तो ड्राइवर ने रोजा और उनके साथ बैठे दूसरे अश्वेत लोगों को सीट खाली करने के लिए कहा. रोजा ने अपनी सीट देने से मना कर दिया. ड्राइवर ने पुलिस बुलाई, और रोजा गिरफ्तार हो गईं.

Rosa Parks
रोजा पार्क्स, जो अश्वेत लोगों के हक़ के लिए लड़ने वाला एक महत्वपूर्ण चेहरा बनीं, पहले अमेरिका में, उसके बाद पूरे विश्व में मानव अधिकारों के लिए. (तस्वीर: विकिमीडिया कॉमन्स)

ऊपर लिखी बातें कहानियां नहीं हैं. ये घटनाएं हैं, जो साल-दर-साल घटी हैं. उन्नीसवीं सदी से लेकर 2020 तक. एक देश से लेकर दूसरे देश तक. जिनमें एक पूरी पहचान पर सवाल खड़े किए गए. उनका दमन किया गया. क्योंकि वो उस नस्ल से नहीं थे, जिस नस्ल को दुनिया ‘सर्वोत्तम’ मानती थी.

रेसिज्म. नस्लभेद.

मेरियम वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार इस शब्द की परिभाषा ये है:

रेसिज्म का मतलब एक ऐसी विचारधारा है, जो मानती है कि नस्ल से ही किसी भी व्यक्ति का मूल स्वभाव निर्धारित होता है. इन नस्लों में जो अंतर होता है, उसके आधार पर कोई एक नस्ल, बाकियों से श्रेष्ठ होती है.

कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी, COVID-19. ख़बरों में लगातार बनी हुई है. उन ख़बरों का पहलू एक ये भी है. जो आपने ऊपर पढ़ा. आप पूछेंगे, बीमारी का नस्लभेद से क्या लेना देना. इटली के लोग भी प्रभावित हुए, स्पेन के भी. जर्मनी में भी मौतें हो रही हैं, भारत में भी. फिर इसमें नस्ल का क्या काम?

न्यूयॉर्क. अमेरिका का ही एक शहर. यहां पर इस वक़्त पांच ऐसे मामलों में पुलिस जांच कर रही है, जिसमें  एशियन नस्ल के लोगों के साथ हिंसा हुई. हिंसा करने वालों के पास उनकी वजह थी- ‘ये लोग हमारे देश में कोरोना फैला रहे हैं’. वही वजह, जो उस मणिपुरी लड़की पर थूकने वाले आदमी के पास थी. जो निदो तानियाम को सरेआम पीटने वालों के पास थी. जो रोजा पार्क्स को उनकी सीट से उठा देने वालों के पास थी. जो यहूदियों को आग में झोंक देने वाले हिटलर के पास थी. वजह ये कि,

‘मेरी सभी दिक्कतों की वजह ये नस्ल, और इससे जुड़े लोग हैं. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी’.

नफरत का ककहरा

जब से कोरोना वायरस वैश्विक महामारी बना है. तब से ही चीन और उसके आस-पास के देशों के लोग पूरी दुनिया में टारगेट किए जा रहे हैं. इसे ‘चाइनीज वायरस’ कहा जा रहा है. इस शब्द का इस्तेमाल अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी किया है. कुछ लोग इसे ‘वुहान वायरस’ भी कह रहे हैं क्योंकि इसके शुरूआती मामले चीन के वुहान में मिले. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब किसी बीमारी की वजह से किसी ख़ास देश के लोगों को टारगेट किया गया हो. इससे पहले भी जब SARS इन्फेक्शन फैला था, तब भी चीन और पूर्वी एशिया के लोगों को पूरी दुनिया में टारगेट किया गया था. जब 2014 में इबोला वायरस फैला, तब अफ्रीका के लोगों के ऊपर नस्लभेदी टिप्पणियां की गईं. 1853 में जब अमेरिका में पीला बुखार फैला था, तब यूरोप से आए लोगों के साथ हिंसा की गई थी.

इस वजह से वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने COVID-19 के साथ ऐसा कोई नाम लगाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जिससे ये पता चल सके कि ये वायरस फैला कहां से. इबोला (Congo नाम के देश की एक नदी है ये) और MERS (Middle East Respiratory Syndrome) जैसे वायरसों के नाम उनके उद्गम स्थानों के आधार पर रखे गए थे. इस बार ऐसा नहीं किया गया. लेकिन फिर भी लोग इसे चाइनीज वायरस कहने, और एशियाई लोगों के साथ नस्लभेद करने से लोग पीछे नहीं हट रहे.

इस ट्वीट में लिखा है, ट्रंप को कोरोनावायरस को ‘चाइनीज वायरस’ कहना बंद कर देना चाहिए. ऐसा तो नहीं है कि H1N1 स्वाइन फ़्लू की महामारी को कोई ‘अमेरिकन पिग फ़्लू’ कहता है क्योंकि इसकी शुरुआत उत्तरी अमेरिका में सूअरों के फ़ार्म में हुई थी. हम सब इसमें एक राष्ट्र की तरह एक साथ खड़े हैं. ये सब रुकना चाहिए.

लेकिन ट्रंप बेझिझक इसे चाइनीज वायरस कह रहे हैं. एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जब उनसे पूछा गया कि इस शब्द का इस्तेमाल वो क्यों कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा, ‘क्योंकि ये वायरस चाइना से आया है’. ये समझे और जाने बगैर कि उनका इस तरह का बयान उनके अपने ही देश में मौजूद कई लोगों के खिलाफ नफरत भर रहा है.

Asia Map
तस्वीर में एशिया का मैप. लाल घेरे में जो देश दिख रहे हैं, ये पूर्वी (ईस्ट एशिया) के देश हैं. ध्यान से देखने पर इसमें चीन के साथ साथ भूटान, वियतनाम, म्यांमार, थाईलैंड,साउथ कोरिया, नॉर्थ कोरिया, जापान भी दिखाई देंगे. भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर जैसे देश दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे हैं. जैसे-जैसे आप बाईं तरफ बढ़ेंगे, उस इलाके को मिडिल ईस्ट कहा जाएगा. जिनमें सऊदी अरब, ईरान, यमन, सीरिया जैसे देश दिखाई देंगे. (तस्वीर साभार: Maps.com)

क्या नस्लभेद सिर्फ श्वेत-अश्वेत लोगों की दिक्कत है?

नस्लभेद, सिर्फ सफ़ेद चमड़ी का भूरी या काली चमड़ी के खिलाफ नफरत का होना नहीं है. जब गुलामी की प्रथा अपने चरम पर थी, तब सत्ता श्वेत लोगों के हाथ में थी. उनकी नफरत को कानून का सहारा मिला हुआ था. वे अपने लिए मसालों, और फर्नीचर की तरह इंसान खरीद सकते थे. उनकी महिलाओं का यौन शोषण कर बच्चे पैदा कर सकते थे. उनके लिए ये सज़ा नहीं थी. उनके लिए ये एक रूटीन था.

आज वो प्रथा नहीं है. लेकिन क्या इसका ये मतलब है कि वो भेदभाव भी नहीं है? या बाकी देशों में नहीं है?

12 Years A Slave
फिल्म 12 ईयर्स अ स्लेव (12 Years A Slave) का एक सीन. ये कहानी है एक ऐसे अश्वेत आदमी की जिसे किडनैप करके गुलामी करने के लिए बेच दिया जाता है. 12 सालों तक फिर वो एक गुलाम की तरह अपनी जिंदगी काटता है. (तस्वीर: विकिमीडिया)

इस वायरस को लेकर चीन को टारगेट करने में भारतीय भी पीछे नहीं हैं. कई वॉट्सऐप फॉरवर्ड ये बताने में जुटे हैं कि चीनी लोगों का खान-पान ही इस पूरे फसाद की जड़ है. इस वजह से चीनी लोग, या उनसे मिलती-जुलती किसी भी राष्ट्रीयता/पहचान वाले लोग उनके लिए एक ईजी टारगेट हैं. चाहे वो थाईलैंड से हों, वियतनाम से हों, या कोरिया से हों. भारत के उत्तर -पूर्वी राज्यों से आने वाले लोग अक्सर इस तरह के भेदभाव का सामना करते हैं. भारत के उत्तरी राज्यों में दक्षिणी राज्यों से आने वाले लोग भी इस तरह का नस्लभेद झेलते हैं.

अप्रैल 2017 में बीजेपी के पूर्व राज्यसभा सांसद रह चुके तरुण विजय ने एक बयान दिया था. मामला था दिल्ली में अश्वेत प्रवासियों पर हुई नस्ली हिंसा का. भारत में अफ्रीका के प्रतिनिधियों ने कहा था, कि इस तरह की हिंसा पूरी तरह से नस्लभेद से उपज रही है. इसके विरोध में तरुण विजय ने कहा था,

‘अगर हम नस्लभेद करते, तो दक्षिण क्यों होता हमारे साथ? हम उने साथ कैसे रहते हैं. हमारे आस पास भी तो काले लोग हैं’.

उन्होंने बाद में माफ़ी मांगकर बचने की कोशिश भी की, लेकिन चिड़िया खेत चुगकर उड़ गई थी. और ट्विटर हैंडल पर जाकर बैठ गई थी. बहुत थुक्का-फजीहत हुई.

लेकिन बात वहीं रही. ऑनलाइन थुक्का-फजीहत तक. उसका असर कुछ नहीं हुआ. होता, तो शायद आज भी देश की राजधानी में ‘चिंकी’ और ‘मोमो’ जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं किए जा रहे होते. किसी लड़की पर थूका नहीं गया होता. उसे कोरोना नहीं कहा जा रहा होता.

दो चीज़ें हैं.

1. ये घटना दिखाती है कि हम रेस यानी नस्ल को लेकर अब भी कितना कम जानते हैं. शक्ल-सूरत में थोड़ी बहुत भी समानता होने पर एक नस्ल को दूसरे से जोड़ दिया जाता है. इस तरह ‘बाहरी’ एलिमेंट्स और  ‘भीतरी’ एलिमेंट्स को भी वो हिंसा झेलनी पड़ती है.

2. अगर वो लड़की सच में चीन से होती भी, तो क्या उसके साथ इस तरह की हिंसा जायज़ होती? कभी नहीं. इससे ये पता चलता है कि नस्लभेद देश के भीतर हो, या बाहर, दिक्कत इस कांसेप्ट से होनी चाहिए. उससे उपजने वाली हिंसा तो बाईप्रोडक्ट है.

तो क्या नस्लभेद कभी ख़त्म नहीं होगा?

टोनी मॉरिसन. अमेरिका की थीं. अश्वेत. लेखिका थीं. साहित्य का नोबेल मिला था इन्हें. इनके लिखे हुए कई उपन्यास बेहद पॉपुलर हुए. जैसे सांग ऑफ सोलोमन, और द ब्लूएस्ट आई. 2019 में ही इनका देहांत हुआ. नस्लभेद पर इन्होंने काफी कुछ लिखा, और बोला भी.

Toni Morrison
टोनी मॉरिसन ना सिर्फ लेखिका थीं, बल्कि अश्वेत लोगों के अधिकारों के काम करने वाले एक नामी एक्टिविस्ट भी थीं. (तस्वीर: विकिमीडिया कॉमन्स)

नेशनल पब्लिक रेडियो की होस्ट मिशेल मार्टिन ने इनसे एक सवाल पूछा था. 2009 में. सवाल ये था कि ‘पोस्ट रेशियल’ शब्द इस्तेमाल करने से उन्हें क्या आपत्ति है. पोस्ट रेशियल का मतलब होता है एक ऐसा समय जो नस्लभेद के काल से परे है, उसके बाद शुरू हुआ है. इस पर टोनी ने बेहद सधा हुआ जवाब देते हुए बताया था कि इस शब्द से क्या दिक्कत होनी चाहिए:

‘ये शब्द जिस चीज़ की तरफ इशारा करता है, मुझे नहीं लगता कि वो सच है. ये शब्द दिखाता है कि नस्लभेद देश से ख़त्म हो गया है. ऐसा नहीं है. नस्लभेद तभी ख़त्म होगा, जब

# इससे मिलने वाली सुविधाएं खत्म हो जाएंगी, और इससे मानसिक रूप से जिन लोगों को फायदा पहुंचता है, उन्हें ये फायदे नहीं मिलेंगे. जब ऐसा होगा, तब नस्लभेद भी ख़त्म हो जाएगा. लेकिन इस वक़्त कई लोग इससे खूब पैसा कमा रहे हैं. फायदे उठा रहे हैं.

#लेकिन सबसे महत्वपूर्ण ये कि नस्लभेद कई लोगों को एक तरह की पीड़ा से बचा लेता है. अगर आप नस्लभेद उनसे छीन लोगे, तो उनके पास क्या रह जाएगा? उन्हें अचानक से कष्ट होगा, खुद से कष्ट होगा, कि आखिर वो हैं कौन. उनके लिए बस ये कहना आसान है, कि ‘वहां वो जो आदमी है, वही मेरे सभी दुखों का कारण है’.

ये सुना-सुना सा लगता होगा आपको?

क्योंकि 2019 और 2020 में भी इसी तरह के तर्क देकर नस्लभेद को जस्टिफाई किया जाता है. इस का इस्तेमाल डॉनल्ड ट्रंप मेक्सिकन लोगों के खिलाफ दीवार बनवाने के लिए करते हैं. अपने देश में अश्वेत लोगों और उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ हिंसा करने के लिए करते हैं. कई देश अपने-अपने बॉर्डर बंद करने के लिए करते हैं.और गोरेपन की क्रीम बेचने वाली कम्पनियां, अपनी क्रीमें बेचने के लिए करती हैं.

कोई उम्मीद बर नहीं आती?

तो क्या उम्मीद करें? बैठे रहें? देखते रहें? हमने हिंसा नहीं की. तो हमारी क्या गलती. हम क्या कर सकते हैं? सवाल आता है मन में. हम उम्मीद कर सकते हैं. नफरत देखकर मुंह फेरने के बजाय उसकी आंखों में आंखें डाल कर देख सकते हैं. तब तक घूर सकते हैं जब तक वो नज़रें झुका कर हट ना जाए. और याद कर सकते हैं मार्टिन लूथर किंग को. अश्वेत लोगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले बहुत बड़े नेता थे. उनके इन शब्दों को. जो उन्होंने 28 अगस्त 1963 को दिए अपने ऐतिहासिक भाषण में कहे थे:

‘मेरा एक सपना है. कि मेरे चार छोटे बच्चे एक दिन ऐसे देश में रहेंगे जहां पर उन्हें उनकी चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र के आधार पर जज किया जाएगा. आज मेरा एक सपना है’.


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