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बड़ी-बड़ी कंपनियों की बनाई लिपस्टिक का जो सच सामने आया वो डराने वाला है

हाल ही में एक स्टडी सामने आई है. Environmental Science and Technology जर्नल में. ये स्टडी कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स को लेकर की गई थी. अमेरिका और कनाडा में अलग-अलग ब्रांड के करीब 231 मेकअप और सेल्फ केयर प्रोडक्ट्स के सैंपल्स को स्टडी में शामिल किया गया था. स्टडी में इन प्रोडक्ट्स में से ज्यादातर में बेहद हानिकारक केमिकल्स की मौजूदगी पाई गई है. इन केमिकल्स को कहते हैं PFAS. इसका पूरा नाम है पर-फ्लूरो-अलकिल एंड पॉली-फ्लूरो-अलकिल सब्सटेंसेस. इसे चलती-फिरती भाषा में ‘फॉरेवर केमिकल्स’ भी कहा जाता है.

‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 100 से भी ज्यादा प्रोडक्ट्स में फ्लोरीन काफी ज्यादा मात्रा में पाया गया है, जो PFAS की मौजूदगी को दर्शाता है. जिन प्रोडक्ट्स की जांच की गई, उनमें- लिपस्टिक, मसकारा, फाउंडेशन, लिप बाम, ब्लश, नेल पॉलिश शामिल हैं. और जिन ब्रांड्स के प्रोडक्ट्स की सैंपलिंग की गई, उनमें कई नामी ब्रांड शामिल थे. हालांकि स्टडी में इस बात का खुलासा नहीं हुआ है कि इनमें से किस ब्रांड के प्रोडक्ट में PFAS की मौजूदगी मिली है. क्योंकि अधिकारी नहीं चाहते थे कि वो अभी किसी ब्रांड को टारगेट करें.

कितने प्रोडक्ट्स में केमिकल मिला?

हालांकि अगर प्रोडक्ट्स की कैटेगिरी की बात करें, तो जांच गिए गए कुल सैंपल्स में से 82 फीसद वॉटरप्रूफ मसकारा में हाई फ्लोरीन मिला, 63 फीसद फाउंडेशन में और 62 फीसद लिक्विड लिपस्टिक में ये केमिकल मिला. जिस केमिकल की मौजूदगी मिली है, ‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, वो कैंसर, बर्थ डिफेक्ट्स, लिवर की बीमारी, थायरॉइड की दिक्कत, इम्युनिटी कम करने, हॉर्मोन्स की दिक्कत जैसी सीरियस हेल्थ प्रॉब्लम्स का कारक हो सकता है. PFAS केमिकल आसानी से पर्यावरण से इंसान के शरीर के अंदर जा सकता है. इसे इंसान का शरीर आसानी से अपने अंदर समा सकता है. फिर चाहे वो टियर डक्ट्स के ज़रिए हो या फिर मुंह के ज़रिए.

कंपनियां अक्सर ही अपने प्रोडक्ट्स की लेबलिंग में PFAS की मौजूदगी को नहीं दिखातीं. इस वजह से कस्टमर को पता ही नहीं चलता कि जो प्रोडक्ट्स को इस्तेमाल कर रहे हैं वो सही है भी या नहीं. हालांकि स्टडी में ये सामने आया है कि PFAS ज्यादातर उन प्रोडक्ट्स में मिला है, जिनके विज्ञापनों में लॉन्ग लास्टिंग और वॉटरप्रूफ होने का दावा किया जाता है. माने स्टडी में ये सामने आया है कि प्रोडक्ट्स को वॉटरप्रूफ, लॉन्ग लास्टिंग और आसानी से अप्लाई करने वाला बनाने में PFAS का ही योगदान है. हालांकि स्टडी में ये भी कहा गया है कि इन प्रोडक्ट्स की सप्लाई चेन काफी कॉम्प्लिकेटेड है, इस वजह से ये अभी साफ नहीं है कि कंपनियां इन ज़हरीले केमिकल्स की मौजूदगी के बारे में जानती भी थीं या नहीं.

Beauty Products (2)
लिपस्टिक को लेकर भारत में भी स्टडी हो चुकी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

क्या है PFAS?

ये केमिकल कार्बन और फ्लोरीन के एटम्स की काफी कॉम्प्लिकेटेड सी चेन है. इन एटम्स के बीच बॉन्ड काफी स्ट्रॉन्ग है, यही वजह है कि PFAS केमिकल्स आसानी से पर्यावरण में डिग्रेड नहीं होते. PFAS के करीब 4700 केमिकल्स अभी हमारे बीच मौजूद हैं. इन केमिकल्स का इस्तेमाल काफी बड़े लेवल में किया जाता है.

भारत में क्या हाल?

इस स्टडी ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया. ये कि क्या वाकई कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स इतने ज्यादा हानिकारक हो सकते हैं? ये जो स्टडी हमने आपको अभी बताई, वो अमेरिका और कनाडा में हुई. अब बात करते हैं भारत की. भारत की अगर बात करें तो ये कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का काफी बड़ा मार्केट है. और सबसे बड़ी ग्राहक हैं महिलाएं. और इन प्रोडक्ट्स में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला प्रोडक्ट है लिपस्टिक. लिपस्टिक वो बेसिक कॉस्मेटिक है जिसे मैं और आप आम दिनों में लगाते हैं. लगाकर ऑफिस चले जाते हैं, घूमने चले जाते हैं. इसलिए ये जानना बेहद ज़रूरी है कि लिपस्टिक में हमारे यहां किस तरह के केमिकल्स या पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है.

इसे लेकर जनवरी 2014 में एक रिपोर्ट सामने आई थी. ये रिपोर्ट भारत के सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट यानी CSE में पॉल्यूशन मॉनिटर लैब माने PML ने जारी की थी. अलग-अलग कैटेगिरी के 73 कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स पर ये स्टडी हुई थी. पता चला था कि इनमें मरक्यूरी जैसे कुछ बेहद हानिकारक मेटल्स मौजूद थे. CSE के डिप्टी डायरेक्टर जनरल चंद्र भूषण ने कहा था-

“भारत में कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल काफी बढ़ रहा है. इसलिए इसका हेल्थ पर क्या असर होता है, इसे जानना भी ज़रूरी था. इसलिए हमने स्टडी की. मोटिवेशन यही था कि इसके पहले इंडिया के पब्लिक डोमेन में इस तरह की कोई भी बड़ी स्टडी नहीं हुई थी. हमने 32 फेयरनेस क्रीम को टेस्ट किया, 30 लिपस्टिक सैंपल्स को टेस्ट किया, कुछ लिप-बाम और एंटी-एजिंग क्रीम को भी टेस्ट किया. टोटल 73 कॉस्मेटिक प्रोडक्ट को टेस्ट किया था. 40 फीसद से ज्यादा फेयरनेस क्रीम्स में हमें मरक्यूरी मिला. जबकि फेयरनेस क्रीम्स में मरक्यूरी के इस्तेमाल पर बैन लगा हुआ है. माने जो मरक्यूरी की मौजूदगी हमें मिली, वो ये बता रही थीं कि ये गैर-कानूनी काम हुआ. 60 फीसद लिपस्टिक में कुछ हैवी मेटल्स थे, जिनमें दो थे क्रोमियम और निकल. क्रोमियम तो बहुत ही हानिकारक है. अगर टोटल बताया जाए तो 50 फीसद से ज्यादा सैंपल्स में हमें या तो मरक्यूरी मिला, या क्रोमियम या निकल मिला.”

2014 की इस रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि सरकार नियम-कानून को कठोर बनाए और क्रोमियम-निकल के इस्तेमाल पर रोक लगाए. क्योंकि कॉस्मेटिक इंडस्ट्री अपनी तरफ से ये काम नहीं कर रही थी. अक्टूबर 2019 में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक रिपोर्ट छपि थी, जिसमें बताया गया था कि FDA यानी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने 100 से भी ज्यादा लिपस्टिक्स को टेस्ट किया. और पाया कि सभी में लेड, जो खुद एक केमिकल एलिमेंट है, वो मौजूद था.

ये सारे प्रोडक्ट्स किसी ने किसी तरह से इंसान की हेल्थ के लिए हानिकारक हैं. इस मुद्दे को और डिटेल में जानने के लिए हमने बात की डर्मेटोलॉजिस्ट डॉक्टर पंकज चतुर्वेदी से. उन्होंने कहा-

“इन केमिकल्स के साइड-इफेक्ट्स जो हैं, जो लॉन्ग टर्म में देखे गए हैं, वो हैं कैंसर, लिवर डैमेज, इनफर्टिलिटी, थायरॉइड डिसऑर्डर और भी बहुत सारे हॉर्मोनल चेंजेस. ये सारे छोटे-मोटे साइड-इफेक्ट्स नहीं हैं. हमें पता है कि कैंसर के मामले टाइम के साथ बढ़ रहे हैं. पहले इतना फ्रिक्वेंटली नहीं होते थे. लेकिन अब कैंसर बढ़ रहा है. तो हमें पता करना होगा कि आखिर क्या कारण है. अगर बिना जानकारी के ये केमिकल्स शरीर में समा रहे हैं तो ये भी कैंसर का कारण हो सकते हैं. जैसे लिपस्टिक और मसकारा को आप बहुत ही नाज़ुक पार्ट्स में इस्तेमाल करते हैं. लिपस्टिक आप होठों पर लगाते हैं, मान लीजिए उसमें कोई हानिकारक केमिकल है, तो वो आसानी से आपके शरीर में चला जाएगा. मसकारा टियर डक्ट्स के ज़रिए बहुत जल्दी अंदर चला जाएगा.”

Dr Pankaj

जैसे-जैसे कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में हानिकारक केमिकल्स के इस्तेमाल की बातें सामने आ रही हैं, वैसे-वैसे ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स का मार्केट बूम कर रहा है. कई सारी कंपनियां ये दावा करती हैं कि उनके प्रोडक्ट्स ऑर्गेनिक हैं और वो हेल्थ को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. क्या वाकई ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स, केमिकल वाले कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स से बेहतर हैं, इसके जवाब में डॉक्टर पंकज चतुर्वेदी ने कहा-

“आइडियली हां, ऑर्गेनिक कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स, लिपस्टिक्स, वो केमिकल वाले प्रोडक्ट्स से ज्यादा सुरक्षित हैं. लेकिन बात वही आ जाती है कि बड़े ब्रांड्स भी इसका खुलासा नहीं कर रहे हैं कि उन्होंने कौन-से केमिकल इस्तेमाल किए थे, या जो केमिकल स्टडी में पाए गए उनका सोर्स क्या था. ऑर्गेनिक लिखने भर से कुछ नहीं होता, ऑर्गेनिक होना चाहिए.”

क्या है लिपस्टिक का इतिहास?

जितने भी कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल अभी हो रहा है, उनमें लिपस्टिक सबसे ज्यादा चलन में है, ऐसा हमने पाया. हालांकि हमें इसे साबित करने के लिए कोई सटीक डेटा नहीं मिला, लेकिन आस-पास की औरतों से बात करने पर पता चला कि लिपस्टिक सभी मेकअप प्रोडक्ट्स में उनका पसंदीदा है. ये एक एवरग्रीन प्रोडक्ट है. लेकिन आप लिपस्टिक को केवल मेकअप प्रोडक्ट कहकर अपनी बात बंद नहीं कर सकते, क्योंकि अगर इतिहास और कल्चर को देखें, तो लिपस्टिक की अपनी एक अहम जगह है. ये काफी हद तक महिला सशक्तिकरण का एक सिंबल भी माना जाता रहा है.

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लिपस्टिक का कलरफुल इतिहास सदियों पीछे ले जाता है. 3500 BC यानी बिफोर क्राइस्ट के आस-पास इसकी शुरुआत हुई थी. मेसोपोटामिया की चार प्राचीन सभ्यताओं में से एक प्राचीन उर की क्वीन शूब-एड ने लिप कलर का इस्तेमाल किया था. उन्होंने सफेल लेड यानी सीसा और लाल जेम्स यानी रत्नों के चूरे को मिलाकर होठों पर लगाने वाला रंग बनाया था. यहां से फिर ये रंग होते हुए इजिप्ट तक पहुंचा. ‘स्टाइल क्रेज़’ वेबसाइट के मुताबिक, प्राचीन समय में मेकअप को स्टेटस सिंबल की तरह देखा जाता था. आदमी और औरत दोनों ही मेकअप अप्लाई करते थे. सुमेरियन सिविलाइज़ेशन को लिपस्टिक के शुरुआती इस्तेमाल का क्रेडिट दिया जा सकता है. यहां लोगों ने फ्रूट्स और बाकी नेचुरल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करके लिप कलर तैयार किया था. माने सुमेरियन्स और उर सभ्यता से आप लिपस्टिक की शुरुआत मान सकते हैं.

इजिप्ट के लोग लिपस्टिक के पहले असली प्रेमी माने गए. डाई का इस्तेमाल करके ये लिपस्टिक बनाते थे. हालांकि इन्होंने कई हानिकारक प्रोडक्ट्स का भी इस्तेमाल किया था, जैसे ब्रोमिन और आयोडिन का मिक्सचर. ये इतना खतरनाक है कि कई गंभीर बीमारी हो सकती हैं. जापान में भी प्राचीन समय में औरतें डार्क लिपस्टिक और मोटा मेकअप करती थीं. ग्रीक एम्पायर ने लिपस्टिक को प्रोस्टिट्यूशन यानी वेश्यावृत्ति से जोड़ रखा था. और यहां वेश्याओं पर लिपस्टिक लगाने का दबाव था. 9 एडी के आस-पास अरब साइंटिस्ट अबुकासिस ने सॉलिड लिपस्टिक बनाई थी. इसाई धर्म के आगमन के बाद चर्च ने लिपस्टिक या किसी भी मेकअप प्रोडक्ट के इस्तेमाल की आलोचना की. लाल होठों को शैतान की पूजा से जोड़कर देखा जाने लगा. और जो औरतें लिपस्टिक लगाती थीं, उन्हें हिकारत भरी नज़रों से देखा जाने लगा, उन्हें चुड़ैल कंसिडर किया जाता था. वेश्याओं के अलावा कोई भी महिला लिपस्टिक का इस्तेमाल नहीं करती थी. इसलिए औरतों ने फिर होठों में चुटकी काटने, उन्हें कतरकर या रगड़कर उन्हें हल्का लाल रंग देने का तरीका अपनाया.

खुले रूप से लिपस्टिक दोबारा सामने आई क्वीन एलिज़ाबेथ के शासनकाल में. वो चटक लाल रंग अपने होठों पर लगता थीं. लेकिन तब भी लिपस्टिक की उपलब्धता केवल नामी लोगों को ही थी. साल 1884 में फ्रेंच परफ्यूम कंपनी ने पहली कमर्शियल लिपस्टिक लॉन्च की. इसके बाद धीरे से लिपस्टिक ने इस दुनिया में अपनी परमानेंट जगह बना ली.

माने कभी लिपस्टिक सौंदर्य प्रसाधन का सामान मानी गई, कभी वेश्यावृत्ति का तो कभी मज़बूती का सिंबल. मज़बूती का सिंबल इसे बनाया था ब्रिटेन की रानी एलिज़ाबेथ ने. और शायद यही वजह है कि आज भी इसे कई बार महिला सशक्तिकरण के तौर पर देखा जाता है. कैसे? ये बताने के लिए ज्यादा दूर नहीं जाएंगे. बॉलीवुड में ही चलते हैं. कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी- ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’. चार अलग-अलग उम्र वाली और अलग-अलग सिचुएशन से डील कर रही औरतों की कहानी थी. डायरेक्टर थीं अलंकृता श्रीवास्तव. जब उनसे पूछा गया कि ये टाइटल क्यों दिया गया. उन्होंने कहा था-

“लिपस्टिक अंडर माई बुर्का एक प्रतीकात्मक टाइटल है. जो दिखाता है कि औरतों के अंदर हमेशा आज़ाद होने की एक मंशा धड़कती रहेगी. वो हमेशा सपने देखेंगी, भले ही सोसायटी उन्हें एक बक्से में ही क्यों न बंद कर दे. वो औरतों के जुनून, लक्ष्य और सपनों को नहीं मार सकते. ये उन चीज़ों की भी बातें करता है, जिन्हें औरतें कभी-कभी सीक्रेटली करती हैं, वो चीज़ें जिन्हें वो पब्लिकली नहीं कर सकतीं, जिसके लिए उन्हें अलाउ नहीं किया जाता. माने टाइटल बात करता है छिपे हुए सपनों की, सीक्रेट इच्छाओं और लक्ष्य की.”

औरतों के बीच लिपस्टिक की मौजूदगी और इससे उनका जुड़ाव इसी से साबित होता है. कि स्त्रीवाद, जिसे पश्चिम एन तीन लहरों में बांटा गया है. उसकी तीसरी और सबसे नयी लहर लिपस्टिक फेमिनिजम कहलाई है. हालांकि एक धड़ा इससे आपत्ति जताता है. कि एक कॉस्मेटिक प्रोडक्ट औरतों को सिंबल कैसे हो सकता है. वहीँ दूसरा धड़ा ये मानता है कि बरसों से फेमिनिस्ट्स के बारे में कहा गया कि वे स्त्री के स्त्रीत्व को स्वीकार नहीं करतीं. लिपस्टिक फेमिनिजम इस बार जोर देता है कि मॉडर्न लड़कियां मेकअप करती है. इससे वो ताकतवर महसूस करती हैं. और कोई पुरुष उन्हें बताने का हक़ नहीं रखता कि सिर्फ इसलिए कि वो मेकअप लगाती हैं, वो वेश्याएं हैं. खूबसूरत महसूस करना उनका हक़ है.


वीडियो देखें: कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में मिलाए जा रहे खतरनाक केमिकल्स से परहेज़ क्यों है ज़रूरी?

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