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'वर्जिनिटी टेस्ट' करने का ये घटिया तरीका बैन होने के बाद भी मेडिकल स्टूडेंट्स को पढ़ाया जाता रहा!

हमारे देश में औरतों को उनका अधिकार मिल सके, इसके लिए समय-समय पर कानूनी तौर पर कई बदलाव हुए हैं. हमारी अदालतें भी पिछले कुछ समय से औरतों के हक में ऐसे फैसले सुना रही हैं, जिनकी उम्मीद हम कुछ समय पहले तक कर ही नहीं सकते थे. कई फिज़ूल के नियमों में भी देशभर में बदलाव हो रहे हैं. भले ही ये बदलाव काफी स्लो हैं और हमें बहुत आगे जाना है, लेकिन अच्छी बात ये है कि ये हो ज़रूर रहे हैं. जैसे कुछ समय पहले महाराष्ट्र की एक यूनिवर्सिटी ने अपने सिलेबस से ‘वर्जिनिटी टेस्ट’, जिसे ‘टू-फिंगर टेस्ट’ भी कहते हैं, उसे हटाने का फैसला ले लिया है. जो वाकई अच्छी बात है. इस खबर के साथ हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि कुछ समय के अंदर ही देश का कोई भी ऐसा मेडिकल इंस्टीट्यूट नहीं बचेगा, जो इस टेस्ट को अपने स्टूडेंट्स को पढ़ा रहा हो. क्या है पूरा मामला? क्या है ‘टू-फिंगर टेस्ट’, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट क्या कहता है? सब जानेंगे एक-एक करके.

क्या है मामला?

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की पत्रकार अलका धुपकर ने इस मामले में एक रिपोर्ट की है. जिसके मुताबिक, महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज यानी MUHS ने इस साल MBBS के अपने पाठ्यक्रम से ‘वर्जिनिटी टेस्ट” को हटा लिया है. MUHS के रजिस्ट्रार केडी चवान कहते हैं- “नेशनल मेडिकल कमीशन यानी NMC ने इस एजुकेशनल ईयर से सिलेबस को अपडेट किया है. इसलिए MUHS ने भी ऐसा किया और इसे अपने करिकुलम से इस टेस्ट को हटा दिया.” यानी MUHS उस पाठ्यक्रम को फॉलो करेगा, जो NMC ने सेट किया है. हालांकि अंडरग्रेजुएट मेडिकल कोर्सेज़ की किताबों में अभी बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही इनमें भी बदलाव हो जाएगा. इसी के साथ अलका ने अपने ट्विटर पर MUHS के एक लेटर को भी पोस्ट किया, जिस पर लिखा था-

“आपने ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को मेडिकल सिलेबस से निकालने की जो अपील दी थी, उस पर चर्चा हुई और ये डिसाइड किया गया कि मेडिकल एजुकेशन के सिलेबस से इसे निकाल दिया जाएगा.”

WHO क्या कहता है?

हमारे देश में आज भी कई लोगों के लिए लड़की की वर्जिनिटी बड़ा अहम मुद्दा है. शादी के समय अक्सर लड़कियों से उम्मीद की जाती है कि वो वर्जिन रहें. वर्जिन माने, जिन्होंने कभी शारीरिक संबंध न बनाए हों. वर्जिनिटी को लेकर समाज में टैबू तो है ही, लेकिन मेडिकल के सिलेबस में भी इस पर बात हुई है और बाकायदा वर्जिनिटी टेस्ट करने के लिए एक टेस्ट भी बताया जाता है, जिसे ‘टू-फिंगर टेस्ट’ कहते हैं. ये टेस्ट कहता है कि लड़की वर्जिन है या नहीं, ये जानने के लिए लड़की की वजाइना में इंसान की दो उंगली इन्सर्ट करके देखना चाहिए. अगर उंगलियां चली जाएं, तो मतलब ये होगा कि लड़की वर्जिन नहीं है और अगर न जाएं, तो मतलब होगा कि लड़की वर्जिन है. ये काफी विवादित टेस्ट है और इसका कोई साइंटिफिक आधार भी नहीं है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेजनाइज़ेशन यानी WHO खुद ये बात कहता है-

“टू-फिंगर टेस्ट की वैधता को सपोर्ट करने के लिए कोई भी साइंटिफिक आधार नहीं है और न ही वर्जिनिटी जानने के दूसरे किसी टेस्ट का साइंटिफिक आधार है. वैज्ञानिकों और मेडिकल कम्युनिटी के बीच आम सहमति है कि किसी महिला का प्राइवेट पार्ट किस तरह दिखता है, इससे उसकी सेक्शुअल हिस्ट्री को लेकर कोई सबूत नहीं मिलता. इसके अलावा महिला की वर्जिनिटी का पता लगाने के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं, उनसे महिला के फैसले लेने की क्षमता कमज़ोर होती है. इसके बाद भी क्लीनिकल सेटिंग्स में अब भी वर्जिनिटी टेस्टिंग को कंटिन्यू किया जा रहा है. कुछ मेडिकल ट्रेनिंग, टेक्स्टबुक्स में भी इसे शामिल किया गया है. रेप हुआ है या नहीं ये पता लगाने के एक तरीके के तौर पर.”

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

WHO सीधे तौर पर ये भी कहता है कि सेक्शुअल असॉल्ट के एग्ज़ामिनेशन के लिए महिला के वजाइना में उंगलियां इन्सर्ट करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है. दरअसल, रेप के मामलों की जांच के दौरान ‘टू-फिंगर टेस्ट’ किया जाता है कई देशों में. पहले भारत भी इन देशों में शामिल था. लेकिन साल 2013 में, निर्भया केस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर ये कह दिया था कि रेप के मामलों की जांच के लिए ‘टू-फिंगर टेस्ट” का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. कोर्ट ने कहा था-

“यूनाइटेड नेशन्स डिक्लेरेशन के मुताबिक, रेप सर्वाइवर्स को ऐसा कानूनी सहारा मिलना चाहिए, जो उन्हें फिर से ट्रॉमेटाइज़ न करे और उनकी शारीरिक-मानसिक डिग्निटी को बनाए रखे. मेडिकल प्रोसिजर भी क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक तरीके से नहीं होनी चाहिए. जेंडर बेस्ड वॉयलेंस से निपटने के दौरान हेल्थ पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इसलिए, ऊपर कही गई सारी बातों को ध्यान में रखते हुए, इस बात में कोई शंका नहीं है कि ‘टू-फिंगर टेस्ट’ और उसका इंटरप्रिटेशन रेप सर्वाइवर्स की निजता, शारीरिक और मानसिक अखंडता और गरिमा का उल्लंघन करता है.”

ऐसा कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रेप के मामलों की जांच में ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर बैन लगा दिया. लेकिन इसके बाद भी ये टेस्ट अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन सिलेबस का हिस्सा बना रहा. कई बरसों से एक्टिविस्ट इस टेस्ट को भारत में बैन करने की मांग करते रहे हैं. डॉक्टर इंद्रजीत खांडेकर, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (MGIMS) सेवाग्राम, वर्धा के फॉरेंसिक मेडिसीन डिपार्टमेंट में प्रोफेसर हैं. वो पिछले कई बरसों से मेडिकल एजुकेशन के सिलेबस से ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को हटाने की मांग उठा रहे हैं. ये लड़ाई उनकी साल 2010 से चल रही है. दिसंबर 2018 में डॉक्टर खांडेकर ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री और MUHS को एक लेटर लिखा था. MBBS के सिलेबस में ‘वर्जिनिटी’ से जुड़े कई चैप्टर्स को लेकर आपत्ति जताई थी. इन चैप्टर्स में केवल महिलाओं की वर्जिनिटी पर बात हुई थी और तथाकथित ट्रू वर्जिन और फॉल्स वर्जिन के बीच अंतर करने के भी नियम बताए गए थे. इन्हीं सब को लेकर डॉक्टर खांडेकर ने अपने लेटर में लिखा था. ‘आउटलुक’ की रिपोर्ट के मुताबिक, डॉक्टर खांडेकर ने मेडिकल करिकुलम से ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ को हटाने की मांग रखी थी. उनका कहना था-

“ये टेस्ट पूरी तरह से अवैज्ञानिक है. और ये जेंडर डिस्क्रिमिनेशन करता है, महिलाओं का कैरेक्टर असेसिनेशन करता है. ऐसी कोई भी रिसर्च नहीं है, जो ये बताए कि ये टेस्ट साफ तौर पर ये बता सकता है कि कोई वर्जिन है या नहीं. सबसे चिंता की बात तो ये है कि ‘साइन्स ऑफ वर्जिनिटी’ मेडिकल करिकुलम में शामिल है. इससे डॉक्टर्स और जनता के दिमाग में ये गलत धारणा बन गई है कि वर्जिनिटी टेस्ट साइंटिफिक है. टेक्स्टबुक्स ‘फॉल्स वर्जिन’ और ‘ट्रू वर्जिन’ के बारे में जानकारी देते हैं. लेकिन कोई भी टेक्स्टबुक इस जानकारी को सपोर्ट करने वाली किसी भी साइंटिफिक रिसर्च को कोट नहीं करता. ये अहम बात है कि किसी भी टेक्स्टबुक में पुरुषों की वर्जिनिटी को लेकर एक भी शब्द नहीं कहा गया.”

खैर, डॉक्टर खांडेकर की अथक मेहनत का असर ये रहा कि साल 2019 में ही MUHS ने वर्जिनिटी टेस्ट से जुड़े चैप्टर्स को सिलेबस से हटाने की तरफ कदम उठा लिए थे. इसी दौरान दिसंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट में एक PIL पर सुनवाई हुई. जिसमें कोर्ट ने फिर से ‘टू-फिंगर टेस्ट’ का ज़िक्र किया. कोर्ट ने कहा-

“क्या मेडिकल एक्सपर्ट्स ने ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को खत्म कर दिया है? और क्या इस संदर्भ में राज्यों द्वारा कोई निर्देश दिए गए हैं या नहीं? क्या मेडिकल एक्सपर्ट्स ने विक्टिम्स के पिछले सेक्शुअल एक्सपीरियंस पर अपनी राय देने की प्रैक्टिस को खत्म कर दिया है? और क्या राज्यों ने इस संदर्भ में कोई निर्देश जारी किए हैं?”

अलका धुपकर की रिपोर्ट के मुताबिक, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया यानी MCI, जो एक समय तक हमारे देश के मेडिकल एजुकेशन को रेगुलेट करती थी, उन्होंने एक कमिटी बनाई थी. जिसका काम था “ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशन” को फाइनलाइज़ करना. इस कमिटी ने रिकमेंड किया कि ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन सिलेबस से हटाया जाए. डॉक्टर खांडेकर भी इस कमिटी का पार्ट थे. उनका कहना था कि ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को लेकर कानून में हुए बदलाव और सुप्रीम कोर्ट के पुश के बाद ये काम हो सका. लेकिन सितंबर 2020 में NMC ने MCI की जगह ले ली. NMC ने मेडिकल एजुकेशन के लिए ‘कॉम्पिटेंसी बेस्ड करिकुलम’ यानी CBC बनाया. अच्छी बात ये रही कि सिलेबस से ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को हटाने की MCI की सिफारिश को फॉलो किया गया. और उसी के बाद अब MUHS ने ये काम किया है. MUHS इस दिशा की तरफ कदम उठाने वाले पहले कुछ संस्थानों में से एक है. भारत में जितने भी सरकारी-प्राइवेट मेडिकल कॉलेज हैं, उनके लिए ये अनिवार्य है कि वो NMC के अपडेटेड करिकुलम को फॉलो करें. डॉक्टर अरुणा वाणिकर, अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड की प्रेसिडेंट हैं. उनका कहना है कि ये बात सुनिश्चित की जाएगी कि ये विवादित सब्जेक्ट किसी भी मेडिकल कॉलेज में न पढ़ाया जाए.

जैसा कि हमने पहले ही आपको बताया था कि ‘टू-फिंगर टेस्ट’ का इस्तेमाल रेप सर्वाइवर्स पर किया जाता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ये गैरकानूनी हो गया. लेकिन फिर भी ऐसी रिपोर्ट्स आती रहीं कि इस टेस्ट को एग्जिक्यूट करने की रिपोर्ट्स जब-तब आती रहती हैं. ‘द हिंदू’ में अगस्त 2019 में एक रिपोर्ट पब्लिश हुई थी. जिसमें बताया गया था कि करीब 1500 रेप सर्वाइवर्स और उनके परिवार वालों ने सुप्रीम कोर्ट को एक लेटर सौंपा था. बताया था कि बैन होने के बाद बी कई मेडिकल प्रैक्टिशनर्स इस टेस्ट को एग्ज़िक्यूट कर रहे हैं. सर्वाइवर्स ने मांग रखी थी कि जो भी ये कर रहे हैं उनका लाइसेंस कैंसिल कर दिया जाए. ये लेटर सर्वाइवर्स की तरफ से राष्ट्रीय गरीमा अभियान (RGA) ने सौंपा था.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

WHO समेत कई मेडिकल एक्सपर्ट्स ये कहते रहे हैं कि ये टेस्ट साइंटिफिक नहीं है. साथ ही ये भी कहा जाता है कि ये टेस्ट अमानवीय भी है. एक लड़की अगर अपनी लाइफ के किसी भी स्टेप में हैरेसमेंट का शिकार होती है, तो उसे ताउम्र याद रहता है. सोचिए ऐसे में अगर कोई लड़की रेप का शिकार हो और मेडिकल एग्ज़ामिनेशन के दौरान उस पर ‘टू-फिंगर टेस्ट’ किया जाए, तो उस पर क्या बीतती होगी. दूसरी बात, ये टेस्ट वर्जिनिटी की बात करता है, सवाल उठता है कि क्या हर रेप सर्वाइवर्स रेप के पहले वर्जिन रही होगी. क्या शादीशुदा औरतों का, या बच्चों की मां का रेप नहीं होता? तो फिर उनके ऊपर ये टेस्ट किस काम का था. पर फिर भी हम अपनी तरफ से किसी साइंटिफिक नतीजे पर नहीं पहुंचेंगे. इस मुद्दे को और गहराई से समझने के लिए हमारे साथी नीरज ने बात की डॉक्टर अर्चना पटेल लिलहारे से. ये बालाघाट ज़िला अस्पताल में गायनेकोलॉजिस्ट हैं. हमने उनसे ही जानना चाहा कि ‘टू फिंगर टेस्ट क्या होता है? क्यों होता था? और ये किस तरह से अवैज्ञानिक, अमानवीय है? इसका जवाब सुनिए-

“नाम से ही समझ आ रहा है कि इसमें टू-फिंगर्स इन्वॉल्व्ड हो रही हैं. इस टेस्ट में हम एक लेडी का वर्जिनिटी टेस्ट देखते हैं. इसमें हम इनटेक्ट हायमन देखते हैं. हायमन एक पतली झिल्ली होती है, जो वजाइनल इंट्राइटिस मतलब ओपनिंग के बाहर होता है. इसमें हम टू-फिंगर डालकर टेस्ट करते हैं. साथ में हायमन देखते हैं कि वो इनटेक्ट है कि नहीं. टू-फिंगर टेस्ट से हम लेक्सिटी ऑफ वजाइनल मसल भी चेक करते हैं. कि कोई महिला सेक्शुअल इंटरकोर्स की हैबिचुअल है या पहली बार उसके साथ ऐसा कुछ हुआ है. ये रेप विक्टिम्स पर किया जाता था. UN मानवाधिकार, UN वुमन और WHO ने अक्टूबर 2018 में कहा कि ये पेनफुल होता है एक रेप विक्टिम के लिए. ह्यूमिलिएटिंग होता है और ट्रॉमेटिक भी होता है. वो ऑलरेडी मेंटल ट्रॉमा से गुज़र रही होती है और हम ये सब करके फिज़िकल ट्रॉमा भी दे रहे होते हैं. इसलिए ये अमानवीय और अवैज्ञानिक बोला गया.”

Dr Archna
डॉक्टर अर्चना पटेल लिलहारे से. ये बालाघाट ज़िला अस्पताल में गायनेकोलॉजिस्ट हैं.

हमारा अगला सवाल था कि किसी महिला का रेप हुआ है या नहीं? ये मेडिकली कैसे पता लगाया जाता है. इसके जवाब में डॉक्टर अर्चना पटेल लिलहारे कहती हैं-

“जब हमारे पास रेप विक्टिम आती है, तब हम उसका मेंटल अवेयरनेस देखते हैं. छोटे सवाल पूछते हैं. नाम क्या है, एड्रेस क्या है, उम्र… वगैरह-वगैरह. उसके बाद हम टाइमिंग पूछते हैं. शॉर्ट हिस्ट्री लेते हैं. ताकि हमें पता चल पाए कि वो कॉन्शियस है कि नहीं. फिर हम एग्ज़ामिनेशन शुरू करते हैं. पहले हम वाइटल्स लेते हैं, कि इनटॉक्सिकेटेड तो नहीं है, बीपी, पल्स रेट सब रिकॉर्ड करते हैं. फिर हम एक्सटर्नल इंजरी मार्क्स देखते हैं कि उसने फाइट किया हो इसके खिलाफ. और बाद में हम एब्डॉमिनल एग्ज़ामिनेशन करते हैं, प्राइवेट पार्ट्स का एग्ज़ामिनेशन करते हैं. हम स्लाइड्स बनाते हैं. यूरेथ्रल स्लाइड, वजाइनल स्लाइड, रेक्टल स्लाइड बनाते हैं. स्वेब लेकर ड्राई होने तक बनाते हैं. फिर ये स्लाइड्स हम फॉरेंसिक टेस्टिंग के लिए भेज देते हैं. वहां डीएनए टेस्टिंग करके देखते हैं कि सेमाइनल फ्लूइड्स तो उस पर नहीं गिरा था प्राइवेट पार्ट पर या कहीं भी. साथ में हम महिला के सारे कपड़े भी फॉरेंसिक को भेजते हैं. आगे चलकर फॉरेंसिक लैब वाले डीएनए टेस्टिंग करके पता करते हैं कि ये फॉरन बॉडीज़ हमें मिले हैं ये किसके हैं.”

अभी तक जो भी हमने आपको बताया, उससे ये साफ होता है कि ‘टू-फिंगर टेस्ट” अमानवीय है. ये सीधे तौर पर एक महिला की गरीमा, उसकी ताकत पर अटैक करता है. हमें ये कहने से कोई परहेज नहीं है कि ये सिस्टम किसी असभ्य और पिछड़े समाज में ही हो सकता है. ये किसी मेडिकल की किताब में तो नहीं ही हो सकता है. ये उस समाज की निशानी नहीं हो सकता, जो अपने बच्चों को मेडिकल की पढ़ाई करवाएं.


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