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समलैंगिक लोगों को 'ठीक' करने का दावा करने वाले डॉक्टर्स का भंडाफोड़!

साल 2009 का जुलाई महीना चल रहा था. योग गुरु और देश के बड़े कारोबारी रामदेव ने ‘आज तक’ न्यूज़ चैनल को एक इंटरव्यू दिया. जहां उन्होंने चरित्रहीन शब्द का इस्तेमाल किया. ये शब्द यूं तो अपने आप में बड़ा कन्फ्यूज़ करने वाला है. भाई एक चरित्र तो सभी का होता है. बिना चरित्र का कोई व्यक्ति हो सकता है क्या? लेकिन शब्द की परिभाषा ऐसी गढ़ दी गई है कि नैतिक रूप से जो काम लोगों को गलत लगते हैं, उन कामों को करना वाले औरत या पुरुष चरित्रहीन कहलाते हैं. और रामदेव ने इस इस इंटरव्यू में चरित्रहीन शब्द का इस्तेमाल समलैंगिकता के बारे में बात करते हुए किया था. ये भी कहा था कि समलैंगिकता पशुता है. एक योग गुरु जिसके लाखों फॉलोवर हैं. देश के सबसे बड़े टीवी न्यूज़ चैनल पर आकर ऐसा कहता है. इतना ही नहीं, संस्कृति की दुहाई देने के साथ-साथ रामदेव ये भी कहते हैं कि समलैंगिकता ‘अवैज्ञानिक’ है. आप यहां क्लिक करके वो इंटरव्यू देख सकते हैं.

क्या आपको भी समलैंगिकता अप्राकृतिक लगती है?

रामदेव ने जिस तरह के सवाल उठाए, वो आप में से भी कई लोगों के मन में हैं. आप में से कई लोगों को समलैंगिक होना अप्राकृतिक लगता है. क्योंकि समलैंगिक कपल नैचुरल तरीकों से बच्चे पैदा नहीं कर सकते. कितना हास्यास्पद है ये. कि हमारे समाज में अगर एक महिला मेडिकल साइंस की मदद से कृत्रिम तरीकों से मां बने. तो वो बड़ा नेचुरल लगता है. लेकिन एक समलैंगिक कपल की माता या पिता बनने की इच्छा बेमानी लगती है.

खैर. हम लौटेंगे इसपर. लेकिन पहले आपको बता दें कि आज हमें रामदेव के इस पुराने इंटरव्यू की याद क्यों आई. क्योंकि रामदेव ने दावा किया था कि वो समलैंगिकता ‘ठीक’ कर सकते हैं. उनके इस दावे के बाद इंडियन एक्स्प्रेस की एक पत्रकार ने उनसे एक डिस्कशन में पूछा कि वो समलैंगिकता की तथाकथित बीमारी का इलाज कैसे करते हैं. तो रामदेव के पास कोई ठोस जवाब नहीं था. उन्होंने बस इतना कहा कि ऐसे कई माता-पिता अपनी समलैंगिक औलादों को उनके पास लेकर आते हैं. और नियमित योग से सभी विकृतियां, आई रिपीट विकृतियां, ठीक हो जाती हैं.

कल यानी 7 जून की सुबह मद्रास हाई कोर्ट ने एक याचिका पर सुनाई करते हुए एक ऑर्डर जारी किया. कोर्ट ने कहा: LGBTQA+ लोगों को हेट्रोसेक्शुअल बनाने, या किसी ट्रांसजेंडर को सिसजेंडर बनाने की कोशिश करने या इन्हें मेडिकली क्योर करने की कोशिश करने, यानी कन्वर्जन थेरेपी पर बैन लगाया जाए. तमिलनाडु में कई अस्पताल और धार्मिक संगठन ऐसा करने का दावा करते आए हैं. अब मद्रास हाई कोर्ट ने इसपर बैन लगा दिया है. क्या है ये पूरा मामला? और क्या है कन्वर्जन थैरेपी, जिसका इस्तेमाल आज भी धड़ल्ले से हो रहा है. सब बताएंगे डिटेल में.

Lgbtqa+
मद्रास हाई कोर्ट ने LGBTQA+ कम्युनिटी के प्रति संवेदनशीलता लाने की बात कही है. (फोटो- PTI)

अभी हमने जो कुछ शब्द कहे हैं उनका मतलब भी पहले समझा देते हैं. LGBTQA+ का अर्थ हुआ लेस्बियन, गे, बायसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वियर, एसेक्शुअल और प्लस का मतलब ऐसे ही और लोग जो खुद को समाज की गढ़ी हुई ‘नॉर्मल’ की परिभाषा में नहीं रखते. हेट्रेसेक्शुअल यानी लड़का होकर लड़की और लड़की होकर लड़के से संबंध रखने वाले लोग. जिन्हें आम भाषा में स्ट्रेट कहते हैं. जो अपने आप में एक गलत धारणा है. क्योंकि स्ट्रेट का अर्थ तो ये हुआ न, कि समलैंगिक लोग टेढ़े हैं. ट्रांसजेंडर का अर्थ हुआ वो लोग जो बचपन में खुद को असाइन हुए लिंग से सहज नहीं हैं. अक्सर आम भाषा में जिन्हें आप हिकारत से ‘हिजड़ा’ कह देते हैं. वो भी ट्रांसजेंडर समुदाय का एक हिस्सा हैं. और सिसजेंडर यानी वो तथाकथित ‘नॉर्मल’ लोग जो पूरे जीवन खुद को एक ही सेक्स, यानी या तो महिला, या तो पुरुष मानते हैं.

क्या कहा हाई कोर्ट ने?

अब आते हैं मद्रास हाई कोर्ट वाले मुद्दे पर. ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 7 जून के दिन हाई कोर्ट ने एक समलैंगिक कपल द्वारा डाली गई रिट याचिका पर सुनवाई की. दरअसल, ये दोनों औरतें मदुरई की रहने वाली हैं, लेकिन लिव-इन में रहने के लिए दोनों अपने-अपने घर छोड़कर चेन्नई में शिफ्ट हो गई थीं. परिवार वाले इस रिश्ते के खिलाफ थे. उन्होंने पुलिस में दो FIR धर्ज कराई, गुमशुदगी की शिकायत की. FIR पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने दोनों महिलाओं को खोज निकाला और उनसे पूछताछ शुरू कर दी. इस पर ये कपल पहुंचा मद्रास हाई कोर्ट. याचिका डालकर पुलिस के हैरेसमेंट और किसी भी तरह के खतरे से सुरक्षा की मांग रखी.

इसी मुद्दे पर हाई कोर्ट पिछले कुछ महीनों से सुनवाई कर रहा है. मिडिएशन सेंटर से रिक्वेस्ट करके पैरेंट्स और लड़कियों के बीच वन-टू-वन बात करवाने के निर्देश दिए गए. LGBTQA+ कम्युनिटी के लिए काम करने वाले काउंसलर्स से पैरेंट्स की मुलाकात करवाने का भी निर्देश दिया गया. और पुलिस को भी कुछ डायरेक्शन्स दिए गए. फिर 7 जून को एक बार फिर सुनवाई हुई. जिसमें कोर्ट ने कहा कि निर्देश देने के बाद भी पुलिस ने अभी तक FIR बंद नहीं की है. गवर्नमेंट एडवोकेट ये आश्वासन दें कि तुरंत ही FIR बंद करवाई जाएगी और कोर्ट को रिपोर्ट किया जाएगा. इसके बाद मामले की अगली सुनवाई के लिए सात जुलाई की तारीख तय कर दी.

भले ही कोर्ट ने कोई फाइनल फैसला अभी नहीं दिया है. लेकिन जस्टिस आनंद वैंकेटेश ने कई अहम बातें कहीं हैं और कुछ गाइडलाइन्स भी जारी की हैं. जस्टिस आनंद वैंकेटेश ने कहा-

“मुझे ये स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि मैं भी आम जनता की उसी मैजोरिटी का हिस्सा हूं, जो अभी तक समलैंगिकता को पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं. किसी भी तरह के भेदभाव को नॉर्मेलाइज़ करने के लिए इग्नोरेंस किसी तरह का जस्टिफिकेशन नहीं है. ये सोसायटी और मेरे लालन-पालन ने हमेशा ‘होमोसेक्शुअल’, ‘गे’ और ‘लेब्सियन’ शब्दों को अभिशाप की तरह ट्रीट किया है. समाज का बड़ा हिस्सा अज्ञानता की एक ही स्थिति और पूर्वकल्पित धारणाओं के साथ ही खड़ा होगा. याचिकाकर्ताओं के साथ वन-टू-वन बातचीत के बाद मैंने ये महसूस किया कि हमें उन्हें समझने और स्वीकार करने का सफर तय करना है, हमारी धारणाओं को त्यागना है.”

जस्टिस ने खुद सेशन का सहारा लिया

जस्टिस आनंद ने ये भी बताया कि LGBTQ कम्युनिटी के बारे में ठीक से समझने के लिए उन्होंने खुद सायको-एजुकेशनल सेशन लिया. और इससे उनकी कई सारी धारणाएं खत्म हुईं. इसके बाद कोर्ट ने कुछ गाइडलाइन्स जारी कीं, ताकि LGBTQA+ कम्युनिटी को लेकर संवेदनशीलता आए और उन्हें सुरक्षा मिले. इसी में क्योर या कन्वर्जन थैरेपी को बैन करने की भी बात की. हाई कोर्ट ने कहा-

“फिजिकल और मेंटल हेल्थ सपोर्ट देकर भेदभाव का सामना करने वाले LGBTIQA+ कम्युनिटी के लोगों को सपोर्ट करें. जेंडर, सेक्शुअलिटी, सेक्शुअल ओरिएंटेशन के प्रति जागरूकता लाने के लिए मेंटल हेल्थ कैम्प्स लगाए जाएं. LGBTIQA+ समुदाय के लोगों को मेडिकली ‘क्योर’ या फिर उन्हें हेट्रोसेक्शुअल बनाने, या किसी ट्रांसजेंडर को सिसजेंडर बनाने की कोशिशों पर प्रतिबंध लगाया जाए. जो भी प्रोफेशनल्स इस तरह की कन्वर्ज़न ‘थैरेपी’ में शामिल हैं उनके खिलाफ एक्शन लिया जाए, उनका प्रैक्टिस करने का लाइसेंस भी वापस ले लिया जाए.”

इसके अगर पुलिस को किसी लड़की, महिला या आदमी की मिसिंग कम्प्लेन मिले और जांच के बाद पता चला कि वो LGBTQA+ कम्युनिटी से है, तो स्टेटमेंट लेकर कम्प्लेन बंद कर दे, कोई हैरेसमेंट न हो. इसके अलावा स्कूलों में पैरेंट्स को इस समुदाय के प्रति अवेयर करने के लिए पैरेंट्स टीचर्स असोसिएशन का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया गया है. पुलिस, जेल अधिकारी और जूडिशियल अधिकारियों के मन में जागरूकता लाने के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम कंडक्ट करने की भी बात कही गई है. NGOs को ज्यादा एक्टिव होने के लिए कहा गया है, ताकि LGBTQA+ समुदाय का कोई भी व्यक्ति, जो भेदभाव का शिकार हो रहा हो, वो आसानी से इन्हें अप्रोच कर सके.

ये सारे निर्देश काफी अहम हैं. लेकिन सबसे ज्यादा ज़रूरी है तथाकथित क्योर थेरेपी या कन्वर्ज़न थेरेपी को रोकने का निर्देश देना. क्या है ये तथाकथित थेरेपी? इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति के खासतौर पर समलैंगिक या ट्रांसजेंडर व्यक्तियों का सेक्शुअल ओरिएंटेशन बदलने के लिए किया जाता है. इसे करने वाले प्रोफेशनल्स का कहना है कि समलैंगिकता एक बीमारी है और उसे ठीक किया जा सकता है. कई सारे धार्मिक लोग, तांत्रिक इसके सहारे अपनी दुकान चला रहे हैं. और तो और कई तथाकथित डॉक्टर्स भी इसे बीमारी कहते हैं. और इलाज करने का दावा करते हैं. हमारे एक साथी ने ऐसे ही कुछ सो-कॉल्ड डॉक्टर्स से बात की. जो छह या दो महीने में हज़ारों रुपए के बदले इसे ठीक करने की बात कहते हैं.

पहले डॉक्टर से बातचीत-

हमारे साथी- डॉक्टर सर मुझे आपसे अपॉइंटमेंट लेना था.

डॉक्टर-आइए आज

हमारे साथी-असल में मेरे भाई को तैयार करना है आने के लिए. कुछ समय से उसकी हरकतें लड़कियों वाली हो रही हैं. हमें होमोसेक्शुअलिटी वाली दिक्कत लग रही है.

डॉक्टर- हां वो हम सही कर देंगे. उसे दिखाना तो पड़ेगा.

हमारे साथी-क्या दवा वगैरह चलेगी?

डॉक्टर- आप ले आइए. हम दवा देंगे. ठीक हो जाएगा. ले आइए.

हमारे साथी- होमोसेक्शुअलिटी की दिक्कत तो सही हो जाएगी न फिर?

डॉक्टर-हां एकदम सही कर देंगे.

हमारे साथी-हमने बहुत लोगों से पूछा तो कह रहे हैं कि इसका इलाज नहीं है. क्या इलाज संभव है?

डॉक्टर-इलाज एकदम संभव है. अभी हाल ही मैंने एक ठीक किया है. एक लड़के को ठीक किया. ये मानसिक विकृति है और हॉर्मोनल डिसबैलेंस है.

हमारे साथी-सर पैसा कितना खर्च होगा?

डॉक्टर- अब आइए हम बता देंगे. छह हज़ार की भी दवा है और इससे महंगी भी है.

दूसरे डॉक्टर की क्लीनिक में पोस्टेड काउंसलर से हुई बातचीत-

हमारे साथी-मेरे भाई को कुछ होमोसेक्शुअलिटी वाली प्रॉब्लम है.

काउंसलर- एज कितनी है?

हमारे साथी-एज 28 है. लड़कियों की तरह हरकतें हो रही हैं. उखड़ा-उखड़ा सा रहता है. समझ नहीं आ रहा. होमोसेक्शुअलिटी वाली ही प्रॉब्लम लग रही है. आपके यहां क्या इसका इलाज है?

काउंसलर- इलाज हो जाएगा, लेकिन 50 हज़ार रुपए के आस-पास का खर्चा आता है पूरा. दो महीने का खर्चा है 50 हज़ार.

हमारे साथी- होमोसेक्शुअलिटी का इलाज संभव हो जाएगा न?

काउंसलर-बिल्कुल हो जाएगा. ये मैंने पूरा खर्चा बताया है. भले ही एक महीने लगे, दो लगे या तीन लगे.

हमारे साथी- वो नौकरी वगैरह करता है, सब अच्छा है. शादी की बात कर रहे हैं. हमें आने में कोई प्रॉब्लम नहीं है, लेकिन ये बता दीजिए कितना टाइम लग जाएगा.

काउंसलर-मैक्सिमम टाइम दो महीने का होता है. दो महीने का बेस ट्रीटमेंट होता है. एक महीना एक्स्ट्रा मानकर चलिए. इलाज का टाइम रिज़ल्ट आने पर डिपेंड करता है. इसमें टोटल हॉर्मोन को बदला जाता है. तभी जाकर सेक्शुअलिटी चेंज होती है.

हमारे साथी-इसका मतलब आपने पहले भी होमोसेक्शुअलिटी का इलाज किया ही होगा न?

काउंसलर-बहुतों का इलाज किया है.

क्या ये बीमारी है?

ये जान लीजिए कि होमोसेक्शुअलिटी कोई बीमारी नहीं है. न तो दीमागी बीमारी है और न ही शारीरिक. इंडियन सायकायट्रिक सोसायटी ने भी ये कह दिया है कि ये कोई बीमारी नहीं है और अब वक्त आ गया है कि इसे बीमारी मानना बंद कर दिया जाए. इस तथाकथित कन्वर्ज़न थेरेपी का कोई साइंटिफिक एविडेंस नहीं है, फिर भी ये धड़ल्ले से अभी भी चल रही है. इस ‘थेरेपी’ का सामना करने वाले लोग किस तरह की पीड़ा से गुज़रते हैं, ये हमें बताया हरीश अय्यर ने. ये LGBT राइट एक्टिविस्ट हैं. उन्होंने कहा-

“पहला तो ये थेरेपी है ही नहीं, क्योंकि थेरेपी किसी बीमारी या दिक्कत को ठीक करने के लिए दी जाती है. और होमोसेक्शुअलिटी कोई बीमारी नहीं है. दूसरा इस तथाकथित थेरेपी का सामना करने वाले लोगों को काफी पीड़ा दी जाती है. बहुतों को इलेक्ट्रिक शॉक दिए गए हैं. प्राइवेट पार्ट्स में इलेक्ट्रिक शॉक देते हैं. बहुतों को पीटा गया है. मारा गया है. कभी सिर पर भी शॉक दिया गया है. पागलखाने में रखा गया है. बहुत बार तो इस तथाकथित थेरेपी में रेप भी होता है. इस थेरेपी के नाम पर, ‘ठीक’ करने के नाम पर. लोग रेप भी कराते हैं. अगर कोई लेब्सियन है तो ये कहकर कि तुमने तो लड़के के साथ कुछ किया ही नहीं होगा, तो चलो अब करो. कभी-कभी लड़की के मामा को बोल देंगे कि तुम जाओ और उसे सबक सिखाकर आओ. ताकि पता चले कि कोई मर्द के साथ कैसे रहा जाता है. आप कभी इन कहानियों को नहीं सुनोगे, क्योंकि मुझे कहने में इतनी शर्म आ रही है और ये मेरे साथ घटा भी नहीं है. तो जिनके साथ ये घटा है वो कैसे कह पाएंगे.”

Harish Iyer Activist
हरीश अय्यर, LGBT राइट एक्टिविस्ट

हमने इन थेरेपी को लेने वाले लोगों से डायरेक्ट बात करनी चाही, लेकिन उनमें से कोई भी इस वक्त इस मानसिक अवस्था में नहीं था, कि हमसे बात कर सके. इस थेरेपी को फेस करने वाले कितने लोगों ने तो सुसाइड तक कर लिया है. पिछले साल गोवा में एक लड़की ने भी सुसाइड कर लिया था, उसे भी उसके पैरेंट्स ने बाइसेक्शुअलिटी के तथाकथित इलाज के लिए मेंटल हेल्थ सेंटर भेजा था.

इस मुद्दे को और ठीक से समझने के लिए और ये जानने के लिए ऐसी थेरेपी की सच्चाई क्या है, क्या असर होता है, हमने बात की एक मेडिकल एक्सपर्ट से. सुनिए उन्होंने क्या कहा-

“मेरी 50 साल की सेक्शुअल मेडिसिन की प्रैक्टिस में, मैं 50 हज़ार से ज्यादा मरीज़ देख चुका हूं. इसमें हर 20वां मरीज़ सजातीय आकर्षण वाला होता है, माने होमोसेक्शुअल होता है. वैज्ञानिक अनुमान के आधार से और खुद के तजुर्बे से, मैं ये कह सकता हूं कि ये जन्मजात होता है. इसमें बदलाव बिल्कुल मुमकिन नहीं है. जो लोग कन्वर्ज़न थेरेपी से इसके क्योर की बात कर रहे हैं, वो हकीकत नहीं है, गलतफहमी है. मुझे पूछा जाए तो एक सजातीय व्यक्ति किसी विजातीय व्यक्ति से शादी करके खुद की और सामने वाले की ज़िंदगी बर्बाद करे, उससे कहीं बेहतर है कि वो खुद अपने आप अपनी संतुष्टि खोज ले.”

Prakash Kothari
डॉक्टर प्रकाश कोठारी.

फ़र्ज़ करें कि आप किसी नई नौकरी को जॉइन करें. और आपके इंट्रो में पूरे कमरे को ये बताया जाए कि ये फलाने हैं. ये हमें फलानी पोस्ट पर जॉइन कर रहे हैं. और इन्हें महिलाओं के साथ सेक्स करना पसंद है. तो आपको कैसा लगेगा? आप कहेंगे कि मैं किसके साथ सेक्स करूं ये आपके लिए क्यों ज़रूरी है? लेकिन हर रोज़ समलैंगिकों के साथ ऐसा होता है. उनकी सेक्स लाइफ की वजह से रोज़ न सिर्फ उनकी खिल्ली उड़ाई जाती है, न सिर्फ भेदभाव किया जाता है. बल्कि उनकी आइडेंटिटी के साथ इस चीज़ को चस्पा कर दिया जाता है. फिर वो चाहे किसी भी पद पर पहुंच जाएं, वो पहले समलैंगिक होते हैं, फिर कुछ और.

यहां हम आपको एक लंबी लिस्ट दे सकती हूं. ऐसी औरतों और पुरुषों की. जो समलैंगिक हैं. मगर अपने फील्ड में बेस्ट हैं. चाहे वो साइंटिस्ट हों या एक्टर. मगर मैं एक सत्य को और जस्टिफाई करने में इससे ज्यादा समय नहीं खर्च करना चाहती. बड़ी खबर को ख़त्म करते हुए बस इतना ही कहूंगी. कि आप अपने आस-पास के लोगों से प्रेम करने की नीयत रखते होंगे तो उनकी हर चॉइस का सम्मान करेंगे. और अगर आपक दिल में एक नफरती चिंटू का वास है. तो आप लिंग क्या, धर्म, जाति, रंग, आर्थिक स्थिति, भाषा, खान-पान और ऐसी ही हजारों वजहें खोज लेंगे किसी समुदाय से नफरत करने के लिए.


वीडियो देखें: समलैंगिक विवाह पर दिल्ली हाईकोर्ट में सेंटर के तर्क को LGBT एक्टिविस्ट ने कहा संवेदनहीन

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