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सुषमा स्वराज की प्रेम कहानी

“थैंक्यू मैडम, अब चुनाव न लड़ने का फैसला लेने के लिए. एक समय ऐसा भी आया था जब मिल्खा सिंह ने भागना छोड़ दिया दिया था. 41 साल से तुम इस मैराथन में हो. 1977 से एक भी इलेक्शन नहीं है जो तुमने न लड़ा हो, दो बार छोड़कर. मैं भी तुम्हारे पीछे 47 साल से भाग रहा हूं. मेरी सांस फूलने लगी है. ये तो सोचो मैं अब 19 बरस का नहीं रहा. शुक्रिया.”

ये शब्द हैं स्वराज कौशल के. जिन्हें हम गवर्नर स्वराज के नाम से जानते हैं. ये स्वराज वही स्वराज हैं, जिनका नाम अपने नाम के साथ सुषमा स्वराज लगाती रहीं, आखिरी सांस तक. ये यहां लिखना इसलिए जरूरी है क्योंकि सुषमा का सेकेंड नेम उनके पति की जाति या वंश नहीं, बल्कि फर्स्ट नेम था.

नेताओं को हम तब सबसे ज्यादा पसंद करते हैं, जब वो संन्यास की ओर बढ़ जाएं. हमें यकीन होता है कि जो लोग घर-बार छोड़ देते हैं, मोह से ऊपर उठ जाते हैं, वही देश और समाज की सेवा कर सकते हैं. नेताओं का वैवाहिक मोह से दूर होना हमारे लिए प्लस पॉइंट होता है. मॉरल सीढ़ी में जरा ऊपर.

sushma-kausal_080719100227.jpgसुषमा और स्वराज कौशल की मुलाक़ात पंजाब यूनिवर्सिटी में हुई थी.

मगर बड़ी बिंदी और सिंदूर से भरी हुई मांग के साथ संसद और पब्लिक में नजर सुषमा ने लव मैरिज की थी.

सुषमा और स्वराज कौशल की मुलाक़ात पंजाब यूनिवर्सिटी में हुई. दोनों लॉ डिपार्टमेंट में पढ़ाई कर रहे थे. सुषमा की हिंदी पर जो कमांड थी, उसके प्रमाण की हमें आवश्यकता नहीं है. एक पूरी पीढ़ी उन्हें सुनते हुए बड़ी हुई है. फिर चाहे वो पत्रकारों को दिए हुए उनके बेबाक जवाब हों, या संसद में उनकी भाषण. स्वराज की ऐसी ही कमांड अंग्रेजी में थी. दोनों डिपार्टमेंट की डिबेटिंग टीम में थे. और कहने वालों की मानें तो उनकी टीम कभी हारी नहीं.

सबसे सुंदर कला और सबसे खूबसूरत प्रेम गुलमोहर की तरह होते हैं. वो फूलते हैं जब हवाएं सबसे ज्यादा गर्म हों, धूप सबसे कठोर. सुषमा और स्वराज का प्रेम इमरजेंसी के दौरान बढ़ा. दोनों का पोलिटिकल झुकाव उन्हें करीब लाया.

सुषमा में पढ़ाई पूरी कर अपनी लीगल प्रैक्टिस शुरू कर दी थी. साल था 1973. इंडिया ने पाकिस्तान के साथ युद्ध ख़त्म किया था और अर्थव्यस्था की हालत खराब थी. इंदिरा गांधी लोकतंत्र को धता बताते हुए तानाशाही की ओर बढ़ रही थीं. सिर्फ कांग्रेस पार्टी के अंदर ही नहीं, देश के अंदर भी.

गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन और बिहार में जेपी यानी जयप्रकाश नारायण का स्टूडेंट मूवमेंट अपने-अपने राज्यों में करप्शन के खिलाफ आग पकड़ चुका था. इंदिरा गांधी का स्टेट मशीनरी पर कंट्रोल बढ़ता जा रहा था. सुषमा और स्वराज कौशल ने खुद को इंदिरा गांधी की तानाशाह नीतियों के खिलाफ एक-दूसरे को और भी करीब पाया.

sushma-ncc_080719100422.jpgNCC यूनिफॉर्म में.

कॉलेज के दिनों से ही सुषमा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP की एक्टिव मेंबर थीं. उनके पिता RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के सदस्य थे. वहीं स्वराज कौशल, जॉर्ज फर्नैन्डिज के करीबी थे. जॉर्ज फर्नैन्डिज ट्रेड यूनियनिस्ट थे, रेलवेमेन्स फेडरेशन यानी रेलवे कर्मचारियों के यूनियन के अध्यक्ष थे और बड़े मजदूर लीडर के तौर पर अपनी पहचान बना चुके थे.

इंदिरा गांधी सरकार ने विरोध का जवाब और तानशाही से दिया. इसी दौर में इंदिरा गांधी सरकार ने जॉर्ज फर्नैन्डिज पर आरोप लगाया कि सरकार को उनसे खतरा है. और वो रेलवे का इस्तेमाल डायनामाइट को ट्रांसपोर्ट करने के लिए कर रहे हैं. ताकि वो सरकारी बिल्डिंग और रेलवे ट्रैक्स पर धमाके कर सकें. इस वक़्त स्वराज कौशल ने जॉर्ज फर्नैन्डिज का केस लड़ा था.

साल 1975 था. 26 जून वो तारीख थी जा इमरजेंसी लागू हुई. 13 जुलाई वो तारीख थी जब सुषमा शर्मा ने घरवालों को मनाकर स्वराज से शादी की.

bansuri_080719100454.jpgसुषमा की भगवन कृष्ण में बेहद आस्था थी. इसलिए अपनी इकलौती संतान, अपनी बेटी का नाम ‘बांसुरी’ रखा.

शादी के दो साल बाद सुषमा इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में आईं. उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है. वहीं स्वराज कौशल 34 की उम्र में सुप्रीम कोर्ट के सबसे युवा ऐडवोकेट जनरल बने. और 37 की उम्र में मिजोरम के गवर्नर बने. 1998 में राज्यसभा सांसद बने. साल 2000 से 2004 तक सुषमा स्वराज भी राज्यसभा सांसद रहीं. ये वो रेयर मौका रहा जब कोई पति-पत्नी एक साथ राज्यसभा में हों.

सुषमा की भगवन कृष्ण में बेहद आस्था थी. इसलिए अपनी इकलौती संतान, अपनी बेटी का नाम ‘बांसुरी’ रखा.

कमाल की बात है कि हर वैलेंटाइन्स डे पर स्वराज, सुषमा को दो वजहों से याद करेंगे. 14 फरवरी को ही सुषमा स्वराज का जन्मदिन भी पड़ता है.


वीडियो देखें : बीजेपी के पूर्व सांसद पर अपहरण के मामले में नया पेंच एक फोन कॉल से आया है

 

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