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लिपस्टिक और काजल की बिक्री से इकॉनमी का क्या लेना देना है?

2000 की शुरुआत में कई विकसित देश आर्थिक मंदी से जूझ रहे थे. इनमें अमेरिका और यूरोपीय देश शामिल थे. ये मंदी ज्यादा समय नहीं रही. कुछ महीनों से लेकर एक साल में देश इससे उबर गए. लेकिन इस दौरान बाज़ार में एक ऐसा ट्रेंड चला, जिसने खरीददारी की एक नई परिभाषा बना दी.

ये देखा गया कि मंदी के दौरान महिलाएं महंगे प्रोडक्ट्स नहीं खरीद पा रही थीं. तो उन्होंने लिपस्टिक खरीदनी शुरू कर दी. ये ऑब्ज़रवेशन हमारा नहीं. एस्ते लॉडर का था. ये कंपनी कॉस्मेटिक्स और परफ्यूम्स बनाती है. इसके प्रोडक्ट्स काफी महंगे होते. लेकिन 2001 में इसके चेयरमैन लियोनार्ड लॉडर ने बताया, कि मंदी के दौरान उनकी लिपस्टिक्स की सेल 11 फीसद बढ़ गई.

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इस इंडेक्स के भरोसेमंद होने पर कई सवाल उठाए गए. (सांकेतिक तस्वीर: Pexels)

उनका तर्क ये था कि जब अर्थव्यवस्था गोते खा रही हो. और महंगे प्रोडक्ट्स बिक न रहे हों, तो लिपस्टिक जैसे कम महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स की खरीददारी बढ़ जाती है. महिलाएं महंगे प्रोडक्ट्स खरीदने के बजाए इन्हें खरीदकर ही संतुष्ट हो लेती हैं. इसे मापने वाला पैरामीटर ही लिपस्टिक इंडेक्स कहलाया.

फिर 2007-08 में वैश्विक मंदी आई. इस दौरान लिपस्टिक की बिक्री में कमी आई, लेकिन नेलपेंट की बिक्री में बढ़ोतरी देखी गई. क्योंकि महिलाओं ने सैलोन में जाकर नेल आर्ट करवाने के बजाए इसे घर पर करना शुरू कर दिया.  इस बढ़ोतरी को लिपस्टिक इंडेक्स की तर्ज पर नेलपॉलिश इंडेक्स कहा गया.

क्यों बात कर रहे हैं हम इसके बारे में?

कोरोना वायरस महामारी के चलते दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर से चरमरा गई है. कई लोग नौकरियां खो रहे हैं. वैश्विक मंदी का खतरा शुरू हो चुका है. अब चूंकि कोरोनावायरस की वजह से लोग मास्क और ग्लव्स पहनना शुरू कर चुके हैं, तो कहा जा रहा है कि क्या अब इकॉनमी के ट्रेंड्स को समझने के लिए मस्कारा/काजल इंडेक्स बनाया जाएगा? ये इसलिए क्योंकि चेहरा और हाथ ढके रहेंगे, दिखेंगी सिर्फ आंखें. ऐसे में आई मेकअप पर फोकस बढ़ेगा.

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मास्क पहनना न्यू नॉर्मल बन गया है. ऐसा जापान में SARS वायरस के अटैक के बाद हुआ था. अब कोरोनावायरस महामारी के बाद पूरी दुनिया में लोग मास्क पहनने पर जोर दे रहे हैं. (सांकेतिक तस्वीर: Pexels)

लेकिन क्या सच में ऐसा है?

इकोनॉमिस्ट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, क्लाइन एंड कंपनी ने लिपस्टिक इंडेक्स पर रीसर्च के लिए डेटा इकठ्ठा किया. इन्होंने ये पाया कि मंदी के दौरान लिपस्टिक की बिक्री बढ़ी ज़रूर, लेकिन तेजी के दौरान भी उनकी बिक्री में बढ़ोतरी हुई. तो इसलिए इन दोनों के बीच कोई आपसी संबंध है नहीं. इस तरह प्रोडक्ट्स की बिक्री को आधार मानकर अर्थव्यवस्था की दिशा नहीं भांपी जा सकती, या उसका असर नहीं समझा जा सकता.

मंदी के दौरान भी काजल-लिपस्टिक से बाहर नहीं आ पा रहे लोग?

इस तरह के इंडेक्स से अर्थव्यवस्था को मापने में एक नहीं कई बड़े झोल हैं. इस तरह के इंडेक्स का इस्तेमाल करना अपने आप में ये बताता है कि:

# घोर मंदी या क्राइसिस की सिचुएशन में भी महिलाओं को उनकी शॉपिंग की आदत से मापा जा रहा है.

# महिलाएं सिर्फ कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स खरीदती हैं. बाकी प्रोडक्ट्स से उनका कोई लेना-देना नहीं है. ऐसे पैरामीटर्स के इस्तेमाल से मार्केट की स्टीयरियोटिपिकल अप्रोच नज़र आती है.

# मंदी के दौरान जाने वाली नौकरियों में एक बड़ा हिस्सा औरतों का होता है. लेकिन उनकी बेरोजगारी को मापने और उस पर फोकस करने के बजाए उन्हें मेकअप आइटम की शॉपिंग से बांधकर देखा जा रहा है. जैसे पति की नौकरी चली गई तो क्या हुआ, मैडम तो साड़ी-बिंदी खरीदेंगी ही. 

लॉकडाउन और महिलाओं की बेरोजगारी 

लॉकडाउन और उसके बाद उभरी मंदी ने महिलाओं को खासे तौर पर प्रभावित किया है. और उनकी ये स्थिति काजल-लिपस्टिक इंडेक्स से नहीं मापी जा सकती. सिटीबैंक का अनुमान है कि अलग-अलग सेक्टर्स में लगभग 22 करोड़ महिलाएं जॉब खोने का खतरा झेल रही हैं. पूरी दुनिया में लॉकडाउन से प्रभावित हुए सेक्टरों के तकरीबन 4.4 करोड़ कामगार. इनमें  3.1 करोड़ महिलाएं हैं, और 1.3 करोड़ पुरुष. स्टडी ये भी बताती है कि जो महिलाएं लॉकडाउन से पहले जॉब कर रही थीं, लॉकडाउन के बाद उनको रोजगार मिलने की संभावना पुरुषों के बनिस्बत कम है. भारत की बात करें, तो गांवों की महिलाओं का रोजगार और भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है. इस स्टडी में यह भी बताया गया है कि लॉकडाउन ने पिछड़े हुए जाति समूहों को ज्यादा प्रभावित किया है.

पिछले दो सालों की कई रिपोर्ट्स ये सुझाती हैं कि रोजगार के क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी कम हुई है. 2019 में NSSO (नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गेनाईजेशन) के डेटा के अनुसार भारत में अगर रोजगार के क्षेत्रों को देखा जाए, तो महिलाओं की संख्या घटी है. इस मामले में भारत से पीछे सिर्फ सीरिया और ईराक जैसे देश हैं.

ऐसे में लॉकडाउन के असर और मंदी के दौरान जहां महिलाएं घरेलू हिंसा और बेरोजगारी झेल रही हैं, वहां उन्हें लिपस्टिक और काजल तक सीमित कर देना, और उससे अर्थव्यवस्था जांचना कितना तर्कसंगत या कारगर है, ये आप खुद तय करें.


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