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किट्टूर की वो रानी जिसने रानी लक्ष्मीबाई से भी पहले अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे

23 अक्टूबर, 1778. कर्नाटक के बेलगावी जिले में चेनम्मा का जन्म हुआ. लिंगायत समुदाय में जन्मीं. मां-बाप ने घुड़सवारी, निशानेबाजी, और तलवारबाजी सिखाई.

कहानी ये चलती है कि 15 साल की उम्र में ये वन में आखेट करने निकलीं. आखेट मतलब शिकार. दूर झाड़ियों में एक बाघ दिखाई दिया. बस फिर क्या था. कमान से तीर निकाला. धनुष की प्रत्यंचा खींची, और तीर छोड़ दिया. बाघ वहीं चित्त. घोड़ा दौड़ाते हुए चेनम्मा पहुंचीं. तभी झाड़ियों के पीछे से एक और घुड़सवार निकल आया. चमचमाते भाल पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं. उसने बाघ की तरफ इशारा किया, और कहा, ये मेरा तीर है.

चेनम्मा ने अपना हक़ जताया. कहा, बाघ उनके तीर से मरा है. दोनों में काफी देर तक बहस चली, शिकार के ऊपर आधिपत्य जमाने की. चेनम्मा पीछे हटने को तैयार नहीं थीं. उनका मुख भी तमतमाया हुआ था. तभी सामने वाले घुड़सवार ने उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया.

ये और कोई नहीं, किट्टूर के राजा मल्लासराजा देसाई थे. वो चेनम्मा की बहादुरी और दृढ़ता पर रीझ गए थे.

चेनम्मा का साहस मल्लासराजा देसाई को बेहद भाया था. (तस्वीर साभार: नवरंग)
चेनम्मा का साहस मल्लासराजा देसाई को बेहद भाया था. (तस्वीर साभार: नवरंग)

दोनों की शादी धूमधाम से हुई, और चेनम्मा किट्टूर की रानी बनकर वहां पहुंचीं. उन दोनों का बेटा हुआ. लेकिन भाग्य में कुछ और ही लिखा था. 1824 में मल्लासराजा देसाई का देहांत हो गया. पीछे रह गईं उनकी रानी, और एक छोटा बेटा. अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी इस वक़्त अपने दांत गड़ा चुकी थी उत्तर में. उनकी नज़र किट्टूर की तरफ गई. लेकिन रानी का बेटा मौजूद था. इस वजह से उनका डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स यहां इस्तेमाल नहीं हो सकता था. डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स के तहत अगर किसी राजा की मौत बिना किसी वारिस के हो जाती थी, तो उसका राज्य लैप्स होकर कंपनी के अधीन आ जाता था. लेकिन मल्लासराजा देसाई का बेटा जिंदा था. किस्मत का खेल ये हुआ कि उसी साल यानी 1824 में उसकी भी मौत हो गई. रानी ने शिवलिंगप्पा नाम के बच्चे को गोद लिया, और उसको राजा घोषित कर दिया.

कंपनी को मुंहमांगी मुराद मिल गई. उन्होंने शिवलिंगप्पा को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया. किट्टूर का राज्य धारवाड़ कलेक्टोरेट के तहत आ गया. इसका इन्चार्ज था सार्जेंट जॉन ठाकरे. कमिश्नर मिस्टर चैप्लिन. किट्टूर को सन्देश भेजा गया, कंपनी का राज स्वीकार कर लो.

रानी ने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लेफ्टिनेंट गवर्नर लॉर्ड एल्फिन्स्टन को चिट्ठी भेज कर अपने मामले में दखल करने की मांग की. लेकिन उनकी न सुनी जानी थी, न सुनी गई. ब्रिटिशरों ने किट्टूर पर हमला बोल दिया. 20 हजार से ज्यादा सैनिक और 400 से ज्यादा बंदूकें लेकर उन्होंने धावा बोला.

चेनम्मा के साथ के लोग आखिरी सांस तक उनके साथ लड़े.
रानी चेनम्मा के साथ के लोग आखिरी सांस तक उनके साथ लड़े.

रानी ने भी युद्ध भेरी बजा दी. अब पीछे हटने का समय नहीं था. युद्ध शुरू हुआ और रानी के लेफ्टिनेंट अमातुर बालप्पा ने अंग्रेजों के पैर उखाड़ दिए. सार्जेंट जॉन ठाकरे मारा गया. दो ब्रिटिश अफसरों को बंधक बना लिया गया. सांगोली रायन्ना ने भी युद्ध में रानी के साथ खड़े रहकर भरपूर मदद की. लेकिन चैप्लिन ने युद्ध जारी रखा. टुकड़ियों पर टुकड़ियां भेजता रहा. अंत में रानी बंधक बना ली गई और बैलहोंगल किले में उन्हें बंदी बना कर डाल दिया गया.

रायन्ना चाहते थे कि शिवलिंगप्पा किट्टूर का राजा बने. इस वजह से रानी के बंदी बनने के बाद भी उन्होंने गुरिल्ला युद्ध जारी रखा. लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया और फांसी दे दी गई. शिवलिंगप्पा को ब्रिटिशरों ने कैद कर लिया.

2 फरवरी को रानी चेनम्मा की मौत हुई. उसी किले में जिसमें उन्हें बंदी बनाकर रखा गया था. उनकी पहली जीत की याद में किट्टूर उत्सव आज भी मनाया जाता है. 22 से 24 अक्टूबर तक. रानी चेनम्मा की मूर्ति भारत की संसद के बाहर भी लगी हुई है. ये याद दिलाते हुए कि उन्हें भारती स्वतंत्रता संग्राम का सुबह का तारा कहा जाता है. इसी डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स का रानी लक्ष्मीबाई ने भी विरोध किया था, लगभग तीन दशक बाद.


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