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पंजाब में हर महिला को 1000 रुपये देने का पूरा प्लान आतिशी ने बताया

जब मैं छोटी थी तब मुझे नौकरी करने वाली लड़कियां या नौकरी करने वाली औरतें हमेशा प्रभावित करती थीं. उन्हें देखकर मैं सोचती थी कि बड़ी होकर मैं भी ऐसी ही बनूंगी. फिर मैं बड़ी हुई. पहली नौकरी लगी. पहली बार अपने नाम के खाते में पैसे आए. पहली बार था जब अपने फाइनेंस की चीजें मैंने खुद मैनेज की. इससे पहले ये काम मुझे कभी किसी ने नहीं सिखाया. मेरे पेरेंट्स ने मुझे बहुत अच्छी परवरिश दी. मुझे जिस भी चीज़ की ज़रूरत थी, सब पूरी की. मम्मी ने सब सिखाया. छौंका कैसे लगाना है, 5 मिनट में तहरी कैसे बनाना है, कपड़े झटक कर कैसे सुखाने हैं और सबसे बड़ी चीज़ जब कुछ ना हो तो जुगाड़ से क्या झटपट बनाकर पेट भरना है. पर मुझे कभी फाइनेंसेज़ मैनेज करना नहीं सिखाया गया. बैंक में चेक कैसे जमा करना है, PF के पैसे कैसे निकालना है या HR से सैलरी कैसे नेगोशिऐट करना है. वो तो भला हो सीनियर्स का जिन्होंने इस बारे में सही वक़्त पर बता दिया.

खैर, ये बात मुझे इसलिए याद आई क्यूंकि कल मैंने अरविन्द केजरीवाल का एक बयान सुना. उसमे वो कह रहे थे कि अगर आम आदमी पार्टी पंजाब में जीतती है तो 18 साल से ऊपर की लड़कियों और महिलाओं को हर महीने 1000 रुपये दिए जाएंगे. सोशल मीडिया पर इसे लेकर खूब बहस चल रही है. कोई कह रहा है ये सही कदम है. तो कोई सवाल उठा रहा है कि इससे वीमेन एम्पावरमेंट कैसे होगा?

सबसे पहले आप अरविंद केजरीवाल का बयान पढिए. पंजाब की एक चुनावी रैली में केजरीवाल ने कहा,

 

“पूरी दुनिया में आज तक किसी भी सरकार ने अपनी हर बेटी, मां और बहन के अकाउंट में हर महीने 1000 रुपये नहीं डलवाए हैं. मैं जितना सोचता हूं इस योजना के बारे में, उतना मुझे यक़ीन है हमारी महिलाओं को ये इतनी ताकत देगी. 1000 रुपये कोई ज़्यादा नहीं होते.

मेरे जो विरोधी हैं, वो कहेंगे पैसा कहां से आएगा? मैं टीवी में देखता हूं चन्नी साहब के एक तरफ़ ट्रांसपोर्ट माफिया बैठा होता है, एक तरफ़ रेत माफिया बैठा होता है. यह दो माफिया खत्म कर दो, पैसा ही पैसा आ जाएगा.”

इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर रिएक्शन्स की बाढ़ आ गई.

कुछ रिएक्शन छांटकर आपके लिए लेकर आए हैं –

अनिल कुमार नाम के एक यूज़र ने लिखा,

“1000 रुपये मिलने के बाद पंजाब के औरतें उससे सेनेटरी नैपकिन खरीद सकती हैं. अपने बूढ़े होते मां बाप के लिए कोई सामान खरीद सकती हैं. अपने लिए कोई कॉस्मेटिक खरीद सकती हैं या कोई हॉबी में ये पैसे लगा सकती हैं. इस प्रैक्टिकल विज़न को अप्रिशिऐट करना चाहिए.”

मनोज अरोरा नाम के एक यूज़र ने लिखा,

“अपने घर की डोमेस्टिक हेल्प को 1-2 महीने के लिए ये पैसे इंसेंटिव के रूप में देकर देखिए. अगर दिल्ली की किसी महिला के लिए 1 हज़ार रूपए मायने रखते हैं, तो सोचिए गांव की महिलाओं पर कितना इम्पैक्ट करेंगे जब उनके हाथ में खर्च के लिए हर महीने 1 हज़ार रुपये आएंगे.”

मोनिशा नाम की एक यूज़र ने लिखा,

“ये एक बढ़िया कदम है. बहुत से परिवारों में महिलाओं की इज्ज़त नहीं की जाती. वो अब भी 18 सदी की तरह महिलाओं के साथ व्यवहार करते हैं. अगर इम्पलिमेंट होता है तो ये एक अच्छा इनिशिएटिव होगा. पर 99.99% विश्वास के साथ कह रही हूं, ये पंजाब में सरकार नहीं बना पाएंगे.”

रमन गुप्ता नाम के एक ट्विटर यूज़र ने पूछा,

“1000 रुपये कैसे एक महिला को सशक्त करेंगे?”

मीरा नाम की एक यूज़र ने इसके जवाब में लिखा,

“हर महीने 1000 रुपये सेव कर के एक औरत कोई बिज़नस शुरू कर सकती है. जैसे- टेलरिंग का काम, अचार- पापड़ बनाना, सिलाई करना, पेंटिंग बनाना, या आर्ट और क्राफ्ट का काम. एक ऐसे देश में जहां कईं लोग एक दिन में 150 रुपये से कम कमाते हैं, वहां 1000 रुपये बहुत मदद कर सकते हैं.”

दिल्ली सीएम के इस बयान पर ऋचा अनिरुद्ध ने लिखा,

“हर औरत को क्यों? सिर्फ कम प्रिविलेज को दिया जाए तो समझ आता है. पर जो पहले से सशक्त हैं, उन्हें क्यों? जो 1000 रुपये की एक लिपस्टिक लेती हैं, उन्हें भी मिलेगा? आप श्योर हैं?

अक्की कॉप नाम के एक यूज़र ने लिखा,

“पंजाब में लगभर डेढ़ करोड़ औरतें हैं. फ़र्ज़ करते हैं कि 30% माइनर हैं. 1 करोड़ महिलाओं को 1000 रुपये हर महीने दिए गए, तो 1000 करोड़ रुपये हर महीने ख़र्च होंगे. मोटा मोटी, फिस्कल डेफिसिट का ये 50% है. एक बैंकरप्ट स्टेट ये अफ्फोर्ड नहीं कर सकता.”

शशांक शेखर झा नाम के एक यूज़र ने लिखा,

“अरविन्द केजरीवाल की दिल्ली कैबिनेट में कोई महिला नहीं है. सच एमपावरमेंट, मच वाओ!”

ये कायदे की बहस थी. अब कुछ ट्रोल की भी सुनते हैं –

प्रमिला नाम की एक यूज़र ने पूछा है,

“अपने बाप के घर से देगा? मिडिल क्लास टैक्स भरता है और तू लुटायेगा वोट के लिए? सिद्धू की पत्नी को भी देगा 1000.”

बघीरा नाम के एक यूज़र ने लिखा है,

“भीख देना कब बंद करोगे? तुम सभी फेमिनिस्ट को भीख लेने में शर्म नहीं आती?तुम लोग पैदा ही भिखारी हुए हो.”

बवाल पर आम आदमी पार्टी ने क्या कहा?

खैर ट्रोल को इगनोर कर के हमने लॉजिकल सवालों पर फोकस किया. क्योंकि मीडिया का काम है लोगों के सवालों को नेताओं तक ले जाना और उनसे जवाब मांगना. इसलिए हमने बात की आतिशी से. आतिशी आम आदमी पार्टी की नेत्री हैं और दिल्ली से विधायक हैं –

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आम आदमी पार्टी से विधायक आतिशी मार्लेना ने ऑडनारी से एक्सक्लूज़िव बात की

– हर महिला को पैसे देने की क्या ज़रूरत है? कुछ प्रिविलेज महिलाएं इतने पैसे की लिपस्टिक खरीद लेती हैं? उन्हें पैसे देने का क्या मतलब?

अगर हम दुनिया भर में नीतियों की समीक्षा करें, तो ज़्यादातर बेनिफ़िशियरी नीतियां यही सोचकर बनाई जाती हैं कि कुछ लोगों को तो आवश्यकता है, कुछ को नहीं है. कुछ नीतियां ऐसी बनाई जाती हैं जो सिर्फ़ ग़रीबी रेखा के नीचे वालों को लक्षित करना है, तो दुनिया में ऐसी नीतियां कहीं भी सफल नहीं हैं. क्यों? क्योंकि ये जो पूरी प्रक्रिया होती है कि अब आप अपना इनकम सर्टिफिकेट दिखाइए. इनकम सर्टिफिकेट दिखाने के लिए आप पहले इनकम सर्टिफिकेट बनवाए. इनकम सर्टिफिकेट बनवाने के लिए आप डीएम/एसडीएम के ऑफिस जाइए. वहां शायद आपको घूस देनी पड़े.

तो जब आप किसी नीति में इतने बैरीयर्स डाल देते हैं, तो जिस श्रेणी को उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, वह उसी तक नहीं पहुंचती. जब भी आप कोई ऐसी नीति बनाते हैं आपके पास दो विकल्प होते हैं, ‘रॉन्गली सेलेक्टेड’ या ‘रॉन्गली रिजेक्टेड.’ अगर ऐसे कुछ लोग ऐसी स्कीमों के लाभार्थी हो जाएं, जिन्हें स्कीम की उतनी ज़्यादा ज़रूरत नहीं है, तो उसका नुकसान कम है, जितना अगर जिन्हें वास्तव में ज़रूरत है, उन्हें ना मिले तो.

– लोग पूछ रहे हैं कि दिल्ली में तो आप सत्ता में है? वहां क्यों नहीं लागू कर रहे?

दिल्ली में कुछ साल पहले हमने ऐसी एक पॉलिसी को इंट्रोड्यूस किया था कि हम दिल्ली में महिलाओं को बस यात्रा फ्री देंगे. अगर आप इसका फाइनेंशियल इंप्लीकेशन देखिए तो ये एक जैसा ही आता है,‌ क्योंकि कोई भी महिला जो अपनी किसी भी आउटडोर एक्टिविटी के लिए बाहर जाती है वह तक़रीबन इतना ही खर्च कर देती है. 1000 रुपये महीना. तो हमने यह संसाधन दिल्ली में ट्रांसपोर्ट के जरिए से दिया हुआ है. दिल्ली एक मेट्रो शहर है. लेकिन जब हम ऐसी किसी पॉलिसी को ग्रामीण इलाके में लागू करते हैं, तो ज़रूरी नहीं है कि लोगों को वही ज़रूरतें वहां भी हों.

– कई लोगों ने सोशल मीडिया पर पूछा है कि 1000 रुपये देकर कैसा वीमेन एम्पावरमेंट. आप इससे बेहतर सिकिल ट्रेनिंग देते, बेटर जॉब ऑपुरचुनिटी देते.

जो लोग यह सवाल पूछ रहे हैं, मुझे यक़ीन है कि वो इस देश की महिलाओं की वास्तविकता से परिचित नहीं हैं. आप आज देखिए ग्रामीण इलाकों में या छोटे शहरों में भी, महिलाओं के पास कैश का कोई ऐक्सेस नहीं होता. महिलाओं की निर्भरता होती है कभी अपने पिता पर, कभी अपने भाई पर या अपने पति पर. इस केस में अगर उनके हाथ में अपनी इनकम हो, और वो भी ऐसी कि हज़ार रुपये तो आने ही आने हैं, तो वो एक महिला के लिए बहुत एंपावरिंग है. वह अपनी ज़िंदगी से जुड़े कई फ़ैसले उसके आधार पर ले सकती है.

दिल्ली सरप्लस स्टेट है. वहां फ्री-बी झेल सकते हैं. पंजाब, अभी डेफिसिट में है. ये कहना गलत नहीं होगा कि बैंकरपसी की कगार पर है. इस योजना से जो भार आयेगा, उसे कैसे संभालेंगे?

जब हम दिल्ली में सत्ता में आए थे तब दिल्ली भी डेफ्सिट स्टेट था, पर हमने अपने फाइनेंस इसको इस कदर मैनेज किया कि आज दिल्ली सरप्लस स्टेट है. सारा मामला संसाधनों के मैनेजमेंट का ही है. हम पंजाब में भी बेहतर मैनेजमेंट करेंगे, अगर हमारी सरकार आती है तो. हमारे देश की सच्चाई है कि पॉलीटिशियंस और पार्टी की जेब भरी रहती है और सरकार की जेब खाली. दिल्ली में जो हमने सात सालों में किया है, वो सबके सामने है. दिल्ली इकलौता स्टेट है जो फिस्कल सरप्लस में है.

– आप दिल्ली में सत्ता में हैं. वीमेन एम्पावरमेंट के लिए आपने वहां क्या किया? वहां को कैबिनेट में एक भी महिला मंत्री नहीं हैं.

दिल्ली सरकार और दिल्ली सरकार की नीतियों को अगर आप देखें, तो स्कूलों की बेहतरी की वजह से सीधे तौर पर लड़कियों का सशक्तिकरण हुआ है. लोअर-मिडल क्लास अगर कुछ पैसे जुटाकर अपने बच्चों को अच्छी पढ़ाई के लिए किसी निजी स्कूल भेज पाता था, तो वह अपने बेटों को भेजता था. दिल्ली के सरकारी स्कूलों की स्थिति को ठीक कर के उस घर की लड़की को सशक्त दिल्ली सरकार ने किया है. अगर आप स्वास्थ्य की बात करें, तो आपको मालूम होगा कि महिलाएं कभी भी हेल्थ एक्सेस नहीं करती थीं. क्योंकि उनको निजी अस्पतालों में खर्च होने वाले रुपये दिखते थे. जब तक कोई गंभीर बीमारी नहीं होती थी, डॉक्टर तक के पास नहीं जाती थीं. दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार की बनाई हुई मोहल्ला क्लिनिक्स की वजह से आज महिलाएं बड़े स्तर पर स्वास्थ्य को एक्सेस कर रही हैं. महिलाओं को बस टिकट देने से महिलाओं की आर्थिक ऐक्टिविटीज़ में भागीदारी बढ़ी है.

बहुत से लोग कहते हैं कि ये एक तरह मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना है. टैक्स-पेयर्स जो मेहनत कर के टैक्स देते हैं उन्हें बर्बाद करने जैसा है. इसपर क्या कहेंगे?

सबसे पहले तो ये कि इस देश का हर नागरिक टैक्स देता है. कुछ लोग ही नहीं हैं, जो टैक्स देते हैं. सब टैक्स देते हैं. साबुन से ले कर नमक तक, हम सब टैक्स देते हैं.
दूसरी बात, जो ये नीतियां हैं वो नागरिकों के सीधे जेब में पैसे डाल रही हैं. इकोनॉमी, सप्लाई और डिमांड से चलती है. पिछले 2 साल में, देश भर की इकॉनमी नीचे गिरी है. क्यों? क्योंकि इकॉनमी में डिमांड नहीं है. लोगों की परचेज़िग पावर खत्म हो गई है. दिल्ली में इकोनॉमिक रिसेशन सबसे कम आया है क्योंकि दिल्ली सरकार की नीतियों की वजह से लोगों के पास स्पेंडिंग पावर ज़्यादा है.

इस पूरे मसले पर आपकी क्या राय है, कमेंट सेक्शन में बताइए.


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