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कर्नाटक की औरतों ने बताया, शराब ने किस कदर सैकड़ों परिवार तबाह किए

एक लड़का है 16 साल का. मान लीजिए कि उसका नाम रवि है, वैसे असल में नाम कुछ और है, हम आपको बदला हुआ नाम बता रहे हैं. रवि रहता है कर्नाटक के रायचूर ज़िले के एक गांव में. वैसे तो उसे स्कूल में पढ़ना चाहिए, करियर बनाने के लिए कड़ी मेहनत करना चाहिए. लेकिन वो ये सब नहीं कर रहा. क्यों? क्योंकि उसे लग चुकी है शराब की लत. और इसी वजह से उसके घरवाले काफी परेशान हैं. खासतौर पर उसकी मां. इसलिए अब वो कर्नाटक सरकार से ये मांग कर रही हैं कि शराब की अवैध बिक्री को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाएं. रवि की मां की तरह ही कर्नाटक की कई औरतों की यही मांग है. और इसे ही सरकार के कानों तक पहुंचाने के लिए ये औरतें बैठी हैं धरने पर. 11 फरवरी से रायचूर सिटी में बनी महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने सैंकड़ों औरतें धरना दे रही हैं. क्या मांग है इनकी? इस पर अब तक सरकार ने क्या किया है? ये आंदोलन कबसे चल रहा है? भारत में किन-किन राज्यों में शराबबंदी को लेकर कड़े कदम उठाए गए हैं, आंकड़े क्या कहते हैं? इन सब सवालों के जवाब जानेंगे एक-एक करके.

क्या है पूरा मामला?

मामले की शुरुआत होती है साल 2015 से. वैसे तो इसके कहीं पहले से कर्नाटक के गांवों में औरतें शराबबंदी की मांगें रख रही थीं. अपने स्तर पर. लेकिन सारी औरतें इकट्ठा आईं साल 2015 में. और सरकार से मांग रखी कि शराब को बैन कर दिया जाए, क्योंकि शराब की वजह से उनके घर के आदमी काम पर नहीं जा रहे, पैसों की बर्बादी हो रही है. ज़िंदगियां तबाह हो रही है. इस आंदोलन को नाम दिया गया ‘मद्य निषेध’. इन पांच बरसों में औरतों ने कई बार, कई तरीकों से सरकार के सामने अपनी मांग रखी. सड़कों पर तख्तियां लेकर हज़ारों औरतें उतरीं. 2020 में तो औरतों ने ‘जल सत्याग्रह’ किया. कृष्णा नदी में करीब दो हज़ार औरतें लंबी की चेन बनाकर खड़ी हुईं. करीब पांच घंटे तक खड़ी रहीं. हाथों में शराबबंदी की मांग को लेकर प्लाकार्ड पकड़े हुई थीं. ‘मद्य निषेध’ आंदोलन से जुड़ी हुई एक महिला, जिनका नाम विरुपम्मान है. वो बताती हैं-

“हमने 2015 से शुरुआत की. पिछले पांच साल में यहां तीन पार्टियों के मुख्यमंत्री आए, हमने हर किसी के सामने अपनी मांग रखी, लेकिन कुछ किया नहीं गया. बल्कि इसी दौरान गांवों में अवैध शराब की बिक्री डबल हो गई. इसलिए अक्टूबर 2020 में हम हाई कोर्ट गए, एक PIL डाली. हाई कोर्ट ने अवैध शराब की बिक्री तत्काल प्रभाव से रोकने के लिए फैसला दिया. लेकिन सरकार उस आदेश का पालन नहीं कर रही है. इसलिए 11 फरवरी 2021 से कर्नाटक की सैंकड़ों औरतें धरने पर बैठी हैं, रायचूर में. और ये सत्याग्रह अनिश्चितकाल के लिए है.”

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विरुपम्मा, ‘मद्य निषेध’ आंदोलन से जुड़ी महिला

बाकी औरतें क्या कहती हैं?

यल्लमा नाम की एक महिला हैं, ये भी रायचूर में रहती हैं. ‘मद्य निषेध’ आंदोलन का हिस्सा हैं. इन्होंने ‘ऑडनारी’ को बताया कि कर्नाटक के कई ज़िलों के अधिकतर गांवों में लाइसेंस के बिना की शराब बेची जा रही हैं. लोग अपने घरों से शराब बेच रहे हैं. ऐसे में गांव के बच्चे, स्कूल जाने की उम्र में ही शराब की ज़द में आ रहे हैं. दूसरा आसानी से शराब हाथ लगने की वजह से, इसे पीने वाले लोग ज़्यादा कन्ज़्यूम करने लगे हैं. यल्लमा का कहना है-

“घर के आदमी सारा पैसा शराब में उड़ा रहे हैं. नशे में अपनी पत्नियों को पीटते भी हैं. लोगों के घरों का माहौल आर्थिक और मानसिक, दोनों की तौर पर खराब हो रहा है. घर के आदमियों की शराब की लत के कारण औरतों को काम पर जाना पड़ता है. किसी तरह औरतें मज़दूरी करके चार पैसा कमाती हैं, घर चलाने के लिए, लेकिन आदमी लोग उस पैसे को भी शराब में खर्च कर देते हैं. साथ ही मार-पीट भी करते हैं. बच्चों को भी पीटते हैं. कई बार इतना पीटते हैं कि बच्चे भी गुस्से में कह देते हैं कि अगर पाल नहीं सकते, तो पैदा क्यों किया? ऐसी बातें सुनकर हमें बहुत दुख होता है. हम चाहते हैं कि सरकार हमारी बात सुने. राज्य में पूरी तरह से शराब पर बैन लगाए, या फिर कम से कम गांव में अवैध तरीके से जो शराब बिकती है उस पर रोक लगाए. क्योंकि ज्यादा शराब की वजह से आदमी की जल्दी मौत भी हो जाती है. परिवार तबाह हो रहे हैं.”

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यल्लमा, ‘मद्य निषेध’ आंदोलन से जुड़ी महिला

इस आंदोलन से जुड़ी एक और महिला, जिनका नाम दुर्गम्मा है. उनके पति को भी शराब की लत है. और इस वजह से उनके लिए घर चलाना मुश्किल हो रहा है. वो कहती हैं-

“मेरे पति को शराब की लत है. तीन छोटे बच्चे हैं, जिन्हें अकेले अपने दम पर पालना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा है. मैं सरकार से मांग कर रही हूं कि शराब पर बैन लगा दिया जाए. मैं अपने बच्चों को घर पर छोड़कर आती हूं, इस आंदोलन में शामिल होने के लिए. न केवल मेरे पति को शराब की लत है, बल्कि परिवार के बाकी आदमियों को भी है. मैं 2015 से इस आंदोलन में हिस्सा ले रही हूं, लेकिन सरकार सुन ही नहीं रही. मैंने 2020 में ‘जल सत्याग्रह’ भी किया था.”

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दुर्गम्मा, ‘मद्य निषेध’ आंदोलन से जुड़ी महिला

आंदोलन में बैठी औरतें “बीर बेड़ा, नीर बेकू’ के नारे लगा रही हैं. ये नारा कन्नड भाषा में है. इसका हिंदी में मतलब है- “हमें बीयर नहीं चाहिए, हमें पीने का पानी चाहिए”. औरतों की मांग है कि लोकल शराब की जगह वो चाहती हैं कि उनके बच्चों को शिक्षा मिले, परिवार का पेट भरने के लिए ज़मीन मिले.

औरतों की और क्या मांगें हैं?

औरतों की मांग है कि सरकार हाई कोर्ट के आदेश का पालन करे. अब बताते हैं कि हाई कोर्ट में जो PIL डाली गई थी, उसमें क्या-क्या मांगें रखी गई थीं और कोर्ट ने क्या आदेश दिए. PIL में कहा गया था कि कोर्ट संविधान के आर्टिकल 47 के तहत एक एक्सपर्ट कमिटी बनाने का आदेश दे. और इस आदेश के लिए एक मैंडमस जारी करे. मैंडमस, एक तरह का जूडिशियल रिट होता है, जिसे कोर्ट जारी करता है, इसके ज़रिए कोर्ट सरकार को, अपने तहत आने वाले बाकी कोर्ट्स को या किसी अधिकारी को कोई काम करने का आदेश देता है. PIL में संविधान के आर्टिकल 47 का भी ज़िक्र हुआ, ये आर्टिकल कहता है राज्य मादक पेय पदार्थों को रोकने की तरफ काम करेगा. ये आर्टिकल केवल इस दिशा की तरफ काम करने को कहता है, मादक पदार्थों में सीधे तौर पर रोक लगाने को नहीं कहता. PIL में औरतों ने अगली मांग ये रखी थी कि कोर्ट मैंडमुस के तौर पर एक रिट जारी करे, और अवैध तरीकों से शराब की बिक्री पर रोक लगाने के निर्देश दे. ये भी कहा था कि कोर्ट हर गांव में औरतों की एक निगरानी समिती बनाने का निर्देश दे, जो शराब की अवैध बिक्री को रोकने की दिशा में काम करेगी. इसी तरह की कई सारी मांग इस PIL में की गई. कर्नाटक हाई कोर्ट ने 1 दिसंबर 2020 को अपना फैसला सुनाया. मैंडमस तो जारी नहीं किया, लेकिन सरकार अवैध बिक्री को रोकने की मांग पर निर्देश ज़रूर किया. कोर्ट ने कहा-

“ये राज्य सरकार की ड्यूटी है कि इस बात का ध्यान रखा जाए कि शराब की बिक्री अवैध तरीके से न हो. अवैध बिक्री को रोकने के लिए तुरंत एक्शन लिया जाए. अगर महिलाओं का कोई ऑर्गेनाइज़ेशन इस तरह की शिकायत करता है, तो राज्य सरकार और अधिकारियों की ज़िम्मेदारी बनती है कि महिलाओं के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए एक्शन लिया जाए.”

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2020 में हुए जल-सत्याग्रह के दौरान की एक तस्वीर.

हाई कोर्ट के इसी निर्देश के पालन की मांग अब औरतें कर रही हैं. 11 फरवरी से धरने पर बैठी हैं. इन औरतों ने मुख्यमंत्री बी.एस येदियुरप्पा के नाम एक एप्लीकेशन भी लिखा, जिसे रायचूर के विधायक डॉक्टर शिवराज पाटिल को 13 फरवरी के दिन सौंपा. औरतों ने मांग रखी कि इस बार वो पूर्ण शराबबंदी की डिमांड नहीं कर रही हैं, लेकिन वो चाहती हैं कि कम से कम शराब की अवैध बिक्री पर रोक लगा दी जाए. लेटर में कहा गया है-

“हम चाहते हैं कि सीएम औरतों के प्रतिनिधिमंडल से मिलें. हमारी दिक्कतें सुनें. 30 ज़िलों के कलेक्टर से हम मांग करते हैं कि हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन करें, और अवैध बिक्री पर रोक लगाएं. ‘कर्नाटक प्रोहिबिशन एक्ट-1961’ के तहत हर गांव में एक विजिलेंस कमिटी बनाएं, जिनमें करीब 5-7 महिलाएं शामिल हों. ये कमिटी इस बात का ध्यान रखेगी कि अवैध तरीके से शराब न बेची जाए. शराब बेचने का लाइसेंस देने के लिए ग्राम पंचायत और ग्राम सभा की अनुमति लेना ज़रूरी कर दिया जाए.”

ये सारी मांगे औरतों ने अपने एप्लीकेशन में रखी है. अब इस एप्लीकेशन में सरकार का क्या कहना है, शराब की अवैध बिक्री को लेकर औरतें जो दावा कर रही हैं, उस पर सरकार का क्या कहना है, ये जानने के लिए हमने कर्नाटक आबकारी विभाग के डिप्टी कमिश्नर को कॉल किया था, लेकिन जब हमने उन्हें कहा कि आपका बयान चाहिए इस मुद्दे पर, तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया. ये कहते हुए कि उन्हें इस पर बोलने का अधिकार नहीं है, कमिश्नर से बात की जाए. कमिश्नर जी को फोन लगा नहीं. फिर कर्नाटक के एक्साइज़ मिनिस्टर को हमने कॉल किया, उन्होंने फोन नहीं उठाया.

आंकड़े क्या कहते हैं?

अब एक नज़र आंकड़ों पर डालते हैं. 2018 में ‘TOI’ में एक रिपोर्ट पब्लिश हुई थी, जिसमें कहा गया था कि पिछले 11 साल में कर्नाटक में शराब की खपत 77 फीसद तक बढ़ी और इससे मिलने वाला एक्साइज़ रिवेन्यू 273 फीसद तक बढ़ा. ऐसा नहीं है कि केवल कर्नाटक की औरतें शराब पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रही हैं, बल्कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु समेत और भी कई राज्यों की औरतें ये मांग कर रही हैं. 2017 में राजस्थान की औरतों के प्रदर्शन का ये असर हुआ था कि एक्साइज़ डिपार्टमेंट को भरतपुर में एक शराब की दुकान बंद करनी पड़ी थी. ‘मद्य निषेध’ आंदोलन के जुड़े एक व्यक्ति से हमने बात की, उन्होंने बताया कि राजस्थान और मध्य प्रदेश की कई औरतें इस आंदोलन से जुड़ना चाहती हैं और अपने राज्य में भी इसे बैन करवाना चाहती है.

सवाल ये है कि इतनी सारी जगहों से इतनी मांगों के बाद भी सरकार शराब की बिक्री पर रोक क्यों नहीं लगाती? इसका एक ही जवाब है- पइसा बाबू भइया पइसा. दरअसल, शराब की वजह से सरकार को अच्छा खासा एक्साइज़ रिवेन्यू मिलता है. वैसे भारत के कई राज्यों ने शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है. गुजरात, बिहार, नागालैंड, लक्ष्यद्वीप और मिज़ोरम में शराब बैन है. गुजरात 1960 में बॉम्बे स्टेट से अलग होकर राज्य बना था, तब से ही यहां पर शराब बैन है. यहां शराब बनाना, बेचना, कंज्यूम करना, स्टोर करके रखना सब अवैध है. हालांकि ऐसी कई रिपोर्ट्स आई हैं कि बैन के बाद भी गुजरात में अवैध तरीके से शराब का कारोबार होता है. थोड़ा आइडिया लेना है तो रईस फिल्म देख लीजिएगा. सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है. अब बात बिहार में हुई शराबबंदी की. 2016 से यहां बैन लगा हुआ है, लेकिन यदा-कदा यहां से अवैध बिक्री की खबर आती रहती है. NFHS यानी नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019-20 कहता है कि बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा शराब कन्ज़्यूम की जाती है. रिपोर्ट ने बताया कि 15 साल से ऊपर के करीब 15.5 फीसद पुरुष शराब का सेवन करते हैं. जबकि महाराष्ट्र में ये आंकड़ा 13.9 फीसद है. इसके अलावा कुछ ऐसे राज्य भी हैं हमारे यहां, जिन्होंने शराबबंदी की थी, लेकिन बाद में बैन हटा दिया था. इनमें एक नाम केरल का है. अब शराब की वजह से मरने वालों के आंकड़ों पर भी बात कर लेते हैं. 2018 में WHO की एक रिपोर्ट आई थी, उसके मुताबिक हर साल 2.6 लाख लोगों की, यानी करीब ढाई लाख भारतियों की या तो शराब की वजह से लीवर में होने वाली दिक्कत के चलते मौत होती या फिर कैंसर या ड्रंक ड्राइविंग की वजह से एक्सीडेंट में मौत होती है. खैर, कर्नाटक में सरकार क्या फैसला लेती है, ये समय आने पर पता चलेगा.


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