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अगर कन्हैया कुमार ऐसी ही बातें करते रहे, तो युवा लड़कियां उन्हें कभी अपना नेता नहीं मान पाएंगी

कन्हैया कुमार. कम्युनिस्ट पार्टी इंडिया के नेता. पूर्व JNU छात्र. इंडिया टुडे के पोर्टल पर एक डिबेट में आए. अमिताभ सिन्हा के साथ बहस चल रही थी. अमिताभ बीजेपी के स्पोक्सपर्सन हैं. लॉयर हैं. JNU से ही पढ़े हैं. राजदीप सरदेसाई इस डिबेट को मॉडरेट कर रहे थे. इस बहस के दौरान अमिताभ सिन्हा ने कन्हैया से कहा कि तियानानमेन स्क्वायर के बारे में उन्हें नहीं पता होगा क्योंकि वो बच्चे थे. इसके जवाब में कन्हैया ने कहा,

जब 2010 में 76 CRPF जवानों  की हत्या के खिलाफ प्रोटेस्ट चल रहा था, तब आप क्या कर रहे थे? चूड़ी पहन लिए थे?

वीडियो आप यहां देख सकते हैं. चूड़ियों वाली बात आप 11 मिनट 40 सेकण्ड पर सुन सकते हैं:

यानी क्या आप डर कर दुबक गए थे? कहीं कोने में छुप गए थे?

और ये कोई पहली बार नहीं है कि इसे पॉलिटिकल बयानों में इस्तेमाल किया गया है. हाल में ही कैलाश विजयवर्गीय ने भी कमलनाथ को चुनौती देते हुए कहा था, कमलनाथ सुन लो, हमने चूड़ियां नहीं पहन रखीं, ईंट से ईंट बजाकर रख देंगे.

चूड़ी ही क्यों?

चूड़ियां पहन लेना मुहावरा है. यानी ‘स्त्री जैसी असमर्थता दिखाना’. किसी मर्द को ताना देना हो कि वो नालायक है, या उसमें हिम्मत नहीं है, तो उसे कह दिया जाता है कि उसने चूड़ियां पहन रखी हैं. कई बार औरतें भी धरना प्रदर्शन करने बैठती हैं तो नेताओं को चूड़ियां भेज देती हैं. प्रतीकात्मकता यही है कि जिसने चूड़ियां पहनी हैं, वो ‘मर्द’ नहीं हैं. नाज़ुक हैं. उससे कोई उम्मीद नहीं रखी जा सकती.

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(सांकेतिक तस्वीर: फेसबुक)

क्यों गलत है ये?

चूड़ी श्रृंगार की चीज जब तक रहे, तब तक ठीक. जैसे ही उसे महिलाओं की कमजोरी का स्टीरियोटाइप बना दिया जाता है, तभी दिक्कत हो जाती है. तब आप ये दिखाने लगते हैं कि आप कमजोर हैं, क्योंकि चूड़ियां महिलाओं का गहना है और महिलाएं कमजोर होती हैं. इसलिए एक महिला होना बेइज्जती की बात है. अपने चूड़ी पहन ली, तो ये आपके लिए शर्म की बात है.

कन्हैया से दिक्कत क्यों?

कन्हैया छात्र नेता के रूप में उभरे. उन्होंने प्रोग्रेसिव राजनीति की बात की. कहा, हम मुद्दों पर लड़ेंगे. हम बाकियों की तरह नफरत की बात नहीं करेंगे. हमारी लड़ाई बराबरी की लड़ाई है. इन वादों के साथ उन्होंने जेएनयू का प्रतिनिधित्व किया. फिर मुख्यधारा की राजनीति में आए. अब सार्वजनिक मंच पर उनके मुंह से इस तरह की बातें सुनकर, उनमें और मिसोजिनी में डूबी हुई बातें करने वाले नेताओं में कोई अंतर करना मुश्किल लगता है. JNU की लड़ाई से लेकर अभी तक के सभी छात्र आन्दोलनों में लड़कियों ने आगे बढ़ कर काम किया है. लाठियां खाई हैं. जेलों में बंद हुई हैं. पुलिस से लेकर प्रशासन से टकराई हैं. जामिया में हो रही हिंसा के दौरान लड़कियों ने न सिर्फ विरोध किया बल्कि अपने साथियों को बचाने के लिए घायल भी हुईं. ऐसी लड़कियों साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की बात करने वाले कन्हैया कुमार उन्हें ही नीचा दिखा रहे हैं?

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लाठियां खातीं, विरोध में खड़ी लड़कियां. जिन के साथ खड़े होना का दावा कन्हैया कुमार करते हैं. उनके लिक्ये जाने अनजाने में ऐसी भाषा का इस्तेमाल भी करते हैं. (तस्वीर: ट्विटर)

ये कतई सच नहीं है कि चूड़ियां पहनने से कोई छोटा या कमज़ोर हो जाता है. हर कोई जानता है. ये एक मुहावरा है. जो कि दिखाता है कि भाषा के तौर पर हम अभी भी कितने गरीब हैं. कि हमारे पास कमजोरी और कायरता मापने के पैमाने अभी भी उन्हीं सतही, दोमुंही, स्त्रीद्वेषी तरीकों से तय हो रहे हैं जिससे पीछा छुड़ाने के लिए सदियों से महिलाएं लड़ रही हैं.

हो सकता है कन्हैया की मंशा औरतों को कमज़ोर कहने की न रही हो. बहस के दौरान आवेश में आकर उन्होंने ये बात कही हो. उनको डिफेंड करने वाले लोग भी शायद यही कहें. लेकिन इससे बात और पक्की हो जाती है. आवेश में मनुष्य का फ़िल्टर हट जाता है. उसमें वो बातें निकल जाती हैं जिनको हम आमतौर पर लोगों के सामने नहीं कहते. जिसे ‘कंडिशनिंग’ कहा जाता है, वो साफ़ झलक जाती है ऐसे में. जिससे पार पाने के लिए बहुत कुछ जो सीखा जा चुका है, उसे भूलना पड़ता है.

भूलना ये कि बचपन से जो सीखा वो सही है. भूलना, भाषा का. और याद रखना, कि जिन चूड़ियों की बेइज्जती कन्हैया जाने अनजाने में कर रहे हैं, वो महज़ एक गहना है, श्रृंगार का सामान. उसका सामर्थ्य या कमज़ोरी से कोई लेना-देना नहीं है.


वीडियो: पुस्तक मेले में आए बुजुर्ग को ‘हम देखेंगे’ गाने वाले स्टूडेंट्स से क्या शिकायत है? 

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