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जस्टिस भानुमती : रात ढाई बजे कोर्ट खोलकर निर्भया के दोषियों को फांसी तक पहुंचाने वाली जज

20 मार्च, 2020 को निर्भया गैंगरेप के चार दोषियों को फांसी दे दी गई. लेकिन फांसी से पहले दोषियों के वकील एपी सिंह ने फांसी रोकने की हर संभव कोशिश की. दिल्ली हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट, यहां तक कि इंटरनैशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस तक में उन्होंने इसके लिए अपील कर डाली. फांसी से महज़ ढाई घंटे पहले यानी रात के ढाई बजे सुप्रीम कोर्ट की बेंच बिठाई गई, ताकि एपी सिंह की अपील सुनी जा सके. देर रात जस्टिस आर भानुमती की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने एपी सिंह की अपील खारिज कर दी. इस बेंच में जस्टिस भानुमती के अलावा जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एएस बोपन्ना भी शामिल थे. उनके निर्णय के बाद पवन, विनय, मुकेश, और अक्षय को फांसी दे दी गई.

ये पहली बार नहीं है जब जस्टिस भानुमती ने इतने संवेदनशील और विवादित मुद्दे पर फैसला दिया है.

कौन हैं जस्टिस भानुमती?

तमिलनाडु की हैं. 1981 में वकालत शुरू की. सात साल तक डिस्ट्रिक्ट और मुफस्सिल कोर्ट्स में प्रैक्टिस किया उन्होंने. 1988 में तमिलनाडु हायर जुडिशियल सर्विस का हिस्सा बनीं, और डिस्ट्रिक्ट जज (सेशंस जज) के पद पर उनकी नियुक्ति हुई. 2003 में मद्रास हाई कोर्ट की जज बनीं. 2013 में उन्हें झारखंड हाई कोर्ट में नियुक्ति मिली, और वहां की चीफ जस्टिस बनीं. 2014 में सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति हुई. सेशंस जज से सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस का सफ़र तय करने वाली वो भारत के इतिहास की दूसरी महिला रहीं, उनसे पहले जस्टिस फातिमा बीबी 1989 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी. उन्होंने भी सेशंस जज के तौर पर अपना करियर शुरू किया था. वह छठी महिला हैं जो सुप्रीम कोर्ट की जज बनीं.

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जस्टिस भानुमती 2014 में सुप्रीम कोर्ट की जज बनीं. इनका कार्यकाल सात साल का होगा. (तस्वीर साभार: The news Minute)

नवंबर, 2019 में जस्टिस भानुमती सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम का हिस्सा बनीं. कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट के सबसे सीनियर पांच जजों का पैनल होता है, जो अलग-अलग हाई कोर्ट्स में जजों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करता है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद जस्टिस भानुमती कॉलेजियम में शामिल हुईं. 13 साल बाद कॉलेजियम में किसी महिला जज की एंट्री हुई. उनसे पहले जस्टिस रूमा पाल इसका हिस्सा रही थीं.

महत्वपूर्ण फैसले:

# 1997 में स्वघोषित संत प्रेमानंद को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी. उस वक्त वो पुदुकोट्टई के सेशंस कोर्ट में जज थीं. प्रेमानंद को उसके आश्रम में रहने वाले फॉलोअर्स के यौन शोषण और एक हत्या के आरोप में दोषी पाया गया था. इस फैसले में जस्टिस भानुमती ने उसे उम्र कैद की दो सजाएं दी थीं. इस शर्त के साथ कि वो दोनों सजाएं साथ नहीं भुगतेगा. अलग-अलग भुगतेगा. यानी 32 साल. उस पर 67 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था. 2011 में प्रेमानंद की जेल में ही मौत हुई.

# 2006 में मद्रास हाई कोर्ट में उन्होंने जलीकट्टू (सांडों की लड़ाई) पर बैन लगा दिया था. केंद्र सरकार ने इस बैन को 2014 में हटा दिया था. इस पर 2016 में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई, तब जस्टिस भानुमती ने खुद को इस सुनवाई से रेक्यूज (अलग) कर लिया था.

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जस्टिस भानुमती का कॉलेजियम का हिस्सा बनना एक बेहद महत्वपूर्ण घटना थी. पिछले 13 सालों में पहली बार कोई महिला जस्टिस कॉलेजियम में पहुंची थीं. (तस्वीर: indialegal)

# 2010 में उन्होंने तमिलनाडु की तामिरापारानी नदी के आस-पास बालू की खुदाई पर रोक लगा दी थी. ये बैन पांच साल के लिए था. जजमेंट में बेंच ने तमिलनाडु की सभी नदियों में बालू के खनन के लिए गाइडलाइन्स जारी की थीं. इसी के साथ राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग कमिटी बनाने का आदेश दिया था. जो बालू के खनन पर नजर रखेगी.

# 2017 में निर्भया गैंगरेप मामले पर निर्णय देते हुए जस्टिस भानुमती ने अलग से अपना मत दिया था. और सज़ा-ए-मौत की वकालत की थी. कहा था कि ये अपराध रेयरेस्ट ऑफ द रेयर की कैटेगरी में आता है.


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