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इस लड़की ने धरती के अंदर घुसकर ऐसा क्या कारनामा कर दिया कि बड़े-बड़े मंत्री ट्वीट कर रहे हैं

खबरों की दुनिया में औरतों की जगह कहां हैं? कब आती हैं औरतें खबरों में? ज्यातादर उस वक्त जब वो किसी घिनौने अपराध का शिकार होती हैं. या फिर जब वो कुछ बड़ा अचीव करती हैं या जब बरसों से औरतों को नज़रअंदाज़ करता समाज अचानक से जागता है और महिलाओं के हक में काम करता है. कल यानी 31 अगस्त के दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ. ट्विटर पर बड़े-बड़े ब्लूटिकधारियों ने एक लड़की को बधाई दी. क्योंकि उस लड़की ने एक ऐसी फील्ड में इतिहास रचा है, जहां औरतों की मौजूदगी न के बराबर है. हम बात कर रहे हैं आकांक्षा कुमारी की. और जिस फिल्ड में उन्होंने नाम कमाया है वो है कोल माइनिंग की फील्ड. आकांक्षा कोयले की खदान में अंडरग्राउंड काम करने वाली कोल इंडिया की पहली भारतीय महिला माइनिंग इंजीनियर बन गई हैं. कौन हैं आकांक्षा? कैसा है उनका अब तक का सफर? क्यों आज तक भारत की महिलाएं कोयला खदानों के अंदर काम नहीं कर सकीं? सब जानेंगे एक-एक करके.

कौन हैं आकांक्षा?

आकांक्षा कुमारी 25 साल की हैं. झारखंड के हज़ारीबाग के बरकागांव की रहने वाली हैं. अब चूंकि हज़ारीबाग अपनी कोल माइन्स के लिए जाना जाता है, तो आकांक्षा ने बचपन से ही कोल माइनिंग की एक्टिविटीज़ को करीब से देखा था. उन्होंने भी इसी फील्ड में करियर बनाने का फैसला किया. नवोदय विद्यालय से स्कूलिंग के बाद उन्होंने धनबाद के बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी सिंदरी से माइनिंग इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया. राजस्थान में हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड की माइन्स में तीन साल काम किया और फिर CCL से जुड़ीं. और यहां से आकांक्षा की ज़िंदगी ने नया मोड़ ले लिया.

CCL माने सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड. ये कोल इंडिया लिमिटेड यानी CIL की कई सहायक कंपनियों में से एक है. यानी कोल इंडिया के तहत काम करती है. और कोल इंडिया भारत सरकार के कोयला मंत्रालय के तहत तहत काम करती है. देश की कोयला खदानों का लेखा-जोखा और रखरखाव का ज़िम्मा कोयला मंत्रालय के हाथ में ही है. ‘मिंट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड में नॉर्थ करनपुरा एरिया में CCL की चुरी अंडरग्राउंड माइन्स है. इस माइन्स से जुड़ने वाली पहली महिला इंजीनियर आकांक्षा हैं. CCL ने 31 अगस्त को एक स्टेटमेंट जारी कर कहा-

“आकांक्षा कुमारी CCL में शामिल होने वाली पहली महिला माइनिंग इंजीनियर हैं. हमारी महिला कर्मचारी, अधिकारी से लेकर डॉक्टर तक बन रही हैं. सिक्योरिटी गार्ड से लेकर डंपर जैसी भारी मशीनें चला रही हैं. सारी ज़िम्मेदारियां बखूबी निभा रही हैं. हर काम में शानदार प्रदर्शन दे रही हैं. हालांकि ये पहली बार हो रहा है कि दुनिया की बड़ी कोल माइनिंग कंपनियों में से एक कंपनी इतने बड़े और प्रगतिशील बदलाव को देखेगी. कोल इंडिया लिमिटेड के इतिहास में आकांक्षा पहली महिला माइनिंग इंजीनियर हैं, जो अंडरग्राउंड माइन्स में काम करेंगी. वो अपने परिवार को क्रेडिट देती हैं, जिन्होंने लगातार उन्हें सपोर्ट किया. कोल इंडिया लिमिटेड में शामिल होना उनके बचपन के सपने का पूरा होना है.”

आकांक्षा का सफर कैसा रहा? उन्होंने क्यों, कब और कैसे कोल माइनिंग में अपना करियर बनाने का फैसला किया? ये जानना बेहद ज़रूरी है. इसके जवाब के लिए हमारे साथी नीरज ने बात की आकांक्षा से. वो कहती हैं-

“मैं जिस गांव से हूं, वो एरिया पूरा कोल्ड फील्ड एरिया है. जब मैं छोटी थी तब मैंने सुना था कि आस-पास माइन्स हैं. मेरे दादाजी भी घर पर जलाने के लिए भी लेने जाते थे. तो उनसे पूछती थी कि ये अपने खेतों में क्यों नहीं होता? आप दूसरों के खेतों से क्यों लाते हो? तो वो समझाने के लिए जवाब देते थे कि अपने खेतों में नहीं होता, वो दूसरों के खेतों में ही होता है. बच्चों को शांत करवाने के लिए जैसे पैरेंट्स जवाब देते हैं, उस तरह का वो जवाब देते थे. जब मैं बड़ी हुई, नवोदय गई, तो उत्सुकता और बढ़ती गई. मेरी दोस्त रामगढ़ के आस-पास थी. वो बताती थी कि उसके आस-पास के लोग कोयला लेने के लिए जाते हैं. मैं उससे पूछती थी कि कैसे निकालते हैं कोयला? वो मुझे एक्सप्लेन करती थी कि “मान लीजिए एक कमरा है, पूरा सॉलिड है. उसको काटते-काटते अंदर घुस जाओ”. मैं पूछती थी कि काटते-काटते घुस तो जाएंगे, लेकिन वो स्टेबल तो नहीं रहेगा. गिर जाएगा वो कमरा. माने मेरी सहेली खुद मेरी उम्र की थी, इसलिए खुद इतना नहीं जानती थी. ऐसे में मेरी उत्सुकता और बढ़ती गई. फिर मैंने सोचा कि इसी फील्ड में मैं आगे बढ़ूंगी. जानूंगी कि आखिर क्या है, कैसे है?”

चूंकि ये फील्ड ऐसी है, जिसमें लड़कियां काफी कम हैं. हैं भी तो अंडरग्राउंड काम नहीं करतीं. ऐसे में ज़ाहिर है आकांक्षा के सामने काफी चुनौतियां आ सकती हैं. इनका सामना करने के लिए वो खुद को कैसे तैयार कर रही हैं? इसका जवाब भी हमें दिया आकांक्षा ने-

“चुनौतियां केवल माइनिंग में नहीं है, हर फील्ड में है. पर खुद की इच्छाशक्ति ही ऐसी होती है, जिसके दम पर आप चुनौतियों से निपट सकते हो. आस-पास के लोग भी, जो आपको मोटिवेट करते हैं. जैसे मेरे पापा कहा करते थे कि “फैसला आपका है. जो भी चुनौती होगी, आपकी होगी. नतीजा जो भी होगा, आपका होगा. लेकिन आप हार गए तो मैं आपके साथ हूं”. तो ये बात मुझे मोटिवेट करती थी, कि मैं जो भी फैसला ले रही हूं मेरे पैरेंट्स मेरे साथ हैं.”

Akanksha Kumari (2)
आकांक्षा हमेशा से कोल माइन्स को लेकर काफी उत्सुक थीं.

कोल माइन में अंडरग्राउंड काम करने वाली पहली महिला इंजीनियर होने के नाते आकांक्षा क्या सोचती हैं, ये जानना भी ज़रूरी था. इस पर आकांक्षा कहती हैं-

“आप गूगल पर सर्च करेंगे तो आपको माइनिंग में औरतें दिखेंगी. पहले भी काम करती थीं. लेकिन आज़ादी के बाद हालात बदले. ऐसा नियम आया कि हमें परमिशन नहीं मिली, लेकिन 2019 में ये संशोधन आया और इसके लिए मैं शुक्रगुज़ार हूं. फीमेल माइनिंग इंजीनियर को परमिशन दी गई कि वो अंडरग्राउंड काम कर सकती हैं. मेरे साथ ऐसा हुआ कि जब मैं एग्ज़ाम देने गई, तो इंटरव्यू में मुझसे पहला ही सवाल ये पूछा गया था कि “आप ये क्यों ले रही हैं. आपको तो परमिशन है नहीं अंडरग्राउंड काम करने की?” मैंने कहा कि ‘मैच खेलने के लिए तैयारी तो पहले से करनी पड़ेगी. बस मैं उसी की तैयारी कर रही हूं, जब मौका मिलेगा तो मुझे अफसोस नहीं होगा कि मेरे पास ये सर्टिफिकेट होता तो मैं कर पाती’.”

आकांक्षा ने भारत की उन लड़कियों को भी खास मैसेज दिया है, जो अपना करियर माइनिंग की फील्ड में बनाना चाहती हैं. वो कहती हैं-

“जो है सब आप खुद हो. आपके अंदर सबकुछ है. बस आपके अंदर हिम्मत होनी चाहिए उस रास्ते को चुनने की, जिस पर कोई चला न हो. मैं पैरेंट्स से कहना चाहूंगी कि आप कभी उन्हें डिमोटिवेट न करें. कभी सोसायटी के नियम-कानून न समझाएं. मैंने तो अभी शुरुआत बस की है, मिलकर इतिहास लिखना बाकी है.”

लगातार मिल रही तारीफ

आकांक्षा को लगातार बधाइयां मिल रही हैं. कोल मिनिस्ट्री से लेकर CCL, हर किसी के ट्विटर हैंडल के ज़रिए कुछ न कुछ लिखा जा रहा है. यूनियन मिनिस्टर ऑफ कोल प्रहलाद जोशी ने भी आकांक्षा को बधाई दी. हालांकि उन्होंने अपनी सरकार की भी भरपूर तारीफ की. ट्विटर पर लिखा-

“प्रगतिशील सरकार: लैंगिक समानता प्रमोट करने के लिए और ज्यादा अवसर पैदा करने के लिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तहत काम कर रही सरकार ने औरतों को कोल माइन्स में अंडरग्राउंड काम करने की परमिशन दी थी. और आकांक्षा कुमारी ऐसा करने वाली कोल इंडिया की पहली महिला माइनिंग इंजीनियर बनीं.”

BJP के तीन बार के सांसद पीसी मोहन ने भी ट्वीट कर आकांक्षा को बधाई दी. कहा-

“जेंडर रिप्रेजेंटेशन के लिए ये ऐतिहासिक पल है. जस्टिस हिमा कोहली, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस बेला त्रिवेदी ने सुप्रीम कोर्ट के जज की शपथ ली. और आकांक्षा कुमारी कोल इंडिया में अंडरग्राउंड माइन में काम करने वाली पहली महिला माइनिंग इंजीनियर बनीं.”

भारत की कोल माइन्स में औरतें किस लेवल पर हैं, ये आपको हम बताएंगे, लेकिन पहले सरसरे तौर पर ये जान लीजिए कि खदानों में काम किस तरह होता है. ताकि आप अच्छी तरह से आगे की बातें समझ पाएं. देखिए भारत की कोयला खदानों से कोयला निकालने का सारा कामकाज कोल इंडिया लिमिटेड यानी CIL देखता है. इसके तहत करीब 345 खदानें हैं. इसकी आधिकारिक वेबसाइट की मानें तो इन खदानों में 151 अंडरग्राउंड हैं, 172 ओपन कास्ट और 22 मिक्स्ड खदानें हैं. अंडरग्राउंड यानी कोयले तक पहुंचने के लिए रास्ता बनाकर जाना, ओपन कास्ट यानी ज़मीन के अंदर दबे कोयले को बाहर लाने के लिए उसके ऊपर की लेयर्स हटाना और मिक्स्ड खदानें, जहां दोनों ही तरीकों से कोयले को बाहर निकाला जाता है. इन खदानों के बारे में और भी डिटेल में जानने के लिए हमारे साथी नीरज ने बात की जितेंद्र मलिक से. ये CMC, BCCL में महाप्रबंधक हैं. वो कहते हैं-

“हमारे यहां कोयले का डिपॉज़िट, जिसे हम कोल शीट कहते हैं, वो एक बेड के रूप में पृथ्वी के गर्भ गृह में हमें मिलता है. उस तक पहुंचने के हमारे पास दो तरीके हैं. या तो हम कोयले की परत के ऊपर से जो भी रॉक्स हैं, मिट्टी है, उसे पूरी तरह से हटा दें. फिर उस तक पहुंचे. ये तरीका ओपनकास्ट है. दूसरा उस शीट तक पहुंचने के लिए एक रास्ता बनाएं, जिसे हम शाफ्ट कहते हैं. उसमें हमें कोयले के ऊपर का पूरा मटेरियल नहीं हटाना होता है. खाली उस तक पहुंचने के लिए गैलरी की तरह रास्ता बनाना होता है. जहां गहराई ज्यादा है, वहां हम अंडरग्राउंड माइनिंग करते हैं.”

हमारे देश की कोयला खदानें रोज़गार का बड़ा साधन हैं. लेकिन इस साधन में बहुत ही कम औरतें शामिल हैं. और जो काम कर भी रही हैं वो अंडरग्राउंड खदानों में काम नहीं कर रहीं. वो ऑफिस वर्क या ओपन कास्ट खदानों में काम कर रही हैं. जितेंद्र मलिक बताते हैं कि औरतों की संख्या कम इसलिए रही क्योंकि आधिकारिक तौर पर कई सारे नियमों के तहत प्रतिबंध लगाए गए थे. एक प्रतिबंध हम आपको बताते हैं. एक एक्ट है- माइन्स एक्ट 1952. खदानों में किस तरह से काम होगा, सुरक्षा के कैसे इंतज़ाम होंगे, इन सबके बारे में ये एक्ट बात करता है. ये एक्ट औरतों को अंडरग्राउंड खदानों में काम करने से रोकता था. साथ ही ये भी प्रावधान था कि ओपनकास्ट या अंबवग्राउंड खदानों में काम कर रही औरतें नाइट शिफ्ट नहीं करेंगी. ‘PIB’ की रिपोर्ट की मानें तो महिला कर्मचारियों के ग्रुप्स ने, माइनिंग इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले कई सारे स्टूडेंट्स ने सरकार के सामने मांग रखी की माइनिंग में भी औरतों को नौकरी के समान अवसर दिए जाएं. माइनिंग कंपनियों ने भी ये मांग रखी. सरकार के कई सारे मंत्रालयों ने एक कमिटी बनाई और इन मांगों पर विचार किया. फिर ये फैसला सुनाया गया कि औरतें अंडरग्राउंड कोल माइन्स में काम कर सकेंगी. साथ ही ओपनकास्ट और अबवग्राउंड कोल माइन्स में नाइट शिफ्ट भी कर सकेंगी.

Akanksha Kumari Coal Mining (1)
कोयले की खदानों में पहले अंडरग्राउंड कामों में महिलाओं को एंट्री नहीं मिलती थी. (कोयले की खदान. सोर्स- गेटी)

क्या शर्तें रखी गईं?

हालांकि कुछ नियमों और शर्तों के साथ ये बदलाव किए गए. जैसे ओपनकास्ट या अबवग्राउंड में महिलाओं से नाइटशिफ्ट करवाने के लिए पहले उनसे लिखित कंसेंट लिया जाए. उसके बाद ही महिलाएं शाम सात से लेकर अगली सुबह 6 बजे के बीच काम कर सकेंगी. महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े सारे ज़रूरी इंतज़ाम किए जाएं. महिलाओं का डिप्लॉयमेंट एक ग्रुप में किया जाए, जिनमें कम से कम तीन लोग तो एक शिफ्ट में शामिल हों.

अब बताते हैं कि अंडरग्राउंड माइनिंग में औरतों को परमिशन देते हुए क्या शर्तें रखी गईं. कहा गया कि माइन का मालिक महिलाओं को सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बीच डिप्लॉय कर सकता है. टेक्निकल, सुपरवाइज़री और मैनेजेरियल कामों में. महिलाओं से लिखित कंसेंट लिया जाए. सुरक्षा के इंतज़ाम सारे हों. ग्रुप में डिप्लॉय किया जाए.

अच्छी बात है कि औरतों को अंडरग्राउंड कोल माइन्स में परमिशन मिल गई और अब औरतें इस दिशा की तरफ नए कदम उठा रही हैं. लेकिन सवाल उठता है कि हमारी माइन्स औरतों के लिए तैयार हैं भी या नहीं. जैसे- क्या वहां उनके लिए अलग से टॉयलेट होंगे या नहीं. और किस तरह की चुनौतियों का सामना माइन्स के अंदर औरतों को करना पड़ सकता है. इनसे निपटने के लिए क्या किया जाना चाहिए. इसका जवाब हमें दिया जितेंद्र मलिक ने. साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि अब तक औरतें कोल माइन्स से दूर क्यों थीं. वो कहते हैं-

“अभी तक हमारे रेगुलेशन्स जो बने थे, उसमें महिलाओं को हम लोग इंगेज नहीं कर सकते थे. लेकिन जैसे-जैसे हमारा देश प्रगति कर रहा है, सोच में बदलाव आ रहा है, तो नियमों में बदलाव लाए गए और अब महिलाएं भी खदानों में काम कर सकती हैं. पहले ये नियम में शामिल नहीं था. पुरुषों को बस परमिशन थी काम करने की माइनिंग में. ऑफिस और सरफेस में महिलाएं काम कर सकती थीं, लेकिन अंडरग्राउंड में प्रतिबंध था. उसमें केवल पुरुष काम कर सकते थे. लेकिन हमारा देश अब नई दिशा की तरफ मुड़ रहा है. चूंकि अंडरग्राउंड माइन एक हज़ार्डस प्रोफेशन तो है ही, लेकिन अब तक हमारे रेगुलेशन्स में ऐसा था नहीं, लेकिन अब जब महिलाएं भी काम करेंगी, तो हमें भी काफी बदलाव लाने होंगे. जैसे सेनिटेशन का मुद्दा हुआ या किसी पर्सनल ज़रूरत का मुद्दा हुआ. उस हिसाब से हमें बदलाव लाने होंगे. माइन्स को और डेवलप किया जाएगा, ताकि महिलाओं की पर्सनल ज़रूरतों का ख्याल रखा जा सके.”

महिलाएं इस फील्ड में कम क्यों हैं?

अब ऐसा नहीं है कि औरतें माइनिंग में जाना नहीं चाहतीं. लेकिन ये फील्ड कथित तौर पर पुरुषों की फील्ड मानी जाती है. इसलिए कई बारी लड़कियां अगर चाहें भी तो उनके परिवार वाले दस तरह की बातें कहकर उन्हें मना कर देते हैं. मॉरल तो वहीं पर डाउन हो जाता है. और अगर लड़कियां इन सबसे लड़कर आगे बढ़ें भी, तो कई दरवाज़ें उनके लिए बंद रहते हैं. केवल उनके लिंग की वजह से. जैसे अभी हमने आपको अंडरग्राउंड और नाइटशिफ्ट वाला वाकया बताया. डॉक्टर चंद्राणी प्रसाद वर्मा, देश की पहली महिला माइनिंग इंजीनियर कहलाती हैं. जब 2019 में सरकार ने अंडरग्राउंड कोल माइनिंग में औरतों को परमिशन दी, तब चंद्राणी ने ‘द हिंदू’ को एक इंटरव्यू दिया था. उन्होंने बताया था-

“मोटामाटी हिसाब लगाएं तो भारत में करीब 120 औरतों ने माइनिंग में या तो बी.टेक किया है या डिप्लोमा किया है, लेकिन उनमें से ज्यादातर औरतें माइनर्स के तौर पर काम नहीं कर रहीं. हो सकता है कि नए नियम आने के बाद कंपनियां औरतों को हायर करने लगें.”

चंद्राणी के पिता खुद कोल्डफील्ड्स में काम करते थे, उन्होंने बचपन से वो काम देखा था, इसलिए वो भी चाहती थीं कि माइनिंग इंजीनियर बनें. उन्होंने बताया कि ऐसा कोई नियम नहीं था कि माइनिंग के डिप्लोमा प्रोग्राम में औरतें एडमिशन नहीं ले सकतीं, लेकिन जब उन्होंने कोर्स करना चाहा तो मैनेजमेंट उन्हें सीट देने में आनाकानी करता दिखा. चंद्राणी बताती हैं कि उनके एडमिशन लेने के अगले ही साल कॉलेज ये नियम लेकर आ गया कि ये प्रोग्राम लड़कियों के लिए नहीं है.

डिप्लोमा के बाद जब चंद्राणी ने माइनिंग में बी.टेक के लिए एडमिशन लेना चाहा, तो ये दाखिला भी उन्हें आसानी से नहीं मिला था. वो बताती हैं- “मुझे कोर्ट में मेरे दाखिले के लिए लड़ना पड़ा. ये लड़ाई एक साल तक चली.” आखिर में चंद्राणी को तथाकथित ‘स्पेशल केस’ के तौर पर एडमिशन दिया गया. माइनिंग फील्ड में जॉब भी बड़ी मशक्कत के बाद मिली. उन्हें साल 2001 में पहली नौकरी CSIR में मिली थी. चंद्राणी बताती हैं कि एक बार माइन साइट पर एक दिक्कत हुई थी, उसकी जांच के लिए केवल वो ही वहां मौजूद थीं. उन्होंने अपना काम बखूबी किया, लेकिन उनके काम को लेकर बाकी लोग निश्चित नहीं हुए, केवल इसलिए कि वो एक महिला थीं. वो कहती हैं कि जैसे-जैसे औरतें इस प्रोफेशन से जुड़ेंगी, माइन्स में भी लोगों का एटिट्यूड बदलेगा. 44 बरस की डॉक्टर चंद्राणी इस वक्त सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च नागपुर में प्रिंसिपल साइंटिस्ट हैं.

आकांक्षा, चंद्राणी के अलावा माइनिंग में और भी औरतें आगे आ रही हैं. कुछ ही दिन पहले ‘हिंदुस्तान ज़िंक’ की माइन में संध्या रासकतला को सेकंड क्लास माइनिंग मैनेजर बनाया गया था. ‘हिंदुस्तान ज़िंक’ की वेबसाइट के मुताबिक, वो अंडरग्राउंड माइनिंग ऑपरेशन को मैनेज करने वाली देश की पहली महिला हैं. माइनिंग में कितनी औरतें हैं, इसका सटीक डाटा तो हमें नहीं मिला, लेकिन इतना कन्फर्म है कि ये संख्या पुरुषों के मुकाबले काफी कम है. कारण कई हैं, जो हमने आपको बताए. नियम, नज़रिया और दस तरह की पारिवारिक पाबंदियां. उम्मीद है आगे चलकर हम इस फील्ड में और भी लड़कियों को देखेंगे.


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