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ये पोस्टर आपको भावुक करता है तो आपको अपनी सोच बदलने की सख्त ज़रूरत है

अरुण बोथरा. ट्विटर पर सबसे ज्यादा एक्टिव रहने वाले IPS अफसरों में से एक. अलग-अलग मुद्दों पर अपनी राय वो ट्वीट ज़रूर करते हैं. आदतन, उन्होंने एक तस्वीर ट्वीट की. और उस पर लोगों के अजीबोगरीब कमेंट्स आने लगे.

दरअसल जो तस्वीर अरुण बोथरा ने ट्वीट की वो किसी दीवार पर बना एक पोस्टर था. जिसमें एक बच्ची रोटी बेलती हुई दिख रही थी. और लिखा था, “कैसे खाओगे उनके हाथ की रोटियां, जब पैदा ही नहीं होने दोगे बेटियां.”

इस पोस्टर से बेटी बचाने का मैसेज जाए न जाए, ये मैसेज जरूर जा रहा है कि बेटी का जन्म रोटी बनाने के लिए ही होता. अरुण बोथरा ने फोटो ट्वीट करते हुए लिखा,

“एक तस्वीर 1000 शब्दों के बराबर होती है. पर इन 13 शब्दों की कीमत क्या है?”

इसी के थ्रेड में उन्होंने लिखा,

“ये देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया. लेखक और इस तरह का पोस्टर लगाने वाले का माइंडसेट दिखाने के लिए इसे यहां लगाया.”

इसके बाद तमाम लोग इस पर अलग-अलग और अजीब-अजीब तरह के जवाब देने लगे. कुछ उदाहरण देखिए,

एक शख्स ने लिखा,

“सर एक पिता से पूछिए, बेटी के हाथ से बनी आधी जली, आधी कच्ची रोटी का स्वाद कैसा होता है. थोड़ा सोचने का तरीका भी बदलना होता है.”

“मुझे समझ नहीं आता ये लोग इतना पैट्रिआर्की, पैट्रिआर्की क्यों करते हैं. ज्यादा ईशू है तो अपनी मां को मना कर दो खाना बनाने को. खुद बनाओ. लड़कियां आज़ाद हैं अपने तरीके से जीने के लिए. लेकिन अपनों के लिए खाना बनाने में कौन सी बैकवर्डनेस आ गई.”

एक शख्स ने तो ये तक लिख दिया कि अब कुछ लोग इतने ‘स्वीट मैसेज’ को हटाने के लिए भी अरुण बोथरा से कहेंगे. इस पर IPS बोथरा ने जवाब दिया कि वो मैसेज बिल्कुल भी स्वीट नहीं है. और वो उसे बिल्कुल भी डिलीट नहीं करेंगे.

माने इन लोगों को समझ में ही नहीं आया कि उस पूरे ऐडवर्डिजमेंट में दिक्कत क्या थी. पर सारे लोग ऐसे नहीं थे. कुछ लोगों ने उस पोस्टर के पीछे की घटिया सोच पर लिखा.

सुरभी नाम की यूजर ने लिखा, “लोगों को जागरुक करने के लिए भेजा गया सामाजिक संदेश किस तरह से एकदम गलत मैसेज देता है, यह विज्ञापन इसी बात का उदाहरण है.”

नीलेश मिश्रा ने लिखा,

“आग्रहपूर्वक कहूंगा कि ऐसे संदेश अच्छी नीयत के बावजूद बहुत नुकसान करते हैं. बेटियां और माएं ही अधिकांशत: रोटियां बनाती होंगी. लेकिन उनका काम सिर्फ रोटियां बनाना नहीं है. ऐसे स्टीरियोटाइप पनपते हैं. इसके लिए हम, इनके लेखक जिम्मेदार हैं. जैसे- मैंने चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं.”

 

सृष नाम की यूज़र ने लिखा- अगर आप बेटी को केवल इसलिए जन्म देना चाहते हैं क्योंकि वो आपके लिए रोटी बनाएगी, तो आप बेटी के बिना ही अच्छे हैं.

आशिमा नाम की यूजर ने लिखा,

“इस तरह के संदेश से पैट्रियार्की का मुकाबला पैट्रियार्की के जरिए ही किया जा रहा है.”

 

भ्रूण हत्या रोकने के मकसद से तैयार किया गया ये पोस्टर कुछ लोगों को इमोशनल अपील करता नज़र आ सकता है. लेकिन गौर से देखेंगे तो इसके पीछे औरत को रसोई तक समेटकर रखने वाली सोच नज़र आती है. वो सोच जिसमें लोग मान बैठे हैं कि घर संभालना, चूल्हा-चौका केवल औरत का काम है. वो सोच जो कहती है कि लड़की आएगी नहीं तो तुम्हारे काम करके कौन देगा?

तमाम स्टडीज़ में सामने आ चुका है कि औरतें जितना काम करती हैं, उसके बदले अगर उन्हें पैसे देने पड़ें, तो तमाम देशों की जीडीपी उनके काम के आगे बौनी पड़ जाए. लेकिन इसके बाद भी उनके काम की कद्र नहीं की जाती. रसोई को उसकी ही जिम्मेदारी बना दिया जाता है. और ये जिम्मेदारी केवल हाउस वाइव्स के जिम्मे नहीं आती, दफ्तर जाने वाली औरतों के सिर भी आती है. बदले में मदर्स डे, सिस्टर्स डे, डॉटर्स डे, गर्ल चाइल्ड डे… तो हम मनाते ही हैं.


 

 

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